भूमिका करंज (पोंगामिया पिन्नाटा एल पियरे) लेग्यूमिनेसी परिवार एवं पैपिलीयोनेसी उप- परिवार का एक पेड़ हैं| इसे अलग-अलग राज्यों में विभिन्न स्थानीय नामों से जाना जाता है जैसे आंध्रप्रदेश में गानूग एवं पूंगू: कर्नाटक में होंगे, हूलिगिली, बट्टी एवं उगेमेरा, केरल में मिन्नारी एवं पुन्नू: तमिलनाडू में पोगंम, पोंगा एवं कंगा; उड़ीसा में कोरोंजो एवं कोंगा, पश्चिम बंगाल में दलकरमाचा, मध्यप्रदेश एवं उत्तर प्रदेश में करंजा एवं करंज, हरियाणा, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान एवं पंजाब में सुखचैन, करंज एवं पापरी और असम में करछों ट्रेड पूंगा आदि नामों से जाना जाता है| वनस्पतिक विवरण करंज एक सूखारोधी, अर्द्ध- पर्णपाती एवं फलीदार पेड़ हैं| यह एक मंझोले आकार का चिकनी छाल वाला पेड़ है जिसका तना छोटा और ऊपरी भाग (शिखर) का विस्तार 18 फुट की ऊँचाई तक अथवा कभी - कभी इससे भी अधिक होता है| इसकी वक्ष- परिधि 1.5 फुट की होती है| चाल भूरापन मिश्रित हरे अथवा भूरे रंग की तथा चिकनी व गूलिका से अच्छादित होती है| पत्तियाँ अंतपर्णीत, इम्पोरीपिनेट, पर्णक परस्पर विपरीत, 5-9 की संख्या में, अंडाकार अथवा दीर्घ वृताकार होते हैं| फूल, गुलाबी या बैंगनी रंग की छटा लिए सफेद रंग वाला खुशबूदार व कक्षास्थ गुच्छों मर लगे होते हैं| फली दबी हुई और काष्ठीय, अंडाकार – लंबवत- तिरछी, दोनों छोर पर नुकीली, स्फूटना रहती होती है| पकने पर फली का रंग पीला – भूरा होता है| इसके आकार ओए भिन्नता होती है जो कि 4.0 – 7.5 सें. मी . तक लंबी एवं 1.7- 3.2 सें. मी. तक चौड़ी होती है| करंज में समान्यत: एक और कभी कभार दो बीज होते हैं| बीज अंडाकार या वृक्काकार होता है जो कि 1.7 – 2.0 सें.मी. लंबा तथा 1.2 – 1.8 सें.मी. चौड़ा, झुर्री दार व लाल भूरे व चमड़े जैसे रंग के आवरण वाला होता है| वितरण करंज का उदगम भारतवर्ष में माना जाता है| यह पूरे भारत वर्ष में पूरब में रावी नदी से लेकर दक्षिण भारत में 1200 मीटर (4000 फुट) तक की ऊँचाई वाले क्षेत्रों तथा हिमालय के 610 मीटर (2000 फुट) तक की उंचाई वाले क्षेत्रों पाया जाता है| यह उष्णकटिबंधीय शुष्क से उप-उष्णकटिबंधीय शुष्कवनीय क्षेत्रों में स्वत: उगता है| यह छायादार होता है तथा इसकी छाँव के नीचे घास की अच्छी बढ़त के कारण इसे चारागाह तैयार करने के लिए उपयुक्त माना जाता है| खासकर देश के जल- विभाजन वाले क्षेत्रों तथा सूखे भागों में वनोंरोपण के लिए यह बहुत ही उपयुक्त पेड़ है| आन्ध्रप्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान, तामिलनाडु एवं उत्तर प्रदेश में इसकी काफी संभवनायें हैं| पिछले दो दशकों में सड़कों व राजमार्गों के किनारे तथा शहरी क्षेत्रों में भी काफी संख्या में करंज के पेड़ लगाए गए हैं| जलवायु एवं मिट्टी करंज में अनुकूलन की क्षमता काफी अच्छी होती है और यह विभिन्न प्रकार में की जलवायु एंव भूमि में उगाई जा सकती है| 5 डिग्री से 50 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान तथा 600-200 मि.मी. वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र इसकी वृद्धि लिए उपयुक्त होते हैं| यह पेड़ निम्नकोटि की सीमांत, बलूवाई एवं पथरीली भूमि वाले सूखे क्षेत्रों में उग सकता है| हालाँकि प्रचुर नमी वाली गहरी बलूई दोमट मिट्टी इसके पौधारोपण के लिए सबसे उपयुक्त होती है| सूखे के अतिरिक्त यह खारी स्थिति को भी सहने की क्षमता रखता है| प्रवर्धन तकनीक करंज का सफल प्रवर्धन बीज एवं कलम दोनों से किया जा सकता है| इसके बीज में एक वर्ष तक जीवन क्षमता विद्यमान रहती है| करंज के लिए निम्नलिखित प्रवर्धन तकनीक अपनाई जा सकती हैं- क. बीजों के माध्यम से प्रवर्धन करंज के बीजों के माध्यम से आसानी से प्रवर्धित किया जा सकता है| इसके लिए जुलाई-अगस्त महीनों के दौरान बीजों को सीधे नर्सरी बेड/पॉली बैग में बुआई करने तथा पौधरोपण वाले खेतों में सीचे बुआई कने का विकल्प अपयाना जा सकता है| 24 घंटे तक बीजों को आई. बी. ए. (30 पी.पी.एम.) या जी. ए.3 (20 पी.पी.एम.) में भिगाने से इसकी अंकुरण क्षमता में वृद्धि होती है| अच्छी एवं गुणवत्ता युक्त पौध प्राप्त करने के लिए 2:1:1 के अनुपात में उपजाऊ मिट्टी, रेत व गोबर खाद का नर्सरी मिश्रण, सर्वोत्तम व आर्थिक रूप से किफायती होता है| ख) कलम द्वारा प्रवर्धन करंज की 1-2 सें.मी. मोटी तथा 15-25 सें. मी. लंबी तथा अर्द्ध-कठोर डालियों में कलमें तैयार की जा सकती हैं| आई.बी.ए. तथा एन.ए.ए. के 800 पी.पी. एम वाले घोल में भिगोने से कलमों में शीघ्र जड़ निकलती हैं और प्रस्फूटन होता है| ग) लेयरिंग तथा ग्राफ्टिंग द्वारा प्रवर्धन एयर लेयरिंग तथा क्लेफ्ट ग्राफ्टिंग के माध्यम से भी करंज का प्रवर्धन किया जा सकता है| क्लेफ्ट ग्राफ्टिंग के लिए करंज के एक वर्ष की आयु वाले पौधों के रूट स्टॉक (प्रकंद) के तौर पर उपयोग में लाया जा सकता है| बेहतर गुणवत्ता वाले पेड़ों के रूट स्टॉक आकार के सांकुरक संग्रहित किए जा सकते हैं| रूट स्टॉक पर पर तैयार किए गए सांकुरकों में फन्नी आकर की कलमें डाली जाती हैं और इन्हें वाष्परहित पॉली टनेल सिस्टम में रखा जाता है| पन्द्रह दिनों के बाद कलम में गांठ (जोड़) बननी शुरू हो जाती हैं जो 60 दिनों तक जारी रहती हैं| इसके बाद इन कलमों को पॉली टनेल सिस्टम से निकालकर कठोरीकरण (हार्डेनिंग) कक्ष में डाला जतरा है| नर्सरी तैयार करने की विधि पॉली बैग में नीचे की ओर बीजांड द्वार रखते हुए बीज बोए जाते हैं| बुआई के 10वें दिन से इनमें अंकुरण आरंभ हो जाता है| हालाँकि पहले वर्णित किए गए घोलों में बीजों को भिगोने से इनकी अंकुरण प्रतिशतता व जीवन्तता में वृद्धि होती है| करंज का अधोभूमि अंकुरण होता है अर्थात सामान्य पौध में जेर या अपरा अंकुरण माध्यम के नीचे रहता है तथा प्रांकूर बाहर की ओर निकलता है| बीज के माध्यम से पौध तैयार करना अच्छी प्रकार तैयार की गई क्यारियों में पुष्ट और साफ – सुथरे बीजों की बुआई की जाती है| गर्मी मौसम के शुरूआत के दौरान बीजों को 7.5 सें. मी. × 15 सें. मी. के अन्तराल पर क्यारियों में बोया जाता है| क्यारियों में बोया जाता है| क्यारियों को पलवारने (मल्चिंग) से इनकी नमी संरक्षित रखने में सहायता मिलती है| कुछ जगहों पर जुलाई-अगस्त महीनों के दौरान भी बीजों की बुआई पॉली बैग में की जाती है| बुआई के 10 दिनों बाद इनका अंकुरण शुरू हो जाता है और यह प्रक्रिया एक महीने में पूरी जाती है| पौधरोपण का तरीका 60×60×60 घन सें.मी. के गड्ढे तैयार किए जाते हैं और कतारों के बीज परस्पर 5 मीटर तथा पौधों के बीच 4 मीटर का अंतराल रखा जाता है इस प्रकार प्रति हैक्टेयर 500 पौधों लगाए जा सकते हैं| पुनर्रोपण के लिए एक वर्ष के स्वस्थ पौधों को जड़ व ठूंठ के साथ लगी मिट्टी सहित ही उखाड़ा जाता है| पुनर्रोपण के लिए जून-जुलाई महीनों के शूरूआती मानसून के मौसम उपयुक्त माने जाते हैं| अंत: फसलीकरण सरसों, मूंगफली, तिल, चना, उड़द, लोबिया, कुलथी एवं सोयाबीन जैसी बौनी तिलहनी व दलहनी फसलें तथा मक्का व बाजरा इत्यादि जैसे अनाज 4-5 वर्षों तक पौधरोपण की वृद्धि को प्रभावित किए बिना अंत: फसल के रूप में उगाई जा सकती है| इससे करंज पौधरोपण की आर्थिक उपादेयता भी बढ़ जाती है और उसी जमीन से पौधों से फल प्राप्त करने में लगे समय के दौरान अतिरिक्त आमदनी भी प्राप्त की जा सकती है| कीट-पतंग एवं बीमारियों का नियंत्रण क) कीट –पतंगे (i) लीफ माइनर (एक्रोसेरकोप्स एन्थ्रोरिस) एवं फालिएज फीडर (यूकोरमा बेलेनोप्टईका) : ये सामान्यत: अगस्त-सितंबर महीनों के दौरान नुकसान पहुंचाते हैं| इन कीटों के लार्वा कोमल ऊतकों के उथले अंश को खा जाते हैं| जिससे इनकी वृद्धि अवरूद्ध (पत्तों एक अधिकांश भाग नष्ट हो जाते हैं) हो जाती है| मोनोक्रोटोफास 0.01% (ए.आई) के छिड़काव से इन्हें नियंत्रित किया जा सकता है| ख. बीमारियों के संक्रमण डैपिंग ऑफ़ (एस्परजिलस फ्लेवस, फूसोरियम एक्यूमिनेटम एवं माइक्रोफोमिना फेसिलिना) प्रस्फूटन के बाद इसका प्रभाव देखा जाता है जिससे विल्ट रूट रौट की बीमारी हो जाती है| बुआई के बाद इस वजह से कम अंकुरण होता है| इसे बाविस्टीन 0.1% या थायरम 0.3% के घोल से बीज उपचार तथा मिट्टी को उपचारित कर नियंत्रित किया जा सकता है| रस्ट (रेवेनेलिया होबोसेनि) : अक्टूबर-जनवरी महीनों के दौरान पत्तियों पर इसका दुष्प्रभाव पड़ता है जिससे क्षीण वृद्धि होती है| डायथेन जेड-78 या डायथेन एम- 45 के 0.3% घोल के उपचार व छिड़काव से इसे नियंत्रित किया जा सकता है| अल्टरनेरिया लीफ स्पॉट (अल्टरनेटिव सोलानि) : जुलाई से सिंतबर महीनों के दौरान इससे आक्रमण पत्तियों पर होता है जिसके वृद्धि में कमी आ जाती है| मैंकोजेब के 0.3% घोल के छिड़काव से इसे नियंत्रित किया जा सकता है| कोलेटोरट्रिकम लीफ स्पॉट: यह भी जुलाई-सितंबर महीनों के दौरान पत्तियों को प्रभावित करता है जिससे वृद्धि में कमी आ जाती है| इसे भी मैकोजेब के 0.3% घोल के छिड़काव से नियंत्रित किया जा सकता है| सेरकोस्पोरा लीफ स्पॉट: यह जुलाई – सितंबर के दौरान पत्तियों को प्रभावित करता है तथा वृद्धि में कमी लाता है| फाइटोलैम के 0.3% घोल के छिड़काव से इसे नियंत्रित किया जा सकता है| फ्यूजिक्लेडियम लीफ स्पॉट : यह जुलाई- दिसंबर महीनों के दौरान पत्तों पर अपना दुष्प्रभाव डालता है जिससे पत्तों के अंग नष्ट (ब्लाइट) हो जाते हैं और वृद्धि रूक जाती है| डायथेन एम – या फाइटोलैम के 0.3% घोल का छिड़काव कर इसे नियंत्रित किया जा सकता है| पुष्पन एवं फलन अप्रैल – जुलाई महीनों के दौरान इसके क्क्षास्थ गुच्छे में सफ़ेद तथा बैंगनी रंग के फुल खिलते हैं| कलम से तैयार करंज के पेड़ 4 वर्ष की अवस्था से फल देना प्रारंभ कर देता है जबकि पौध (नर्सरी) से तैयार पेड़ 5-6 वर्षो में फल देना शुरू करता है| देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग- अलग समयावधि पर फल तोड़ने योग्य होते हैं| सामान्यत: नवंबर-दिसंबर तथा मई जून महीनों में फलों की तुड़ाई की जाती है| प्रत्येक पेड़ से लगभग 8 से 24 की.ग्रा. तक गिरी की उपज प्राप्त होती है| बीज संग्रह एवं प्रसंस्करण पुष्पन एवं फलन की अवधि में एकरूपता नहीं होने के कारण बीज संग्रह में काफी समय लगता है| संग्रहित पत्तियों को धुप में 2-3 दिनों तक सुखाया जाता है| लकड़ी के हथौड़े अथवा हस्तचालित डीकाटेक्टर भी बनाए जा चुके हैं और उपयोग में लाए जा रहे हैं| करंज की औसत बीज उपज 40-90 क्विंटल/हेक्टेयर है| करंज बीज के गुण करंज की गिरी चटखीले लाल रंग की होती है| हवा में सूखाए हुए गिरियों में 10% आर्द्रता, 27 -39% तेल, 17.4%प्रोटीन, 6.6% स्टार्च, 7.3% कच्चे रेशे तथा 2% भस्म होते हैं| गिरियों में श्लेष्मा (13.5%) तथा सारभूत तेल के अंश भी पाये जाते हैं| इसके अतिरिक्त कॉम्प्लेक्स एमिनो एसिड ग्लेब्रिन में पाया जाता है| करंज के तेल के भौतिक – रासायनिक लक्षण तथा इसके फैटी एसिड संरचना व्यापारिक उपयोग में इसे पोंगम तेल के नाम से जाना जाता है| ताजे निकाले गए तेल का रंग, पीले रंग लिए नारंगी रंग से भूरे रंग का होता है जो कि भंडारण के दौरान और गहरा हो जाता है| इसकी गंध बर्दास्त करने लायक नहीं होती है जबकि स्वाद कड़वा होता है| साल्वेंट एक्ट्रेक्षण विधि से बेहतर गुणवत्तायूक्त तेल प्राप्त किया जा सकता है| तेल तथा वसाम्ल के महत्वपूर्ण गुण/लक्षण निम्नलिखित हैं – क. तेल के गुण रंग गहरा भूरा गंध बदबूदार असहनीय 40 डिग्री सेंटीग्रेड पर परावर्ती इंडेक्स 1.434-1.47900 30 डिग्री सेंटीग्रेड पर विशिष्ट घनत्व 0.925-0.940 आयोडीन मान 80-96 सैपानिफिकेशन वैल्यू 185 -195 अनसैपोनिफियेबिल वैल्यू 2.6 – 3.0 ख. करंज में विद्यमान महत्वपूर्ण फैटी एसिड की सरंचना पामिटिक 3.7-7.9% स्टीयरिक 2.4 – 8.9% ओलेयिक 44.5-71.3% लिनेलिक 10.8-18.3% लिग्नोसेरिक 1.1-3.5% एकोसेनोइक 9.5 -12.4% एराकिडिक 2.2 – 4.7% बेथेनिक 4.2 – 5.3% ट्रांस – एस्टरिफिकेशन प्रक्रिया बायो- डीजल मिथाईल – इस्टर है जो कि ट्रांस - एस्टरिफिकेशन प्रक्रिया से तैयार किया जाता है| साधारण तेल मिल में करंज बीज से तेल निकाला जा सकता है| मिथाइल इस्टर एवं ग्लिसरीन प्राप्त करने के लिए एक उत्प्रेरक की उपस्थिति में मिथेनॉल के साथ करंज तेल की प्रतिक्रिया कराई जाती है| सामान्यत: सोडियम हाइड्रोक्साइड तथा पोटैशियम हाइड्रोक्साइड को उत्प्रेरक के तौर पर उपयोग में लाया जाता है| एक घोल तैयार करने के लिए सोडियम हाइड्रोक्साइड टेबलेट को मिथेनोल में घोला जाता है| करंज तेल की पूरी मात्रा में क्रमशः 2.5% एवं 10% सोडियम हाइड्रोक्साइड तथा मिथेनोल की मात्रा में होनी चाहिए| गर्म करंज तेल में इस घोल को मिलाने के बाद इस पूरे घोल को 5-7 मिनट तक हिलाते रहना चाहिए उसके बाद इसे 4 घंटे तक बिना कुछ किए छोड़ देना चाहिए| भारी होने के कारण ग्लिसरीन धीरे-धीरे निचली सतह पर जमा होने लगता है और ऊपरी सतह पर बायो - डीजल बचता है जिसे आसानी से अलग किया जा सकता है| तेल से सोडियम की अशुद्धता हटाने के लिए इसे 2-3 बार पानी से धोया जाता है| इसके लिए तेल में पानी मिलाया जाता है और 5 मिनट बाद ऊपरी सतह पर जमा हुए तेल को संग्रहित कर लिया जाता है| इस प्रक्रिया को बार – बार दुहराया जाता है तथा अतं में तेल को गर्म किया जाता है ताकि तेल के साथ पानी का बचा हुआ अंश वाष्प बन कर उड़ जाए और उपयोग के लिए तैयार योग्य बायो-डीजल प्राप्त किया जा सके| उपयोग करंज के पेड़ दो उद्देश्यों के लिए लगाए जाते हैं, एक तो इसके खुशबूदार फूलों के लिए इसे उद्यानों, चौड़े मार्गों व सड़कों के किनारे सजावट के लिए और दुसरे लाख के कीटों के परपोषी पेड़ के तौर पर| समूचे समुद्री किनारों वाले क्षेत्रों में एक सजावटी पेड़ के रूप में इसे काफी पसंद किया जाता है| जिन पेड़ों को अधिक पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है उसके लिए बतौर कंपोस्ट उपयोग में लाने हेतु मालियों द्वारा इसके सड़े – गले फूलों व पत्तियों के टुकड़ों से तैयार खाद को प्रयुक्त किया जाता है| छाल का उपयोग सुतली व रस्सी बनाने के लिए भी किया जाता है| इसकी छाल काले रंग का लस्सा अथवा गोंद सा निकलता है जिसे जहरीली मछली के काटने से हुए घाव के उपचार के लिए उपयोग में लाया जाता है| खासकर शुष्क क्षेत्रों में इसकी पत्तियों को दुग्धसर्जक पशुओं के चारे के लिए बहुत उपयोग माना जाता है| इसे कई बार चारागाहों के साथ अंत: फसल के तौर पर उगाया जाता है क्योंकि यह कहा जाता कि इसकी छाँव में घास बहुत ठीक ढंग से उगती है| करंज की सूखी पत्तियों को अनाज भंडारण के लिए कीट - नाशक तौर पर भी प्रयुक्त किया जाता है| इसकी पत्तियों को खेत की जुताई के समय हरे खाद के तौर पर उपयोग में लाया जाता है क्योंकी यह माना जाता है कि इससे गोल कृमियों का संक्रमण रोका जा सकता है| करंज पेड़ की जड़ से प्राप्त रस को मवाद भरे घावों के उपचार के लिए प्रयुक्त किया जाता है| इसके बीजों तथा पत्तियों को पीसकर एंटीसेप्टिक (मलहम) के तौर पर उपयोग में लाया जाता है| करंज के बीज में तेल पाया जाता है जो कि कसैला, लाल-भूरे रंग का गाढ़ा, नहीं सूखने वाला अखाद्य, भार के 27-39% तक का होता है| इसे चमड़े की धुलाई, साबुन, छालों के उपचार, हर्पीस तथा गठिया के इलाज के लिए उपयोग में लाया जाता है| इसे रोशनी के साथ-साथ ल्यूब्रिकेंट्स (स्नेहक) के तौर पर भी प्रयुक्त किया जाता है| करंज के तेल में बैसिलस एन्थ्रेसिस, बैसिलस माइक्रोइडस, बैसिलस पूलिलस, इस्केरिशिया, कोलि, स्यूड़ोमोनेस मैन्जिफेरी, सल्मोनेला टायफी, शारसीना ल्यूटी, स्टायफीलोकोकाश और्येश तथा जैन्था मोनस काम्पैस्टीरिश के प्रतिरोधक प्रभाव पाए गए जबकि इसे शिंगेला स्पेशीज का प्रतिरोधक नहीं पाया गया| इसकी लकड़ी पीले – सफेद रंग की जाती है जो कि रूखी, सख्त एवं आकर्षक रूप से दानेदार परन्तु टिकाऊ नहीं होती है| लकड़ी का उपयोग केवल कैबिनेट, खींचने वाली गाड़ी तथा खंबे बनाने एवं जलावन के तौर पर किया जाता है| तेल और इसका अवशिष्ट भाग दोनों ही विषाक्त होते हैं फिर भी इसकी खली को एक “उपयोगी पोल्ट्री आहार” के बतौर माना जाता है| भारत में देहाती उपचार के रूप में उदर संबंधी गांठों के इलाज के लिए इसके फलों एवं कलिकाओं का उपयोग किया जाता है| आजकल गठिया के लेप के तौर पर इसके तेल का प्रयोग किया जाता है| माइक्रोकोकश के विरूद्ध पत्तियाँ प्रभावकारी होती हैं| इसके रस का उपयोग जुकाम, खाँसी, डायरिया, डिस्पेप्सिया, फ्लाटूलेंस, गोनोरिया एवं कुष्ठ रोग के उपचार के लिए किया जाता है| मसूड़ों, दांतों, तथा जख्मों की सफाई के लिए इसके जड़ से प्राप्त रस को प्रयुक्त किया जाता है| इडके बीज के चूर्ण को ज्वर-नाशक, शक्तिवर्धक तथा ब्रोंकाइटिस एवं कूकर खाँसी के इलाज के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है| इसके फूलों का उपयोग मधुमेह इलाज तथा बेरी- बेरी के लिए भी उपयोग में लाया जाता है| पेड़ का रस तथा तेल मलहम के लिए प्रयुक्त होता है| इसे खुजली, हर्पीस तथा पिटीरियासिस वर्सीकोलर का एक उत्कृष्ट उपचार माना जाता है| बादूबदार घावों की सफाई तथा फिस्टूला संबंधी जख्मों को बंद करने के लिए इसके जड़ के रस को प्रयुक्त किया जाता है| करंज खेती की लागत (एक मॉडल गणना) अ. करंज पौधारोपण की लागत (एक हेक्टेयर) वानस्पतिक नाम पोंगामिया पिन्नाटा अन्तराल 5 मी. 4 मी. प्रति है./पौधों की संख्या 500 जीवंतता 90 प्रतिशत फल आने के पूर्व का समय (पूर्व) 4-7 विवरण वर्ष पहला दूसरा तीसरा चौथा पांचवा छठा सातवाँ आठवां नौवां दसवां ग्यारहवां खेत तैयार करना अर्थात इसकी सफाई व स्तरी करण 600 क्यारियाँ तैयार करना 120 गड्ढों की खुदाई (500) 60×60×60 घन सें. मी. आकार का 1200 खाद (ढुलाई सहित) लागत पहले वर्ष (5 मि. ट)10 कि. ग्रा. प्रति गड्ढा की दर से दुसरे वर्ष व इससे आगे 2 कि. ग्रा. प्रति पौधा @ 400 रू./मि.ट. 2000 400 400 400 स्रोत: राष्ट्रीय तिलहन एवं वनस्पति तेल विकास बोर्ड (कृषि मंत्रालय, भारत सरकार)