बड चिप विधि द्वारा केवल 10-12 क्विंटल बीज गन्ना से एक हैक्टर क्षेत्रफल में गन्ने की खेती की जा सकती है, जबकि पारंपरिक विधि द्वारा इतने ही क्षेत्रफल के लिए 50-60 क्विंटल बीज गन्ना की आवश्यकता होती है। 10-12 क्विंटल बीज गन्ना से निष्कासित बड का वजन मात्रा 2-2 क्विंटल होता है जो प्रवर्धन के लिए उपयोगी होता है। शेष बचे गन्ने का इस्तेमाल गुड़ या चीनी बनाने में किया जा सकता है। पारंपरिक विधि से गन्ने की खेती करने पर 40-45 क्विंटल बीज गन्ना को व्यर्थ ही दबा देते हैं। इतनी मात्रा में बीज गन्ना को खेतों में डालने से कीट-व्याधि का प्रकोप बढ़ने के साथ-साथ आर्थिक हानि भी होती है। अतः अल्प बीज से अधिक क्षेत्रफल में गन्ना उगाने एवं नवीनतम प्रभेदों के त्वरित विस्तार के लिए बड चिप एक टिकाऊ विकल्प है। उच्च उत्पादकता के लिए उत्तम प्रभेदों का चयन आवश्यक है। साधारणतः गन्ने की खेती में व्यावसायिक फसल का ही उपयोग किया जाता है। गन्ने के वानस्पतिक भाग का बीज के रूप में इस्तेमाल होने के कारण इसकी बीज दर अत्यधिक होती है। बीज दर ज्यादा होने के कारण कई राज्यों में बीज शृंखला यथा प्रजनक बीज, आधार बीज एवं प्रमाणित बीज संबंधित निर्देशों का पालन नहीं हो पाता है। फलस्वरूप किसान पुराने प्रभेदों को ही वर्षों तक अपने प्रक्षेत्र पर उगाते रहते हैं। ये दस वर्षों या इससे अधिक पुराने प्रभेदों में उत्पादन क्षमता एवं आनुवंशिक श्रेष्ठता में कमी एवं कीट-व्याधि के प्रति संवेदनशीलता में वृद्धि होने लगती है। इन समस्याओं से बचाव के लिए त्वरित बीज वृद्धि आवश्यक है, ताकि कम समय में नवीनतम प्रभेदों को ज्यादा से ज्यादा किसानों तक पहुंचाया जा सके। इसे बीज बचत तकनीक के नाम से भी जाना जाता है। इस विधि से पौधे तैयार करने के लिए गन्ने से निष्कासित बड को उपयोग किए गए प्लास्टिक कप, प्रवर्तन ट्रे या रेतीली मृदा में डालकर नर्सरी तैयार किया जा सकता है। भूमि का चुनाव एवं तैयारी दोमट मृदा, जिसमें अच्छे जल निकास की सुविधा हो गन्ने की खेती के लिए उपयुक्त रहती है। खेत तैयार करने के लिए एक गहरी जुताई मृदा पलटने वाले हल से तथा दो जुताईयां हैरो या कल्टीवटेर से करने के बाद पाटा लगा देना चाहिए। खेत की जुताई के समय ही 20 टन प्रति हैक्टर गोबर की खाद या प्रेसमड को मृदा में डालकर मिला देना चाहिए। प्रारम्भिक अवस्था में गन्ने को कीटमुक्त रखने के लिए क्लोरोपाइरीफॉस नामक कीटनाशी दवा 5 लीटर/हैक्टर की दर से इस्तेमाल करनी चाहिए। प्रत्यारोपण के दिनों में अनुशंसित दूरी पर नाली खोलकर सिंचाई करने के बाद 25-30 दिनों के पौधों को प्रत्यारोपित करना चाहिए। प्रत्यारोपण के बाद एक दिन के अंतराल पर एक सप्ताह तक हल्की सिंचाई देते रहना चाहिए। पौधों के जमाव के बाद पारपंरिक विधि अनुसार ही प्रबंधन करना चाहिए। प्रत्यारोपण की विधि इर्खा अनसुधांन सस्ंथान, पूसा, समस्तीपुर, बिहार में किए गए शोध के परिणाम से स्पष्ट है कि बड चिप से तैयार पौधों के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी 90 सें.मी. तथा पौध से पौध की दूरी 45 सें.मी. रखनी चाहिए। अगर जोड़ी पंक्ति विधि से गन्ने की रोपाई करनी हो तो पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30-120 सें.मी. तथा पौध से पौध की दूरी 45 सें.मी. रखनी चाहिए। प्रत्यारोपण के समय नाली में सिंचाई कर देनी चाहिए। खाद एवं उर्वरक प्रबंधन खेत की जुताई के समय 20 टन प्रति हैक्टर सड़ा हुआ कम्पोस्ट या गंधकीय प्रेसमड तथा उर्वरकों के रूप में 150 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 85 कि.ग्रा. फॉस्फोरस, 60 कि.ग्रा. पोटाश तथा 50 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट की पूरी मात्रा तथा नाइट्रोजन की आधी मात्रा प्रत्यारोपण के समय प्रयोग करनी चाहिए। शेष बचे नाइट्रोजन का आधा हिस्सा प्रथम सिंचाई के बाद एवं आधा हिस्सा मृदा चढ़ाते समय इस्तेमाल करना चाहिए। सिंचाई प्रत्यारोपित पौधों के स्थापित होने के बाद शरदकालीन प्रत्यारोपण में 6-7 एवं बसंतकालीन प्रत्यारोपण में 4-5 सिंचाइयों की आवश्यकता पड़ती है। प्रत्येक सिंचाई के बाद दो पंक्तियों के बीच अंतरकर्षण कर देना चाहिए। निराई-गुड़ाई साधारणतः बड चिप विधि द्वारा तैयार पौधे को नाली में लगाया जाता है और सिंचाई भी केवल नाली में ही की जाती है। नाली में सिंचाई देने के कारण जल की बचत तो होती ही है। इसके साथ ही खरपतवार भी कम निकलते हैं। बरसात का मौसम शुरू होने से पहले मृदा चढ़ाते समय नाली मेड़ में बदल जाती है। यदि खरपतवार अधिक हो तो आवश्यकतानुसार प्रत्यारोपण के 40-45 दिनों बाद पूरे खेत में एक बार अच्छी तरह खरपतवार प्रबंधन श्रमिक या मशीन द्वारा करना चाहिए। मृदा चढ़ाना एवं स्तंभन बरसात का मौसम प्रारंभ होने के पहले ही यानी जून के तीसरे सप्ताह में यूरिया का द्वितीय उपरिवेशन और फ्रयूराडॉन कीटनाशी का 33 कि.ग्रा./हैक्टर की दर से इस्तेमाल कर रीजर से मृदा चढ़ानी चाहिए। अच्छी बढ़वार होने पर फसल को गिरने से बचाने के लिए अगस्त से मध्य सितंबर तक आमने-सामने की पंक्तियों को गन्ने के एक दूसरे की तरफ झुकाकर उसी की हरी एवं सूखी पत्तियों को एकान्तर श्रृंखला में बांध देना चाहिए। कटाई कटाई जमीन की सतह से की जानी चाहिए। अगात प्रभेदों की कटाई 15 नवंबर तथा मध्य पछैती प्रभेदों की कटनी जनवरी के प्रथम सप्ताह से करनी चाहिए। बड चिप तकनीक से लाभ पारंपरिक विधि (30-35 प्रतिशत) की अपेक्षा बड चिप का प्रस्पफुटन अधिक (90 प्रतिशत) होता है। इस विधि द्वारा गन्ने की खेती करने पर 80 प्रतिशत बीज की बचत होती है। प्रवर्ध्दन ट्रे, प्लास्टिक कम या पॉलीबैग में तैयार किए गए पौधे का परिवहन आसानी से किया जा सकता है। बड चिप द्वारा विकसित पौधों का मुख्य खेत में स्थापन्न शत्-प्रतिशत होता है। मातृ पौधे की संख्या पर्याप्त होने के कारण गन्ना रस में चीनी की अधिकता होती है। बड चिप निष्कासन के बाद शेष बचे हुए गन्ने को रस, गुड़ या चीनी बनाने में उपयोग किया जा सकता है। इस विधि से गन्ना प्रत्यारोपित करने पर लंबी अवधि वाली धान के बाद भी गन्ना संभव है। जल-जमाव वाले क्षेत्रों में, जहां नमी की अधिकता के कारण समय पर खेत तैयार नहीं हो पाता, उस परिस्थिति के लिए भी उपयुक्त। खूंटी फसल में रिक्त स्थानों की पूर्ति के लिए उपयुक्त। नर्सरी तैयार करने की विधि रोग एवं कीटमुक्त स्वस्थ गन्ने, जिसकी उम्र 9-10 माह हो उसी फसल को बीज के रूप में चयन करते हैं। हस्तचालित यंत्र द्वारा बड चिप को निकालते हैं। कटे हुए बड चिप को 0.1 प्रतिशत कार्बेण्डाजिम के मिश्रण में 10 मिनट तक डुबोते हैं। बड चिप रोपण के लिए छनी हुई मृदा, रेत एवं कार्बनिक पदार्थ की मात्रा को बराबर-बराबर अनुपात में मिलाने के बाद मिश्रण को 10 मि.ली. क्लोरपायरफॉस 20 ई.सी. तरल दवा को प्रति क्विंटल मिश्रण में मिलाकर उपचारित कर लेना चाहिए। उपचारित बड चिप एवं मिश्रण को प्रवर्तन ट्रे, कप या छिद्रयुक्त थैलियों में डालकर पंक्तिबद्ध करते हुए रखना चाहिए। ट्रे या थैलियों में बड चिप सावधानीपूर्वक रखना चाहिए, ताकि बड ऊपर की ओर स्थित हो। निरंतर सिंचाई आवश्यक है, ताकि नमी बनी रहे। एक प्रतिशत यूरिया घोल का 15वें एवं 25वें दिन छिड़काव करना चाहिए। स्त्राेत : खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर), सस्य विभाग ईख अनुसंधान संस्थान डा. राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा-848125 बिहार।