रायण (मनिलकारा हेक्सेंड्रा), स्पोटेसी परिवार का स्वदेसी फलल है। इसे खिरनी भी कहते हैं। इसका पेड़ सदाबहार, मध्यम से बड़े आकार (5-60फीट ऊंचाई) का हो सकता है। यह प्राकृतिक रूप से राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश के जंगलों व बंजर भूमि में बहुतायत से पाया जाता है। यह पेड़ मुख्यतः आदिवासी क्षेत्रों में छोटे और भूमिहीन किसानों की सामाजिक-अर्थव्यवस्था, आजीविका सुरक्षा और पोषण प्रबंधन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बीजू पौधे की उम्र 80-100 वर्ष से भी ज्यादा हो सकती है। इसके ताजा फललों का बाजार भाव 60-120 रुपये प्रति कि.ग्रा. व सूखा फलल, जिसे मेवा कहा जाता है, 400-500 रुपये प्रति कि.ग्रा. के भाव से बिकता है। यह एक बहुत ही पौष्टिक फलल है। इसके फलल को विटामिन ‘ए’ का कैप्सूल कहा जाता है। रायण के फललों का संघटन सारणी-1 में दिया गया है। सारणी 1. रायण के फलों का संघटन क्र.स. तत्व का नाम मात्रा 1 ऊर्जा (कैलोरी) 134 2 कुल घुलनशील ठोस (डिग्री ब्रिक्स) 23 3 रेशा (ग्राम) 3.50 4 अम्लता (प्रतिशत) 0.44 5 प्रोटीन (ग्राम) 4.90 6 कैल्शियम (मि.ग्रा.) 147 7 फास्फाेरस (मि.ग्रा.) 58 8 लौह तत्व (मि.ग्रा.) 4.0 9 विटामिन ‘ए’ (आई.यू.) 675 10 विटामिन ‘सी’ (मि.ग्रा.) 24.25 11 राइबोफ्रलेविन (माइक्रो ग्राम) 40 12 नियासिन (माइक्रो ग्राम) 350 13 कैरोटीन (माइक्रो ग्राम) 348 थार ऋतुराज यह किस्म केंद्रीय बागवानी परीक्षण केंद्र, गोधरा, गुजरात द्वारा विकसित की गई है। पेड़ अर्ध-बौने और सघन बागवानी के लिए उचित हैं। यह किस्म चार वर्ष में फल देने लगती है। छह वर्ष के पेड़ से 10-16 कि.ग्रा. प्रति पेड़ उत्पादन संभव है। यह ताजा खाने व सुखाने के लिए उपयुक्त है। प्रवर्धन रायण का प्रवर्धन, बीज व कायिक, दोनों विधियों से किया जा सकता है। बीज से प्रवर्धन करने से 12-14 वर्ष बाद पेड़ की लंबाई व चैड़ाई ज्यादा हो जाती है। इसके कारण फलों की तुड़ाई करने में मुश्किल होती है। ऐसे में उत्पादन कम व फल निम्न गुणवत्ता वाले होते हैं, जबकि कायिक विधि से प्रवर्धन करने से पौधे जल्दी (3-4 वर्ष) फलते हैं तथा पेड़ बौने होते हैं। इस प्रकार फलों की तुड़ाई करने में आसानी रहती है। इसके अलावा ज्यादा उत्पादन व फल उच्च गुणवत्ता वाले होते है। रायण का प्रवर्धन सॉफ्रट वूड ग्राफिटिंग से करना चाहिये। रोपण प्रणाली और दूरी रायण के बाग लगाने के लिये वर्गाकार प्रणालियों में रेखांकन व अंतःसस्य क्रियाएं (इंटरकल्चरल ऑपरेशन) करने में आसानी रहती है। रायण के बाग में पौधे 5ҳ5 मीटर या 6ҳ3 मीटर पर लगाये जा सकते हैं। गड्ढे तैयार करना और पौधे लगाना चयनित भूमि में उचित जल निकास की सुविधा होनी चाहिये। रोपण प्रणालियों और किस्म के अनुसार उचित दूरी के अनुसार लेआउट कर लेना चाहिए। निश्चित की हुई जगह पर अप्रैल में 1ҳ1ҳ1 मीटर आकार के गड्ढे खोदने चाहिए। गड्ढों को 15-20 दिनों तक खुला छोड़ना चाहिए, जिससे रोगजनकों और कीटों के इनोकुलम, अंडे, प्यूपा इत्यादि गर्मी से मर जाएं। गड्ढों का 1/3 भाग खेत के ऊपर की मृदा व = भाग अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद और उर्वरकों (एन-50, पी-100 ग्राम प्रति गड्ढे) को मिलाकर भर देना चाहिए। गड्ढों की मृदा व्यवस्थित हो जाने के बाद मानसून की पहली बरसात के बाद पौधों का रोपण करना चाहिए। सधाई रायण के पौधे 3-4 वर्ष के बाद फलन देते हैं। पौधों को मजबूत ढांचा देने लिये दोनों विधियों से किया जा सकता है। किशोर अवस्था से उचित मात्रा में कटाई व छंटाई करते रहना चाहिये। तने को सीधा रखने के लिए, आवश्यकता हो, तो पौधों को मजबूत डंडे का सहारा देना चहिये। पौधे के तने से जमीन से 70 सें.मी. ऊंचाई तक निकलने वाली सभी शाखाओं को निकालते रहना चहिये। 3-4 मजबूत शाखाएं, जो कि चारों दिशाओं में एक-दूसरे से पर्याप्त दूरी पर हों प्राथमिक शाखाओं के रूप में व प्रत्यके प्राथमिक शाखा पर 2-3 द्वितीयक शाखाओं के रूप सधाई की जाती हैं। अन्य शाखाओं को समय-समय पर निकालते रहना चाहिये। सधाई एक वर्ष में पूर्ण कर लेनी चाहिए। खाद एवं उर्वरक खाद एवं उर्वरक पौधों की अच्छी बढ़वार, उत्पादन व बेहतर गुणवता वाले फल प्राप्त करने के लिये आवश्यक होते हैं। रायण के पौधों में बरसात के मौसम में पौधे के फैलाव तक 1.5 फीट चैड़ाई व 1.0 फीट गहरी नाली बनाकर पौधे की आयु के अनुसार खाद एव उर्वरक भर देना चहिये। खाद एवं उर्वरक भरने के बाद नाली को मिट्टी से भर देना चहिये। फूल व फलन रायण में नवंबर-जनवरी में फूल सफेद रंग के गुच्छे (3-6) में आते हैं। फूल उभयलिंगी होते हैं, फिर भी मधुमक्खी द्वारा पर-परागण कर उत्पादन को बढ़ाने में मदद मिलती है। इसके फल को बेरी कहते हैं और एक बेरी में 1-3 तक बीज पाये जाते हैं। फल परिपक्वता एवं तुड़ाई रायण के फल लगने के 120-140 दिनों बाद, फलों का रंग पीला और कुल घुलनशील ठोस (24-25 डिग्री ब्रिक्स) हो जाये, तब ये पककर तैयार हो जाते हैं। एक क्लैमाकटरिक प्रकृति का फल है, अतः लंबी दूरी के बाजार में भेजने के लिए फलों के रंग बदलने पर तुड़ाई कर लेनी चाहिये। स्थानीय बाजारों के लिये, जब फल 60 प्रतिशत पीले हो जाएं, तब तुड़ाई करनी तथा सूखे मेवे बनाने के लिए पूर्णरूप से पके फलों की तुड़ाई करनी चहिये। रायण के मेवे रायण के मेवे बनाने के लिए पूर्णरूप से पके फलों की तुड़ाई करनी चाहिये। फलों को छाया में सुखाना चाहिए। सूखे फलों के श्रेणीकरण के समय कटे, फलटे अथवा काले हुये फलों को अलग कर उन पर अरंडी के तेल का लेपकर देते हैं। तैयार मेवों को एक दो वर्ष तक संग्रहित किया जा सकता है। सूखे मेवों की मांग वर्ष भर रहती है, परंतु गौरी व्रतों के दौरान इनकी मांग और बढ़ जाती है। इनका बाजार भाव 400-500 रुपये प्रति कि.ग्रा. तक हो सकता है। उत्पादन रायण की वर्षा आधारित खेती से छह वर्ष के कलमी पेड़ से 8-10 व 80-90 वर्ष के बीजू पेड़ से 100-120 कि.ग्रा. उत्पादन लिया जा सकता है। बीजू पौधे की आयु 80-100 वर्ष तक हो सकती है और एक पेड़ से 10000-15000 रुपये प्रति वर्ष अर्जन संभव है। रायण का उपयोग पके हुये फलों को ताजा व सुखाकर खाया जा सकता है। इसकी लकड़ी पानी में बहुत टिकाऊ होने के साथ-साथ दीमक प्रतिरोधी भी होती है। पेड़ से गोंद पैदा किया जा सकता है। रायण की छाल में 10 प्रतिशत टैनिन होता है। इसका उपयोग चीकू के मूलवृन्त के लिये किया जाता है। रायण की छाल ताडी़ (पालमिरा पॉल्म) के किण्वन को रोकने में सहायक होती है। इसके बीज में 24 प्रतिशत खाने योग्य पदार्थ पाया जाता है। फलल दूधिया, मीठे, कामोद्दीपक, क्षुधावर्धक, वातकारक और टॉनिक की तरह उपयोग में लिये जाते हैं। इसकी छाल मसूड़ों व दंत विकारों के इलाज में उपयोगी है। यह हृदय को बल देता है। इसके अतिरिक्त तपेदिक और कुष्ठ रोग में उपयोग किया जाता है। फलल का उपयोग गठिया, पीलिया, रक्त शोधन में किया जाता है। बीज खली में नाइट्रजेन (1.5 प्रतिशत) और फास्फोरस (0.2 प्रतिशत) पाया जाता है। स्त्राेत : फल-फूल पत्रिका(आईसीएआर), राजकुमार, कनक लता, बी.एस. खद्दा, ए.के. राय और एस. खजुरिया,भाकृअनुप-कृषि विज्ञान केन्द्र, पंचमहल-389340, (केंद्रीय शुष्क बागवानी संस्थान), गुजरात