परिचय तुलसी के अनेक नाम हैं। सुलभा, ग्राम्या, पुरसा, बहुमंजरी तथा होली बेसिल के नाम से जाने वाले लेमिएसी कुल के पौधे कीविश्व में लगभग 150 प्रजातियाँ पायी जाती हैं। इस पौधे की मूल प्रकृति एक जैसे हैं किंतु इनकी रासायनिक संरचनाओं में काफी भिन्नता हे। धार्मिक महत्त्व के इस पौध को गैरपारम्परिक रूप में वाणिज्यिक कृषि के लिए अपनाया जा रहा है। तुलसी की प्रजातियाँ निम्नानुसार हैं: ओसियम बेसीलिकम (O.Basilicum) अजंधिका अथवा स्वीट फ्रेंच बेसिल अथवा बोवई तुलसी ओसिमम किलिमण्डस्क्रिकम (O.Kilimandschricum) ओसिमम केनम/ओसिमम अमेरिकेनम (O.Americanum) काली तुलसी ओसिमम ग्रेटिसियम (O.Grattisimum) बन तुलसी या राम तुलसी ओसिमम विरडी (O. Virdi) जंगली तुलसी ओसिमम सैंकटम (O.Sanctum) श्री तुलसी या श्यामा तुलसी उपर्युक्त में से प्रथम पाँच फ्रेंच बेसिल की श्रेणी में हैं जबकि अंतिम को होली बेसिल (Holi Basil) में रखा गया है। होली तुलसी का उपयोग औषधीय के से सुगंधीय है जबकि फेच बेसिल के मुख्यतया सुगंधीय उपयोग हैं। सगंध उड़नशील के विभिन्न रसायनिक संगठन के कारण बाजार में इनके तेल की कीमत अलग-अलग हैं। खेती करने में प्रजाति का ज्ञान रहने से इसकी कीमत अधिक मिल सकती है। विश्व बाजार में विभिन्न प्रजाति के तेल की कीमत 2000/- से 8000/- किलो हैं। तुलसी की ओसिमम बेसीलीकम प्रजाति को तेल उत्पादन के लिए उगाया जाता है। तुलसी की इस प्रजाति की भारत में बड़े पैमाने पर खेती होती है। उत्तर प्रदेश में बरेली, बदायूँ, मुरादाबाद और सीतापुर जिलों में इसकी खेती की जाती है। इसका प्रयोग परफ्यूम व कास्मेटिक इन्डस्ट्रीज में अधिक होता है । अपने बिहार राज्य में इसकी खेती लगभग 400 हे0 में हो रही है। मृदा व जलवायु इसकी खेती, कम उपजाऊ जमीन जिसमें पानी की निकासी का उचित प्रबन्ध हो, अच्छी होती है। बलुई दोमट जमीन इसके लिए बहुत उपयुक्त होती है। इसके लिए उष्ण कटिबंधीय एवम् उपोष्ण कटिबंधीय दोनों तरह की जलवायु उपयुक्त होती है। जमीन की तैयारी जमीन की तैयारी ठीक तरह से कर लेनी चाहिए। जमीन जून के दूसरे सप्ताह तक तैयार हो जानी चाहिए। बुवाई/रोपाई इसकी खेती बीज द्वारा होती है लेकिन खेत में बीज की बुवाई सीधे नहीं करनी चाहिए। पहले इसकी नर्सरी तैयार करनी चाहिए बाद में उसकी रोपाई करनी चाहिए। पौध तैयार करना जमीन की 15-20 से. मी. गहरी खुदाई कर के खरपतवार आदि निकाल कर तैयार कर लेना चाहिए। 15 टन प्रति हे० की दर से गोबर की सड़ी खाद अच्छी तरह मिला देना चाहिए। 1 मी. x 1 मी. आकार की जमीन सतह से उभरी हुयी क्यारियां बना कर 20 कि० फास्फोरस तथा इतना ही पोटाश प्रति है, की दर से मिला देना चाहिए। 750 ग्रा.- 1 किग्रा. बीज एक हेक्टेयर के लिए पर्याप्त होता है। बीज की बुवाई 1:10 के अनुपात में रेत या बालू मिला कर 8-10 से. मी. की दूरी पर पंक्तियों में करनी चाहिए। बीज की गहराई अधिक नहीं होनी चाहिए। जमाव के 15-20 दिन बाद 20 कि./हे. की दर से नत्राजन डालना उपयोगी होता है। पांच-छह सप्ताह में पौध रोपाई हेतु तैयार हो जाती है। रोपाई सूखे मौसम में रोपाई हमेशा दोपहर के बाद करनी चाहिए। रोपाई के बाद खेत को सिंचाई तुरन्त कर देनी चाहिए। बादल या हल्की वर्षा वाले दिन इसकी रोपाई के लिए बहुत उपयुक्त होते हैं। इसकी रोपाई लाइन से लाइन 60 से. मी. तथा पौधे से पौधे 30 से. मी. की दूरी पर करनी चाहिए। सिंचाई अगर वर्षा के दिनों में वर्षा होती रही तो सितम्बर तक इसके लिए सिंचाई की कोई आवश्यकता नही होती है उसके बाद सिंचाई की आवश्यकता हो सकती है। खरपतवार नियंत्रण इसकी पहली निराई-गुड़ाई रोपाई के एक माह बाद करनी चाहिए। दूसरी निराई-गुड़ाई पहली निराई के 3-4 सप्ताह बाद करनी चाहिए। बड़े क्षेत्रा में गुड़ाई ट्रेक्टर से की जा सकती है। उर्वरक इसके लिए 15 टन प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद जमीन में डालना चाहिए। इसके अलावा 75-80 कि. ग्रा, नत्रजन 40-40 कि. ग्रा, फास्फोरस व पोटाश की आवश्यकता होती है। रोपाई से पहले एक तिहाई नत्रजन तथा फास्फोरस व पोटास की पूरी मात्रा खेत में डालकर जमीन में मिला देना चाहिए। शेष नत्रजन की मात्रा दो बार में खड़ी फसल में डालना चाहिए। कटाई जब पौधे में पूरी तरह से फुल आ जाये तथा नीचे के पत्ते पीले पड़ने लगे तो इसकी कटाई कर लेनी चाहिए । रोपाई के 10-12 सप्ताह के बाद यह कटाई के लिए तैयार हो जाती है। आसवन तुलसी का तेल पूरे पौधे के आसवन से प्राप्त होता है। इसका आसवन, जल तथा वाष्प आसवन, दोनों विधि से किया जा सकता है। लेकिन वाष्प आसवन सबसे ज्यादा उपयुक्त होता है। कटाई के बाद 4-5 घंटे छोड़ देना चाहिए। इससे आसवन में सुविधा होती है। पैदावार इसके फसल की औसत पैदावार 20-25 टन प्रति हेक्टेयर तथा तेल की पैदावार 80-100 कि. ग्रा. हेक्टेयर तक होता है। तुलसी की खेती पर होने वाले आय तथा व्यय का विवरण (प्रति एकड़) (क) लागत विवरण व्यय प्रति एकड़ (रूपये) 1. खेत तैयार करने की लागत 2000 2. खाद आदि की लागत 4000 3. नर्सरी तैयार करने पर खर्च 500 4. बीज की कीमत 500 5. मुख्य खेत में पौध की ट्रांसप्लांटिंग पर व्यय 2500 6. निंदाई-गुड़ाई की लागत 1000 7. भू-टॉनिकों की लागत 1000 8. सिंचाई व्यवस्था पर व्यय 2000 9. फसल कटाई, छंटाई तथा सुखाने आदि पर व्यय 3000 10. अन्य व्यय (पैकिंग, ट्रांसपोर्टेशन आदि सहित) 4000 11. आसवन पर व्यय 5000 कुल योग 26,000.00 (ख) प्राप्तियां बेसिल/तुलसी तेल से आय (60 किलो ग्राम x1000.00 किलो) 60,000.00 शुद्ध लाभ = रू0 60,000–26,000 =34,000.00 स्रोत- बिहार राज्य बागवानी मिशन, बिहार सरकार