राई/सरसों का रबी तिलहनी फसलों में प्रमुख स्थान है। प्रदेश में अनेक प्रयासों के बाद भी राई के क्षेत्रफल में विशेष वृद्धि नही हो पा रही है। इसका प्रमुख कारण है कि सिचित क्षमता में वृद्धि के कारण अन्य महत्वपूर्ण फसलो के क्षेत्रफल का बढ़ना । इसकी खेती सीमित सिचाई की दशा में अधिक लाभदायक होती है। उन्न्त विधियॉ अपनाने से उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि होती है। खेत की तैयारी खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करके बाद पाटा लगाकर खेत को भुरभुरा बना लेना चाहिए। यदि खेत में नमी कम हो तो पलेवा करके तैयार करना चाहिए। ट्रैक्टर चालित रोटावेटर द्वारा एक ही बार में अच्छी तैयारी हो जाती है। उन्नतिशील प्रजातियॉ क्र.सं. प्रजातियाँ विमोचन की तिथि नोटीफिकेशन की तिथि पकने की अवधि (दिनों में) उत्पादन क्षमता कु०/हे० विशेष विवरण सिंचित क्षेत्र 1 नरेन्द्र अगेती राई-4 1999 15.11.01 95-100 15-20 सम्पूर्ण उ.प्र. हेतु 2 वरूणा (टी-59) 1975 2.2.76 125-130 20-25 सम्पूर्ण मैदानी क्षेत्र हेतु 3 बसंती (पीली) 2000 15.11.01 130-135 25-28 - 4 रोहिणी 1985 26.11.86 130-135 22-28 सम्पूर्ण उ.प्र. हेतु 5 माया 2002 11.3.03 130-135 25-28 सम्पूर्ण उ.प्र. 6 उर्वशी 1999 2.2.01 125-130 22-25 शीघ्र बुआई हेतु 7 नरेन्द्र स्वर्ण- राई - 8 (पीली) 2004 23.8.05 130-135 22-25 सम्पूर्ण उ.प्र. हेतु 8 नरेन्द्र राई (एन०डी०आर०-8501) 1990 17.8.90 125-130 25-30 सम्पूर्ण उ.प्र. हेतु असिंचित क्षेत्रों के लिए 1 वैभव 1985 18.11.85 125-130 15-20 सम्पूर्ण उ.प्र. हेतु 2 वरूणा (टा-59) 1975 2.2.76 120-125 15-20 सम्पूर्ण मैदानी क्षेत्र हेतु विलम्ब से बुआई के लिए 1 आशीर्वाद 2005 26.08.05 130-135 20-22 सम्पूर्ण उ.प्र. हेतु 2 वरदान 1985 18.11.85 120-125 18-20 सम्पूर्ण उ.प्र. हेतु क्षारीय/लवणीय भूमि हेतु 1 नरेन्द्र राई 1990 17.08.90 - - सम्पूर्ण उ.प्र. हेतु 2 सी.एस.-52 1987 15.05.98 135-145 16-20 सम्पूर्ण उ.प्र. हेतु 3 सी.एस.-54 2003 12.02.05 135-145 18-22 सम्पूर्ण उ.प्र. हेतु बीज दर सिंचित एवं असिंचित क्षेत्रों में 5-6 किग्रा./हे.की दर से प्रयोग करना चाहिए। बीज शोधन बीज जनित रोगों से सुरक्षा हेतु 2.5 ग्राम थीरम प्रति किलो की दर से बीज को उपचारित करके बोये। मैटालेक्सिल 1.5 ग्राम प्रति किग्रा० बीज शोधन करने से सफेद गेरूई एवं तुलासिता रोग की प्रारम्भिक अवस्था में रोकथाम हो जाती है। बुआई का समय एवं विधि राई बोने का उपयुक्त समय बुन्देलखंड एवं आगरा मंडल में सितम्बर का अंतिम सप्ताह तथा शेष क्षेत्रों में अक्टूबर का प्रथम पखवारा है। बुआई देशी हल के पीछे उथले (4-5 सेन्टीमीटर गहरे) कूंड़ों में 45 सेन्टीमीटर की दूरी पर करना चाहिए। बुआई के बाद बीज ढ़कने के लिए हल्का पाटा लगा देना चाहिए। असिंचित दशा में बुआई का उपयुक्त समय सितम्बर का द्वितीय पखवारा है। विलम्ब से बुआई करने पर माहूँ का प्रकोप एवं अन्य कीटों एवं बीमारियों की सम्भावना अधिक रहती है। उर्वरक की मात्रा उर्वरकों का प्रयोग मिट्टी परीक्षण की संस्तुतियों के आधार पर किया जायें सिंचित क्षेत्रों में नत्रजन 120 किग्रा. फास्फेट 60 किग्रा. एवं पोटाश 60 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करने से अच्छी उपज प्राप्त होती है। फास्फोरस का प्रयोग सिंगिल सुपर फास्फेट के रूप में अधिक लाभदायक होता है। क्योंकि इससे सल्फर की उपलब्धता भी हो जाती है। यदि सिंगल सुपर फास्फेट का प्रयोग न किया जाए तो गंधक की उपलबधता को सुनिश्चित करने के लिए 40 किग्रा./हे.की दर से गंधक का प्रयोग करना चाहिए तथा असिंचित क्षेत्रों में उपयुक्त उर्वरकों की आधी मात्रा बेसल ड्रेसिंग के रूप में प्रयोग की जाये। यदि डी.ए.पी. का प्रयोग किया जाता है तो इसके साथ बुआई के समय 200 किग्रा.जिप्सम प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना फसल के लिए लाभदायक होता है तथा अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए 60 कुन्तल प्रति हे.की दर से सड़ी हुई गोबर की खाद का प्रयोग करना चाहिए। सिंचित क्षेत्रों में नत्रजन की आधी मात्रा व फास्फेट एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुआई के समय कूंड़ों में बीज के 2-3 सेमी. नीचे नाई या चोगें से दिया जाय। नत्रजन की शेष मात्रा पहली सिंचाई (बुआई के 25-30 दिन बाद) के बाद टापड्रेसिंग में डाली जाय। निराई-गुड़ाई एवं विरलीकरण बुआई के 15-20 दिन के अन्दर घने पौधों को निकालकर उनकी आपसी दूरी 15 सेमी. कर देना आवश्यक है। खरपतवार नष्ट करने के लिए एक निराई-गुड़ाई, सिंचाई के पहले और दूसरी पहली सिंचाई के बाद करनी चाहिए रसायन द्वारा खरपतवार नियंत्रण करने पर बुआई से पूर्व फ्लूक्लोरोलिन 45 ई.सी. की 2.2 लीटर प्रति 800-1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव कर भली-भांति हैरो चलाकर मिट्टी में मिला देना चाहिए या पैन्डीमेथलीन 30 ई.सी. 3.3 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से बुआई के दो तीन दिन के अन्दर 800-1000 लीटर पानी में घोलकर समान रूप से छिड़काव करें। सिंचाई राई, नमी की कमी के प्रति, फूल आने के समय तथा दाना भरने की अवस्थाओं में विशेष संवेदनशील होती है। अतः अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए सिंचाई करें यदि उर्वरक का प्रयोग भारी मात्रा में (120 किलोग्राम नत्रजन, 60 किलोग्राम फास्फेट तथा 60 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर) किया गया हो तथा मिट्टी हल्की हो तो अधिकतम उपज प्राप्त करने के लिए 2 सिंचाई क्रमशः पहली बुआई के 30-35 दिन बाद तथा दूसरी वर्षा न होने पर 55-65 दिन बाद करें। फसल सुरक्षा (क) प्रमुख कीट आरा मक्खी: इस कीट की सूड़िया काले स्लेटी रंग की होती है जो पत्तियों को किनारों से अथवा पत्तियों में छेद कर तेजी से खाती है, तीव्र प्रकोप की दशा में पूरा पौधा पत्ती विहीन हो जाता है। चित्रित बग: इस कीट के शिशु एवं प्रौढ़ चमकीले काले, नारंगी एवं लाल रंग के चकत्ते युक्त होते है। शिशु एवं प्रौढ़ पत्तियों, शाखाओं, तनों, फूलों एवं फलियों का रस चूसते है। जिससे प्रभावित पत्तियाँ किनारों से सूख कर गिर जाती हैं।प्रभावित फलियों में दाने कम बनते है। बालदार सूँडी: सूंडी काले एवं नारंगी रंग की होती है तथा पूरा शरीर बालों से ढका रहता है। सूड़ियाँ प्रारम्भ में झुण्ड में रह कर पत्तियों को खाती है तथा बाद में पूरे खेत में फैल कर पत्तियों खाती हैं। तीव्र प्रकोप की दशा में पूरा पौधा पत्ती विहीन हो जाता है। माहूँ: इस कीट की शिशु एवं प्रौढ़ पीलापन लिये हुए हरे रंग के होते है। जो पौधों के कोमल तनों, पत्तियों, फूलों एव नये फलियों के रस चूसकर कमजोर कर देते है। माहूँ मधुस्राव करते हैं। जिस पर काली फफूँद उग आती है जिससे प्रकाश संश्लेषण में बाधा उत्पन्न होती है। पत्ती सुरंगक कीट: इस कीट की सूँडी पत्तियों में सुरंग बनाकर हरे भाग को खाती है जिसके फलस्वरूप पत्तियों में अनियमित आकार की सफेद रंग की रेखायें बन जाती है। आर्थिक क्षति स्तर क्र.सं. कीट का नाम फसल की अवस्था आर्थिक क्षति स्तर 1 आरा मक्खी वानस्पतिक अवस्था एक सूँड़ी प्रति पौधा 2 पत्ती सुरंगक कीट वानस्पतिक अवस्था 2 से 5 सूँड़ी प्रति पौधा 3 बालदार सूँड़ी वानस्पतिक अवस्था 10-15 प्रतिशत प्रकोपित पत्तियाँ 4 माहूँ वानस्पतिक अवस्था से फूल व फली आने तक 30-50 माहूँ प्रति 10 सेमी. मध्य ऊपरी शाखा पर या 30 प्रतिशत माहूँ से ग्रसित पौधे। नियंत्रण के उपाय गर्मी में गहरी जुताई करनी चाहिए। संतुलित उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए। आरा मक्खी की सूड़ियों को प्रातः काल इकठ्ठा कर नष्ट कर देना चाहिए। प्रारम्भिक अवस्था में झुण्ड में पायी जाने वाली बालदार सूडियाँ पत्तियों को तोड़कर नष्ट कर देना चाहिए। प्रारम्भिक अवस्था में माहूँ से प्रभावित फूलों, फलियों एवं शाखाओं को तोड़कर माहूँ सहित नष्ट कर देना चाहिए। यदि कीट को प्रकोप आर्थिक क्षति स्तर पर कर गया हो तो निम्नलिखित कीटनाशों का प्रयोग करना चाहिए। आरा मक्खी एवं बालदार सूँडी के नियंत्रण के लिए मैलाथियान 5 प्रतिशत डी.पी की 20-25 किग्रा० प्रति हेक्टेयर बुरकाव अथवा मैलाथियान 50 प्रतिशत ई.सी. की 1.50 लीटर अथवा डाईक्लोरोवास 76 प्रतिशत ई.सी. की 500 मिली. मात्रा अथवा क्यूनालफास 25 प्रतिशत ई.सी. की 1.25 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से लगभग 600-750 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। माहूँ चित्रित बग, एवं पत्ती सुरंगक कीट के नियंत्रण हेतु डाईमेथोएट 30 प्रतिशत ई.सी. अथवा मिथाइल-ओ-डेमेटान 25 प्रतिशत ई.सी. अथवा क्लोरोपाईरीफास 20 प्रतिशत ई.सी. की 1.0 लीटर अथवा मोनोक्रोटोफास 36 प्रतिशत एस.एल. की 500 मिली प्रति हेक्टेयर की दर से लगभग 600-750 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। एजाडिरेक्टिन (नीम आयल) 0.15 प्रतिशत ई.सी. 2.5 ली प्रति हेक्टेयर की दर से भी प्रयोग किया जा सकता है। प्रमुख रोग अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा इस रोग में पत्तियो तथा फलियों पर गहरे कत्थई रंग के धब्बे बनते है जो गोल छल्ले के रूप में पत्तियों पर स्पष्ट दिखाई देते है। तीव्र प्रकोप की दशा में धब्बे आपस में मिल जाते है जिससे पूरी पत्ती झुलस जाती है। सफेद गेरूई इस रोग में पत्तियों की निचली सतह पर सफेद फफोले बनते है जिससे पत्तियों पीली होकर सूखने लगती है। फूल आने की अवस्था में पुष्पक्रम विकृत हो जाता है। जिससे कोई भी फली नहीं बनती है। तुलासिता इस रोग में पुरानी पत्तियों की ऊपरी सतह पर छोटे-छोटे धब्बे तथा पत्तियोॅ निचली सतह पर इन धब्बों के नीचे सफेद रोयेदार फफूंदी उग आती है। धीरे-धीरे पूरी पत्ती पीली होकर सूख जाती है। नियंत्रण के उपाय बीज उपचार सफेद गेरूई एवं तुलासिता रोग के नियंत्रण हेतु मैटालैक्सिल 35 प्रतिशत डब्लू.एस. की 2.0 ग्राम प्रति किग्रा. बीज की दर से बीजशोधन कर बुआई करना चाहिए। अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा रोग के नियंत्रण हेतु थीरम 75 प्रतिशत डब्लू.एस. की 2.5 ग्राम प्रति किग्रा. बीज की दर से बीजशोधन कर बुआई करना चाहिए। भूमि उपचार भूमि जनित एवं बीज जनित रोगों के नियंत्रण हेतु बायोपेस्टीसाइड (जैव कवक नाशी) ट्राइकोडरमा विरिडी 1 प्रतिशत डब्लू.पी. अथवा ट्राइकोडरमा हारजिएनम 2 प्रतिशत डब्लू.पी. की 2.5 किग्रा. प्रति हे060-75 किग्रा. सड़ी हुए गोबर की खाद में मिलाकर हल्के पानी का छींटा देकर 8-10 दिन तक छाया में रखने के उपरान्त बुआई के पूर्व आखिरी जुताई पर भूमि में मिला देने से राई/सरसों के बीज/भूमि जनित आदि रोगों के प्रबन्धन में सहायक होता है। पर्णीय उपचार अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा, सफेद गेरूई एवं तुलासिता रोग के नियंत्रण हेतु मैकोजेब 75 डब्लू.पी. की 2.0 किग्रा. अथवा जिनेब 75 प्रतिशत डब्लू.पी. की 2.0 किग्रा. अथवा जिरम 80 प्रतिशत डब्लू.पी. की 2.0 किग्रा. अथवा कापर आक्सीक्लोराइड 50 प्रतिशत डब्लू.पी. की 3.0 किग्रा. मात्रा प्रति हेक्टेयर लगभग 600-750 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए। प्रमुख खरपतवार बथुआ, सेन्जी, कृष्णनील, हिरनखुरी, चटरी-मटरी, अकरा-अकरी जंगली गाजर, गजरी, प्याजी, खरतुआ, सत्यानाशी आदि। नियंत्रण के उपाय खरपतवारनाशी रसायन द्वारा खरपतवार नियंत्रण करने हेतु फ्लूक्लोरैलीन 45 प्रतिशत ई.सी. की 2.2 ली. मात्रा प्रति हेक्टेयर लगभग 800-1000 लीटर पानी में घोलकर बुआई के तुरन्त पहले मिट्टी में मिलाना चाहिए। अथवा पेण्डीमेथलीन 30 प्रतिशत ई.सी. की 3.30 लीटर प्रति हेक्टेयर उपरोक्तानुसार पानी में घोलकर फ्लैट फैन नाजिल से बुआई के 2-3 दिन के अन्दर समान रूप से छिड़काव करे।यदि खरपतवारनाशी रसायन का प्रयोग न किया गया हो तो खुरपी से निराई कर खरपतवारों का नियंत्रण करना चाहिए। कटाई-मड़ाई जब 75 प्रतिशत फलियाँ सुनहरे रंग की हो जायें, फसल को काट कर सुखाकर व मड़ाई करके बीज अलग करना चाहिए। देर करने से बीजों के झड़ने की आशंका रहती है। बीज को खूब सुखाकर ही भण्डारण करना चाहिए। विरलीकरण किया जायें। सल्फर का प्रयोग किया जाये। आई.पी.एम. का प्रयोग किया जाये। स्त्राेत: किसान पारदर्शी सेवा याेजना, कृषि विभाग, उत्तरप्रदेश ।