भूमिका मसूर, भारत में उगाई जाने वाली प्रमुख दलहनी फसल है। यह निर्धन वर्ग की आबादी के लिए प्रोटीन का मुख्य स्रोत है। यह फसल भारत के लगभग सभी असिंचित तथा बारानी क्षेत्रों में उगाई जाती है। इसमें प्रमुख पोषक तत्व जैसे-प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, रेशा, फॉस्फोरस, आयरन, विटामिन-सी, कैल्शियम, विटामिन-ए तथा रिबोफ्लेविन पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं। मसूर की खेती से भूमि की उर्वराशक्ति बढ़ती है। भूमि की रासायनिक, भौतिक तथा जैविक दशा में सुधार होता है। इसकी खेती से 30-40 कि.ग्रा. नाइट्रोजन प्रति हैक्टर मसूर की जड़ों में बनने वाली गांठों में एजेटोबैक्टर द्वारा भूमि में स्थिर होती है। यह अत्यंत कम लागत वाली फसल है। प्रस्तुत लेख में मसूर की उन्नत बीज उत्पादन तकनीक तथा उन्नत प्रजातियों का विस्तृत वर्णन किया गया है। भारत में मसूर की उत्पादकता विश्व के विकसित तथा विकासशील देशों से काफी कम होने के कारण हमें प्रति वर्ष विदेशों से दलहन का आयात करना पड़ता है। आयात को कम करने के लिए उत्पादकता बढ़ानी आवश्यक है इसके लिए उन्नत बीज उत्पादन तकनीक जैसे-खाद, उर्वरक, सिंचाई, फसल सुरक्षा आदि के साथ-साथ उन्नत प्रजातियों का बीज पैदा करना तथा कम कीमत पर किसानों को उपलब्ध कराना अति आवश्यक है। जलवायु मसूर की उत्तम फसल के लिए समशीतोष्ण जलवायु की आवश्यकता होती है। इसकी बुआई तथा बढ़वार के समय कम तथा पकने के समय अधिक तापमान की आवश्यकता होती है। मसूर की फसल के लिए 20-32 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त रहता है। अंकुरण तथा फल आने के समय पर अधिक वर्षा के कारण अंकुरण प्रभावित होता है। इससे फूल गिर जाते हैं और परागण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने के कारण फलियां कम लगती हैं और पैदावार बहुत कम हो जाती है। अधिक वर्षा, ठंडे तथा गर्म क्षेत्र मसूर के बीज उत्पादन के लिए उचित नहीं रहते हैं। प्रजातियां मसूर को बीज के आकार तथा टेस्टवेट के आधार पर दो भागों में बांटा गया है | जिन प्रजातियों का टेस्टवेट 25 ग्राम से अधिक होता है ,वे मोटे दाने वाली प्रजातियां कहलाती हैं | इन्हें स्थानीय भाषा में मसूर या मल्का मसूर के नाम से जाना जाता है | इन प्रजातियों को मुख्यतः उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश के बुंदेलखण्ड क्षेत्र तथा महाराष्ट्र में उगाया जाता है। जिन प्रजातियों का टेस्टवेट 25 ग्राम से कम होता है, वे बारीक दाने वाली प्रजातियां हैं |इन्हें स्थानीय भाषा में मसरी के नाम से पुकारा जाता है। इनका उत्पादन मुख्यतः उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल तथा असोम में किया जाता है। मसूर की प्रमुख प्रजातियों का विवरण सारणी-1 में दर्शाया गया है। भूमि एवं उसकी तैयारी मसूर के बीज उत्पादन के लिए दोमट या बलुई दोमट भूमि, जिसमें जल निकास तथा जलधारण क्षमता अच्छी हो, मृदा का पी-एच 7-8 के आसपास हो एवं पर्याप्त मात्रा में जीवांश पदार्थ हो, अच्छी मानी जाती है। मृदा की तैयारी के लिए 2 जुताइयां मिट्टी पलट हल या हैरो से करने के बाद 2 जुताइयां कल्टीवेटर से करनी चाहिए। प्रत्येक जुताई के समय पाटा अवश्य लगायें ताकि बुआई के समय मिट्टी भुरभुरी बन जाये। बीज की मात्रा एवं बीज उपचार दाने के आकार तथा प्रजातियों की बढ़वार के आधार पर सामान्यतः 25-30 कि.ग्रा. बीज प्रति हैक्टर जिसका अंकुरण 85 प्रतिशत हो, पर्याप्त रहता है। बुआई से पूर्व बीज को उपचारित अवश्य करना चाहिए, क्योंकि उपचार करने से फसल में कीट तथा व्याधियों का प्रकोप कम होता है | बीज के अंकुरण में सहायता मिलती है। इसके कारण बीज की गुणवत्ता तथा उत्पादकता में वृद्धि होती है। सर्वप्रथम बीज को कवकनाशी जैसे थायरम या बाविस्टीन 2.5 ग्राम प्रति कि.ग्रा. की दर से उपचारित करने के 6 घंटे बाद दीमक के नियंत्रण के लिए क्लोरोपायरीफॉस 2 मि.ली. प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचार करें।12 घंटे छाया में सुखाने के बाद जैविक उपचार के लिए 100 ग्राम गुड़ एक लीटर पानी में उबालकर ठंडा होने के बाद 200 ग्राम राइजोबियम कल्चर को इस गुड़ के घोल में अच्छी प्रकार मिलायें। इसके बाद इस कल्चर के घोल को 25-30 कि.ग्रा. मसूर में अच्छी तरह मिलाकर छाया में अच्छी प्रकार सुखाने के बाद बुआई करनी चाहिए | प्रजातियों का चुनाव तथा बुआई का समय प्रजातियों का चुनाव क्षेत्र विशेष की जलवायु एवं प्रजाति गुणों जैसे उपज, बीमारी प्रतिरोधिता, दाने के आकार आदि के आधार पर करना चाहिए।उन्नत प्रजातियों का बीज विश्वसनीय स्रोत से खरीदते समय बैग पर लिखी सभी आवश्यक सूचनायें जैसे अंकुरण, भौतिक शुद्धता, आनुवंशिक शुद्धता, लॉट नम्बर आदि सारणी-2 में वर्णित बीज मानकों के आधार पर अच्छी तरह पढ़नी चाहिए। बीज उत्पादन के लिए बुआई का समय 15 अक्टूबर से 15 नवंबर तक प्रजातियों एवं क्षेत्र के अनुसार सर्वोत्तम रहता है। खाद एवं उर्वरक मृदा में जीवांश पदार्थ की कमी होने की स्थिति में 150-200 क्विंटल गोबर की सड़ी खाद बुआई से पूर्व अंतिम जुताई के समय खेत में डालनी चाहिए। उर्वरकों के रूप में मसूर को 15-20 कि.ग्रा. नाइट्रोजन तथा 45-50 कि.ग्रा. फॉस्फोरस प्रति हैक्टर की आवश्यकता होती है। इनकी पूर्ति हेतु 100 कि.ग्रा. डीएपी प्रति हैक्टर अंतिम जुताई के समय खेत में बिखेरकर अथवा सीडड्रिल द्वारा बीज की बुआई के साथ जड़ क्षेत्र में प्रयोग करना चाहिए। बुआई की दूरी बीज फसल की बुआई पंक्तियों में करनी चाहिए। पंक्तियों के बीच की दूरी सामान्यतः 30 सें.मी. रखनी चाहिए। बुआई से पूर्व सीडड्रिल का कैलिब्रेशन अवश्य करना चाहिए ताकि बीज की वांछित मात्रा की बुआई की जा सके | खरपतवार नियंत्रण मसूर की फसल में मुख्यतः चने की भांति बथुआ, मोथा, पीली सैंजी, जंगली सोया आदि फसल को अधिक हानि करते हैं।खरपतवार नियंत्रण के लिए बुआई के तुरंत बाद पेंडिमेथीलीन 3 लीटर दवा 600-800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टर छिड़काव करने से बुआई के 30-35 दिनों तक खरपतवार की समस्या से निजात मिल जाती है | छिड़काव करने के लिए मृदा भुरभुरी तथा बारीक होनी चाहिए, ताकि खरपतवारनाशी की परत अच्छी तरह बिछ जाये | खरपतवारनाशी के छिड़काव के बाद खेत में लगभग 30-35 दिनों तक किसी भी प्रकार की कृषि क्रियायें नहीं करनी चाहिए, अन्यथा खरपतवारनाशी की परत टूटने के कारण फसल में खरपतवार शीघ्र उगते हैं | इसके बाद कृत्रिम रूप से खरपतवारों के नियंत्रण के लिए बुआई के 45-50 दिनों बाद एक निराई-गडाई करनी अति आवश्यक है। रोग प्रबंधन रोगरोधी प्रजाति उगानी चाहिए। मसूर की बुआई दोमट तथा बलुई दोमट मृदा में करनी चाहिए। भारी मृदा में मसूर की बुआई से बचें। फसल चक्र विशेषकर खाद्यान्नों को अपनायें। गर्मी में खेत की गहरी जुताई करें। बुआई समय पर करें। हल्की सिंचाई करें तथा खेत को खरपतवाररहित रखना चाहिए। जल निकास की व्यवस्था होनी चाहिए। फसल में खड़े संक्रमित पौधों को समय-समय पर निकालते रहें। ट्राइकोडरमा विरडी 5 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से जैविक उपचार करना चाहिए। थायरम या बाविस्टीन 2.5 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज अथवा दोनों के मिश्रण (1:1) से उपचारित करके बीज की बुआई करनी चाहिए। फसल में फफूदीजनक रोगों का अधिक प्रकोप दिखाई देने पर 2 ग्राम डाइथेन एम 45 प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर 15 दिनों के अंतर पर दो छिड़काव करने चाहिए। सिंचाई मसूर की फसल सामान्यतः असिंचित तथा वर्षा आधारित क्षेत्रों में उगायी जाती है।इस फसल को पानी की कम आवश्यकता होती है। जल भराव से मसूर की फसल को बहुत अधिक हानि होती है। अधिक शुष्क अवस्था में पुष्पन पूर्व एक सिंचाई देने की आवश्यकता पड़ती है। निरीक्षण एवं अवांछनीय पौधे निकालना शुद्ध बीज पैदा करने के लिए मसूर में दो बार निरीक्षण की आवश्यकता पड़ती है।प्रथम निरीक्षण फूल आने की अवस्था पर करके फूल के रंग तथा पौधों के गुणों के आधार पर अन्य प्रजाति के पौधों को खेत से बाहर निकाल देना चाहिए। द्वितीय निरीक्षण फलियां बनने के समय फलियों के रंग तथा पौधों के प्रजाति के गुणों के आधार पर तथा रोगग्रस्त पौधों को खेत से बाहर निकाल देना चाहिए। मसूर का बीज, मानकों के अनुसार होना चाहिए जिनका विवरण सारणी-2 में दर्शाया गया है। फसल क्रम भारत में निम्न फसल क्रम काफी है। प्रचलित हैं जैसे-धान-मसूर, मक्का-मसूर, कपास-मसूर, बाजरा-मसूर, ज्वार-मसूर, मूंगफली-मसूर, सोयाबीन-मसूर, मंडुवा-मसूर तथा अगेती अरहर-मसूर आदि। अंतरा फसल गेहू+ मसूर (2:1), मसूर+ गन्ना (अक्टूबर) बुआई (2:1), मसूर +सरसों (2:1) प्रमुख रोग मसूर की फसल में निम्न रोग प्रमुख रूप से आक्रमण करते हैं: सारणी 1. मसूर की प्रमुख प्रजातियां प्रजाति का नाम अनुमोदन वर्ष फसल की अवधि (दिन) उत्पाद पैदावार क्विंटल/हैक्टर अनुमोदित क्षेत्र विवरण आरवीएल 11-6 2017 100 12-14 उत्तरी मध्य तथा पश्चिमी क्षेत्र दाना मोटा, उकठा प्रतिरोधी पंत मसूर 9 (पीएल 098) 2017 135-145 15-17 उत्तराखण्ड उकठा, जड़गलन मध्यम प्रतिरोधी पूसा अगेती मसूर (एल 4717) 2016 96-106 12-13 उत्तरी तथा मध्य क्षेत्र सूखा तथा तापमान प्रतिरोधी, जिंक, आयरन की अधिकता केशवानंद मसूर-1 (आर एल जी-5) 2016 115-120 12-14 राजस्थान बारीक दाने वाली प्रजाति के एल बी 2008-4 (कृति) 2016 115-120 16-18 उत्तर प्रदेश दाना मोटा,उकठा तथा रतुआ प्रतिरोधी के एल एस 09-3 (क्रिश) 2016 105-110 14-16 उत्तर प्रदेश दाना बारीक, उकठा प्रतिरोधी आई पी एल 526 2016 130-135 16-18 उत्तर प्रदेश मध्यम बड़ा दाना, उकठा तथा सूखा प्रतिरोधी राज विजय मसूर 31 (जे एल 31) 2014 115-120 16-18 मध्य प्रदेश दाना बड़ा, उकठा प्रतिरोधी एल एल 931 2012 146-147 12-13 उत्तराखण्ड रतुआ और फलीछेदक प्रतिरोधी वी एल मसूर-133 (बी एल-133) 2011 150-155 11-12 उत्तराखण्ड उकठा, रतुआ तथा जङगलन प्रतिरोधी वी एल मसूर-514 (बी एल-514) 2011 149-159 10 उत्तराखण्ड उकठा, जड़गलन के मध्यम प्रतिरोधी, फलीछेदक प्रतिरोधी पंत मसूर 7 (पी एल-024) 2010 140-147 15 पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश फलीछेदक रतुआ तथा उकठा प्रतिरोधी पंत मसूर 8 (पी एल-063) 2010 130-135 15 उत्तर-पश्चिम मैदानी क्षेत्र रतुआ तथा उकठा मध्यम प्रतिरोधी,फलीछेदक प्रतिरोधी प्रजाति का नाम अनुमोदन वर्ष फसल की अवधि (दिन) उत्पाद पैदावार क्विंटल/हैक्टर अनुमोदित क्षेत्र विवरण पंत मसूर 6 (पी एल-02) 2010 125-145 11 उत्तराखण्ड रतुआ, झुलसा, उकठा तथा फलीछेदक प्रतिरोधी वी एल मसूर-129 2010 151-155 9 उत्तराखण्ड उकठा,जड़गलन तथा फलीछेदक प्रतिरोधी मोइट्री डब्ल्यू बी एल 77 2009 110-117 15 उत्तर-पूर्वी मैदानी क्षेत्र उकठा प्रतिरोधी शेखर मसूर 2 (के एल बी-303) 2009 120-128 14 उत्तर प्रदेश उकठा तथा रतुआ मध्यम प्रतिरोधी शेखर मसूर 3 (के एल बी-320) 2009 125-128 14 उत्तर प्रदेश उकठा तथा रतुआ के मध्यम प्रतिरोधी पूसा मसूर-5 (एल 45994) 2008 120-128 17-18 दिल्ली फलीछेदक तथा रतुआ मध्यम प्रतिरोधी आई पी एल 406 (अंगूरी) 2007 120-125 17 उत्तर-पश्चिम मैदानी क्षेत्र उकठा तथा रतुआ प्रतिरोधी पूसा मसूर-5 (एल 4594) 2006 125-135 17 राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली दाना बारीक, रतुआ प्रतिरोधी, मध्यम बढ़वार वी एल मसूर 507 2006 140-209 10-12 उत्तर-पश्चिमी, उत्तर-पूर्वी पहाड़ी क्षेत्र उकठा प्रतिरोधी, दाने बड़े व भूरे रंग के हरियाणा मसूर-1 (एल एच 89-48) 2006 135-138 14 हरियाणा सभी रोगों के प्रति मध्यम प्रतिरोधी वी एल मसूर 125 वी एल मसूर 125 2006 170-175 18-20 उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्र उकठा प्रतिरोधी, दाने छोटे एवं काले रंग वी एल मसूर 126 2006 126-150 12-16 उत्तर-पश्चिमी, उत्तर-पूर्वी पहाड़ी क्षेत्र उकठा तथा रतुआ मध्यम प्रतिरोधी, दाने छोटे काले रंग के मालवीय विश्वनाथ (एच यू एल-57) 2005 125-130 14 उत्तर-पूर्वी मैदानी क्षेत्र दाना छोटा, रतुआ तथा उकठप्रतिरोधी के एल एस 218 2005 125-130 14-15 उत्तर-पूर्वी मैदानी क्षेत्र दाना छोटा, रतुआ तथा उकठा प्रतिरोधी प्रजाति का नाम अनुमोदन वर्ष फसल की अवधि (दिन) उत्पाद पैदावार क्विंटल/हैक्टर अनुमोदित क्षेत्र विवरण पंत मसूर-5 2001 130-135 15-18 उत्तराखण्ड दाना मोटा, उकठा प्रतिरोधी पूसा वैभव(एल 4147) 1997 120-125 17 उत्तर-पश्चिमी मैदानी क्षेत्र दाना बारीक, उकठा तथा रतुआ प्रतिरोधी, आयरन की अधिकता, पूसा शिवालिक (एल 4676) 1995 120-125 15 उत्तर-पश्चिमी मैदानी क्षेत्र मोटा दाना, उकठा तथा रतुआ प्रतिरोधी उकठा या म्लानि इस रोग का संक्रमण शुरू तथा बढ़वार की अवस्था में होता है। पौधे मुरझाकर एकाएक मर जाते हैं। इसके प्रकोप से पत्तियां पीली व सूखने पर गहरी भूरी रंग की हो जाती हैं। जड़ों को बीच से चीरने पर बीच का भाग भूरा दिखाई देता है। जड़ विगलन इस रोग के प्रकोप से पौधे का निचला भाग, जड़ के पास का तना तथा जड़ सड़ जाती है। यह रोग भूमि में अधिक नमी के कारण फैलता है। शुष्क जड़ विगलन इसके प्रकोप से खेत में पूरा पौधा सूख जाता है। रोगग्रस्त पौधे को निकालने पर उनकी जड़े साफ दिखाई नहीं देती तथा जड़ों के सिरे कमजोर दिखाई देते हैं | सफेद विगलन यह मसूर का प्रमुख रोग है, जो विशेषतः घनी फसल तथा अधिक आर्द्रता के कारण होता है। इसके प्रकोप से पौधे के स्कंध या ऊपरी भाग में सफेद फंगस का जाल बन जाता है। इस रोग से संक्रमित पौधों की पत्तियां सूखी तथा भूसे के रंग की हो जाती हैं। इसके प्रकोप से तने के ऊपरी भाग में हल्के से गहरे काले रंग के छोटे-छोटे स्कलेरोशिया बन जाते हैं। अगेती झुलसा यह भी मसूर का फफूदीजनक रोग है। यह शुरू की अवस्था में आक्रमण करता है। इसके प्रकोप से पत्तियों पर गहरे भूरे रंग से काले रंग के गोलाकार से तिकोने धब्बे बन जाते हैं | प्रमुख कीट दीमक मसूर का यह प्रमुख कीट है, जो पौधों की जड़ों को खाकर हानि करते हैं। इनकी संख्या लाखों में होती है तथा बहुततेजी से फैलती है। यह छोटे-छोटे मटमैले कीट होते हैं। कटवर्म यह बुआई के बाद शुरू की अवस्था में अधिक आक्रमण करता है। ये कीट जमीन से निकलकर छोटे-छोटे पौधों को काटकर हानि पहुंचाते हैं। दाल भृंग यह भंडारगृह में लगने वाला प्रमुख कीट है। ये भंडारित बीज में गोलाकार छेद बनाते हैं। इसके वयस्क भुंग भूरे रंग के छोटे कीट होते हैं। कटाई एवं श्रेसिंग प्रजाति की अवधि एवं बुआई के समय के अनुसार मार्च से अप्रैल के अंत तक फसल पककर तैयार हो जाती है | बीज उत्पादन के लिए फसल की पूर्ण परिपक्व अवस्था पर पौधों के सूखने और फलियों के अंदर दाने पूर्ण रूप से पक जाएं और पंक्तियां भी सूख जाएं, तब फसल काट लेनी चाहिए। ग्रेडिंग एवं पैकिंग श्रेसिंग के बाद बीजों की दो दिनों की धूप में अच्छी प्रकार सुखाकर, पंखे से सफाई करके ग्रेडिंग करनी चाहिए। ग्रेडिंग मशीन तथा ग्रेडिंग फ्लोर की भी अच्छी प्रकार सफाई करें ताकि मिश्रण की आशंका न रहे। ग्रेडिंग के बाद बीज को नई बोरियों में भरकर प्रत्येक बोरी पर प्रजाति का टैग लगाकर भंडारगृह में रख देना चाहिए तथा बिक्री के समय मूंग सामान्यतः 5 कि.ग्रा. या 10 कि.ग्रा. के पैक बनाकर बिक्री करनी चाहिए। कीट प्रबंधन बुआई से पूर्व बीज को क्लोरोपायरोफॉस से उपचारित करना चाहिए। बुआई से पूर्व अंतिम जुताई के समय खेत में 25 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर रीजेन्ट का प्रयोग करना चाहिए। मसूर के बीज को अच्छी प्रकार सुखाकर, ग्रेडिंग करने के बाद भंडारण करना चाहिए। भंडारण के लिए सीड बिन का प्रयोग करें। खड़ी फसल में आवश्यकतानुसार क्लोरोपायरीफॉस या डेल्टामेथ्रिन एक मि.ली. प्रति लीटर का घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। जुलाई के शुरू में बीज में फ्यूमिगेशन अवश्य करें। सल्फास की 2-3 गोलियां प्रति टन बीज की दर से धूमण करना चाहिए। यह गैस बहुत जहरीली होती है। अत: इस बात का पूर्ण ध्यान रहे कि गैस सीड बिन से बाहर न निकले। भंडारण में समय-समय पर डेल्टामेथ्रिन या न्यूवान 5 मि.ली. प्रति लीटर पानी का घोल बनाकर दीवारों, छतों तथा फर्श आदि पर छिड़काव करते रहना चाहिए। सारणी 2. उन्नत बीज के मानक बीज मानक बीज मानकों का स्तर आधार बीज प्रमाणित बीज दूरी 10 मीटर 5 मीटर अन्य प्रजाति के पौधे 0.10 प्रतिशत 0.20 प्रतिशत फसल निरीक्षण की संख्या 2 बार 2 बार बीज लॉट का आकार (अधिकतम) 200 क्विंटल 200 क्विंटल शुद्ध बीज (न्यूनतम) 98 प्रतिशत 98 प्रतिशत अक्रिय तत्व (अधिकतम) 2 प्रतिशत 2 प्रतिशत अन्य फसलों के बीज (अधिकतम) 5 प्रति कि.ग्रा 10 प्रति कि.ग्रा. कुल खरपतवारों के बीज (अधिकतम) 10 प्रति कि.ग्रा. 20 प्रति कि.ग्रा. अन्य प्रजाति के बीज (अधिकतम) 10 प्रति कि.ग्रा. 20 प्रति कि.ग्रा. अंकुरण कठोर बीज सहित (न्यूनतम) 75 प्रतिशत 75 प्रतिशत बीज में नमी (अधिकतम) 9 प्रतिशत 9 प्रतिशत वायुरोधी पैकिंग के दौरान बीज में नमी (अधिकतम) 8 प्रतिशत 8 प्रतिशत कार्यशील बीज की नमूना शुद्धता विश्लेषण 60 ग्राम 60 ग्राम कार्यशील बीज का नमूना अन्य प्रजातियों की गणना 600 ग्राम 600 ग्राम लेखन: ज्ञानेन्द्र सिंह, चन्दू सिंह, रमेश चन्द, गणपति मुक्री और संजय कुमार स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार