उत्तर प्रदेश में ग्रीष्मकालीन मूँगफली की खेती का प्रचार–प्रसार जनपद फर्रूखाबाद मैनपुरी हरदोई, अलीगढ़ आदि जिलों में बढ़ा है क्योंकि खरीफ की अपेक्षा जायद में कीड़े आदि बीमारियों का प्रकोप कम होता है। ग्रीष्मकालन मूँगफली से अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिए कृषकों को निम्न तकनीक अपनानी आवश्यक हैः 1. भूमि की किस्म मूँगफली की खेती के लिए बलुअर, बलुअर दोमट या हल्की दोमट भूमि अच्छी रहती है। ग्रीष्मकालीन मूँगफली, आलू, मटर, सब्जी मटर तथा राई की कटाई के बाद खाली खेतों में सफलतापूर्वक की जा सकती है। ग्रीष्मकालीन मूँगफली के लिये भारी दोमट भूमि का चयन न करें। 2. भूमि की तैयारी ग्रीष्मकालीन मूँगफली के लिए खेत की तैयारी अच्छी प्रकार कर लेनी चाहियें। यदि मूँगफली की खेती राई तथा मटर के बाद की जा रही है। तो उन खेतो की एक गहरी जुताई तथा 2-3 जुताई देशी हल अथवा कल्टीवेटर से करके भुरभुरा बना लेना चाहिये। आलू तथा सब्जी मटर की खेती के बाद मूँगफली उगाई जाने की दशा में गहरी जुताई की आवश्यकता नही पड़ती है। देशी हल अथवा कल्टीवेटर से 2-3 जुताई करके खेत को भुरभुरा बना लेना चाहिये। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा लगाकर खेत को चौरस कर लेना चाहिए। ताकि सिंचाई का पानी खेत मे समान रूप से फेल जाये तथा पानी की अधिक बरबादी न होने पाये 3. प्रजातियों का चयन कम अवधि में पकने वाली तथा गुच्छेदार प्रजातियों का चयन ग्रीष्मकालीन मूँगफली की खेती के लिये कर सकते हे। दक्षिण भारत में नमी दबाव प्रभावित क्षेत्र से विकसित प्रजातियों जो निम्न सारिणी में आंकित है मे से किसी भी प्रजाति का चयन करना श्रेष्ठ होगा। मूँगफली क्रमांक प्रजाति पकने की अवधि(दिनो में) उपज (कु./हे.) सोलिंग प्रतिशत तेल प्रतिशत विशेषता 1 डी.एच.-86 90-95 28-30 70 50 कम नमी,अधिकतम तापमान की सहन शक्ति बडनिक्रोसिस भुनगा जैसिड एवं पत्ती सुरंग अवरोधी 2 आई.सी.जी.एस.-44 105-110 23-27 70 49 तदैव 3 आई.सी.जी.एस.-1 105-110 20-26 70 51 तदैव 4 आई.सी.जी.वी.-93468 (अवतार) 115-120 25-30 69 50 तदैव 5 टी.जी.37ए 90-100 25-30 69 50 तदैव सीधी 6 टी.ए.जी.-24 90-100 25-30 69 50 तदैव सीधी 4. बीज दर एवं चयन बीज का चयन रोग रहित उगायी गयी फसल से करें। ग्रीष्मकालीन फसल से अच्छी पैदावार होने हेतु (गिरी) में 95-100 किलोग्राम बीज प्रति हैक्टेयर की दर से डालना चाहिए। बीज की मात्रा कम न करें अन्यथा पौधे कम रहने पर उपज सीधे प्रभावित होगी। 5. बीज शोधन एवं उपचार बोने से पूर्व गिरी को थीरम 75: डब्लू.एस. 2.0 ग्राम तथा कार्बेन्डजिम का 50 प्रतिशत 1 ग्राम घुलनशील चूर्ण के मिश्रण की 3.0 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से शोधित कर लेना चाहिए। इस शोधन के 5-6 घण्टे के बाद बोने से पहले बीज मूँगफली के विशिष्ट राइजोबियम कल्चर से उपचारित करें। एक पैकेट कल्चर 10 किलोग्राम बीज के लिए पर्याप्त होता है। कल्चर को बीज में मिलाने के लिए आधा लीटर पानी में 50 ग्राम गुड़ घोल लें। घोल में 200 ग्राम राइजोबियम कल्चर का पूरा पैकेट मिलायें, इस मिश्रण को 10 किलोग्राम बीज के ऊपर छिडक कर हल्के हाथ से मिलायें जिससे बीज के ऊपर एक हल्की पर्त बन जाये। इस बीज को साये में 2-3 घण्टे बुवाई प्रातः 10 बजे तकया शाम को 4 बजे करे। तेज धूप में कल्चर के जीवाणु के मरने की आशंका रहती है। ऐसे खेतों में जहॉ मूँगफली पहली बार या काफी समय बाद बाेंई जा रही हो कल्चर का प्रयोग अवश्य करे। 6. बुवाई की विधि खेत में पर्याप्त नमी के लिए पलेवा देकर ग्रीष्मकालीन मूँगफली की बुवाई करना उचित होगा। यदि खेत मे उचित नमी नही हैं तो मूँगफली का जमाव अच्छा नही होगा जो उपज को सीधा प्रभावित करेगा। गुच्छेदार प्रजातियों ग्रीष्मकालीन खेती के लिए उत्तम रहती है। इसलिए बुवाई 25-30 सेमी. की दूरी पर देशी हल से खेले गयें कूडो में 8-10 सेमी की दूरी परकरना चाहियें। बुवाई के बाद खेत में क्रास पाटा लगाकर दानों का ेपूरी तरह से मिट्टी से ढंक देना चाहियें। क्रास पाटा खेत में उपलब्ध नमी को उडाने से बचाकर सुरक्षित करेगा। और जमाव को शीघ्र व अच्छा होने पर सहायक होगा। 7. बुवाई का उचित समय ग्रीष्मकालीन मूँगफली की अच्छी उपज लेने के लिए अच्छा होगा कि बुवाई मार्च के प्रथम सप्ताह में अवश्य समाप्त कर लें। विलम्ब से बुवाई करने पर मानसून की वर्ष प्रारम्भ होने की दशा में खुदाई के बाद फलियों की सुखाई करने में कठिनाई होगी। 8. खाद एवं उर्वरक प्रबन्धन मूँगफली की अच्छी पैदावर लेने के लिए उर्वरकों का प्रयोग बहुत आवश्यक है। यदि राई एवं मटर की खेती के बाद ग्रीष्मकालीन मूँगफली की खेती की जा रही है तो बुवाई के पूर्व 100 कुन्तल प्रति हे. की दर से गोबर की खाद डालन चाहिये। आलू तथा सब्जी मटर में फसलों में यदि गोबर की खाद का प्रयोग की गयी तो गोबर की खाद डालने की आवश्यकता नही है। राई तथा मटर की खेती के बाद उगाई जा रही मूँगफली में 20 किग्रा. नत्रजन, 50 किग्रा. फास्फेट, 45 किग्रा. पोटाश तथा 300 किग्रा. जिप्सम प्रति हे. की दर से प्रयोग करना चाहिए। आलू एवं सब्जी मटर या गौहानी खेतों में 15 किग्रा. नत्रजन, 30 किग्रा. फास्फेट,45 किग्रा. पोटाश तथा 300 किग्रा. जिप्सम डालना उचित होगा। ग्रीष्मकालीन मूँगफली में नत्रजन की अधिक मात्रा न डालें अन्यथा यह मूँगफली की पकने की अवधि बढ़ा देगा। नत्रजन की आधी मात्रा तथा फास्फेट व पोटाश की पूरी मात्रा कूड़ों में नाईं अथवा चोंगे द्वारा बुवाई के समय बीज से करीब 2-3 सेमी. गहरा डालना चाहिए। जिप्सम तथा नत्रजन की शेष आधी मात्रा मूँगफली में फूल निकलते तथा खूँटी बनते समय टापडेªसिंग करके प्रयोग करना चाहिए। जिप्सम की टापडेªसिंग के बाद खुरपी से गुड़ाई करके खेत में मिलाना आवश्यक है तथा 4 किग्रा. बोरेक्स प्रति हे. का प्रयोग करें। 9. जल प्रबन्ध जिन कृषको के पास सिचाई के साधनों की व्यवस्था नहीं है वह ग्रीष्मकालीन मूँगफली की खेती न करें। पलेवा देकर बुवाई के बाद पहली सिचाई जमाव पूर्ण होने तथा सूखी गुडाई के 20 दिन बाद करे। ग्रीष्मकालीन मूँगफली की प्रजातियों में 30-35 दिन के बाद फूल आने प्रारम्भ हो जाते हैं इसलिए दूसरी सिंचाई 35 दिन की फसल होने पर करें। 45-50 दिन के बाद खूँटी बनने लगती है। अतः इस अवस्था में नमी की उचित व्यवस्था हेतु 50-55 दिन बाद तीसरी सिचाई करे। तीसरी सिचाई गहरी करना उचित होगा क्योकि इस समय खूंटी भमि में गढने लगती है। तथा फलियॉ बनने लगती है। चौथी सिचाई 70-75 दिन के बाद फलियों में दाना भरते समय करना चाहिये। इस प्रकार भरपूर उपज लेने के लिए 4-5 सिचाईयों देना चाहिये। 10. निकाई गुडाई बुबुवाई के 15-20 दिन के बाद पहली निकाई–गुड़ाई एवं बुवाई के 40-45 दिन बाद जिप्सम बुरकाव के उपरान्त दूसरी निकाई-गुड़ाई करें। खूँटियॉ (पेगिंग) बनते समय निकाई-गुड़ाई न की जाये। रासायनिक विधि से खरपतवार नियंत्रण हेतु पेन्डिमेथेलिन 30 ई.सी. की 3.3 लीटर⁄हे. अथवा एलाक्लोर 50 ई.सी.4 लीटर⁄ हैक्टेयर अथवा आक्सीफ्लोरफेन 23.5 ई.सी. की 420 मिली. मात्रा 800-1000 लीटर पानी में घोल बनाकर बुवाई के दूसरे या तीसरे दिन छिड़काव करना चाहिए। इस छिडकाव से मौसमी घास एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों का जमाव नही होता है। इस विधि से खरपरवार नियंत्रण केवल अत्यधिक खरपरतवार समस्या वाले क्षेत्रों मे करे। 11. कीट/रोग प्रबन्ध जायद में उगाई जाने वाली मॅूगफली में प्रायः कीट ⁄ रोग की जटिलता न के बराबर रहती है। 3 वर्ष गहन अध्ययनों से पता चला कि एनारसिया का प्रकोप 1-2 प्रतिशत, जैसिड़ का प्रकोप 1-3 प्रतिशत, सफेद गिड़ार का प्रकोप शून्य तथा फलीवेधक का प्रकोप 5-7 प्रतिशत तक ही देखा गया। इसलिए दीमक एवं फलीवेधक की रोकथाम कर ली जाए तो फसल की भरपूर उपज प्राप्त होती है। इन दोनो कीटों का प्रकोप निम्न प्रकार से रोकं दीमकयह सूखे की स्थिति में जड़ों तथा फलियों को काटती है। जड़ कटने से पौधे सूख जाते है। फलियों के अन्दर गिरी के स्थान पर मिट्टी भर देती है। उपचार खड़ी फसल में प्रकोप होने पर क्लोरपायरीफास 20% ई.सी. की 2.5 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से सिंचाई के पानी के साथ प्रयोग करें कार्बोफ्यूरान 3 जी 20 किग्रा. अथवा फोरेट 10 जी 10 किग्रा. प्रति हे. सूत्रकृमि के नियंत्रण के लिए प्रयोग करें। 12. खुदाई खुदाई तभी करें जब मॅूगफली के छिलके के ऊपर नसें उभर आयें, भीतरी भाग कत्थई रंग का हो जाय और मूँगफली का दाना गुलाबी हो जाये। खुदाई करते समय पौधा सीधा रक्खें पलट कर कड़ी धूप में रखना उचित न होगा। खुदाई करते समय इस बात का ध्यान में रक्खें कि फसल को खेत में ग्रीष्मकालीन समय में 70-80% फलियाँ पकने के बाद खोद लें। 13. तुड़ाई ग्रीष्म ऋतु में उगाई जाने वाली सभी प्रजातियॉ में फलियाँ गुच्छों में लगती है। मूँगफली की तुड़ाई महगी सस्य क्रिया है। इसलिए फलियों की तुड़ाई हेतु देशी एवं सस्ती विधि विकसित की गयी है। दो खम्भों को खेत में गाड़ दे और उन खम्भों के ऊपर चौड़ा लकड़ी का पटरा रख कर रस्सी से बॉध दे। पटरे पर मूँगफली के पौधे इस प्रकार रखे कि मूँगफली की फलियॉ एक तरफ किनारे रहे। एक मजबूत डंडे से फलियों को झाड़ कर पौधों से अलग कर लें। इस प्रकार शीघ्र एवं कम लागत में फलियॉ पौधों से अलग हो जायेगी। 14. सुखाई ग्रीष्मकालीन मूँगफली की खेती में फलियों को सुखाना एक महत्वपूर्ण कड़ी है। फलियों की सुखाई पेड़ों की छाया में करें। फलियों की सुखाई तेज धूप में न करें। तेज धूप में सुखाई गयी मूँगफली के दानों का जमाव कम हो जायेगा। जो बीज के प्रयोग के लिए अनुपयुक्त होगा। यदि पेड़ों की छाया का अभाव है तो मूँगफली की तुड़ाई छाया में 4 बजे के बाद हल्की धूप होने की दशा में धूप में सुखा लेना भी उचित रहेगा। 15. भण्डारा खुदाई के बाद फलियों को खूब छाया में सुखाकर भण्डारण करें। यदि गीली मूँगफली का भण्डारण किया जायेगा तो फलियॉ काले रंग की हो जायेगी जो खाने एवं बीज हेतु सर्वथा अनुपयुक्त हो जाती हैं। ग्रीष्मकालीन मूँगफली से दोहरा लाभ यदि ग्रीष्मकालीन में उत्पादित मूँगफली के दानों को वर्षाकालीन खेती में प्रयोग करना है तो इन दोनों की बुवाई कर सकते हैं। शत प्रतिशत जमाव होगा और भरपूर उपज मिलेगी। ग्रीष्मकालीन मूँगफली की खेती करके मूँगफली के उत्पादन की क्षति जो वर्षा ऋतु में हुयी है उसकी पूर्ति ग्रीष्मकालीन मूँगफली की खेती से करते हुए प्रदेश एवं देश का उत्पादन बढ़ा सकते हैं। प्रभावी बिन्दु लम्बी अवधि में पकने वाली प्रजातियों की बुवाई कदापि न करें। समय से बुबाई करें एवं बीज दर तथा दूरी पर विशेष ध्यान दें। संस्तुत उर्वरकों के साथ जिप्सम 300 किग्रा. ⁄ हे. एवं बोरेक्स 4 किग्रा. प्रति हे. की दर से प्रयोग अवश्य करें। खूँटियाँ बनते समय एवं फली भरते समय सिंचाई अवश्य करें। पकने के निर्धारित समय के अन्दर 70 से 80% फलियाँ पकने पर (100-110) दिन खुदाई अवश्य कर लें। स्त्राेत : पारदर्शी किसाना सेवा याेजना, कृषि विभाग, उत्तरप्रदेश।