जनवरी लीची माइट, लीची (घुन), लीफ माइनर आदि से ग्रसित टहनियोंको निकाल कर नष्ट कर दें। फरवरी 10 प्रतिशत फूल खिलने की अवस्था में मधुमक्खी के 10-15 बक्से प्रति हे. बागान में रखे ताकि पूर्णरूपेण परागण हो सके। फल लगने एवं मुधमक्खी के बक्से के बाद ही रासायनिक कीटनाशी या अन्य दवा का बागान में छिड़काव करें। मार्च बौर निकलने के 15 दिन बाद डयफेनकोनाजॉल (25 ई.सी.) 1.0 मिलीलीटर/लीटर या कारबेन्डाजाईम 1.0 ग्राम/लीटर का पहला छिड़काव करें । फल लगने के 7-10 दिन बाद प्लानोफिक्स 2.0 मिली/लीटर/5 लीटर या एन.एन.ए. 20 पी.पी.एम. (20 मिलीग्राम/लीटर) के घोलका पहला छिड़काव करें ताकि फल झड़ने की समस्या न आये। बगों मे नमी की कमी होने पर यिमित सिंचाई करते रहें। फलों के मसूर या लौंग दाने की अवस्था में निम्बीसिडीन या नीम बीज अर्क (5 मिली लीटर/लीटर) या पंचगव्य (30 मिली लीटर/लीटर) या वर्मीवाश 10 मिली लीटर/लीटर का छिड़ाव करें जिससे फल बेधक कीट के प्रभाव को कम किया जा सके। वैसे बागानों में जहाँ पिछले वर्ष में फल बेधक कीट का प्रकोप ज्यादा रहा हो उसमें नोवाल्यूरान (10 ई.सी.) 1.5मिली लीटर/लीटर के घोल का छिड़काव करें। अप्रैल फल लगने की प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद नत्रजन की एक तिहा मात्रा (500-600 ग्राम यूरिया प्रति पौधा) तथा बचे पोटाश की मात्रा (600 ग्राम प्रति पौधा) का व्यवहार कर हल्की सिंचाई करें। फलों के फटने की समस्या से बचाव के लिए फल लगने के 15-20 दिन बाद बोरेक्स (4 ग्राम/लीटर) का 2 छिड़काव 15 दिन के अंतराल पर करें। ध्यान रहे कि बागों में नमी की कमी न हो। बड़ी इलाइची आकार के फल होने पर प्लानोफिक्स 2.0 मिली लीटर/5 लीटर या एन.ए. ए. 20 पी.पी.एम (20 मिलीग्राम/लीटर) के घोल का दूसरा छिड़काव करें ताकि फल झड़नेकी समस्या न आए । फलों के गुच्छों को नान ओवेन पॉलीप्रोपलीन थैलियों में ढ़के । फलों पर लाली आने के पहले निम्बीसिडीन (5 मिली/लीटर) या पंचगव्य (30 मिली/लीटर) घोल का 7 दिनों के अंतर से दो छिड़काव रकें ताकि फलों को फल बेधक कीट के प्रभाव से बचाया जा सके। ज्यादा प्रकोप की स्थिति में फल पकने के 20-25 दिन पहले नोवाल्यूरान (10 ई.सी. 1.5 मिलीलीटर/लीटर या थ्यिाक्लोरपीड) (21.7 एस.सी) 0.5 मिलीलीटर/लीटर के घोल का छिड़काव करें। अंतरवर्ती फसलें जैसे हल्दी, ओल, अरबी, आदि की बुआई करें। मई बागों में फल पकने तक सिंचाई का समुचित प्रबंधन करें। फल बेधक कीट के प्रभाव को कम करने के लिए ऊपर बताए गये दवा का प्रयोग करें। मई के तीसरे सप्ताह से फलों की तुड़ाई करें। तुड़ाई प्रातः काल 4-8 बजे तक ही करें। फलों को बाग में ही ठंडे स्थान पर झोपड़ी बनाकर रखें जहाँ फलों की छंटाई एवं पैकजिंग की जा सके। पैकेजिंग हाऊस की सुविधा न होने पर फलों को धूप से बचाते हुए वहाँ पहुँचावे ताकि छंटाई एवं पैकजिंग की जा सके। शीतलन की कड़ी के साथ ही रेफर वैन से कार्डबोर्ड के डब्बों में फलों को बाहर विपणन के लिए भेजने का प्रबंध करें या प्रसंस्करण करें। जून तुड़ाई उपरांत पेड़ों की छंटाई करे। कीड़ो से प्रभावित टहनियाँ, सूखी तथा धड़ों से निकल रही टहनियों और पेड़ के उचित फैलाव से बाहर जा रही टहनियों को काटकर नष्ट कर दे ताकि समुचित प्रकाश एवं हवा पौधों को मिल सके। बागों की हल्की जुताई करें जिससे खरपतवार नष्ट हो जायें एवं प्रकाश तथा हवा का आवागमन हो सके। जताई उपरांत खेत मे पाटा जरूर लगादें। पहली अच्छी वर्षा के साथ प्रति पौधा 60-70 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद, 2-3 किलोग्राम डी.ए.पी. एवं 1.0 किलोग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाष प्रति पौधा व्यवहार करें। खाद एवं उर्वरक पेड़ों के फैलाव से लगभग 1 मीटर अंदर 20-25 सेमी चौड़ी एवं गहरी नाली बनाकर दें। कम नमी की स्थिति में हल्की सिंचाई करें ताकि पौधे पोषक तत्वों को अच्छी तरह ग्रहण कर सकें। अंतरवर्ती फसलें जैसे लोबिया, मक्का, या हरी खाद के लिए लैंचा, सनई, आदि का बुआई करें। जुलाई नई कोपलों को पत्ती खाने वाले कीड़ों से बचाने हेतु क्लोरपायरिफॉस (20 ई.सी.) 2.0 मिली लीटर /लीटर के घोल का छिड़काव करें। साथ ही साथ मकड़ी के प्रकोप को कम करने के लिए ग्रसित टहनियों को काट कर नष्ट कर दें। अगस्त बागों में जल जमाव दूर करने के लिए उचित जल निकास की व्यवसी करें। शाखाओं पर अगर छिलका वाले कीड़ों का प्रकोप नजर आये तो उसका उपचार करें। जाल को साफ कर छिद्र में सायकिल स्पोक घुसाकर कीड़ों को नष्ट करें एवं डाइक्लोरवॉस (76 ई.सी.) कीटनाशी का सान्द्र घोल 1-2 बूंद छिद्र में डालकर छिद्रों को गीली मिट्टी से बंद करें। बगों की जुताई करें ताकि हरी खाद फसलें अच्छी तरह से खेत में मिल जायें एवं खरपतवारआदि भी नष्ट हो जायें और वायु संचार अच्छा हो सके। पुराने बागों के जीर्णोद्धार का कार्य इसी महीने में किया जाना चाहिए । सितम्बर लीची बाग में नियमित पुष्पन व फलन के लिए पोधों के तीन-चौथाई प्राथमिक शाखाओं में 2 से 3 मिलीलीटर चौड़ा आकार में छाल हटाकर वलय/छल्ला (गर्डलिंग) बनाने से टहनियों में मंजर/ फूल निकलते हैं। शाही किस्म में गर्डलिंग अगस्त अंतिम सप्ताह से तथा चाइना किस्म में सितम्बर के प्रथम सप्ताह में करें। नियमित पुष्पन व फलन हेतु वलयन (गर्डलिंग) प्रत्येक साल करना अनिवार्य है तथा दूसरे वर्ष वलयन प्रथम वर्ष से 1.5 इंच ऊपर करें। छिलका खाने वाले कीड़ों के प्रकोप के लिए ऊपर बताये विधि को अपनायें या दुहरायें। नई कोपलों/ पत्तियों को खाने वाल कीड़ों से बचाव के लिए क्लोरपायरिफॉस (20 ई.सी.)2.0 मिलीलीटर/लीटर के घोल का छिड़काव करें। अक्टूबर बाग की जुताई न हुई हो तो जुताई कर पाटा मार दें। मकड़ी से प्रभावित टहनियों/ पत्तियों को काटकर नष्ट कर दें एवं प्रोपरजाइट (57 ई.सी.)3.0 मिलीलीटर/लीटर के घोल का छिड़काव करें। इस माह में तांबा (कॉपर) की कमी के लक्षण दिखाई देते है। इसकी कमी को दूर करने के लिए 2.0 ग्राम प्रति लीटर कॉपर सल्फेट के घोल का पहला छिड़काव करें। आवश्यकतानुसार दूसरा छिड़काव 15 दिन बाद करें । नवम्बर धड़ों से या कटे भाग से टहनियाँ निकल रही हों तो उसे काटकर नष्ट करते रहें। छिलका खाने वाले कीड़ों पर ध्यान रखें। प्रकोप रहने पर ऊपर बताये गयी विधि से उपचार करें। वर्षा खत्म होने पर बाग की हल्की जुताई/सफाई के बाद पेड़ों के तनों को कम से कम 1.5 मीटर ऊँचाई तक बोर्डो लेप (चूनाःतुतियाःपानी 1:1:10) से पुताई करें। दिसम्बर जिंक सल्फेट (33 प्रति) 2.0 ग्राम/लीटर के घोल का छिड़काव करें। जिससे मादा फूलोंकी संख्या में वृद्धि की संभावना बढ़ जाती हुँ । आव"यकतानुसार 15 दिन बाद दूसरा छिड़काव करें। पोषक तत्वों की आव”यकता के लिए मृदा व पत्तियों की जाँच करवायें तद्नुसार पोषक तत्वों का व्यवहार करें। सामान्य सुझाव सामान्यतः नवम्बर माह से फूल आने तक बाग की सिंचाई करें। अतिआवश्यक होने पर हीहल्की सिंचाई दें। बाग में पर्याप्त नमी की अवस्था में ही खाद एवं उर्वरकों का व्यवहार तथा कोई छिड़कावकरें। नमी संरक्षण के लिए पलवार (मल्चिंग) का प्रयोग करें। रसायनिक कीटनाशी का व्यवहार तभी करें जब कीटों का प्रकोप नियमित रूप से बढ़ रहाहो अन्यथा समेकित कीट प्रबंधन तकनीक को अपनायें। रसायनिक घोल बनाने में 0.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के दर से स्ट्रीकर को अवश्य मिलायें। निदेशक, भाकृअनुप-राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केन्द्र, मुजफ्फरपुर, बिहार