भूमिका अश्वगंधा कम लागत से होनेवाला एक बहुमूल्य औषधीय पौधा है। मुख्य रूप से यह शक्तिवर्द्धकऔषधि है। शक्तिवर्द्धक होने के कारण इसका नाम “अश्व” से है। पौधे के कच्चे जड़ से “अश्व” जैसी गंध आती है इसलिए इसे अश्वगंधा कहते है। अश्वगंधा की वीन्टरचेरी भी कहते है। यह एक नगदी फसल है तथा 35000-40000 हजार प्रति हेक्टेयर की आमदनी छ: महीने में प्राप्त किया जा सकता है। अश्वगंधा एक झाड़ीदार 2-3 फीट की ऊँचाई का बहुशाखीय, काँटा रहित पौधा है। एक स्वस्थ पौधे में लगभग 30 सेंटीमीटर लम्बी, मुलायम तथा कड़वी जड़ पायी जाती है। मुख्य रूप से जड़ को औषधि के रूप में प्रयोग करते है। वैसे पत्तियाँ तथा बीज का उपयोग भी औषधि के रूप में होता है। इस पौधे के तने रोयेंदार, हल्के हरे तथा जड़ें मोटी एवं मुसलाधार होती है। पत्ते 6-8 सेंटीमीटर लम्बे अंडाकार होते है। अश्वगंधा की जड़ों में 13 प्रकार के एक्लोलाइड पाये जाते हैं। जिसमें विथेफेरिन-ए विथेनोलीड विथानीन, टोरीन, अइसोवलीन, विदाखमिन तथा सोमेनीन प्रमुख हैं। औषधीय उपयोग सर्दी के दिनों में इसकी जड़ का चूर्ण बनाकर दूध के साथ सेवन करने से शारीरिक ताकत बढ़ता है। इसके सेवन से हिमोग्लोविन एवं लाल रक्तकण की मात्रा बढ़ती है। इसकी जड़ों को कामोदीपक के रूप में सेवन करने की सलाह वैद्य देते है। यह खाँसी में भी काम आता है। इसके लिए पत्तियों को पानी में उबालकर सेवन किया जाता है। यह गठिया एवं जोड़ों का दर्द तथा शरीर के सूजन में बहुत उपयोगी है। कैंसर में भी यह औषधि कारगर सिद्ध हो रहा है। अश्वगंधा के पत्तियों का लेप जोड़ों के सूजन के उपचार के लिए किया जाता है। कमर एवं कूल्हों के दर्द में इसके जड़ों का उपयोग किया जाता है। यह “मूड” बनाता है तथा चिंता को दूर करता है। मानसिक बीमारी में भी इसका उपयोग होता है। यह एन्टीबायोटिक तथा एन्टीबैक्टीरियल है। यह पेशाब बढ़ाता है। अश्वगंधा की खेती राजस्थान के जावद एवं पश्चिम मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले के मनास नीमच क्षेत्र में लगभग 5000 हेक्टेयर क्षेत्र में की जाती है। झारखंड के गर्म क्षेत्र गिरिडीह, कोडरमा, दुमका, देवघर, गढ़वा, गुमला इत्यादि उपयुक्त हैं। जलवायु इसके लिए गर्म जलवायु की आवश्यकता है। न्यूनतम तापक्रम 7-8 डिग्री से नीचे नहीं जाना चाहिए। इसकी खेती के लिए 600-800 मिलीमीटर वर्षा उपयुक्त है। तापक्रम 20 डिग्री से 35 डिग्री तक होने से अच्छी उपज मिलती है। जोड़े के दिनों में वर्षा होने से जड़ का विकास समुचित होता है। मिट्टी अश्वगंधा की खेती बलुई दोमट, हल्की लाल मिट्टी उपयुक्त है। जहाँ सिंचाई की सुविधा नहीं है तथा फ़ूड कॉप उगाना कठिन है वहाँ इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। मिट्टी की अम्लीयत 7.5 से 8.0 के बीच होना चाहिए। अम्लीय मिट्टी में चूना का प्रयोग लाभदायक होगा। खेत की तैयारी अश्वगंधा में कम खाद देने की आवश्यकता होती है। खेत की जुताई के बाद 20-30 क्विंटल गोबर की सड़ी खाद 15-20 किलो नाइट्रोजन, 25 किलो स्फूर प्रति हेक्टेयर देने से उपज में वृद्धि होती है। गर्मी में जुताई करना लाभदायक होता है। वर्षा ऋतु में खेत को खाली छोड़ते हैं। जब दो तिहाई वर्षा पूरी हो जाय तो बुआई करनी चाहिए। एक हेक्टेयर के लिए 5-7 किलो बीज की आवश्यकता होगी। बीज की बुआई मेढ़ पर 20-25 सेंटीमीटर के फासले पर करते हैं। बुआई के लिए 2-3 सेंटीमीटर गहरा नाली बनाते हैं तथा बीज के साथ बारीक गोबर मिलाकर बुआई करते हैं। बुआई के बाद बीज को हल्की खाद एन मिट्टी से ढँक दें। सामान्य रूप से 8-10 दिनों में अंकुरण हो जाता है। 25-30 दिन के बाद घने पौधे को निकाल देते हैं। प्रति वर्ग मीटर में 25-30 पौधा रखते हैं। दो दिन बाद निकाई-गुड़ाई तथा 1-2 बार सिंचाई की आवश्यकता होती है। बीज को पौधशाला में बुआई कर बिचड़ा भी तैयार किया जाता है। इसे 20 सें. x 15 सें. के फसले पर रोपाई करते हैं। अश्वगंधा की WSR Jawahar Ashwagandha-20 एवं अश्वगंधा-134 उन्नत प्रजातियाँ हैं। अश्वगंधा-134 अगात प्रजाति है जो 160-170 दिन में तैयार हो जाती है। फसल कटाई जुलाई में बोई गई फसल नवम्बर में फूलने लगती है। जड़ें 150-180 दिन में तैयार हो जाती है। जब पौधों की पत्तियाँ पीली पड़ जाय एवं फल लाल हो जाय तब फसल परिपक्व माना जाता है। जड़ों की खोदाई जनवरी माह में की जाती है। तना को काटकर अलग कर देते हैं। जड़ को अच्छी तरह से साफ़ कर 8-10 सेंटीमीटर के टुकड़ों में काटकर सुखा लिया जाता है। ज्यादा मोटाई वाली जड़ें अच्छी एवं कम मोटाई वाली जड़ें निम्न कोटि की मानी जाती है। इस प्रकार उन्नत खेती से लगभग 800-1000 किलो जड़ें एवं 40-60 किलो बीज प्रति हेक्टेयर प्राप्त किया जा सकता है। जड़ें लगभग 60-70 रुपया प्रति किलो बिक जाता है। सतावर की खेती सतावर एक काँटेदार महीन सूई आकार के पत्तियाँ वाला मध्यम लता है। सतावर के जड़ को औषधि के रूप में प्रयोग में लाते हैं। यह डेढ़ साल में तैयार होता है। यह पुष्टिवर्द्धक, माताओं में दूधवर्द्धक, पित्तशोधक औषधि है। सतावर के औषधीय उपयोग सतावर एक बहुत ही उपयोगी पारिवारिक औषधि है। इसका 2-3 ग्राम चूर्ण अथवा 5-10 कच्चा जड़ चूर कर दूध के साथ उबालकर खाते हैं। यह माताओं एवं पशु के स्तन में दूध बढ़ाने में उपयोगी है। यह स्त्रियों के लिए टॉनिक का काम करता है। यह पाचन सुधारने एवं भुख बढ़ाने में भी टॉनिक का काम करता है। सतावर का उपयोग पित्तशोधक के रूप में किया जाता है। यह शांति प्रदान करने वाला है इसलिए मानसिक रोग में भी इसका प्रयोग होता है। यह काम वासना बढ़ाने वाला है। पेशाब बढ़ाने में सतावर का उपयोगी है। एन्टी-डिसेंट्रिक होने के कारण यह डायरिया को रोकता है। यह अनिद्रा में उपयोगी है। सतावर का प्रयोग पीपल एवं शहद के साथ प्रयोग करने से गर्भाशय का दर्द मिटता है। ल्यूकोरिया एवं एनीमिया (खून की कमी) में यह लाभदायक है। जलवायु उष्ण आद्र जलवायु, तापक्रम 10-40 डिग्री सुखा को यह सहन करता है। भूमि सभी प्रकार की भूमि में की जा सकती है लेकिन हल्की बलुआही दोमट मिट्टी उपयुक्त है। अम्लीयता 7-8 के बीच में होनी चाहिए। बीजदर 12-15 किलो प्रति हेक्टेयर। खाद गोबर 25 टन (150 क्विंटल) नेत्रजन-40 किलो, फास्फोरस 40 किलो तथा पोटाश 40 किलो जमीन के अंतिम तैयारी के समय। बिचड़ा उगाना तथा रोपाई जून-जुलाई माह में बीज की बोआई नर्सरी में करते हैं तथा अगस्त माह में 40 सेंटीमीटर चौड़े मेड़ पर रोपाई करते हैं। मेड़ पर पौधे की दूरी 45 सेंटीमीटर रखी जाती है। जब पौधे 45 सेंटीमीटर के हो जाय तो सहारा दें। रोपाई 45 सें. x 45 सें. पर। कटनी कटनी के तुरन्त बाद जड़ों को छीलकर सुखा लें, छीलने के लिए रसदार मूल चीरा लगाकर, छिलका हटा देते हैं। उपज 800-800 क्विंटल/हेक्टेयर गीली जड़, 75-90 क्विंटल शुष्क भार। लागत करीब 40,000 – 50,000 के बीच। लाभ 1,30,000 के करीब। सर्पगंधा की खेती सर्पगंधा एपोसाइनेंसी कुल का पौधा है। सर्पगंधा की कई प्रजातियाँ होती हैं जिसमें Rauvolfia serpentina प्रमुख है। R. tetraphyllus दूसरी प्रजाति है जिसे औषधीय पौधों के रूप में उगाया जाता है। सर्पगंधा के जड़ औषधि के रूप में प्रयोग में लाये जाते हैं। इसके पौधे की ऊँचाई 30 से 75 सेंटीमीटर तक की होती है। इसमें 10-15 सेंटीमीटर लम्बाई के हरे चमकीले रंग के पत्ते होते हैं। पत्ते 3-4 के गुच्छे में औवलौंग आकार के तथा अग्रभाग नुकीले होते हैं। इसमें उजले अथवा गुलाबी रंग के गुच्छे में फूल निकलते हैं। इसमें गोलाकार छोटे-छोटे गहरे बैंगनी अथवा काले रंग के फल लगते हैं जिसे द्रुप कहा जाता है। इस पौधे के नर्म जड़ से सर्पेंन्टीन नामक दवा निकाली जाती है। इसके अलावा जड़ में रेसरपीन, सरपेजीन, रौलवेनीन, टेटराफिर्लीन इत्यादि अल्कलाइड भी होते हैं। औषधीय उपयोग 1. स्थानीय लोग इसे सांप काटने में प्रयोग में लाते हैं। 2. गाँव में औरतें इसका उपयोग बच्चों को सुलाने में करती हैं क्योंकि इसमें सुस्ती गुण होता है। प्रसव काल में भी इसका उपयोग किया जाता है। 3. मानसिक रोगी को रिलैक्स करने के लिए इसे दिया जाता है। इससे रोगी शांत हो जाता है। 4. यह रक्तचाप (ब्लड प्रेशर) को कम करता है। 5. जड़ के एक्सट्रेक्ट को पेचिस तथा हैजा में इसका इस्तेमाल होता है। 6. पेट दर्द तथा पेट के कीड़े को मारने के लिए गोलमिर्च के साथ जड़ का काढ़ा बनाकर दिया जाता है। जलवायु यह एक छाया पसंद पौधा है इसलिए आम, लीची एवं साल पेड़ के आसपास प्राकृतिक रूप से उगते हुए देखा जाता है। झारखंड के सारंडा वन (सिंहभूम) एवं बीरवुरू वन (हजारीबाग) में काफी पाया जाता है। व्यवसायिक रूप में मुख्य रूप से यह उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, असम, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, केरला, कर्नाटक एवं महाराष्ट्र से आपूर्ति की जाती है। यद्यपि यह छाया पसंद पौधा है लेकिन इसकी खेती खुले में भी की जा सकती है। इसकी खेती उष्ण एवं समशीतोष्ण जलवायु में की जा सकती है। 10 डिग्री सेंटीग्रेड से 38 डिग्री सेंटीग्रेड तक एक तापक्रम बढ़वार के लिए अच्छा है। जून से अगस्त तक वर्षा पर्याप्त होनी चाहिए। 1200-1800 मिलीमीटर तक वर्षा वाले क्षेत्र में इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। जाड़े के दिनों में झारखंड क्षेत्र में पौधों से पत्तियाँ गिर जाती हैं। प्रसारण सर्पगंधा का प्रसारण बीज द्वारा, तना कलम एवं जड़ कलम द्वारा किया जा सकता है। मिट्टी सभी तरह की जमीन में की जा सकती है। लाल लैटेरिटक उपजाऊ मिट्टी उपयुक्त है। यह अम्लीयता को बर्दास्त करता है। मिट्टी हल्की होनी चाहिए तथा पानी न लगे। बीज द्वारा इस विधि में नर्सरी में बिचड़ा तैयार करते हैं। इसके लिए ऊँचा नर्सरी बनाते हैं। बीज की बुआई वर्षा के आरंभ में (मई-जून) में करते हैं तथा रोपाई अगस्त माह में करते हैं। एक हेक्टेयर के लिए 8-10 किलो बीज की आवश्यकता होती है। बोआई के पहले बीज को पानी में 24घंटे फुला लेने पर अंकुरण अच्छा होता है। बीज अंकुरण कम (15-30 प्रतिशत) होता है तथा 3-4 सप्ताह समय लगता है। नर्सरी में 20-25 सेंटीमीटर के फासले पर 2 सेंटीमीटर गहरे कुंड में 2-5 सेंटीमीटर की दूरी पर गिराते हैं। दो माह के बाद तैयार बिचड़े को (10-12 सेंटीमीटर के होने पर) 45 सेंटीमीटर x 50 सेंटी मीटर की दूरी पर रोपाई करते हैं। कलम द्वारा कलम जड़ अथवा तना दोनों के लिया जा सकता है। जड़ में कलम के लिए पेंसिल मोटाई के 2.5 से 5 सेंटीमीटर लम्बाई के छोटे-छोटे टुकड़े कर लेते हैं। इसे 5 सेंटी मीटर की गहराई पर पौधशाला में लगाते हैं। तीन सप्ताह बाद कल्ले आने पर तैयार खेत में रोपाई करते हैं। तना से पौधा तैयार करने के लिए 15-20 सेंटी मीटर पेंसिल मोटाई के कलम बनाते हैं। हरेक कलम में 2-3 नोड (गाँठ) रहना जरूरी है। कलम को पौधशाला में लगाते हैं। 4-6 सप्ताह में रूटेड कटिंग को तैयार खेत में रोपाई करते हैं। रूट-शूट कटिंग द्वारा भी प्रसारण किया जा सकता है। इसमें 5 सें.मी. रूट कटिंग के साथ तना का कुछ हिस्सा को भी रखते हैं। खाद की मात्रा खेत को मई माह में जोताई करते हैं। वर्षा आरंभ होने पर गोबर की सड़ी खाद 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर देकर मिट्टी में मिला दें। लगाते समय 45 किलो नाइट्रोजन, 45 किलो फ़ॉस्फोरस तथा 45 किलो पोटाश दें। नाइट्रोजन की यही मात्रा (45 किलो) दो बार अक्टूबर एवं मार्च में दें। निकाई-गुड़ाई एवं सिंचाई कोड़ाई कर खरपतवार निकाल दें। जनवरी माह से लेकर वर्षा काल आरंभ होने तक 30 दिन के अंतराल पर तथा जाड़े के दिनों में 45 दिन के अंतराल पर सिंचाई दें। कटाई एवं उपज सर्पगंधा डेढ़ से दो वर्ष का फसल है। जाड़े के दिनों में जब पत्तियाँ झड़ जाती है तब जड़ को सावधानीपूर्वक उखाड़ना चाहिए। पौधों को छोड़ देने पर उपज बढ़ जाती है। तीन साल के पौधे में अधिकतम उपज होता है। उखाड़ते समय जड़ से छिलका नहीं हटना चाहिए। जड़ को 12-15 सेंटी मीटर टुकड़े में काटकर सुखा लिया जाता है। सुखने पर 50-60 प्रतिशत वजन की कमी हो जाती है। औसत उपज 100 किलो होती है। बिक्री दर 70-80 रूपये प्रति किलो है। लगभग 40-50 हजार तक की आमदनी हो सकती है। स्त्रोत एवं सामग्रीदाता : समेति, कृषि विभाग, झारखण्ड सरकार