<p style="text-align: justify;">अमरूद भारत का लोकप्रिय फल है। राजस्थान के सवाईमाधोपुर, बूंदी तथा कोटा जिलों में इसकी खेती व्यावसायिक स्तर पर की जा रही है। जड़गांठ सूत्रकृमि के प्रकोप के कारण अमरूद उत्पादक किसानों को भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। सूत्रकृमि (नीमेटोड) सूक्ष्मजीव हैं, जो मृदा तथा पौधों पर परजीवी रूप में पाए जाते हैं। इनके अग्रभाग में मुख छिद्र और इस भाग में एक मजबूत खंजर (स्टाईलेट) होता है। ये दूसरी अवस्था में पौधों की पोषक जड़ों के अग्रभाग पर आक्रमण करते हैं और इस कारण जड़ें भूमि से पोषण लेना बंद कर देती हैं। जड़ों में कायिकी संबंधी विकार (हायपरट्रॉफी एवं हायपरप्लासिया) उत्पन्न हो जाता है।</p> <p style="text-align: justify;">भारत में वर्ष 1901 में 'बारबर' नामक वैज्ञानिक ने तमिलनाडु के देवला स्थान पर सर्वप्रथम चाय की जड़ों में जड़गांठ सूत्रकृमि को देखा। वर्ष 1906 में 'बटलर' नाम के वैज्ञानिक ने इसे केरल में काली मिर्च की जड़ों पर देखा। अय्यर नामक वैज्ञानिक ने वर्ष 1926 व 1933 में क्रमशः सब्जियों व अन्य फसलों पर देखा। नीब की जडों पर संक्रमण सर्वप्रथम 'थिरूमाला राव' ने वर्ष 1956 में आंध्र प्रदेश में देखा।</p> <h3 style="text-align: justify;">आर्थिक नुकसान</h3> <p style="text-align: justify;">जड़गांठ सूत्रकृमि द्वारा पूरे विश्व में विभिन्न फसलों पर लगभग 5 प्रतिशत नुकसान आंका गया है। देश में विभिन्न फसलों में लगभग 10-12 प्रतिशत हानि का आकलन है। सब्जियों में लगभग 50-90 प्रतिशत क्षति दर्ज की गई है। धान में 16-32 प्रतिशत, तम्बाकू में 59 प्रतिशत, नीबू में 40-70 प्रतिशत, दलहनी फसलों में 8 प्रतिशत व कपास में 10-15 प्रतिशत हानि का अनुमान है। दुनिया में जड़गांठ सूत्रक्रमि की लगभग 63 प्रजातियां हैं। इनमें मुख्यतः पांच (एम. इनकागनिटा, एम. जवैनिका, एम. हैप्ला, एम. एरिनेरिया तथा एम. ग्रैमिनिकोला) बहुतायत में भारत में मिलती हैं। अमरूद में नुकसान पहुंचाने वाली नई प्रजाति मिलैडोगाइन एंटरोलोबीई है। यह अमरूद में 60-80 प्रतिशत तक नुकसान पहुंचाती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">लक्षण</h3> <p style="text-align: justify;">पत्तियों में पीलापन, दिन के समय पौधों का मुझाना, फूल व फल का देर से और कम लगना, पौधों में बौनापन जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। जड़ों में गोल-गोल गांठें बनी हुई दिखाई देती हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">प्रकोप</h3> <p style="text-align: justify;">सूत्रकृमियों का सर्वाधिक प्रकोप<a href="../../../../../../agriculture/crop-production/93892c94d91c93f92f94b902-915940-92a94c927-92494892f93e930940-90f935902-90991793e928947-915940-93593f92793f92f93e902/संरक्षित-खेती-null-1"> संरक्षित खेती</a>, सब्जियों, पौधशाला तथा उद्यानिकी फसलों में देखने को मिलता है। बलुई दोमट मृदा में तथा जहां नमी अधिक हो, उन क्षेत्रों में प्रकोप अधिक होता है। सूत्रकृमि नमी प्रिय सूक्ष्मजीव होते हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">जीवनचक्र</h3> <p style="text-align: justify;">सूत्रकृमि द्वारा ग्रसित गांठ में एक या एक से अधिक प्रौढ़ मादा सूत्रकृमि पाई जाती हैं। प्रत्येक मादा 300-350 तक अण्डे देती है। इनके जीवनचक्र में छह अवस्थाएं होती हैं। इनमें अंडा, वयस्क तथा चार त्वचा निर्मोचन अवस्थाएं शामिल होती हैं। प्रथम त्वचा निर्मोचन अंडे के अंदर ही पूर्ण हो जाता है। वयस्क अंडे से बाहर निकल कर पौधों की जड़ों पर आक्रमण करते हैं। धीरे-धीरे त्वचा निर्मोचन पूर्ण करते हुए ये वयस्क मादा में बदल जाते हैं। इस तरह से अनुकूल परिस्थितियों में जीवनचक्र 28-32 दिनों में पूरा हो जाता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">बगीचों में सूत्रकृमि प्रबंधन</h3> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cre30.jpg" width="240" height="215" /></p> <ul style="text-align: justify;"> <li>बगीचा स्थापित करने से पहले खेत की मृदा में सूत्रकृमि की जांच करवाएं।</li> <li>मई-जून में उचित आकार के गडढे (1X1X1 मीटर) खोदकर धूप में तपने देना चाहिए। अनुशंसा के अनुसार खाद, उर्वरक एवं दवाइयों का उपयोग कर गड्ढों को भरना चाहिए।</li> <li> काम में लिए जाने वाले उपकरणों, सिंचाई पानी, अंत:फसल आदि को सूत्रकृमियों से संक्रमित माध्यम के संपर्क में नहीं आने देना चाहिए।</li> <li>इनकी समय-समय जांच करते रहें तथा उपकरणों को उपचारित करते रहना चाहिए। थावले की मेड़ पर गेंदे के पौधे को लगाने से सूत्रकृमियों की संख्या में कमी की जा सकती है। गेंदे से कुछ ऐसे तत्व (एल्फा टरथेनाइल) निकलते हैं, जो सूत्रकृमियों को अरुचिकर लगते हैं।</li> <li>रोपण करते समय आधा टन नीम की खली या एक टन वर्मीकम्पोस्ट या दो टन गोबर की खाद में पप्यूरोसिलियम लिलासिनम, ट्राईकोडर्मा हर्जियान, स्यूडोमोनास फ्यूयोरेन प्रत्येक जैवकारक की 2 कि.ग्रा. मात्रा मिलाकर मिश्रण तैयार करें। इस मिश्रण को 15 दिनों तक छाया में संवर्धित करें। इसकी मात्रा, नीम मिश्रण 250 ग्राम या वर्मीकम्पोस्ट मिश्रण 500 ग्राम या गोबर की खाद का मिश्रण 3 कि.ग्रा. गड्ढे में मिलाएं। 6 दिनों के अंतराल पर इसे दोहराएं।</li> <li>रासायनिक उपचार के लिए प्रति गड्ढे में कार्बोफ्यूरॉन (फ्यूराडान 3जी) या निमिटज (फ्यूएन्सल्फोन 2 प्रतिशत जी.आर.) मिलाकर पौध रोपण करें। 3 दिन के अंतराल पर इसे दोहराएं व अनुशंसा अनुसार ही उपयोग में लें।</li> <li>रोपण करने के 40-45 दिनों बाद वेलम प्राइम (फ्लूयोपाइराम 34.48 एस.सी.) 1.0 मि.ली. मात्रा 5.0 लीटर पानी में मिलाकर गड्ढे में मृदा को सिंचित करें 3 दिन के अंतराल पर इसे दोहराएं व अनुशंसा अनुसार ही उपयोग में लें।</li> </ul> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 100%;"> <h3>पौधशाला में सूत्रकृमि प्रबंधन</h3> <ul> <li>पौधे तैयार करने के लिए काम में ली जाने वाली मृदा को उपचारित करना चाहिए। मृदा को सूत्रकृमि की जांच करवाकर ही काम में लें। एक बार सूत्रकृमि का प्रकोप हो जाने के बाद उसे नियंत्रित करना बहुत ही कठिन है।</li> <li>नर्सरी में मृदा पर पतली पॉलीथीन डालकर मई-जून में 3-6 सप्ताह तक मृदा की निराई करनी चाहिए। इससे मृदा में सूत्रकृमियों की उपस्थिति (इनोकुलम) को नियंत्रित किया जा सकता है।</li> <li>उपकरणों, काम में लिया जाने वाला पानी, मृदा मिश्रण आदि को सूत्रकृमियों से संक्रमित माध्यम के संपर्क में नहीं आने देना चाहिए।</li> <li>उपचारित की गई मृदा में बराबर मात्रा में आधा टन नीम की खली या एक टन वर्मीकम्पोस्ट या दो टन एफ.वाई.एम. (गोबर की खाद) में पप्यूरोसिलियम लिलासिनम, ट्राइकोडर्मा, हर्जियानम, स्यूडोमोनास फ्लूयोरेन प्रत्येक जैव कारक की 2 कि.ग्रा. मात्रा मिलाकर मिश्रण तैयार करें। इस मिश्रण को 15 दिनों तक छाया में संवर्धित करें। इसके बाद उपचारित मृदा में इस मिश्रण को बराबर मात्रा में मिलाकर थैलियों में भरकर मूलवृन्त तैयार करें।</li> <li>काम में ली जाने वाली मृदा में कार्बोफ्यूरॉन (फ्यूराडान 3जी) या निमिटज (फ्यूएन्सल्फोन 2 प्रतिशत जी.आर.) मिलाकर मृदा को उपचारित करके पॉलीथीन की थैलियों में भरकर मूलवृन्त तैयार करें।</li> <li>बुआई करने के बाद वेलम प्राइम (फ्लूयोपाइराम 34.48 एस.सी.) अंकुरण के 40-45 दिनों बाद 0.5 मि.ली. मात्रा प्रति लीटर पानी में मिलाकर मृदा को सिंचित करें। 3 दिन के अंतराल पर दोहराएं व सिफारिश अनुसार ही उपयोग में लें। पौधे खरीदते समय दो-चार पौधों से थैलियों को हटाकर पानी से धोकर जांच कर लेनी चाहिए कि गांठें तो नहीं बन रही हैं। यदि गांठें बनी हुई हैं, तो ऐसे पौधों का चयन नहीं करें तथा इन पौधों को नहीं बेचना चाहिए।</li> </ul> </td> </tr> </tbody> </table> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : फल-फूल पत्रिका(आईसीएआर), हेमराज गुर्जर,-सहायक प्राध्यापक एवं वैज्ञानिक, सूत्रकृमि विज्ञान विभाग एस.पी. बिश्नोई-सहायक प्राध्यापक, वैज्ञानिक एवं प्रभारी, सूत्रकृमि विज्ञान विभाग, बी.एस. चंद्रावत-सहायक प्राध्यापक सूत्रकृमि विज्ञान, एस.के.एन. कृषि महाविद्यालय-जोबनेर (राजस्थान), ए.एस. बालौदा-निदेशक, एवं विष्णु गुर्जर-पी.जी. स्कॉलर, राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान, दुर्गापुरा, जयपुर (राजस्थान)। </p>