परिचय तुलसी - (ऑसीमम सैक्टम) एक द्विबीजपत्री तथा शाकीय, औषधीय पौधा है। यह झाड़ी के रूप में उगता है और १ से ३ फुट ऊँचा होता है। इसकी पत्तियाँ बैंगनी आभा वाली हल्के रोएँ से ढकी होती हैं। पत्तियाँ १ से २ इंच लम्बी सुगंधित और अंडाकार या आयताकार होती हैं। पुष्प मंजरी अति कोमल एवं ८ इंच लम्बी और बहुरंगी छटाओं वाली होती है, जिस पर बैंगनी और गुलाबी आभा वाले बहुत छोटे हृदयाकार पुष्प चक्रों में लगते हैं। बीज चपटे पीतवर्ण के छोटे काले चिह्नों से युक्त अंडाकार होते हैं। नए पौधे मुख्य रूप से वर्षा ऋतु में उगते है और शीतकाल में फूलते हैं। पौधा सामान्य रूप से दो-तीन वर्षों तक हरा बना रहता है। इसके बाद इसकी वृद्धावस्था आ जाती है। पत्ते कम और छोटे हो जाते हैं और शाखाएँ सूखी दिखाई देती हैं। इस समय उसे हटाकर नया पौधा लगाने की आवश्यकता प्रतीत होती है। प्रजातियाँ तुलसी की सामान्यतः निम्न प्रजातियाँ पाई जाती हैं: ऑसीमम अमेरिकन (काली तुलसी) गम्भीरा या मामरी। ऑसीमम वेसिलिकम (मरुआ तुलसी) मुन्जरिकी या मुरसा। ऑसीमम वेसिलिकम मिनिमम। आसीमम ग्रेटिसिकम (राम तुलसी / वन तुलसी / अरण्यतुलसी)। ऑसीमम किलिमण्डचेरिकम (कर्पूर तुलसी)। ऑसीमम सैक्टम तथा ऑसीमम विरिडी। इनमें ऑसीमम सैक्टम को प्रधान या पवित्र तुलसी माना गया जाता है, इसकी भी दो प्रधान प्रजातियाँ हैं- श्री तुलसी जिसकी पत्तियाँ हरी होती हैं तथा कृष्णा तुलसी जिसकी पत्तियाँ निलाभ-कुछ बैंगनी रंग लिए होती हैं। श्री तुलसी के पत्र तथा शाखाएँ श्वेताभ होते हैं जबकि कृष्ण तुलसी के पत्रादि कृष्ण रंग के होते हैं। गुण, धर्म की दृष्टि से काली तुलसी को ही श्रेष्ठ माना गया है, परन्तु अधिकांश विद्वानों का मत है कि दोनों ही गुणों में समान हैं। तुलसी का पौधा हिंदू धर्म में पवित्र माना जाता है और लोग इसे अपने घर के आँगन या दरवाजे पर या बाग में लगाते हैं। भारतीय संस्कृति के चिर पुरातन ग्रंथ वेदों में भी तुलसी के गुणों एवं उसकी उपयोगिता का वर्णन मिलता है। इसके अतिरिक्त ऐलोपैथी, होमियोपैथी और यूनानी दवाओं में भी तुलसी का किसी न किसी रूप में प्रयोग किया जाता है। तुलसी का औषधीय महत्व भारतीय संस्कृति में तुलसी को पूजनीय माना जाता है, धार्मिक महत्व होने के साथ-साथ तुलसी औषधीय गुणों से भी भरपूर है। आयुर्वेद में तो तुलसी को उसके औषधीय गुणों के कारण विशेष महत्व दिया गया है। तुलसी ऐसी औषधि है जो ज्यादातर बीमारियों में काम आती है। इसका उपयोग सर्दी-जुकाम, खॉसी, दंत रोग और श्वास सम्बंधी रोग के लिए बहुत ही फायदेमंद माना जाता है। तुलसी के गुण तुलसी में गजब की रोगनाशक शक्ति है। विशेषकर सर्दी, खांसी व बुखार में यह अचूक दवा का काम करती है। इसीलिए भारतीय आयुर्वेद के सबसे प्रमुख ग्रंथ चरक संहिता में कहा गया है। - तुलसी हिचकी, खांसी,जहर का प्रभाव व पसली का दर्द मिटाने वाली है। इससे पित्त की वृद्धि और दूषित वायु खत्म होती है। यह दूर्गंध भी दूर करती है। - तुलसी कड़वे व तीखे स्वाद वाली दिल के लिए लाभकारी, त्वचा रोगों में फायदेमंद, पाचन शक्ति बढ़ाने वाली और मूत्र से संबंधित बीमारियों को मिटाने वाली है। यह कफ और वात से संबंधित बीमारियों को भी ठीक करती है। - तुलसी कड़वे व तीखे स्वाद वाली कफ, खांसी, हिचकी, उल्टी, कृमि, दुर्गंध, हर तरह के दर्द, कोढ़ और आंखों की बीमारी में लाभकारी है। तुलसी को भगवान के प्रसाद में रखकर ग्रहण करने की भी परंपरा है, ताकि यह अपने प्राकृतिक स्वरूप में ही शरीर के अंदर पहुंचे और शरीर में किसी तरह की आंतरिक समस्या पैदा हो रही हो तो उसे खत्म कर दे। शरीर में किसी भी तरह के दूषित तत्व के एकत्र हो जाने पर तुलसी सबसे बेहतरीन दवा के रूप में काम करती है। सबसे बड़ा फायदा ये कि इसे खाने से कोई रिएक्शन नहीं होता है। तुलसी की मुख्य जातियां- तुलसी की मुख्यत: दो प्रजातियां अधिकांश घरों में लगाई जाती हैं। इन्हें रामा और श्यामा कहा जाता है। - रामा के पत्तों का रंग हल्का होता है। इसलिए इसे गौरी कहा जाता है। - श्यामा तुलसी के पत्तों का रंग काला होता है। इसमें कफनाशक गुण होते हैं। यही कारण है कि इसे दवा के रूप में अधिक उपयोग में लाया जाता है। - तुलसी की एक जाति वन तुलसी भी होती है। इसमें जबरदस्त जहरनाशक प्रभाव पाया जाता है, लेकिन इसे घरों में बहुत कम लगाया जाता है। आंखों के रोग, कोढ़ और प्रसव में परेशानी जैसी समस्याओं में यह रामबाण दवा है। - एक अन्य जाति मरूवक है, जो कम ही पाई जाती है। राजमार्तण्ड ग्रंथ के अनुसार किसी भी तरह का घाव हो जाने पर इसका रस बेहतरीन दवा की तरह काम करता है। पौधे का परिचय वैज्ञानिक नाम : ओसिमम सेक्टम सामान्य नाम : तुलसी पौधे की जानकारी उपयोग : तुलसी का उपयोग भारत मे व्यापक रूप से पूजा में किया जाता है। इसके उपयोग से त्वचा और बालों में सुधार होता हैं। यह रक्त शर्करा के स्तर को भी कम करती है और इसका चू्र्ण मुँह के छालों के लिए प्रयोग किया जाता है। इसकी पत्तियों के रस को बुखार, ब्रोकाइटिस, खांसी, पाचन संबंधी शिकायतों में देने से राहत मिलती है। कान के दर्द में भी तुलसी के तेल का उपयोग किया जाता है। यह मलेरिया और डेंगू बुखार को रोकने के लिए एक निरोधक के रूप में काम करता है। लोशन, शैम्पू, साबुन और इत्र में कास्मेटिक उघोग में तुलसी तेल का उपयोग किया जाता है। कुछ त्वचा के मलहम और मुँहासे के उपचार में भी इसका प्रयोग किया है। मधुमेह, मोटापा और तंत्रिका विकार के इलाज में इसका उपयोग किया जाता है। 10. यह पेट में ऐंठन, गुर्दे की स्थिति और रक्त परिसंचरण को बढ़ावा देने में उपयोगी होता है। 11. इसके बीज मूत्र की समस्याओं के इलाज में इस्तेमाल किये जाते है। उपयोगी भाग : संपूर्ण भाग उत्पादन क्षमता : 2.4 से 3 टन/हेक्टेयर/वर्ष सूखी पत्तियाँ। उत्पति और वितरण यह संपूर्ण भारत में पाया जाता है। मध्यप्रदेश में यह समान्य रूप से मिलता है। तुलसी भारत में एक पवित्र पौधे के रूप में ऊगाई जाती है। इसे मंजरी या कृष्णा तुलसी के नाम से भी जाना जाता है। अंग्रेजी में इसे होली बेसिल कहा जाता है। यह पौधा संपूर्ण दुनिया में नम मिट्टी में स्वभाविक रूप से मिलता है। भारत में हिन्दू तुलसी को अपने घरो, मंदिरो और खेतों में एक धार्मिक पौधे के रूप उगाते है। वे इसकी पत्तियो का उपयोग नियमित पूजा में करते है। भारतीय पौराणिक कथाओं में तुलसी से संबधित असंख्य संदर्भ हैं। इसे गमलो और घरो के बगीचे में भी उगाया जाता है। स्वरूप: तुलसी एक शाखायुक्त, सुगंधित और सीधा रोयेदार शाकीय पौधा है। इसकी लाल या बैंगनी चतुष्कीणीय शाखाएँ होती है। पत्तिंया : पत्तियाँ साधारण, एक दूसरे के विपरीत ओर, दांतेदार किनारों पर अण्डाकार, काली बैंगनी रंग की होती है। पत्तियाँ लगभग 3-5 से.मी. लंबी और 1.5 से 2 से.मी़. चौड़ी होती है। फूल : फूल छोटे, बैंगनी और पुष्पक्रम लगभग 12-14 से.मी. लंबे होते है। फल : फल छोटे, चिकने और लाल से भूरे रंग के होते है। फल 1.5 मिमी लंबे और 1 मिमी चौड़े होते है। बीज : बीज छोटे, अंडाकार, समतल लाल या काले धब्बों के साथ पीले रंग के होते है। परिपक्व ऊँचाई : परिपक्व होने पर यह 75-90 से.मी. की ऊँचाई तक बढ़ता है। बुवाई का समय जलवायु : यह पौधा समान्य से उच्च वर्षा और नम स्थितियो में अच्छी तरह पनपता है। लंबे दिन और उच्च तापमान पौधों की वृध्दि और तेल के उत्पादन के लिए अनुकूल पाये जाते है। इसकी खेती के लिए दोनों उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय जलवायु उपयुक्त होती है। इसे 140 – 300 C तापमान की आवश्यकता होती है। भूमि : सभी प्रकार की मिट्टी में यह अच्छी तरह पनपता है। खनिज युक्त दोमट मिट्टी से लेकर बिना खनिज वाली मिट्टी, क्षारीय से लेकर अम्लीय मिट्टी में इसकी खेती अच्छी तरह की जा सकती है। अच्छी जल निकासी की मिट्टी में इसका वनस्पतिक विकास अच्छा होता है। जल भराव की स्थिति से बचना चाहिए। मिट्टी का pH मान 6.5 - 8 होना चाहिए। बुवाई-विधि भूमि की तैयारी : खेत को अच्छी तरह जोतकर और हेरो चलाकर क्यारियाँ बना ली जाती है| अच्छी से मिश्रित मिट्टी में मिलाना चाहिए। फसल पद्धति विवरण : तुलसी बीज आसानी से अंकुरित हो जाते है। चूंकि बीज छोटे होते है इसलिए इन्हे रेत और लकड़ी की राख के मिश्रण के साथ मिलाया जाता है। बीज अप्रैल – मई के महीनों के दौरान बोये जाते है। उन्हे समय – समय पर पानी दिया जाता है और अंकुरण एक से दो सप्ताह बाद होता है। रोपाई: 6 से 10 से.मी. लंबे अंकुरित पौधो को जुलाई - अगस्त माह में पहाड़ी क्षेत्रों में और अक्टूबर - नवंबर माह में समतल क्षेत्रों में लगाया जाता है। पौधो को पंक्तियों में 40 से.मी. की दूरी पर लगाया जाता है। रोपण के तुंरत बाद खेत की सिंचाई की जाती है। पौधशाला प्रंबधन नर्सरी बिछौना-तैयारी: क्यारियों को अच्छी तरह तैयार किया जाता है। गोबर की खाद या वर्मी कम्पोस्ट का प्रयोग किया जाता है। बीज नर्सरी में बोये जाते है। एक हेक्टेयर भूमि के लिए लगभग 20-30 कि.ग्रा. बीजों की आवश्यकता होती है। बुवाई के बाद FYM और मिट्टी के मिश्रण की पतली परत को बीजों के ऊपर फैलाया जाता है। स्पिंक्लिर द्दारा सिंचाई की जाती है। बीज अंकुरण के लिए 8-12 दिन का समय लेते है और लगभग 6 सप्ताह के बाद पौधे रोपण के लिए तैयार हो जाते है। उत्पादन प्रौद्योगिकी खेती खाद : इसे कम उर्वरक की आवश्यकता होती है। बहुत ज्यादा उर्वरक से पौधा जल जाता है। कभी भी बहुत गर्म या ठंडे मौसम में उर्वरक नही डालना चाहिए। रोपण के समय आधारीय खुराक के रूप में मिट्टी में 40 कि.ग्रा./हे. P की मात्रा दी जाती है। पौधे के विकास के दौरान 40 कि.ग्रा./हे. N की मात्रा दो भागों में विभाजित करके दी जाती है। सिंचाई प्रबंधन : रोपण के बाद विशेष रूप से मानसून के अंत में खेत की सिंचाई की जाती है। दूसरी सिंचाई के बाद पौधे अच्छी तरह जम जाते है। अंतराल को भरने और कमजोर पौधो को अलग करने का यह सही समय होता है ताकि एक समानता को प्राप्त किया जा सकें। गार्मियो में 3-4 बार सिंचाई की आवश्यकता होती है जबकि शेष अवधि के दौरान आवश्यकता के अनुसार सिंचाई की जाती है। लगभग 20 - 25 बार सिंचाई देना पर्याप्त होता है। घसपात नियंत्रण प्रबंधन : रोपण के पहले गहरी जुताई करना चाहिए। खरपतवार की सभी जड़े हाथों से एकत्रित करके हटा दी जाती है। अच्छे प्रंबधन के अंतर्गत खेत को खरपतवार मुक्त रखने के लिए 4 या 5 बार निंदाई की आवश्यकता होती है। निराई को हाथ से या ट्रेक्टर चालित कल्टीवेटर द्दारा किया जा सकता है। कटाई तुडाई, फसल कटाई का समय : तुड़ाई एक चमकदार धूप वाले दिन में की जानी चाहिए। रोपण के बाद 90-95 दिन बाद फसल प्रथम तुडाई के लिए तैयार हो जाती है। पत्ती उत्पादन के लिए फूलों के प्रारंभिक स्तर पर पत्तियों की तुड़ाई की जाती है। फसल को जमीनी स्तर से 15-20 से.मी ऊपर काटा जाता है । कटाई इस प्रकार की जाती है कि शाखाओं को काटने के बाद बचे हुए तने की फिर से उत्पत्ति हो सके। अखिरी कटाई के दौरान संपूर्ण पौधे को उखाड़ा जाता है। फसल काटने के बाद और मूल्य परिवर्धन सुखाना : इसे पतली परत बनाकर छायादार स्थान में 8-10 दिनों के लिए सुखाया जाता है। इसे अच्छे हवादार एवं छायादार स्थान में ही सुखाना चाहिए। आसवन: तुलसी तेल को आंशिक रूप से सूखी जड़ी बूटी के भाप आसवन के द्दारा प्राप्त किया जाता है। आसवन सीधे अग्नि प्रज्जवलन भट्रटी द्दारा किया जाता है जो भाप जनेरटर द्दारा संचालित होता है। पैकिंग : वायुरोधी थैले इसके लिए आदर्श होते है। नमी के प्रवेश को रोकने के लिए पालीथीन या नायलाँन थैलों में पैक किया जाना चाहिए। भडांरण: पत्तियों को शुष्क स्थानों में संग्रहित करना चाहिए। गोदाम भंडारण के लिए आदर्श होते है। शीत भंडारण अच्छे नहीं होते है। परिवहन : सामान्यत: किसान अपने उत्पाद को बैलगाड़ी या टैक्टर से बाजार तक पहुँचता हैं। दूरी अधिक होने पर उत्पाद को ट्रक या लाँरियो के द्वारा बाजार तक पहुँचाया जाता हैं। परिवहन के दौरान चढ़ाते एवं उतारते समय पैकिंग अच्छी होने से फसल खराब नही होती हैं। अन्य-मूल्य परिवर्धन तुलसी अदरक तुलसी चूर्ण तुलसी चाय तुलसी कैप्सूल पंच तुलसी तेल मच्छरों के काटने से होने वाली बीमारी में फायदा मच्छरों के काटने से होने वाली बीमारी, जैसे मलेरिया में तुलसी एक कारगर औषधि है। तुलसी और काली मिर्च का काढ़ा बनाकर पीने से मलेरिया जल्दी ठीक हो जाता है। जुकाम के कारण आने वाले बुखार में भी तुलसी के पत्तों के रस का सेवन करना चाहिए। इससे बुखार में आराम मिलता है। शरीर टूट रहा हो या जब लग रहा हो कि बुखार आने वाला है तो पुदीने का रस और तुलसी का रस बराबर मात्रा में मिलाकर थोड़ा गुड़ डालकर सेवन करें, आराम मिलेगा। - साधारण खांसी में तुलसी के पत्तों और अडूसा के पत्तों को बराबर मात्रा में मिलाकर सेवन करने से बहुत जल्दी लाभ होता है। - तुलसी व अदरक का रस बराबर मात्रा में मिलाकर लेने से खांसी में बहुत जल्दी आराम मिलता है। - तुलसी के रस में मुलहटी व थोड़ा-सा शहद मिलाकर लेने से खांसी की परेशानी दूर हो जाती है। - चार-पांच लौंग भूनकर तुलसी के पत्तों के रस में मिलाकर लेने से खांसी में तुरंत लाभ होता है। - शिवलिंगी के बीजों को तुलसी और गुड़ के साथ पीसकर नि:संतान महिला को खिलाया जाए तो जल्द ही संतान सुख की प्राप्ति होती है। - किडनी की पथरी में तुलसी की पत्तियों को उबालकर बनाया गया काढ़ा शहद के साथ नियमित 6 माह सेवन करने से पथरी मूत्र मार्ग से बाहर निकल जाती है। - फ्लू रोग में तुलसी के पत्तों का काढ़ा, सेंधा नमक मिलाकर पीने से लाभ होता है। - तुलसी थकान मिटाने वाली एक औषधि है। बहुत थकान होने पर तुलसी की पत्तियों और मंजरी के सेवन से थकान दूर हो जाती है। - प्रतिदिन 4- 5 बार तुलसी की 6-8 पत्तियों को चबाने से कुछ ही दिनों में माइग्रेन की समस्या में आराम मिलने लगता है। - तुलसी के रस में थाइमोल तत्व पाया जाता है। इससे त्वचा के रोगों में लाभ होता है। - तुलसी के पत्तों को त्वचा पर रगड़ दिया जाए तो त्वचा पर किसी भी तरह के संक्रमण में आराम मिलता है। - तुलसी के पत्तों को तांबे के पानी से भरे बर्तन में डालें। कम से कम एक-सवा घंटे पत्तों को पानी में रखा रहने दें। यह पानी पीने से कई बीमारियां पास नहीं आतीं। - दिल की बीमारी में यह अमृत है। यह खून में कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करती है। दिल की बीमारी से ग्रस्त लोगों को तुलसी के रस का सेवन नियमित रूप से करना चाहिए। स्त्रोत: कृषि विभाग, झारखण्ड सरकार ; ज़ेवियर समाज सेवा संस्थान कैसें करें तुलसी पौधे की खेती, बड़े और व्यवसायिक तौर पे : देखिए यह विडियो