<div id="MiddleColumn_internal"> <h3><span>भूमिका </span><strong> </strong></h3> <p style="text-align: justify; ">भारत एवं पूरे विश्व में औषधीय एवं सुगंधित पौधों की मांग निरंतर बढ़ रही है और इस विषय पर कार्य कर रहे दुनिया भर के वैज्ञानिकों का मत है कि इस मांग में निरंतर बढ़ोत्तरी की सम्भावनाएँ हैं।</p> <p style="text-align: justify; ">भारत में लगभग 8 हजार करोड़ रुपयों की औषधीय पौधें से बनी दवाओं का बाजार है। अभी लगभग<img class="image-right" src="https://static.vikaspedia.in/media/images_hi/agriculture/crop-production/91593e93094d92f92a94d93092393e93293f92f94b902-91593e-938902915941932/91493792794092f-92a94c92794b902-915940-916947924940/91d93e93091692394d921-92e947902-91493792794092f-90f935902-93894191790292794092f-92a94c92794b902-915940-93594d92f93593893e92f93f915-916947924940/Paudhe.jpg" /> 80 प्रतिशत औषधीय पौधे प्राकृतिक स्त्रोतों से प्राप्त किये जाते हैं। परन्तु जंगलों के कट जाने और बढ़ती हुई मांग के कारण प्राकृतिक स्त्रोतों से औषधीय पौधों की मांग को पूरा करना कठिन होता जा रहा है। अनेक औषधीय पौधे तो दुर्लभ हो गये हैं और अनेक पौधों की प्रजातियाँ विलुप्त हो गई हैं।</p> <p style="text-align: justify; ">इन कठिनाईयों के कारण औषधीय पौधों की खेती करना आवश्यक हो गया है। भारत में औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देने के लिए केंद्र एवं विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।</p> <p style="text-align: justify; ">झारखंड की जलवायु, जमीन औषधीय पौधों की खेती के लिए अत्यंत उपयुक्त है। छिटपुट रूप में औषधीय पौधें की खेती भी कही-कहीं की जाने लगी है–परन्तु सही जानकारियों एवं समायोजित प्रयास के अभाव में इस दिशा में अधिक प्रगति नहीं हुई है।</p> <h3><span>औषधीय पौधों की खेती की कुछ आवश्यक जानकारियाँ </span></h3> <p style="text-align: justify; ">इस लेख में औषधीय पौधों की खेती में सफलता के लिए कुछ आवश्यक जानकारियाँ दी जा रही है – साथ ही खेती की सुविधा के लिए कुछ औषधीय पौधों का वर्गीकरण फसल में लगने वाले समय एवं उनके प्रकार के आधार पर किया जा रहा है। औषधीय पौधों की खेती प्रारम्भ करने के पहले भूमि का चुनाव, फसल के आधार पर करना आवश्यक है। मूलतः इस कार्य के लिए बेकार पड़ी भूमि का प्रयोग करना अच्छा रहता है। परम्परागत धान/चावल/सब्जी की खेती में उपयोग की जाने वाली भूमि का उपयोग वनौषधियों की खेती में प्रारम्भ करने से बचना चाहिए। अतिरिक्त या उपयोग में न आने वाली भूमि से प्रारम्भ करने से हानि से बचा जा सकता है। टांड या ऊँची जमीन जहाँ पानी का अभाव हो ऐसी फसल लगाने का प्रयास करें जिसमें सिंचाई की आवश्यकता न हो, केवल वर्षा जल पर ही निर्भर हो – जैसे: अश्वगंधा, वासक, मस्कदाना, शतावर इत्यादि। जलमग्न या नमी की अधिकता वाली भूमि पर ब्राह्मी, वचू, भृंगराज जैसी फसल लेना उपयुक्त होता है।</p> <h3><span>औषधीय पौधों का वर्गीकरण</span></h3> <p style="text-align: justify; ">भूमि एवं फसल के चुनाव के साथ-साथ केवल एक फसल के चुनाव की अपेक्षा 4-5 औषधीय पौधों का चुनाव करना लाभदायक होगा–ऐसी फसलें जो मिश्रित खेती के रूप में लगाई जा सके। मिश्रित खेती को ध्यान में रखकर हम विभिन्न औषधीय पौधों को वर्गीकृत कर सकते हैं। जैसे–छोटे बड़े पेड़ जो 5-10 वर्षों में तैयार होते हैं। झाड़ीदार पौधे जो खेत के घेराव में लगाने से जानवरों से सुरक्षा भी प्रदान करे एवं उत्पादन भी दे। पेड़ों पर चढ़ाने के लिए लता वाले औषधीय पौधों को चुना जा सकता है। पेड़ों के बीच की भूमि 6 माह से 1 वर्ष तक में तैयार होने वाली औषधीय पौधों की फसल को चूना जा सकता है।</p> <p style="text-align: justify; "><span>पेड़ों के तैयार होने में कम से कम 3-5 या 10 वर्षों का समय लगता है। झारखंड में खेती के लिए उपयुक्त पेड़ों में श्योनाख, अगस्त, गम्हार, सहजन, हरश्रृंगार को चुना जा सकता है। श्योनाख को स्थानीय भाषा में हाथी पांजरथा भालू सूपली कहा जाता है। आयुर्वेद में सोनापाठा के नाम से भी जाना जाता है। इसकी जड़ों की छाल दशमूल में प्रयोग की जाने वाली दस औषधियों में एक है। किसी समय झारखंड के जंगलों में इसकी बहुतायत थी, पर अति दोहन के परिणामस्वरूप यह पेड़ अधिक नहीं दिखते। चूँकि दशमूल आयुर्वेद की एक अत्यंत महत्वपूर्ण दवा है। जिसका बाजार हमेशा रहने वाला है, अत: श्योनाखया सोना पाठा की मांग हमेशा रहेगी। इसके पेड़ आसानी से बीजों के द्वारा लगाये जा सकते है। इसके पेड़ अधिक बड़े नहीं होते, अत: इन पेड़ों के बीच अन्य फसलों को भी लिया जा सकता है।</span></p> <p style="text-align: justify; "><span>इसी प्रकार अगस्त, हरश्रृंगार एवं सहजन के पेड़ भी तेजी से बढ़ते हैं, छोटे होते हैं- इनको भी मिश्रित खेती में लिया जा सकता है।</span></p> <p style="text-align: justify; "><span>झाड़ीदार पौधों में बासक का रोपण खेत को घेरने में किया जा सकता है। इसके पत्तों में एक प्रकार की अप्रिय गंध होने के कारण जानवर इसे नहीं खाते। इसके फूलों एवं पत्तों का प्रयोग खाँसी/दमा एवं अन्य श्वास रोगों में किया जाता है। इस प्रकार दोहरा लाभ होगा। वायविडंग या स्थानीय भाषा में भाभीरंग या बाय बेरंग के नाम से परिचित पौधा भी 7-8 फुट तक की झाड़ी के रूप में होता है – इसे पेड़ों के बीच या खेत के चारों ओर लगाया जा सकता है।</span></p> <p style="text-align: justify; "><span>लगाये गये पेड़ों पर लता जाति के औषधीय पौधों को लगाया जा सकता है जिससे इन लता जाति के पौधों की खेती में सहारे के निर्माण के खर्च से बचा जा सकता है। लता जाति के पौधों में अमृता, गुडमार, कवाच या अलकुसी काफी आसानी से लगाई जा सकती है।</span></p> <p style="text-align: justify; "><span>6-12 माह में तैयार होनेवाली फसलों में पिपली, कालमेघ, ब्राह्मी, अश्वगंधा, बेंगसाग, भृंगराज, धृतकुमारी, केयोमाइल जैसी फसलें प्रमुख हैं, जिन्हें पेड़ों के बीच वाली भूमि में लगाना लाभप्रद होगा।</span></p> <p style="text-align: justify; ">पेड़ों के बीच सुगंधित पौधों में खस, सिट्रोनेला, लेमन ग्रास, पामारोजा जैसी फसलों को लिया जा सकता है।</p> <p style="text-align: justify; "><span>औषधीय पौधों की मिश्रित खेती में अधिक आमदनी एवं कम खतरे हैं। विभिन्न अवधि के तैयार होनेवाली इन फसलों से निरंतर आमदनी की जा सकती है।</span></p> <p style="text-align: justify; "><strong> स्रोत: समेति तथा कृषि एवं गन्ना विकास विभाग, झारखंड सरकार</strong></p> </div>