भूमिका भारत में दलहनी फसलों में चने का एक महत्वपूर्ण स्थान है। देश में कुल दलहनी फसलों के क्षेत्रफल के 43.18 प्रतिशत भाग (16.35 मिलियन हैक्टर) वाले 25 राज्यों में चने का उत्पादन किया जाता है। इसका लगभग 96 प्रतिशत क्षेत्रफल मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात एवं झारखण्ड में है। देश में चने की लगभग 200 प्रजातियों का विकास भारत में किया गया है, जो कि विभिन्न जलवायु परिस्थितियों में अच्छा प्रदर्शन करती हैं। ये प्रजातियां विभिन्न रोगों की प्रतिरोधी क्षमता से युक्त हैं। इन सभी प्रयासों के फलस्वरूप चने के क्षेत्रफल को 2000-01 के 5.19 मिलियन हैक्टर से 2015-16 तक 8.35 मिलियन हैक्टर तक बढ़ाया जा सका है। इसी प्रकार उत्पादन (3.96 मिलियन टन से 7.06 मिलियन टन) को लगभग दोगुना तथा उत्पादकता को 7.44 क्विंटल/हैक्टर से 8.59 क्विंटल/हैक्टर तक बढ़ाया जा सका है। चने की विभिन्न प्रजातियाँ चने की मशीन से कटाई वाली प्रजातियों के विकास में बहुत सी चुनौतियां हैं जैसे कि लंबी बढ़ने वाली प्रजातियों की ही कटाई एवं मड़ाई की जा सकती है। इन प्रजातियों में फलियां भूमि से कम से कम 25 सें.मी. ऊपर लगें तथा सभी दाने एक साथ पके ताकि कटाई के वक्त दाने टूटकर जमीन पर न गिरें। यांत्रिक कटाई हेतु उपयुक्त प्रजातियों के विकास के लिए पिछले दशक में अनुसंधान शुरू किया गया था। इससे तीन प्रजातियों एनबीइजी-47 जीबीएम-2 और फूले विक्रम का विकास किया गया है। यह आंध्र प्रदेश, कर्नाटक एवं महाराष्ट्र राज्य के लिए उपयुक्त है। एनबीइजी-47 एक देशी प्रजाति है, जो कि मध्य सीधी बढ़ने वाली है और यांत्रिक कटाई के लिए उपयुक्त है। यह आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना राज्य के लिए उपयुक्त है। अधिक उपज देने वाली इस प्रजाति के 100 दानों का वजन लगभग 27-28 ग्राम तक होता है। इसकी औसत उपज 20-25 क्विंटल/हैक्टर होती है। यह 90-105 दिनों में पककर तैयार ही कटाई हो जाती है। इसमें फलियां लगभग 28-30 सें.मी. भूमि की ऊंचाई से ऊपर आती हैं। जीबीएम-2 प्रजाति एक पुरानी प्रजाति अन्नेगिरी-1 का प्रतिरूप है, जो कि कर्नाटक राज्य के लिए अनुमोदित की गयी है। यह अभी तक प्रचलित प्रजातियों से 2 गुना तक ऊंची होती है औरइसका पौधा मजबूत होता है। इसके पौधे में फलियां ऊपर के 1/3 भाग में ही आती हैं, जो कि मशीन से कटाई के लिए उपयुक्त हैं। मशीन से कटाई में दानों का कम से कम नुकसान होता है। यह 100-110 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। इसकी औसत उपज 18-20 क्विंटल/हैक्टर है। ‘फूले विक्रम' देशी चने की प्रजाति है, जिसका विकास महाराष्ट्र राज्य के लिए जिसका विकास महाराष्ट्र राज्य के लिए किया गया है | यह प्रजाति महाराष्ट्र में मशीन द्वारा कटाई एवं मड़ाई के लिए उपयुक्त है। यह प्रजाति 96-112 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। इसकी औसत उपज 16-22 क्विंटल/हैक्टर है। यांत्रिक कटाई से चना पैदा करने वाले क्षेत्रों में किसानों की आमदनी को लागत मूल्य कम करके बढ़ाया जा सकता है। यांत्रिक कटाई से फसल को तूफान, वर्षा, ओले आदि से बचाकर किसी भी प्रकार के नुकसान से बचा जा सकता है। यांत्रिक कटाई एवं मड़ाई से मजदूरी भी कम की जा सकती है, जिससे फसल का लागत मूल्य कम किया जा सकता है। यांत्रिक कटाई के लिए उपयुक्त ऊंचे और खड़े पौधे न केवल सूर्य के प्रकाश को बेहतर तरीके से ग्रहण करेंगे बल्कि इसके परिणामस्वरूप पत्ते के रोगों में भी कमी आएगी तथा फसल में कीटनाशकों का छिड़काव भी प्रभावी ढंग से किया जा सकेगा। इससे पौधों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों जैसे फलीभेदक इत्यादि का भी उचित प्रबंधन किया जा सकेगा। चने में यंत्रीकरण सम्पूर्ण विश्व में चना सुधार कार्यक्रमों का मुख्य उद्देश्य चने के लागत मूल्य को कम करना है। भारत के किसान धीरे-धीरे यंत्रीकरण की तरफ बढ़ रहे हैं, जिससे उनकी कार्यकुशलता में वृद्धि कर लागत मूल्य को कम किया जा सकता है। किसानों की मांग है कि चने की ऐसी प्रजातियां विकसित की चने की यांत्रिक विधि से कटाई जाएं, जिनकी कटाई एवं मड़ाई कम्बाइन हार्वेस्टर मशीन द्वारा की जा सके। वर्तमान में प्रचलित ज्यादातर प्रजातियां मशीन से कटाई हेतु उपयुक्त नहीं हैं।इसी संदर्भ को देखते हुए अब चने की लंबी प्रजातियों (70 सें.मी. से अधिक) के विकास पर अनुसंधान कार्य तेजी से चल रहा है। इससे इन प्रजातियों में सूर्य की रोशनी नीचे तक जायेगी, जिससे इनमें पत्ती रोग की आशंका भी कम हो जायेगी एवं कृषि कर्षण भी आसानी से किया जा सकेगा। उत्तरी भारत में चने के क्षेत्रफल में बढ़ोतरी हेतु यांत्रिक कटाई की उपयुक्त प्रजातियां एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। लेखन: ए.के. श्रीवास्तव, जी.पी. दीक्षित और एन.पी. सिंह स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार