भूमिका च्यूरा (डिप्लोक्नेमा बूटीरेशिया) का ताल्लुक सपाटेसी प्रजाति के पेड़ों से है जो की भारतीय मक्खन वृक्ष के रूप में लोकप्रिय है और यह मुख्यत: उत्तराखंड राज्य में पाया जाता है| यह अपार संभावनाओं वाला एक बहूउद्देशीय पेड़ है जिसकी उपयोगिताओं के समुचित दोहन किए जाने की आवश्यकता है| उत्तराखंड राज्य के कुमाऊँ क्षेत्र में इसे फूल्वारे, फुलवा, पहाड़ी महुआ, गोफट अथवा भारतीय मक्खन वृक्ष का नामों से भी जाना जाता है| व्यवसायिक तौर पर बीजों से निकाले गए च्यूरा तेल का विपणन फुलवारा घी के रूप में होता है| वितरण च्यूरा मूलत: नेपाल का पौधा है जो कि वहाँ से होते हुए भारत से फिलीपिंस तक पाया जाता है| भारत के गढ़वाल के कुमाऊँ क्षेत्र से पूरब की ओर सिक्किम तथा भूटान (उप-हिमालयी दर्रों तह बाह्य हिमालयी घाटियों) तक भी यह पाया जाता है| यह अंडमान द्वीप समूह के उष्ण कटिबंधीय, आर्द्र, पर्णपाती अर्ध- पर्णपाती तथा सदाबहार जंगलों में भी पाता जाता है| यह एक तेजी से बढ़ने वाला वृक्ष मूल तिलहन है जो कि मुख्यत: 400-1400 मीटर तक की ऊँचाई वाले दर्रों के किनारे तथा छायादार घाटियों में पाया जाता है| वनस्पतिक विशेषताएँ यह एक मंझोले आकार का पर्णपाती पेड़ है जिसका तना सीधा होता है| इसकी ऊँचाई 15-22 मीटर तक तथा तने की गोलाई 1.5-1.8 मीटर तक होती है परंतु अंडमान द्वीप समूह में इसकी ऊँचाई 21-36 मीटर तथा तने की मोटाई 1. 5-2.4 मीटर तक होती है| कुमाऊँ क्षेत्र में इसका वृक्ष मंझोले आकार से लेकर कुछ अधिक ऊँचाई वाला भी होता है तथा पहाड़ियों पर इसका तने की गोलाई 3 मीटर तक होती है| तने की छाल गहरे भूरे अथवा भूरे रंग की 1.3 सें. मी. मोटी तथा काफी चिकनी होती है| पत्तियाँ 20-25 सें. मी. लम्बी एवं 9-18 सें. मी. चौड़ी होती है जो शाखाओं के छोर पर गुच्छे के रूप में लगी होती हैं| फूलों का व्यास 2.0-2.5 सें. मी. होता है और ये सफेद/पीले रंग के होते हैं| फलरसदार 2.0 – 4.5 लंबा, चमकीले हरे या काले रंग का तथा चमकदार मोटे व मुलायम फल भित्ति वाला होता है| फल अंडाकार व हरे रंग का होता है जिनमें तीन बीज होते हैं और यह पकने के बाद रसदार व भूरे रंग का हो जाता हैं| फल का बाहरी हिस्सा मोटा, मुलायम तथा ग्लूकोज एवं सुगन्ध से परिपूर्ण होता है फलों के अंदर 1.5 से 2.0 सें. मी. लम्बाई वाले काले चमकदार लगभग बादाम के आकार वाले बीज होते हैं जिनके अंदर की गिरी सफेद होती हैं| बीज का आवरण पतला से मोटा तथा काष्ठीय व पपड़ीदार होता है| जलवायु एवं मिट्टी इसके प्राकृतिक वास वाले क्षेत्रों में प्रतिवर्ष औसतन 1000-2000 मि.मी. वर्षा होती है और तापमान 240 सें. से 270 से तक रहता है| च्यूरा के लिए उप – हिमालयी क्षेत्र के पहाड़ी ढलान, गहरी घाटियों वाले तथा नदी के किनारे वाले क्षेत्र सर्वाधिक उपयुक्त होते हैं| च्यूरा के पौधारोपण के लिए गहरे दानेवाली माध्यम प्रकार की मिट्टी अच्छी होती है| संवर्धन तकनीक च्यूरा का संवर्धन बीजों तथा कलमों के माध्यम से किया जा सकता है| हालाँकि इसका कायिक संवर्धन वाणिज्यिक रूप से सफल नहीं पाया गया है| 1) बीज के माध्यम से संवर्धन पेड़ों से मई – जून महीनों के दौरान पूरी तरह से परिपक्व, अच्छे तथा बीमारी रहित स्वस्थ बीज संग्रहित किए जाते हैं| इन संग्रहित बीजों के गूदे हटाकर इन्हें अच्छी तरह से धो लेना चाहिए और 24 घंटे तक पानी में फूलने के लिए डुबो कर रखना चाहिए| इससे बीजों की अंकुरण क्षमता बेहतर होती है| इससे बीजों की अंकुरण क्षमता बेहतर होती है| च्यूरा के बीजों की अंकुरण क्षमता 7 से 10 दिनों तक की ही होती है इसलिए संग्रह के एक सप्ताह के अंदर ही इनकी बुआई की जानी चाहिए| लगभग 45 दिनों बाद इनसे उगे पौधों की रोपाई, पॉली बैग में किया जा सकता है| बीजों की बुआई में 10 × 20 सें. मी. आकार के पॉली – बैग जिसमें 2:1:1 के अनुपात में मिट्टी, एफ.वाई.एम् तथा रेत के मिश्रण भरे हुए हों, उसमें भी सीधे किया जा सकता है| 15 मी.मी. की गहराई में प्रति बैग एक बीज की दर से बीजों की बुआई की जानी चाहिए| अच्छी वृद्धि के लिए आवश्यक आर्द्रता के स्तर को बनाए रखने के लिए जरूरत के अनुसार सिंचाई की जानी चाहिए| इनकी निराई-गुड़ाई भी नियमित रूप से की जानी चाहिए| 2) कलम द्वारा संवर्धन इस विधि में मई- सितंबर महीनों के दौरान पुराने पेड़ों से 25 सें. मी. लंबी तथा 12-18 मि. मी. मोटाई वाली कलमें काटकर संग्रहित की जाती है| इन कलमों में बेहतर जड़ प्रस्फूटन के लिए इन्हें आई.बी.ए. के 1000 पी. पी. एम. वाले घोल से उपचारित किया जाता है| इन कलमों को बसंत ऋतू के दौरान रोपा जाना चाहिए| पौधारोपण के तरीके प्रति हेक्टेयर 250 पौधे लगाए जाते हैं जिनके लिए 6 मीटर × 6 मीटर के अन्तराल पर 60×60×60 सें. मी.3 (लंबाई, चौड़ाई, गहराई) के आकार के गड्ढे तैयार किए जाते हैं| खेतों में रोपाई के लिए एक साल के स्वस्थ पौधों (60 सें.मी. की ऊँचाई वाले पौधे) को नर्सरी की क्यारियों से जड़ तथा इसके साथ लगी मिट्टी सहित उखाड़कर रोपाई हेतु उपयोग में लाया जाता है| नर्सरी से उखाड़कर खेतों में पौधों की रोपाई के लिए जून- जुलाई का महीना सबसे उपयुक्त होता है क्योंकी इस समय मानसून की भी शूरूआत हो जाती है और इन पौधों में स्वभाविक रूप से बेहतर वृद्धि होती है| पुष्पन एवं फलन च्यूरा के 8-10 वर्ष के पेड़ में फूल आना प्रारंभ हो जाता है| फूल, अक्टूबर- नवंबर महीनों में आते हैं| इसके फूल सफेद या पीले रंग के तथा एक विशेष खुशबू वाले होते हैं| समान्यत: इसमें एक वर्ष छोड़कर फिर अगले वर्ष अर्थात् वैकल्पिक आधार पर फूल और फल लगते हैं| जून – जुलाई के महीनों में फल पकना शुरू हो जाता है| फल अंडाकार होते हैं और शूरूआती अवस्था में ये हरे रंग के होते हैं जो जून – जुलाई महीनों के दौरान पकने पर पीले रंग के हो जाते हैं| फलों की तुड़ाई जून महीने के दुसरे सप्ताह से लेकर जुलाई महीने के अंत तक किया जाता है| फलों की तुड़ाई एवं उपज च्यूरा के पके हुए फलों, जो भूरे तथा हल्के पीले रंग वाले होते हैं, को हाथ से अथवा बांस के डंडे से तोड़ा जाता है| इन फलों को 8-12 दिनों तक छायेदार स्थान पर रखकर सुखाया जाता है| प्रतिवर्ष औसतन 100-250 किलोग्राम प्रति पेड़ की दर से उपज प्राप्त होता है| बीजों को अलग करने की विधि पके फलों से रस, गुदा तथा बीजों को अलग करने के लिए दो तरीकों का इस्तेमाल किया जाट है| यदि फल कम मात्रा/संख्या में हो तो यह हाथ से भी किया जा सकता है| फलों की अधिक मात्रा/ संख्या होने की दशा में इसके के लिए रोलर मशीन का प्रयोग किया जाता है| रोलर मशीन के दोनों पाटों के बीच के दूरी को सही प्रकार से समायोजित किया जाना चाहिए ताकि अधिक दबाव के कारण फलों को होने वाले नुकसान से बचाया जा सके| मशीन से तोड़े जाने पर फलों से प्राप्त बीज तथा रस अलग – अलग खाने में गिरते हैं जिससे रस अलग चौड़ी ट्रे में जमा हो जाता है और बीज मशीन के निचले हिस्से में लगे ट्रे में एकत्रित हो जाता है| बीज प्रसंस्करण बीज की गिरियों पारंपरिक तथा आधुनिक यांत्रिक विधि सहित दो तरीकों से प्राप्त किए जाते हैं| पारंपरिक विधि पारंपरिक विधि में फल की गिरियों को पानी भरे एक बड़ी कढ़ाई में डूबोकर गर्म करते हैं तथा कढ़ाई में इन गिरियों को लकड़ी से लगातार चलाते रहते हैं इन गिरियों को अच्छी प्रकार से पकने देते हैं| इसके बाद कढ़ाई से इन पकी गिरियों को निकाल कर पानी से अलग करने के फर्श पर सुखाया जाता है और इन्हें दबाकर दो टुकड़ों में बाँट दिया जाता है| इन टूटी गिरियों को अब बड़े पत्थर अथवा सिलबट्टे पर रगड़ा जाता है ताकि इससे इनका आवरण/छिलका अलग हो जाए| इस प्रकार से प्राप्त छिलकारहित गिरियों को धुप से सुखाया जाता हैं| आधुनिक विधि यांत्रिक विधि में स्क्र्यू वाले सिलिंडर के आकार के धातु के मशीन में बीजों को डाला जाता है| मशीन को हाथ से अथवा बिजली से भी चलाया जाता है| मशीन में लगे शाफ़्ट के चलने से बीजों के टुकड़े हो जाते हैं और इनकी गिरियों चार भागों में विभक्त हो जाती हैं जिन्हें धुप में सुखा लिया जाता है| च्यूरा घी निष्कर्षण पारंपरिक विधि पारंपरिक विधि में पहले च्यूरा की गिरियों को बड़ी कढ़ाई में हल्की आंच पर भुना जाता है| इन गरम – गरम गिरियों का चूरण बनाने के लिए इन्हें कूटकर सिलबट्टे पर पीसा जाता है| इस चूरण से वसा/तेल अलग करने के लिए इसे गर्म पानी के साथ कढ़ाई में उबाला जाता है| उबालने के बाद पानी को ठंडा तथा स्थिर होने के लिए छोड़ दिया जाता है| इसके बाद पानी का ठंडा तथा स्थिर होने के लिए छोड़ दिया जाता है| इसके बाद इकट्ठा हुए पेस्ट (लुगदी) को निकाल लिया जाता है जिसे हाथ से इस प्रकार से तब तक दबाया जाता है जब तक कि इससे मक्खन/ घी निचुड़ कर बाहर न निकलने लगे| एक बार मक्खन निकल जाने के बाद बची हुई लुगदी को धुप में गर्म कर फिर कूटा जाता है और इसे बारीक़ पीसकर गर्म पानी से भरे बड़े बर्तन में डाल कर हाथ से खूब रगड़ा जाता है| अफ़ी देर तक लगातार रगड़ने/ मसलने पर चिकनाई धीरे-धीरे पानी के ऊपरी परत पर आ जाता है| जब बर्तन का पानी ठंडा हो जाए तब इस जमे हुए मक्खन को बाहर लिया जाता है जिसे घी के रूप में उपयोग किया जाता है| परन्तु इस विधि में काफी अधिक समय लगता है और इससे केवल 30-35% तक ही मक्खन प्राप्त किया जा सकता है| आधुनिक विधि बाजार में तेल निकालने वाली मशीनें/ घनियाँ उपलब्ध हैं| ऐसे तेल निष्कर्षकों का उपयोग किया जाता है| बीज का भार फल के भार का 20% जबकि गिरी का भर 76-80% होता है| बीज तथा गिरी में क्रमश: 42-47% तथा 60-88% तेल विद्यमान रहता है| च्यूरा के घी की पोषक महत्ता च्यूरा का घी काफी होता है| इसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट तथा एश (भस्म) की मात्रा क्रमश: 5-20%, 30% तथा 3.8% तक होती है| इसके रस का उपयोग शीतल पेय के रूप में भी किया जाता है| च्यूरा के रस विद्यमान मुख्य पोषक तत्व निम्नलिखित हैं:- कूल घुलनशील ठोस तत्व 17-230 बी नॉन – रिड्यूसिंग सुगर 8.31-11.9% पी.एच 5.4 रिड्यूसिंग सुगर 4.8-6.1% विटामिन सी 38 मि. ग्रा. प्रति 100 ग्राम च्यूरा के भौतिक-रासायनिक गुण च्यूरा की गिरी से प्राप्त तेल को फुलवा या फुलवारा घी कहा जाता है जो गिरी तथा बीज भर का क्रमशः 60-66% तथा 42-47% तक होता है| यह घी की तरह गाढ़ा होता है जो कि 350 से तापमान तक जमा ही रहता है| 490 से तक गर्म करने पर यह पूरी तरह पिघल जाता है| च्यूरा के तेल के निम्न लिखित गुण है:- क्रम.सं. गुन/ लक्षण मूल्य (वैल्यू) 1 सापेक्ष घनत्व 0.856-0.862 2 40 से पर रिफ्रेक्तिव इंडेक्स 1.04552-1.4650 3 सैपानिफिकेशन वैल्यू 191-200 4 आयोडीन वैल्यू 90-101 5 आर. एम. वैल्यू 0.4-4.3 6 क्वथनांक (ByaByब्यालिंग पॉइंट) 39- 510 सें. 7 टाइटर वैल्यू 48-52 8 पाल्मिटिक एसिड 56.6% 9 स्टीयरिक एसिड 3.6% 10 ओलेइक एसिड 36% 11. लेनोलिक एसिड 3.8% स्रोत: हिमालियन क्षेत्रों के संभावित वृक्षमूल वाले तिलहन : नोवोड बोर्ड संभावित उपयोग 1. यह कुमाऊँ क्षेत्र में भोजन सामग्री, पशु आहार तथा औषधि के रूप में उपयोग में लाया जाता है और इसे कल्प –वृक्ष भी कहा जाता है| 2. च्यूरा की पत्तियों का उपयोग पशु चारे के रूप में किया जाता है| 3. च्यूरा की पत्तियों चौड़ी होती है अत: इनका उपयोग भोजन परोसना के लिए पत्तल/दोने के रूप में किया जाता है| ऐसे पत्तल, बायो-डिग्रडेबल भी होते हैं जिनसे पर्यावरण-प्रदूषण नहीं होता है| 4. सब्जियाँ व भोजन पकाने व तलने के लिए च्यूरा के तेल का उपयोग घी मक्खन के रूप में किया जाता है| यह “फूलवारा घी” के नाम से भी जाना जाता है| 5.च्यूरा के मक्खन का उपयोग औषधि, मलहम, मोमबत्ती, क्रीम एवं अन्य ऐसे उपयोगी उत्पाद तैयार करने में किया जाता है| 6. च्यूरा के प्रसंस्करण के बाद प्राप्त खली का प्रयोग खाद रूप में किया जाता है| इसमें कीटनाशक तत्व विद्यमान रहता है अत: इसका उपयोग कीटनाशक, गोलकृमि नाशक (निमेटिसइड), चूहा नाशक (रोडेन्टोसाइड) आदि के तौर पर भी किया जाता है| खली को विनाशकारी रासायनिक कीटनाशकों की जगह क्रूड फ़ीस प्वायजन (विष) के तौर पर भी प्रयोग में लाया जा सकता है| इसमें सैपोनिन भी काफी मात्रा में पाया जाता है इसलिए यह, ऐसे उद्योग सैपोनिन का प्रयोग किया जाता है, कि लिए भविष्य में एक अच्छे स्रोत के रूप में भी उपयोग में लाया जा सकता है| 7. च्यूरा के फूल में चीनी का अंश, प्रचुर मात्रा में विद्यमान रहता है इसलिए इसे गुड तथा अल्कोहल (देशी शराब) बनाने में भी उपयोग में लाया जाता है| 8. इसकी लकड़ी साधारण गृह-निर्माण में फर्नीचर बनाने में तथा जलावन के रूप में प्रयुक्त की जाती है| च्यूरा का विपणन कुमाऊँ के के स्थानीय कृषक समुदाय द्वारा च्यूरा के उप्तादों का उपयोग किया जाता और इनका उपयोग खासकर घरेलू उपभोग के लिए किया जाता है| उन्हें च्यूरा के उत्पादों के बाजरा भाव की सही – सही जानकारी नहीं होती है| च्यूरा का फल जितना सूखा होता है उसी के आधार पर उसका मूल्य निर्धारित होता है| कच्चे फलों की तुलना में सूखे फलों की अधिक कीमत मिलती है| व्यापारियों को फसल तैयार होने के पहले ही फसल बेच दिया जाना आम बात है| व्यापारी, फसल बेचने वाले किसानों को आवश्यक्तानुसार किस्तों में इसकी कीमत अदा करता रहता है| उत्पादकों द्वारा अधिकतर तो सीधे ही व्यापारियों को उत्पाद/ फसल बेच दिए जाते हैं इसलिए उन्हें फसल तैयार किए जाने वाले स्थानों से संग्रह केंद्र तक के किराए के खर्चे का वहन नहीं करना पड़ता है| व्यापारियों द्वारा 15-20 रूपए प्रति बैग की दर से पैकेजिंग का खर्च किया जाता है| सामान्यत: व्यपारियों द्वारा लगभग दो महीनों तक च्यूरा का भंडारण किया जाता है ताकि इसमें मौजूद नमी की मात्रा कम हो सके| खरीदने से पहले व्यापारियों द्वारा इस बात की ताकीद की जाती है कि च्यूरा अच्छी क्वालिटी का हो| च्यूरा के बड़े व मासल फल, अच्छी क्वालिटी के माने जाते हैं| उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र में तो कुछ लोगों द्वारा दशकों से च्यूरा घी का उपभोग सामान्य घी के तौर पर किया जा रहा है| वे इसके उपभोग के अभ्यस्त हो चुके हैं| च्यूरा की खेती की लागत व इससे प्राप्त होने वाली आमदनी च्यूरा के पौधारोपण तथा रख रखाव का खर्च, पौधारोपण के स्थान, निवेश की लागत, मजदूरी इत्यादि जैसे विभिन्न कारकों पर निर्भर करता है जिसके अनुसार प्रति हैक्टेयर लगभग 9000-10000/- रूपए की दर से खर्च होता है| 7-8 वर्षों के बाद इससे फल प्राप्त होना शूरू हो जाता है जिससे कि 50-60 वर्ष तक हरेक वैकल्पिक वर्षो में उपज/फसल प्राप्त होती है| च्यूरा के बीज के बाजार भाव 10-15 रूपए/ किलो ग्राम तक प्राप्त हो जाता है| इस प्रकार इससे प्रति हैक्टेयर प्रति वर्ष लगभग 70,000 -1,20,000/- रूपए तक की औसत आमदनी होती है| स्रोत: राष्ट्रीय तिलहन एवं वनस्पति तेल विकास बोर्ड (कृषि मंत्रालय, भारत सरकार)