भूमिका जंगली खुबानी (प्रूनस आरमेनियाका लिन्न), देश के मध्य पर्वतीय एवं शुष्क शीतोष्ण क्षेत्र की वृक्षमूल वाली एक महत्वपूर्ण क्षमता वाली तिलहनी फसल है। जंगली खुबानी रोजेशी परिवार के प्रूनोइडी उप-परिवार का पौधा है। देश के हिमालयी क्षेत्रों की स्थानीय प्रजातियों में यह ‘चुल्ली’, ‘शारा’, ‘खूरमानी’, ‘चुल्लू’, ‘आरू’, ‘जरदी’, खुबानी, ‘चुआरी’, कसमियारू, ‘चोला’ एवं गुरदुलू’ जैसे स्थानीय नामों से जाना जाता है। पंजाबी में इसे ‘हारी’ ‘सारी’ एवं ‘चुल्ली’ के नाम से जाना जाता है। उदगम एवं वितरण कृष्य खुबानी का उदगम, उत्तर-पूर्वी चीन है। जबकि जंगली खुबानी, भारतीय मूल की ही है। शुष्क– शीतोष्ण क्षेत्रों में जंगली खुबानी स्थानीय चुल्लू नाम से जाने वाले वृक्ष उत्तरी-पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र विशेष रूप से चिनाव जम्मू व कश्मीर (लद्दाखी क्षेत्र) की घाटियों एवं 3000 मीटर तक ऊँचाई वाले हिमाचल प्रदेश के कुल्लू एवं शिमला के क्षेत्र तथा उत्तराखंड के गढ़वाल की पहाड़ियों में पाये जाते हैं। कुमाऊँ क्षेत्र के सभी तीनों जिलों, नैनीताल,अल्मोड़ा एवं पिथौरा व जंगली खुबानी पायी जाती हैं। कुमाऊँ क्षेत्र में पिथौरागढ़ जिले में इसका सर्वाधिक प्रसार है। मिट्टी एवं जलवायु जंगली खुबानी काफी कठोर होती है जिसे गहरी एवं अच्छी सिंचाई वाली अधिकांश मिट्टियों पर लगाया जा सकता है। इसके दस वर्ष पुराने पेड़ की जड़ों का लंबवत व उर्ध्ववत फैलाव क्रमश: 2.2 मीटर एवं 4.5 मीटर तक पहुँचता है जिससे यह पता चलता है कि इसके लिए लगभग 3 मीटर की गहराई वाली मिट्टी होनी चाहिए। पेड़ों को गीली मिट्टी में लगाए जाने पर इनकी पत्तियों को कार्यिक क्रियाओं तथा पौधे सम्पूर्ण वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले के बड़े भू-भाग पर इसे उगाया जाता है जबकि वहाँ की मिट्टी रेतीली, अच्छी जल निकासीयुक्त परंतु अधिक उपजाऊ नहीं है। इसके लिए मिट्टी का पी.एच.मान. 6.0 से 6.8 होना चाहिए। समुद्र तल से औसतन 1200-3000 मीटर की ऊँचाई तक का मध्य-पर्वतीय क्षेत्रों में जंगली खुबानी सबसे बेहतर ढंग से उगती व फलती-फूलती है। दीर्घावधि शीतकालीन मौसम (7 डिग्री सेल्सियस तापमान से नीचे 800 घंटों की कंपकपाती ठडं) और पाला रहित व हल्की सी गर्माहट वाला बसंती मौसम, इसमें फल लगने के लिए उपयुक्त माना जाता है। पौधों की बेहतर वृद्धि तथा गुणकारी फलों के उत्पादन के लिए औसत गर्म तापमान (16.6—32.3 डिग्री सेल्सियस) उपयुक्त होता है। उत्तर- पूर्वी भारत के निम्न–ऊँचाई वाले क्षेत्र इसकी खेती के लिए उपयुक्त हैं। बसंती मौसम के दौरान होने वाली बर्फवारी से इनकी कलियों को काफी नुकसान होता है जोकि 4 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान होने की स्थिति में नष्ट हो जाते हैं। पूरे मौसम के दौरान औसतन 100 से.मी. तक की वार्षिक बरसात इसकी सामान्य वृद्धि तथा इसमें फल लगने के लिए अच्छी होती है। विवरण जंगली खुबानी एक 10 से 15 मीटर ऊँचाई वाला पौधा है जिसकी चाल लाली युक्त भूरे रंग वाली होती है। पत्तियाँ अंडाकार से गोलाई युक्त अंडाकार और 5 से 9 से.मी. लंबी होती है। इसकी कायिक क्रोमोजोम संख्या (2एन) 16 तथा आधार क्रोमोजोम (एक्स) संख्या 8 है। इसका पुष्प एकल,सफेद अथवा गुलाबी और लगभग 2.5 सें.मी. का होता है जो कि अकेले और पल्लवन के काफी पहले ही खिलता है। फल का आकार 1.5 से 4.0 से.मी. तक अथवा ज्यादा होता है और युवा फलों पर बालनुमा आच्छादन होता है जबकि परिपक्व होने पर फल चिकना आवरण वाला हो जाता है। फल, पीला दिखता है जिसपर हल्के लाल तंग की धारियाँ बनी होती हैं। फल का गुदा पीले अथवा पीलापन लिए नारंगी रंग का, ठोस एवं मीठा होता है। इसके अंदर की गुठली मोटी व नुकीली होता है। संवर्धन जंगली खुबानी का संवर्धन ज्यादातर बीजों के माध्यम से ही किया जाता है और कभी-कभार ही इसे कलम व मूकूलन के माध्यम से संवर्धित किया जाता है। डाली कलम (कंटिग) के माध्यम से भी इनका संवर्धन कम ही किया जाता है। वाणिज्यिक/कृष्य खुबानी के प्रकंद तैयार करने के लिए जंगली खुबानी के पौधों का उपयोग किया जाता है। बीज संवर्धन जंगली खुबानी के बीजों के अधिक अंकुरण के लिए इन्हें 72 घंटे तक 4 से 7 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान वाले सहित स्तरीकरण के तहत रखे जाने की आवश्यकता होती है। सतत, शीत उपचार एवं वृद्धि कारकों के इकट्ठे होने पर बीज–आवरण के आन्तरिक वृद्धि संबंधी कार्यकलाप विलुप्त हो जाते हैं। स्तरीकरण माध्यम में आर्द्रता संरक्षण की उपयुक्त क्षमता तथा हवा की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए। स्तरीकरण प्रक्रिया को दौरान बीज को आर्द्र रखा जाना चाहिए। स्तरीकरण के बाद गिरी के बाहरी कवच को हटाकर अंकुरण में तेजी लाई जा सकती है। छंदन तथा बीजों को जिब्बेरेलिक एसिड/काइनेटिन के साथ उपचारित करने पर भी अंकुरण प्रक्रिया को तीव्र किया जा सकता है। बुआई के पहले बीज को चौबीस घंटे तक 500 पी.पी.एम. वाले जी.ए.3 अथवा 5 पी.पी.एम. वाले काइनेटिन के घोल में डुबोया जाता है। कायिक प्रवर्धन डाली कलम जंगली खुबानी को कठोर डाली के कलम के माध्मय से संवर्धित किया जा सकता है। कलमों को दिसंबर महीने तक एकत्रित किया जा सकता है। कलमों की मोटाई पेंसिल के बराबर तथा ये 10-15 सें.मी. लंबी होनी चाहिए। संवर्धन प्रक्रिया प्रारंभ करने के पूर्व इन कलमों के निचले हिस्से को 25000-5000 पी.पी.एम. के घोल से उपचारित किया जाना चाहिए। आसानी से जड़ निकालने के लिए नर्सरी में इन कलमों को 45-60 डिग्री पर रखा जाना चाहिए। ग्राफ्टिंग जंगली खुबानी का इलाइट तैयार करने की लिए जिब्हीं कलम बनाना अथवा तराशी कलम बांधना सर्वाधिक सफल तरीका है। इस तरीके में प्रकन्द के शीर्ष पर की गई कटिंग, सांकुरक के तल पर की गयी कंटिग के सामान ही होनी चाहिए। सबसे पहले तेज धारदार चाकू की सहायता से डाली की 2.5 सें.मी. से 5 सें.मी. (1 से 2 इंच) लंबाई वाली तिरछी कटिंग तैयार की जानी चाहिए। बड़ी सामग्री होने की दशा में ज्यादा लंबाई वाली कटिंग तैयार की जानी चाहिए। कटे हिस्से के एक समान व बराबर सतह के लिए डाली को तेज धारदार चाकू से एक ही बार में काटने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। कम धार वाले चाकू से किए गए लडरिया व आसमान कटिंग से युग्म का संतोषजनक परिणाम प्राप्त नहीं होता है। कटाई किए गए इन प्रत्येक सतहों की उल्टी कटाई भी की जाती है। यह कंटिग शीर्ष से एक तिहाई दूरी से पहले कटिंग वाले स्थान के आधे भाग तक नीचे की ओर प्रारंभ होनी चाहिए। एक सटीक आकार का कलम तैयार करने के लिए इसकी दूसरी कटाई से न केवल डाली की पूली तोड़ी जानी चाहिए बल्कि यह पहली कटाई के ठीक बाद और समानांतर दूरी पर की जानी चाहिए। कलम की जीभी को परस्पर जोड़ते हुए तने एवं सांकुरके यदि तने से पतले हों तो ये तने एक ही ओर जाने चाहिएं ताकि कैम्बियम परत का मिलान आवश्यक रूप से उसी ओर हो सके। रोपाई का तरीका जंगली खुबानी की रोपाई प्रसुप्त मौसम (अंतिम दिसंबर से मध्य मार्च) के दौरान की जाती है परंतु बेहतर ढंग ए पौधे लगे, इसके लिए जरूरी है कि पौधों की रोपाई पहले से की जाए। पौधरोपण के पहले 1 मीटर ×1 मीटर ×1 मीटर साइज के गड्ढे खोदे जाते हैं। इन गड्ढों को 50 से 60 कि. ग्रा. मिट्टी और खाद के मिश्रण से भरा जाता है। प्रत्येक गड्ढे में 1 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट और क्लोरोपाइरीफास का घोल (10 लीटर पानी में 10 मि. ली) भी डाला जाता है। सपाट जमीन पर नियमित आकार वाली वर्गाकार अथवा आयताकार क्यारियां तैयार की जाती हैं। जबकि पहाड़ियों के ढलवां जमीन पर सामान्यता एक समान ऊँचाई पर कन्तूत के रूप में क्यारियां तैयार की जाती हैं। मिट्टी, जलवायु और प्रजाति की प्रबलता के आधार पर पौधों की दूरी में विविधता रखी जाती है। सामान्यत: पौधे 5 × 5 मीटर के अन्तराल पर लगाए जाते हैं। जंगली खुबानी के अधिक सघन पौधोर्पण का मानकीकरण किया जाना अभी बाकी है। जिसके लिए इनकी कटाई-छंटाई के उपयुक्त तरीकों तथा वृद्धि कम करने वाले रसायनों के प्रयोगों का मानकीकरण करना होगा। एक वर्ष के स्वस्थ पौधे को गड्ढे के बीचों–बीच लगाया जाता है उसके बाद आस-पास की मिट्टी को धीरे से दबाया जाता है ताकि जड़ आसानी से मिट्टी को पकड़ सकेंं। मिट्टी के साथ जड़ की सही पकड़ के लिए तुरंत इसमें पानी डाला जाना चाहिए। पौधोरोपण के बाद इसके आस-पास की मिट्टी की नमी को बरकरार रखने के लिए वहां 10 सें.मी. मोटी सतह तक पुआल का बिखराव कर देना चाहिए। गर्मियों के दौरान आवश्यकतानुसार सिंचाई की व्यवस्था की जानी चाहिए। सीधाई एवं छंटाई सामान्यत: जंगली खुबानी के पौधों की वृद्धि के लिए कोई खास तरीका नहीं अपनाया जाता है तथा शुरूआती वर्षों में इसे प्राकृतिक रूप से बढ़ने दिया जाता है। पौधों के कुछ बड़े हो जाने पर इनकी वृद्धि तथा इनकी डालियों की संख्या बढ़ाने के लिए इनकी डालियों की छंटाई की जाती है। पौधों के विकसित होने के पहले मौसम के दौरान इसके तनों के आसपास उगे 3 से 5 प्राथमिक आधारी शाखाओं को चयनित कर 45 से 60 डिग्री तक की उपयुक्त कोण और समुचित अंतराल (10-15 सें. मी. की दूरी) पर व्यवस्थित कर रखा जाता है। सबसे नीचे झुकी डाली और जमीन के बीच 40 से 45 सें. मीटर का फासला होना चाहिए। सभी प्राथमिक आधारी शाखाओं की वृद्धि इस प्रकार होती है कि उन्हीं पर द्वितीयक आधारी शाखाएँ बढ़ सकें। पौधों को वृद्धि के दूसरे चरण के दौरान हरेक प्राथमिक कलियों पर उचित अन्तराल वाले 5-7 से द्वितीयक आधारी शाखाओं को चुनकर छांट लिया जाता है।और बाकी बची डालियों को हटा दिया जाता है। पौधे तीन वर्ष के हो जाने पर उनकी छंटाई केवल इसलिए की जाती है ताकि शाखाएँ मोटी हो सकें, वे एक ही जगह इकट्ठी न हो जाएँ और एक दूसरे पर चढ़ न जाएं। जिससे की पौधों का पूर्ण विस्तार हो सके और इनके ऊपरी हिस्से को पर्याप्त सूरज की रोशनी और हवा प्राप्त हो सके। जिस समय जंगली खुबानी के पेड़ छोटे हों उस अवस्था में इनकी डालियों पर उगे इन दलपुटों को टूटने से बचाना जरूरी है जिससे की पेड़ की समुचित वृद्धि हो सके। फल देने वाले ने पेड़ों की कंटाई–छंटाई अपेक्षाकृत कम और आवश्यकतानुसार ही की जानी चाहिए जबकि पेड़ों की भरपूर छंटाई की जानी चाहिए ताकि इसकी वृद्धि और इनके फल उत्पादन क्षमता में सही संतुलन रखा जा सके। एक वर्ष पुराने पौधों की 25-30 प्रतिशत शाखाओं की छंटाई अथवा बाद में एक तिहाई छंटाई, फलों के आकार तथा गुणवत्ता की वृद्धि के लिए सिफारिश की जाती है। कटाई के बाद चौबटिया पेस्ट नामक रसायन, कटे हुए ठूंठों पर लगाना न भूलें। खरपतवार नियंत्रण चूंकि जंगली खुबानी के पेड़ अधिकांशत जहाँ–तहाँ और सीमांत खेतों पर लगाए गए हैं इसलिए सामान्यत: इनके लिए खर-पतवार नियंत्रण के उपाय नहीं किए जाते हैं और इन्हें इसी प्रकार प्राकृतिक अवस्था में ही सतृण भोमी पर बढ़ने दिया जाता है। तथापि रासायनिक खर-पतवारनाशी का भी इन पर सफल परीक्षण किया जा चुका है। प्रति हेक्टेयर 4 से 6 किलोग्राम की दर से सिमेजिन अथवा डायूरोण के प्री-इमरजेंसी उपचार से 90 दिनों तक खेतों में उगने वाले नए खर-पतवारों को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है। पोषक तत्वों का प्रबंधन किसानों द्वारा जंगली खुबानी के पेड़ों के लिए रासायनिक खाद के का उपयोग नहीं किया जाता है। पेड़ों में केवल सड़ी हुई गोबर की खाद डाली जाती है जंगली खुबानी के एक स्वथ्य पेड़ से फल की अच्छी उपज लेने के लिए उसमें 40-50 किलोग्राम गोबर की खाद डाली जानी चाहिए। पत्तियों को झड़ने के पहले 25-50 प्रतिशत यूरिया और पत्तियाँ झड़ने के बाद 1.0 प्रतिशत बोरिक एसिड के उपचार से भी पेड़ में फूल और फल बेहतर ढंग से लगते हैं। जंगली खुबानी में बोरोन की कमी होने पर इनके फूलों व फलों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।पत्तियों के झड़ने के बाद 0.1 प्रतिशत बोरिक एसिड (1 ग्राम/लीटर पानी के साथ) के छिड़काव से बोरोन की कमी को दूर किया जा सकता है। फलों का छितराव (विरलन) फलों के विरलीकरण से इनके आकार में सुधार होता है, फल नियमित रूप से लगते हैं, इनका झड़ना (अधिक भार के कारण) कम होता है और कुल मिलाकर पौधे जीवंत तथा उत्पादक बने रहते हैं। पूर्ण पुष्प खिलने (अप्रैल का अंतिम या मई माह में पहला सप्ताह) के 40 दिनों के अंदर फल विरलीकरण का कार्य पूरा का लिया जाना चाहिए। विरलीकरण हाथों के द्वारा के द्वारा तथा रसायनों के माध्यम से भी किए जा सकते हैं। फसलों के वजन के अनुरूप फलों को विरलीकृत किया जा सकता है ताकि ये परस्पर 6-10 सें.मी. की दूरी पर रहें। एक पुष्प कलिका पर दो से अधिक फल नहीं लगे रहने चाहिएं। विरलीकरण के लिए फल लगने के 20 दिनों के बाद 25-50 पी.पी.एम एन.ए.ए. के पत्तियों पर घोल को पर्णीत छिड़काव करना सर्वोत्तम मन गया है। सिंचाई जंगली खुबानी के पौधे अक्सर वर्षा सिंचित क्षेत्रों में लगाए जाते हैं। कठोर पौधा एवं शुष्क-वातावरण अवरोधी होने के कारण इस वृक्ष को अतिरिक्त सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। परंतु गर्मी के महीनों वाले सुखाड़ के दौरान इनकी सिंचाई करने से न केवल इनके नए व छोटे पौधे ठीक ढंग से मिट्टी पकड़ते हैं एवं इनमें वृद्धि होती है बल्कि इनके बड़े पेड़ों में भी फूलों की संख्या में इजाफा होता है। कीट – पंतगे एवं बीमारियाँ कीट – पंतगे इंडियन जिप्सी मोथ जंगली खुबानी वाले हरेक क्षेत्रों में इस विनाशकारी पतंगे का प्रभाव देखा गया है। रात में तथा सामूहिक रूप से विचरने वाले लार्वा ही नुकसान करते हैं। इनके लार्वा, पेड़ों की पूरी पत्तियों को खा जाते हैं। और केवल उनकी थोड़ी कठोर से शिराओं को ही बचा छोड़ते हैं इस करण इनके भारी प्रकोप से पेड़ पर्णविहीन हो जाते हैं। इसके नियंत्रण हेतु संभावित तुड़ाई के एक माह पहले 0.1 प्रतिशत कार्बरिल का छिड़काव करें। पीच स्टेम बोरर यह एक पोलिफैगस पेस्ट है जो तनों तथा इनकी शाखाओं पर आक्रमण करता है। कभी-कभी तो तने में इनके द्वारा किए गए छेद के कारण पूरे का पूरा पेड़ ही सूख जाता है। पेड़ के जिस भाग पर इसका आक्रमण होता है वहाँ का अंदरूनी छाल लकड़ी के बुरादे की तरह का पाउडर सा बन जाता है जो कि तने के टूटे हुए भाग से इन पेस्टों के माल के साथ बाहर की ओर भुर-भुराकर गिरता रहता है। मार्च महीने के दौरान 0.15 प्रतिशत बी.एच.सी के घोल का छिड़काव कर वयस्क कीटों को नष्ट किया जा सकता है और एक पखवाड़े के बाद दुबारा इसके छिड़काव की जरूरत होती है। खुबानी कैल्सिड जंगली खुबानी के लिए यह एक घातक कीट है। कोमल फलों के अंदर इनके द्वारा अंडे दिए जाते हैं जिस कारण ऐसे फल पकने के पहले ही गिर जाते हैं। ऐसे ग्रब जो पारभाषी सफेद होते हैं अपने भोजन संबंधी क्रियाकलाप को अप्रैल–मई के दौरान जारी रखते हैं और जून से फरवरी तक निष्क्रिय रहते हैं। इसके बाद वे फलों के अंदर अंडे देते हैं। इस कीट को नियंत्रित करने के लिए सभी प्रभावित एवं गिरे फलों को चुनकर पूरी तरह से नष्ट कर देना चाहिए। बीमारियाँ भूरा विगलन सभी देशों में जंगली खुबानी इस बीमारी से ग्रसित होते हैं। पेड़ों पर फूल आने के बाद शुरूआती सात दिनों के अंदर बारिश होने की दशा में इस बीमारी के फैलने की संभावना देखी गई है। मंजरी (पुष्पगुच्छा) और फल दोनों इससे प्रभावित होते हैं। इस बीमारी से अधिक गंभीर रूप ग्रसित होने की स्थिति में मंजरी का रंग भूरा हो जाता है और यह मर जाता है। इसके दुष्प्रभाव से कुछ ही दिन में फल के सड़े हुए छोटे से हिस्से का फैलाव काफी बड़े हिस्से तक हो जाता है। इसके रोगजनक किटाणु सड़े-सूखे, फलों, टहनियों व गले हुए फलों में फ़ैल जाते हैं। इस बीमारी की रोकथाम के लिए एन्थेसिस (प्रफुल्लन) के दौरान 0.1 प्रतिशत बिनोमाइल और सुशुप्तावस्था के दौरान 1 प्रतिशत डी.एन.ओ.सी. का छिड़काव किया जाता है। बेक्टीरियल कैंकर एवं गमोसिस यह बीमारी दुनियाभर में फैली हुई है जो जंगली खुबानी के अलावा गिरी वाले अन्य फलों को भी ग्रसित करती है। इस बीमारी को दुष्प्रभाव जड़ को छोड़कर पेड़ के बाकी बचे सभी भागों पर पड़ता है। इस बीमारी से ग्रसित पेड़ों के तने की चाल व बाहरी लकड़ी पर चिपचिपा व चित्तीदार दाग उभर आता है जिनमें पानी सा भरा रहता है। जो की बाद से भूरे रंग का हो जाता है और बदबू भी करने लगता है। बीमारी से ग्रसित फलों पर काले रंग की चित्तियाँ हो जाती हैं। इस बीमारी को नियंत्रित करने में पतझड़ तथा बसंत ऋतु के दौरान बोर्डों मिश्रण (4:4:50) का छिड़काव काफी प्रभाविकारी पाया गया है। पाउडरी मिल्ड्यू इस फंगस का दुष्प्रभाव कोमल पत्तियों तथा मूलाग्र पर अधिक होता है जबकि पुराने पौधों में इसके प्रति रोधिता अधिक है। पत्तियों की सतह पर हाईफा के फैलाव से एक बड़ी संख्या में व श्रृखंलावार कोनिडिया के कारण एक सफेद चूर्ण का बिखराव सा हो जाता है। इससे पत्तियाँ सिकुड़ जाती हैं इस बीमारी से ग्रसित भाग की वृद्धि रूक जाती है। इस मिल्ड्यू के दुष्प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए फूल आने से पहले, पंखुड़ियों के झड़ने के समय तथा उसके दो सप्ताह बाद कूल तीन बार 2 प्रतिशत सल्फर युक्त रसायन के घोल का छिड़काव जरूरी है। पत्तियों का मुरझाना इस बीमारी से ग्रसित होने पर पेड़ के प्रभावित भाग की पत्तियाँ शुरूआती गर्मी के मौसम के दौरान मुरझाकर झड़ने लगती हैं। इससे पूरा पेड़ अथवा कोई भी भाग प्रभावित हो सकता है। पेड़ की सामान्य वृद्धि में अवरोध के अतिरिक्त बीमारी का कोई अन्य बाहरी लक्षण दिखलाई नहीं पड़ता है। किसी प्रकार के प्रतिरोधी छिड़काव से इस रोग को नियंत्रित कर पाना संभव नहीं होता है। अत: नए पौधे लगाने के पूर्व उसके गड्ढे की मिट्टी को फोर्मेलिन से उपचारित कर देना चाहिए। तुड़ाई एवं पैदावार जंगली खुबानी के पेड़ों के पाये जाने के स्थान की ऊँचाई व अवस्थिति के अनुरूप इनके फल सामान्यत: मई के अंतिम सप्ताह से शुरू होकर अगस्त की समाप्ति तक परिपक्व हो जाते हैं। फलों की तुड़ाई हाथ से या पेड़ों को हिलाकर जाती है। इसके लिए किसी प्रकार की मशीन का उपयोग नहीं किया जाता है। फल के बाहरी आवरण का रंग, फल आने से तुड़ाई के बीच के अवधि और फल के टी.एस.एस. को फल की परिपक्वता का मापदंड माना जाता है। ताजे फलों की विपणन हेतु इन्हें उसी समय तोड़ लिया जाना चाहिए जब इनके छिलके का रंग हरे से पीला हो रहा हो। शीतकों में रखने, डिब्बाबंद रूप में तथा सुखाकर बेचने के लिए फलों को पूरा पकने के बाद ही तोड़ा जाता है। फलों का सुबह तोड़ा जाना चाहिए तथा ग्रेडिंग एवं पैकिंग के दौरान इनको सूर्य की किरणों से बचाना चाहिए। यह 4 से 5 वर्ष की अवस्था से फल देना आरंभ कर देता है और 50-60 वर्षों तक फलता रहता है। 10 से 15 वर्ष पुराने पेड़ से फलों की उपज पूर्णरूपेण मिलने लगती है जो कि जो प्रति पेड़ लगभग 85 से 100 किलो ग्राम तक होती है। गुठली की उपज फल की 12-17 प्रतिशत तथा गिरी की उपज 3.14 से 4.81 कि.ग्रा. प्रति वृक्ष तक अलग-अलग पायी जाती है। पूरी तरह से परिपक्व और उचट रख-रखाव वाले पेड़ से 120-150 किलो ग्राम तक की उपज प्राप्त की जा सकती है। फल एवं गिरी का संघटन खुबानी, शर्करा एवं विटामिन ‘ए’ का एक अच्छा स्रोत है साथ ही इसमें थायमिन एवं लौह तत्व भी अच्छी मात्रा में विद्यमान रहता है। ताजे भारतीय खुबानी में 86 प्रतिशत खाद्य पदार्थ होते हैं। पके फल के गूदे से विद्यमान तत्व कुल ठोस तत्व 12.4-16.7% अघुलनशील ठोस तत्व 2.1-3.1% एसिड (मेलिक एसिड के रूप में) 0.7-2.2% कुल शर्करा (इनवर्ट शर्करा के रूप में) 5.3-8.5% ग्लुकोस 3.2-4.8% फ्रक्टोस 1.4-4.25% सुक्रोस 1.4-5.4% टेनिन 0.06-0.10% जंगली खुबानी के फलों में 22-38 प्रतिशत तक गिरी होती है जिसका स्वाद इसके किस्म के अनुरूप मीठा अथवा कसैला हो सकता है। मीठे गिरी का स्वाद बादाम में मिलता जुलता होता है जिसे कन्फेक्शनरी तथा पेस्ट उद्योग द्वारा बादाम की जगह पर उपयोग में लाया जाता है। साथ ही इसे खुबानी का जैम बनाने में भी प्रयुक्त किया जाता है। गिरी में जल (4.3%), प्रोटीन (31.4%), तेल (53.4%), रेशा (4.8%), रख (2.6%), शर्करा विशुद्ध (8.1%) तथा डेक्सट्रोज (11.6%) परिवर्तन के बाद पायी जाती है। बादाम तेल के रंग से बहुत अधिक मिलता-जुलता होने के कारण इसमें मिलावट के लिए भी खुबानी के तेल को खली से अलग कर लिया जाता है। कसैला बादाम की अपेक्षा खुबानी की गिरी सस्ती होती है और इससे 0.8–1.6 प्रतिशत तक तेल प्राप्त होता है जो कि बादाम से प्राप्त होने वाले तेल की मात्रा से अधिक भी है इसलिए वाणिज्यिक रूप से यह अधिक फायदेमंद है। जंगली खुबानी के कसैला गिरी से 1.6 प्रतिशत तेल प्राप्त होता है। खली से तेल निकाल लेने के बाद यह पशु आहार के लायक हो जाता है। तेल निकालने की पारंपरिक विधियाँ तेल निकालने के लिए बीजों को हाथ से तोड़ा जाता है ताकि ये छिटककर दूर न चले जाने जाएँ। भीमल के तार का लूप जैसा बनाया जाता है जिसके अंदर बीजों को डालकर नदी के किनारे पाये जाने वाले छोटे, गोलाकार पत्थरों से इन्हें तोड़ा जाता है। इससे बाहर निकली गिरियों को धुप में सुखाया जाता है फिर इसे ‘ओखली’ के अंदर चूर किया जाता है। इसके बाद इसका पेस्ट बनाया जाता है और पानी मिलाकर धुप में इस पेस्ट को हाथ से फेंटने से तेल निकलने लगता है। इस पेस्ट को खासकर तेल निकालने के उद्देश्य से तैयार किए गए लकड़ी के बर्तन में रखा जाता है। हाल के वर्षों में कुछ किसानों द्वारा व्यवसाय के दृष्टिकोण से कुछमें रहने शक्तिचालित तेल निष्कर्षक इकाइयाँ सड़कों के आस पास संस्थापित की गई है। परंतु इससे केवल आस–पास के लगभग 1 से 3 किलोमीटर के दायरे में रहने वाले किसानों को ही फायदा मिल सका है जबकि पहाड़ी क्षेत्र के गांवों के किसानों के पास तेल निकालने का एक मात्र विकल्प ही रहता है। जंगली खुबानी के उपयोग अधिक अम्ल तथा कम चीनी विद्यमान होने के कारण जंगली खुबानी सामान्य उपयोग के लायक नहीं रहता है। वर्तमान में इससे किसी प्रकार का कोई वाणिज्यिक उत्पाद तैयार नहीं किया जा रहा है। हालाँकि इससे चटनी आदि बनाने के उत्साहवर्द्धक परिणाम प्राप्त हुए हैं। हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखंड के आदिवासियों द्वारा इस फसल के गूदे को मुख्यत: देशी शराब बनाने के उपयोग में लाया जाता है। यह फल बड़ी तेजी से नष्ट होता है परंतु इसे कई रूपों में संरक्षित कर रखा जा सकता है। इसे शीतकों में ठंडा कर रखा जा सकता है। इसके डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ व पेस्ट तैयार किये जा सकते हैं। कुछ देशों में इसके फलों को पकाया जाता है और इनके गूदों की एक पतली सतह किसी साफ कपड़े पर बिछाई जाती है जिसे पसारकर सुखाया जाता है और तैयार मीठे पापड़ (एक प्रकार की सूखी मिठाई) को महत्वपूर्ण भोज्य पदार्थ के रूप में उपयोग में लाया जाता है। खुबानी से कई तरह के उत्पाद तैयार किए जाते हैं। हिमाचल प्रदेश में सामान्य कृष्य खुबानी के साथ जंगली खुबानी के फलों को मिश्रित कर खुमानी के जैम, मकरंद व पापड़ जैसे कई प्रकार के उपोत्पाद तैयार किए जाते हैं। इसके गुदों से तैयार किए गए बच्चों के आहार काफी पौष्टिक होते हैं जो की कैल्सियम, फास्फोरस व लौह तत्व के अच्छे स्रोत होते हैं। इसके बीजों के तेल को खाने एवं खली को जैविक खाद के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। आय–व्यय विविरण जंगली खुबानी के वृक्षों की काश्त का खर्चा एवं उपज व प्राप्ति सारणी-1 एवं 2 पर दर्शाया गया है। सारणी -1 जंगली खुबानी का काश्त खर्च खर्च अवधि राशि/रू./है. शुरूआती वर्ष 13200 प्रथम वर्ष 5100 द्वितीय वर्ष 7850 तृतीय वर्ष 11100 चतुर्थ वर्ष 15550 कुल 52800 सारणी -2 उपज एवं प्राप्ति वर्ष/उम्र उपज /वृक्ष (कि. ग्रा.) उपज प्रति है. 400 वृक्ष प्रति है. प्राप्ति प्रति है. (रूपये) फल गुठली तेल तेल की खली तेल तेल की खली तेल तेल की खली कुल 5 20 0.74 0.39 0.35 156 140 23400 640 24040 8 55 2.03 1.08 0.95 432 380 64800 2280 67080 12 115 4.25 2.25 2.00 900 800 135000 4800 139800 15 130 4.81 2.55 2.26 1020 904 153000 5424 158424 तेल की कीमत रू. 150/- कि.ग्रा. खली की कीमत रू. 6/- कि.ग्रा. स्रोत: तिलहन एवं वनस्पति तेल विकास का राष्ट्रीय मिशन देखें किस प्रकार जम्मू- कश्मीर में हो रही है खुबानी की खेती, और किसान उठा रहें हैं लाभ