वेटिवर (खस) की खेती मुख्य रूप आवश्यक तेल की निकासी के लिए की जाती है। इसकी जड़ से आय के साथ-साथ इसकी घनी जड़ प्रणाली के कारण, यह मृदा और जल संरक्षण दोनों में उपयोगी है। वेटिवर रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों में विषाक्त पदार्थको अवशोषित करता है और मृदा की भौतिक दशा में सुधार करता है। यह पौधा मृदा कटाव को रोकने में अच्छा मददगार होता है। इसलिए मृदा के बाइंडर के रूप में इसका उपयोग उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अब ज्यादा होने लगा है। वेटिवर (वेटिवेरिया जिजानोइडेस) उत्तरऔर पश्चिम भारत में खस के नाम से जाना जाता है। यह पोएसी परिवार की, एक बारहमासी घास है। वेटिवर भारत के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगाया जाता है। यह एक प्रमुख औद्योगिक घास फसल है और इसका उपयोग बड़े पैमाने पर दुनियाभर में आवश्यक तेल एवं स्वाद और सुगंध उत्पाद बनाने वाले उद्योग में किया जाता है। वेटिवर का उपयोग जैविक खाद के उत्पादन में भी किया जाता है। इसकी जड़ प्रणाली काफी बारीक, संरचित एवं बहुत मजबूत होती है। अधिकांश घासों में जड़ प्रणाली क्षैतिज रूप से और चटाई जैसी फैलती है, इसके विपरीत, वेटिवर की जड़ें रेशेदार और जमीन के नीचे 2-4 मीटर गहराई में मजबूती के साथ नीचे बढ़ती हैं। इसकी जड़ों से निकलने वाले सुगंधित आवश्यक तेल में मुख्य रासायनिक घटक बेंजोइक एसिड, वीटिवरोल, फुरफुरोल, वैटिवोन और वैटिवीन हैं। अपने उत्कृष्ट सुधारक गुण के कारण यह व्यापक रूप से इत्र के व्यवसाय में उपयोग किया जाता है। वेटिवर की सूखी जड़ों का उपयोग चटाई, पंखे, स्क्रीन, तकिए, बास्केट, सुगंधित अगरबत्ती और पाउच बैग बनाने के लिए भी किया जाता है। प्रमुख उत्पादन क्षेत्र वेटिवर, भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और मलेशिया के लिए स्वदेशी पौधा है। भारत में यह पफसल व्यवस्थित रूप में राजस्थान, उत्तर प्रदेश, केरल, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश राज्यों में उगाई जाती है। देश में लगभग 20-25 टन वेटिवर तेल का उत्पादन किया जाता है। इसमें उत्तर प्रदेश इसके तेल का सबसे अधिक मात्रा में उत्पादन करता है, जो कि मुख्यतः जंगली स्रोत के माध्यम से लिया जाता है। उत्तर भारत में उत्पादित वेटिवर तेल की गुणवत्ता उच्चतम श्रेणी की होती है और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसकी बहुत अधिक कीमत मिलती है। मृदा वेटिवर को लगभग सभी प्रकार की मृदाओं में उगाया जा सकता है। हालांकि, हल्की मृदाओं में पैदा होने वाली जड़ों में तेल का प्रतिशत काफी कम होता है। इसलिए दोमट रेतीली और लाल मृदा, जो जैविक पदार्थों से भरपूर एवं जिसमें पानी का समुचित निकास हो, इसकी खेती के लिए आदर्श मानी जाती है। परिपक्व वेटिवर जलभराव की स्थिति में भी जीवित रहता है। यह क्षारीय मृदा, जिसका पी-एच मान 8.5 से 10 हो, उसमें भी उगाया जा सकता है। वेटिवर प्रदूषित पानी में घुलित भारी धातुओं को भी अवशोषित करता है एवं आर्सेनिक, कैडमियम, क्रोमियम, निकल, सीसा, पारा, सेलेनियम और जस्ता को सहन कर सकता है। वेटिवर की किस्में भारत में, ‘दक्षिण’ और ‘उत्तर’ भारतीय नाम की दो प्रकार की वेटिवर किस्मों की आमतौर पर खेती की जाती है। उत्तर भारतीय प्रकार की वेटिवर की पैदावार बेहतर और इसमें गुणवत्तायुक्ततेल होता है, लेकिन इसकी जड़ें नम मैदान में ज्यादा गहराई में नहीं जाती हैं। दक्षिण भारतीय प्रकार के वेटिवर का प्रयोग मुख्यतः व्यवस्थित खेती के लिये होता है। इसके तने मोटे, कम शाखाओं वाली जड़ें, चौड़ी पत्तियां एवं बिना बीज वाला पौधा होता है। दक्षिण भारतीय प्रकार में, पूसा हाइब्रिड-7, हाइब्रिड-8, सीमैप के एस-2, सुगंधा, के एच-8, के एच-४० और ओडी भी-3 किस्में व्यावसायिक खेती के लिए उपलब्ध हैं। जलवायु वेटिवर की खेती सामान्यतः सभी प्रकार की जलवायु में की जा सकती है। यह 15 डिग्री सेल्सियस से 55 डिग्री सेल्सियस तापमान को सहन कर सकता है। इसकी जड़ों की वृद्धि एवं विकास के लिए 25 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त होता है एवं 5 डिग्री सेल्सियस से नीचे इसकी जड़ों का विकास रुक जाता जाता है। अत्यधिक ठंडी परिस्थितियों में इसके तने सुषुप्तावस्था में बैंगनी रंग के हो जाते हैं या मर जाते हैं। भूमिगत बढ़वार वाला हिस्सा जीवित रहता है और अनुकूल परिस्थितियां आते ही, इसकी स्थिति में सुधार होता है और फिर से अपनी बढ़वार प्राप्त कर लेता है। यह सूखा, बाढ़, जलमग्नता के लिए सहनशील है। प्रसार विधि वेटिवर को बीज या स्लिप के माध्यम से प्रसारित किया जा सकता है, आमतौर पर स्लिप का इस्तेमाल किया जाता है। स्लिप के माध्यम से प्रसारित पौधों में सीमित विविधता दिखाई देती है, जबकि, बीज से विकसित पौधों में विविधता दिखाई देती है, जो नई किस्मों के विकास एवं प्रसार के उपयोग में लाया जाता है। उत्तर भारतीय किस्मों में, प्राकृतिक रूप से खुद व खुद बीज से इसका प्रसार स्वतः होता रहता है। बीज की उपज 400-650 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर के बीच होती है। रोपण का समय एवं विधि वेटिवर रोपण का सबसे उपयुक्त समय मानसून की शुरुआत या जून-अगस्त का महीना होता है। दक्षिण भारतीय परिस्थितियों में, जहां मानसून की शुरुआत जल्दी होती है, इसके रोपण का समय फरवरी-अप्रैल है। स्लिप को राइजोम के साथ क्लंप से अलग किया जाता है एवं तने के हिस्से का 15-20 सें.मी. हिस्सा रखकर बाकी सारी पत्तियों को हटा देते हैं। इसके बाद 10 सें.मी. की गहराई के साथ 60x30 सें.मी./60X45 सें.मी. 160X60 सें.मी. के अंतराल पर लगा देते हैं। पौधों की संख्या 27,800 से 1,10,000 पौधे/हैक्टर होती है। यदि सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो, तो मार्च-अप्रैल का समय रोपण के लिए उपयुक्त होता है। वेटिवर की कटाई वेटिवर की जड़ों की कटाई, उपज और तेल का प्रतिशत पर्यावरण में बदलाव के साथ बदलता है। रोपण के 15-24 महीनों के बाद जड़ों को काटा जाता है। जल्द कटाई से तेल की अधिक उपज होती है, लेकिन तेल में विशिष्ट गुरुत्व और मूल्यवान उबलते घटकों की कमी होती है। यदि जड़ें दो वर्ष तक जमीन में रहती हैं, तो तेल की गुणवत्ता में सुधार होता है, लेकिन पैदावार काफी कम हो जाती है। आमतौर पर फसल की कटाई दिसंबर-फरवरी के दौरान की जाती है। प्रसंस्करण वेटिवर को 5-10 सें.मी. नीचे से छोड़कर ऊपरी भागों को काटकर हटा लेते हैं, फिर नीचे के भाग को पानी से धो लेते हैं। इसके बाद आसवन (तेल निकालने की विधि) से पहले 1-2 दिनों के लिए छाया में सुखा लिया जाता है। सुखाने के बाद, हाइड्रो या भाप आसवन विधि के माध्यम से जड़ों से तेल निकाला जाता है। उत्तर भारतीय किस्मों में आसवन की प्रक्रिया 12-14 घंटों में पूरी होती है, जबकि दक्षिण भारतीय किस्मों में 72-96 घंटे की लंबी अवधि की आवश्यकता होती है। इसमें कम वाष्पशील तेल और उच्च क्वथनांक होते हैं। आसवन पूरा होने के बाद इसे दूसरे बर्तन में डालकर फिल्टर कर लेते हैं। आसुत तेल में 20 ग्राम/लीटर की दर से सोडियम सल्फेट या साधारण नमक डालकर इसमें अतिरिक्त नमी को हटाते हैं। संग्रहीत जड़ों से प्राप्त तेल ताजा कटी हुई जड़ों से प्राप्त तेल की तुलना में अधिक चिपचिपा और बेहतर सुगंध वाला होता है। इसकी ताजा जड़ों को आसवन के लिए कम समय की आवश्यकता होती है और ये अधिक तेल उपज देती हैं। स्त्राेत : खेती पत्रिका, चंदन कुमार और धीरज सिंह’ -भाकृअनुप-काजरी, कृषि विज्ञान केंद्र, पाॅली- मारवाड़-306401 (राजस्थान), दीपक कुमार गुप्ता-भाकृअनुप भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, गौरीया कर्मा , बरही, हजारीबाग-825405 (झारखंड)