लीची वृक्ष में विभिन्न प्रकार के रोगों का प्रकोप होता है जिससे उत्पादन एवं गुणवत्ता प्रभावित हो होती है। बागवानों को लीची में समय-समय पर लगने वाले रोगों के बारे में जानकारी होना आवश्यक है ताकि समय पर प्रभावी प्रबंधन किया जा सके और फलों को नुकसान होने से बचाया जा सके। अतः, लीची में लगने वाले प्रमुख रोगों के विवरण एवं प्रबंधन की जानकारी यहाँ दी जा रही है। पत्ती, मंजर एवं फल झुलसा रोग लक्षण यह नर्सरी में लीची के पौधों का एक प्रमुख रोग है, जो बागों के वृक्ष में मंजर (पैनिकल) एवं विकासशील फलों को भी झुलसा देते हैं । इस रोग के प्रारंभिक लक्षण पत्तियों के अंतिम सिरे पर उत्तकों के सूखने (उत्तकक्षय या नेक्रोसिस) के रूप में होती है। आमतौर पर ऐसे लक्षण को देखकर पोटैशियम की कमी का भ्रम होता है। बाद में पत्तियाँ सिरे से दोनों हाशिये की ओर सूखने लगती है। धीरे-धीरे संक्रमित पत्तियाँ चॉकलेटी गहरे-भूरे रंग की झुलसी हुई प्रतीत होती है। बागों के फलन योग्य वृक्षों में रोग के लक्षण पुष्प एवं फलन की अवस्था में दिखाई देते हैं। इसके रोगकारक मंजरों को झुलसा देते हैं जिससे प्रभावित मंजरों में कोई फल नहीं लग पाते हैं। ऐसे मंजर देखने में सूर्य-किरणों से जली हुई प्रतीत होती हैं। अगर मौसम अनुकूल नहीं रहा और मंजर की अवस्था रोग से बच गई तब भी बाद में अनुकूल मौसम होने पर फल झुलस जाते हैं। तुड़ाई उपरांत भी इसके रोगजनक फल सड़न पैदा करने में प्रमुख कारक होते हैं। यह रोग अल्टरनेरिया अल्टरनाटा नामक फफूंद द्वारा जनित होता है। वृक्ष के क्षत्रक की निचली पत्तियों पर इसके रोगजनक सालों भर पलते हैं। रोग का फैलाव पूरी तरह मौसम (तापक्रम 30-34° सेल्सियस, 60-70 प्रतिशत आर्द्रता) पर निर्भर करता है। प्रबंधन प्रभावित पत्तियों को समय-समय पर इकट्ठा कर जला दें। पत्ती झुलसा से बचाव के लिए नर्सरी पौधों पर ताम्रयुक्त फफूंदनाशी, कॉपर ऑक्सीक्लोराइड या कार्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यू.पी. 2 ग्राम/लीटर पानी की दर से छिड़काव करें । मंजर एवं फलों को झुलसा रोग से बचाने के लिए थायोफेनेट मिथाइल 70 प्रतिशत डब्ल्यू.पी. 2 ग्राम/लीटर या डाईफेनोकोनाजोल 25 प्रतिशत ई.सी. 1 मिली/लीटर या ऐजॉक्सीस्ट्रॉबिन 23 प्रतिशत एस.सी. 1 मिली/लीटर या कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत डब्ल्यू.पी. 2 ग्राम/लीटर का पहला छिड़काव मंजर निकलने के बाद परन्तु फूल खिलने से पहले, दूसरा छिड़काव फल लगने के बाद और तीसरा छिड़काव फल तुड़ाई से लगभग 20 दिन पहले करें। श्यामवर्ण रोग (एन्थ्रेकनोज) लक्षण यह मुख्यतः फलों में होने वाला रोग है पर साथ ही यह पत्तियों और टहनियों को भी प्रभावित कर सकते हैं। पत्तियों पर धब्बे गोलाकार या अनियमित भूरे रंग के क्षेत्र के रूप में दिखाई दे सकते हैं। फलों पर रोग के संक्रमण की शुरूआत फल पकने के लगभग 15-20 दिन पहले होती हैं पर कभी-कभी लक्षण फल तुड़ाई-उपरांत तक दृष्टिगोचर हो सकते हैं। फलों के छिलकों पर छोटे-छोटे (0.2-0-4 से.मी.) गहरे भूरे रंग के धब्बे दिखाई पड़ते है जो आगे चलकर एक दूसरे से मिलकर काले और बड़े आकर (0.5-1.5 से.मी.) के धब्बों में परिवर्तित हो जाते हैं। रोग की अधिक तीव्रता की स्थिति में काले घब्बों का फैलाव फल के छिलकों पर आधे हिस्से तक हो सकता है। रोग के कारण मूलतः फलों के छिलके ही प्रभावित होते हैं परन्तु इस वजह से ऐसे फलों का बाजार मूल्य गिर जाता है। यह रोग कोलेटोट्राइकम ग्लिओस्पोराइडिस नामक फफूंद से जनित होता है। यह रोगजनक संक्रमित पत्तियों पर साल-भर जीवित रहता है। उच्च तापक्रम एवं आर्द्रता रहने पर रोग का संक्रमण और फैलाव बड़ी तेजी से होता है। प्रबंधन जहाँ तक संभव हो, प्रभावित पत्तियाँ एवं टहनियों को वृक्षों से तोड़कर नष्ट कर दें। बचाव के लिए थायोफेनेट मिथाइल 70 प्रतिशत डब्ल्यू.पी. 2 ग्राम/लीटर या क्लोरोथैलोनिल 75 प्रतिशत डब्ल्यू.पी. 2 ग्राम/लीटर या डाईफेनोकोनाजोल 25 प्रतिशत ई.सी. 1 मिली/लीटर या ऐजॉक्सीस्ट्रॉबिन 23 प्रतिशत एस.सी. 1 मिली/लीटर का छिड़काव फल तुड़ाई से लगभग 20 दिन पहले करें। तुड़ाई के पहले फफूंदनाशी का छिड़काव तुड़ाई के बाद फलों की जीवनावधि को बढ़ाता है, लेकिन फफूंदनाशी रसायनों के फलों में अवशिष्ट का भी ध्यान रखना जरूरी है। म्लानि या उकठा रोग लक्षण अक्सर 5 साल से कम के वृक्ष एक सप्ताह से भी कम समय में सूख जाते हैं। प्रक्षेत्र में म्लानि रोग के लक्षण पत्तियों के हल्के पीले होने के साथ-साथ मुरझाने से प्रारम्भ होती है जो क्रमिक उत्तरोत्तर बढ़ती हुई 4-5 दिनों में वृक्ष को पूर्णरूपेण सूखा देती है। ध्यान से देखने पर जड़-मुकुट (क्रॉउन), पार्श्व जड़ों और 'फ्लोएम' उत्तकों पर कुछ भूरे धब्बे दिखाई देते हैं जो बाद में 'जाइलम' उत्तकों में भी फैल जाते हैं। इसकी वजह से पानी का आवागमन अवरूद्ध हो जाता है। यह रोग फ्यूजेरियम सोलानी नामक फफूंद द्वारा जनित होता है। इसके रोगजनक मिट्टी में 'क्लेमाइडोस्पोर' बीजाणु के रूप में हमेशा मौजूद रहते हैं। खेत में संक्रमित मिट्टी के फैलाव से यह रोग नये स्वस्थ्य पौधों में फैलता है। प्रबंधन नीम या अंडी की खल्ली 5-8 किलोग्राम/वृक्ष खाद के रूप में प्रयोग करें। ट्राइकोडर्मा हरजियानम, ट्राइकोडर्मा विरिडी या स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस इत्यादि जैव-नियंत्रक का प्रयोग करें, जो वृक्ष की वृद्धि में भी सहायक होता है। ट्राइकोडर्मा का प्रयोग इस प्रकार करें:-वृक्ष के क्षत्रक की बाहरी सीमा से लगभग दो फीट अंदर की तरफ मिट्टी में 100-200 ग्राम/वृक्ष (उम्र के हिसाब से) ट्राईकोडर्मा उत्पाद को 4-5 किलोग्राम सड़ी गोबर की खाद या कम्पोस्ट में मिलाकर वृक्ष के चारो तरफ 30 सेंटीमीटर चौड़ी पट्टी में छिड़क दें और उसे कुदाल से मिलाएँ। मिट्टी में नमी की मात्रा पर्याप्त होनी चाहिए। अगर नहीं हो, तो ट्राईकोडर्मा डालने के बाद हल्की सिंचाई कर दें। यदि जैव-नियंत्रक न हो तो हैक्साकोनाजोल 5 प्रतिशत एस.सी. 1 मिली/लीटर या कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत डब्ल्यू.पी. 2 ग्राम/लीटर के घोल से वृक्ष के सक्रिय जड़ क्षेत्र को भिगोएँ। फल विगलन लक्षण इस रोग का प्रकोप उस समय होता है जब फल परिपक्व होने लगता है। सर्वप्रथम रोग के प्रकोप से छिलका मुलायम हो जाता है और फल सड़ने लगते हैं। प्रभावित फलों के छिलके भूरे से काले रंग के हो जाते हैं एवं सड़े हुए भाग पर फफूंद दिखने लगते हैं। फल फटने के बाद विगलन रोगजनकों के माइसेलियम (तन्तुएँ) फटे हुए भाग में फैल जाते हैं। इस रोग से प्रभावित फल खमीरीकृत या किण्वित पदार्थ जैसा गंध देने लगता है। यह रोग कई प्रकार के फफूंद जैसे- अल्टरनेरिया अल्टरनाटा, कोलेटोट्राइकम ग्लिोयोस्पोराइडिस, एस्परजिलस फ्लेवस और एस्परजिलस नाइजर द्वारा जनित होता है। फलों के यातायात एवं भंडारण के समय इस रोग के प्रकोप की संभावना ज्यादा होती है। प्रबंधन फल तुड़ाई के 15-20 दिन पहले वृक्षों पर थायोफेनेट मिथाइल 70 प्रतिशत डब्ल्यू.पी. 2 ग्राम/लीटर या कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत डब्ल्यू.पी. 2 ग्राम/लीटर के घोल का छिड़काव करें। फलों की तुड़ाई प्रातः काल 4-8 बजे करें और फल तुड़ाई के दौरान फलों को यांत्रिक क्षति होने से बचाएँ। फलों को तोड़ने के शीघ्र बाद पूर्वशीतलन उपचार (तापक्रम 40 सेल्सियस, नमी 85-90 प्रतिशत) करें। फलों की पैकेजिंग 10-15 प्रतिशत कार्बन-डाय-ऑक्साइड गैस वाले वातावरण के साथ करें। परिवहन के लिए छेदेदार फाइबर बोर्ड (कोरूगेटेड फाइबर बोर्ड) बक्से का प्रयोग करें। अगर आयातक देशों द्वारा सल्फर धूनी (सल्फाइटेसन) की स्वीकृति हो, तो इसके लिए एक बंद कक्ष में फल रखकर 50-100 ग्राम सल्फर प्रति क्यूबिक मीटर जगह के हिसाब से हवा की उपस्थिति में 20-30 मिनट तक जलने दें एवं फलों को उपचारित होने दें। प्रमुख रोगों का एकीकृत प्रबंधन संक्रमित पत्तियों को हटाकर और नष्ट कर बाग की स्वच्छता को बढ़ावा दें। मृदा में गोबर की खाद के साथ सूक्षमजीवों जैसे ट्राइकोडर्मा, माइकोराइजा आदि के अनुप्रयोग द्वारा वृक्ष की प्राकृतिक रोग-प्रतिरोधी क्षमता को बढ़ावा दें। रोगों से बचाव के लिये फफूंदनाशी रसायन-कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50 प्रतिशत डब्ल्यू.पी. या मेंकोजेब 75 प्रतिशत डब्ल्यू.पी. 2 ग्राम/लीटर या कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत डब्ल्यू.पी. 2 ग्राम/ लीटर पानी की दर से छिड़काव करें। रोग के प्रथम दृश्य लक्षणों के प्रकट होने पर थायोफेनेट मिथाइल 70 प्रतिशत डब्ल्यू.पी. 2 ग्राम/लीटर या डाईफेनोकोनाजोल 25 प्रतिशत ई.सी. 1 मिली/लीटर या ऐजॉक्सीस्ट्रॉबिन 23 प्रतिशत एस.सी. 1 मिली/लीटर या कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत डब्ल्यू.पी. 2 ग्राम/लीटर का छिड़काव करें। मंजर एवं फल झुलसा रोग के लिये रोगनिवारक छिडकाव करें - प्रथम छिडकाव मंजर निकलने के तुरंत बाद पर फूलों के खुलने से पहले, और द्वितीय छिडकाव फलों के तुड़ाई के 20 दिन पहले (रंग परिवर्तन होने की अवस्था पर)। फल तुड़ाई के पहले की गई छिडकाव एन्थ्रेक्नोज रोग के संक्रमण को रोकने के साथ-साथ तुड़ाई उपरांत जीवनावधि का विस्तार करने में भी मदद करती है। स्त्राेत : भा.कृ.अनु.प.-राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केन्द्र, डॉ. विनोद कुमार, वरिष्ठ वैज्ञानिक (पादप रोग), डॉ. विशाल नाथ निदेशक, भा.कृ.अनु.प.-राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केन्द्र, मुजफ्फरपुर-842 002 (बिहार) फोनः 0621-2289475, फैक्सः 0621-2281162, वेबसाइट: www.nrclitchi.org $Act: director.nrcl@icar.gov.in, nrclitchi@yahoo.co.in