शीत ऋतु की ठंड, शीत लहर, मेघाच्छन्न दिन-रात भले ही सामान्य जीवन की गतिविधि को प्रभावित करते हैं, परंतु, बागवान भाइयों के लिए यह समय अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस समय बागों में किए गए कृषि कार्यों का पौधों की उत्तरजीविता एवं फलन पर दूरगामी प्रभाव होता है। अब की मेहनत कल काम आएगी, जान लें कि कैसे। फलों के अच्छे और उच्च गुणवत्ता के उत्पादन के लिए बगिया की देखभाल अति आवश्यक है। फलदार पौधों की बहुवर्षीय प्रकृति के कारण इनकी देखभाल तथा रखरखाव धान्य फसलों से भिन्न होता है। इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण फलों में जनवरी व फरवरी में की जाने वाली प्रमुख कृषि क्रियाओं का विवरण दिया गया है। आम का पेड़ चाहे विशेष देखरेख इस मौसम में पौधों, विशेषकर नवस्थापित बागान को पाले से बचाना अति आवश्यक है। जनवरी में नर्सरी में लगे पौधों को पाले से सुरक्षा के लिए छप्पर से ढकना चाहिए। वहीं दूसरी ओर छोटे पौधों को भी पुआल से ढक दें। पाले से बचाव के लिए बाग में समय-समय पर हल्की सिंचाई करें। बागों की निराई-गुड़ाई एवं सफाई का कार्य करें। आम के नवरोपित बागों की सिंचाई करें। इस समय लगने वाले बौरों का भी ध्यान रखना आवश्यक है। इन्हीं पर फलोत्पादन निर्भर करेगा। जनवरी के प्रथम सप्ताह में आने वाले बौर में फल नहीं लगते और ये अक्सर गुच्छे का रूप धारण कर लेते हैं। अतः ऐसे बौर को निकालकर नष्ट कर दें। आम में उर्वरक देने का यह सही समय है। नाइट्रोजन 500 ग्राम, फॉस्फोरस 500 ग्राम तथा पोटाश 700 ग्राम प्रति पौधा प्रयोग करें। इन्हें मिट्टी में मिलाकर हल्की सिंचाई कर दें। बागों की निराई-गुड़ाई एवं सफाई का कार्य करें। फरवरी में थालों की गुड़ाई करें। फुदका या तेला (मैंगो हॉपर) के नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड (0.3 प्रतिशत) तथा चूर्णिल आसिता रोग से बचाव के लिए केराथेन (20 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी में) का छिड़काव फरवरी के अंतिम सप्ताह में अवश्य करें। फरवरी में छोटे पौधों के ऊपर से छप्पर हटा दें। मीलीबग (गुजिया) के बचाव के लिए वृक्षों के तने पर पॉलीथीन की 3 फुट चौड़ी पट्टी बांध दें एवं 250 ग्राम प्रति वृक्ष की दर से क्लोरपॉयरीफॉस धूल (1.5 प्रतिशत) को पेड़ के चारों ओर की मिट्टी में मिश्रित करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, भूमि की सतह पर परभक्षी ब्यूवेरिया बेसियाना (2 ग्राम प्रति लीटर, 1×107 बीजाणु प्रति मि.ली.) अथवा 5 प्रतिशत नीम बीज के गिरी सतत् का प्रयोग प्रौढ़ कीटों को मारने के लिए करें। ध्यान रखने योग्य बात है कि इन्हीं दिनों पौधों पर फूल आते हैं और यदि किसी भी कीटनाशी का प्रयोग फूलों पर किया गया तो संपूर्ण परागण न होने से कम फल लगेंगे। नीबूवर्गीय फलों का कल्याण, भरेगा धन-धान्य जनवरी में एक-दो सिंचाई करें तथा पाले से बचाने के हर संभव उपाय करें। मूलवृत्त तैयार करने के लिए बीज की बुआई पॉलीथीन में करें। प्रति पौधा 400 ग्राम नाइटा्रजेन, 200 ग्राम फास्फोरस तथा 400 ग्राम पोटाश का प्रयोग 50 कि.ग्रा. गोबर की खाद के साथ करके हल्की सिंचाई कर दें। बागों की निराई-गुड़ाई एवं सफाई का कार्य करें। फरवरी में फूल आने से कुछ दिन पहले सिंचाई न करें अन्यथा सभी फूल झड़ सकते हैं। यदि फूलों या फलों में गिरने की समस्या अधिक हो तो 2-4,डी (10 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी में घोलकर) का छिड़काव करें। फल लगते समय पर्याप्त मात्रा में नमी बनाए रखें। नए पौधे तैयार करने हेतु फरवरी मे अंत में कलिकायन (बडिंग) की जा सकती है। अंगूर की देखभाल, करे मालामाल बेहतर अंगूर उत्पादन हेतु, वार्षिक काट-छांट अत्यंत आवश्यक है। उत्तरी भारत में अंगूर की काट-छांट के लिए जनवरी सबसे उपयुक्त माह है। काट-छांट के बाद कटे भाग पर नीले थोथे का घोल लगाना न भूलें, ताकि किसी भी व्याधि के प्रकोप से बचा जा सके। अंगूर में प्रथम वर्ष गोबर/कम्पोस्ट खाद के अलावा 100 ग्राम नाइट्रोजन, 60 काट-छांट किया अंगूर का पौध ग्राम फॉस्फेट व 80 ग्राम पोटाश प्रति पौधा आवश्यक होता है। 5 वर्ष या इससे ऊपर यह मात्रा बढ़कर 500 ग्राम नाइट्रोजन, 300 ग्राम फॉस्फेट व 400 ग्राम पोटाश हो जाती है। फॉस्फोरस की सम्पूर्ण मात्रा तथा नाइट्रोजन व पोटाश की आधी मात्रा काट-छांट के बाद जनवरी में दें। उरर्वक डालने के बाद हल्की सिंचाई करें। कटी हुई शाखाओं से 30-40 सें.मी. आकार की कलमें तैयार कर लें तथा इन्हें 10-15 दिनों तक नम भूमि में दबाने के बाद पौधशाला में लगा दें। बेहतर परिणाम हेतु कलमों को 500-1000 पीपीएम इंडोल ब्यूटाइरिक अम्ल से उपचारित भी किया जा सकता है। उत्तरी भारत में अंगूर के नए बाग लगाने का भी यही उपयुक्त समय है। फरवरी में चूर्णिल आसिता रोग से बचाव के लिए केराथेन (0.1 प्रतिशत) का छिड़काव करें। बागों की निराई-गुड़ाई एवं सफाई का कार्य करें। पपीते की निगरानी, बढ़ाए आमदनी पपीते को पाला अत्यधिक हानि पहुंचाता है। अतः जनवरी में पाले से बचाने के लिए पर्याप्त प्रबंध करें। पौधों को पुआल से ढक दें तथा समय पर सिंचाई करते रहें। पुआल को फरवरी के अंत में हटा दें। 25 ग्राम नाइट्रोजन, 50 ग्राम फॉस्फोरस तथा 100 ग्राम पोटाश का प्रयोग फरवरी में प्रति पौधा की दर से करें। बागों की निराई-गुड़ाई एवं सफाई का कार्य करें। पपीते के नवरोपित बागों की सिंचाई करें। बागों की निराई-गुड़ाई एवं सफाई का कार्य करें। बेर की निगरानी, ना बरतें असावधानी बेर में चूर्णिल आसिता रोग अत्यधिक हानि पहुंचाता है। इससे बचने के लिए फरवरी में 0.2 प्रतिशत केराथेन का छिड़काव करें। 15 दिनों के अंतराल पर दोबारा यही छिड़काव करें। फरवरी के अंत में किसान बेर के पौधे भी लगा सकते हैं। फरवरी में बेर की अगेती .किस्में पकने लगती हैं। फलों को अच्छी दशा में बनाए रखने के लिए, तुड़ाई सुबह या शाम को ही करनी चाहिए। तुड़ाई के समय फलों को उनके रंग एवं आकार के आधार पर छांटकर श्रेणीकृत किया जाना चाहिए। छंटाई उपरांत फलों को कपड़े की चादरों, जूते के बोरॉन, नाइलोन की जालीदार थैलियों बांस की टोकरियों, लकड़ी अथवा गत्तों के डिब्बों में रखकर बाजार भेजा जा सकता है। बागों की निराई-गुड़ाई एवं सफाई का कार्य करें। सही ज्ञान से रखें शीतोष्ण फलों का ध्यान शीतोष्ण वर्गीय फलों के बाग लगाने का सही समय जनवरी है। यदि किसी कारणवश दिसंबर में छंटनी न कर पाएं हों तो जनवरी में इन फलवृक्षों की छंटाई अवश्य करें। छंटाई, सधाई प्रणाली को ध्यान में रखकर करनी चाहिए। कटे भाग पर चौबटिया लेप (सिंदूर : कॉपर कोर्बोनेट : अलसी तेल 1:1:1.25) लगा दनो चाहिए। दो प्रतिशत डोर्मेंट(सर्वो बागान छिड़काव तेल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम छिड़काव तेल) का प्रयोग सैन जोस स्केल और चिचड़ी की रोकथाम के लिए किया जा सकता है। बागों की निराई-गुड़ाई एवं सफाई का कार्य करें। फलदार व छोटे पौधों में गोबर की खाद तथा फॉस्फोरसयुक्त उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए। कीटों एवं रोगों की रोकथाम के लिए यदि दिसंबर में कोई छिड़काव न कर पाए हों तो जनवरी के प्रथम सप्ताह में यह कार्य संपूर्ण करें। बागों में जनवरी में उर्वरक देना भी न भूलें। बनी रहे लीची की मधुरता जनवरी में पाले से सुरक्षा के प्रबंध अवश्य करें। फरवरी में लीची में पफूल आते समय सिंचाई न करें, क्योंकि इससे फूलों के गिरने की आशंका होती है। फूल आने से पहले एवं बाद में पानी की समुचित व्यवस्था करें। चूर्णिल आसिता रोग के प्रकोप से बचने के लिए लीची में संस्तुत रसायनों का प्रयोग करें। कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट की आधी मात्रा अर्थात् 1.5 कि.ग्रा. प्रति पौधा फरवरी में प्रयोग करें। लीची के नवरोपित बागों की सिंचाई करें। बागों की निराई-गुड़ाई एवं सफाई का कार्य करें। खराब न होने पाए खजूर की खासियत जनवरी-फरवरी में खजूर के बागों में कई महत्वपूर्ण कार्य किए जाते हैं, जिनमें कटाई-छंटाई, उर्वरकों का प्रयोग तथा परागण प्रमुख हैं। खजूर के पौधे एक बीज पत्राीय तथा एकल तना होने से शाखित नहीं होते हैं। व्याधिग्रस्त, सूखी, पुरानी, क्षतिग्रस्त पत्तियों को सर्दियों में हटा देना चाहिए। फल गुच्छों से सटी हुई पत्तियों के डंठलों से कांटे निकालना आवश्यक है, ताकि उनके आसपास परागण, फल गुच्छों की छंटाई, डंठल मोड़ना, रसायनों का छिड़काव, थैलियां लगाना एवं फलों की तुड़ाई आदि के कार्य सरलता से हो सकें। पत्ती को डंठल सहित जितना संभव हो सके मुख्य तने के समीप से हटाया जाना चाहिए, ताकि मुख्य तने के सतह को चिकना रखा जा सके। फलःगुच्छा अनुपात 1:6 रखने पर अधिक फल उत्पादन एवं उत्तम गुणवत्ता वाले फल प्राप्त होते हैं। अच्छी फसल हेतु पूर्ण विकसित वृक्ष पर लगभग 70-100 पत्तियां होनी चाहिए। फॉस्फोरस (0.5 कि.ग्रा.) और पोटाश (0.5 कि.ग्रा.) की पूर्ण मात्रा और नाइट्रोजन की 50 प्रतिशत मात्रा (0.75 कि.ग्रा.) को फूल आने से तीन सप्ताह पहले दिया जाना चाहिए, जो विभिन्न किस्मों मे जनवरी-फरवरी के दौरान होता है। इसके वृक्षों की सिंचाई की जानी चाहिए। खजूर में नर एवं मादा पुष्पक्रम अलग-अलग पौधों पर आते हैं। अतः अच्छे उत्पादन के लिए कृत्रिम परागण किया जाता है। इसके लिए ताजे एवं पूर्ण रूप से खुले हुए नर पुष्पक्रमों को अखबार या पॉलीथीन की चादर पर झाड़कर एकत्रित कर लेते हैं। मादा पुष्पक्रमों को जो तुरंत खिले हों, परागकणों में डुबोए गए रुई के फाहों से दो-तीन दिन तक लगातार प्रातःकाल परागित करें या नर पुष्पक्रमों की लड़ियों को काटकर खुले मादा पुष्पक्रम के मध्य में उल्टी करके हल्के से बांध दिया जाता है, जिससे उनमें से परागकण शनै:-शनै: गिरते रहें। जनवरी-फरवरी में लेसर डटे माथे कीट के लार्वा कणों को खाकर नुकसान पहुंचा सकते हैं। स्ट्रॉबेरी में बना रहे माधुर्य जनवरी में स्ट्रॉबेरी के खेत में निराई-गुड़ाई करें। यदि पलवार न बिछाई गई तो वांछित पलवार जैसे पुआल या पॉलीथीन का प्रयोग करें। फलों में उच्च गुणवत्ता प्राप्त करने के लिए फरवरी के शुरू में जिब्रेलिक अम्ल (75 पी.पी.एम.) का छिड़काव करें तथा समय पर सिंचाई करते रहें। पत्तियों पर यदि धब्बे दिखाई पड़ें तो डाईथेन-एम-45 (2 ग्राम प्रति लीटर पानी) या बाविस्टीन (1 ग्राम प्रति लीटर पानी) का छिड़काव करें। पहाड़ी क्षेत्राें में किसान स्ट्रॉबेरी को केवल नए पौधे तैयार करने के लिए लगाते हैं। अतः यदि फरवरी के अंत में पौधों पर फूल आ रहे हैं तो उन्हें तुरंत हटा दें। परंतु मैदानी भागों में किसान ऐसा न करें। मैदानी भागों में फरवरी में स्ट्रॉबेरी की फसल तैयार हो जाती है। इसे तोड़कर, 250 ग्राम के पैकेट में पैक कर बाजार भेजने की व्यवस्था करें। बनी रहे अमरूद की मिठास जनवरी में अमरूद के बागों में फलों की तुड़ाई का कार्य जारी रखें। तुड़ाई का सबसे अच्छा समय सुबह का होता है। फलों को उनकी किस्मों के अनुसार अधिकतम आकार तथा परिपक्व हरे रंग (जब फलों के सतह का रंग गाढ़े से हल्के हरे रंग मे परिवतिर्त हो रहा हो) पर तोड़ना चाहिए। इस समय फलों से एक सुखद सुगंध भी आती है। सुनिश्चित करें कि अत्यधिक पके फलों को तोड़े गए अन्य फलों के साथ मिश्रित नहीं किया जाए। प्रत्येक फल को अखबार से पैक करने से फलों का रंग और भंडारण क्षमता बेहतर होती है। फलों को पैक करते समय उन्हें एक-दूसरे से रगड़ने पर होने वाली खरोंच से भी बचाना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि बक्से के आकार के अनुसार ही उनमें रखे जाने वाले फलों की संख्या निर्धारित हो। जनवरी में पत्तियों पर कत्थई रंग आना सूक्ष्म तत्वों की कमी के कारण होता है। अतः कॉपर सल्फेट तथा जिंक सल्फेट का 0.4 प्रतिशत की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें। फरवरी में आने वाले फूलों को तोड़ दें, ताकि वर्षा ऋतु में आने वाली कम गुणवत्ता वाली फसल की अपेक्षा जाड़े वाली अच्छी फसल को न लेने के लिए फूलों की तुड़ाई के अतिरिक्त नेप्थेलीन एसिटिक अम्ल (100 पी.पी.एम) का छिड़काव करें एवं सिंचाई कम कर दें। फरवरी के दूसरे पखवाड़े में छंटाई का कार्य शुरू किया जाना चाहिए। यह मार्च के प्रथम सप्ताह तक जारी रखा जा सकता है। पिछले मौसम में विकसित शाखाओं के 10-15 सें.मी. अग्रभाग को काट देना चाहिए। इसके अतिरिक्त, टूटी हुई, रोगग्रस्त, आपस में उलझी शाखाओं को भी निकाल देना चाहिए। छंटाई के तुरंत बाद कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (2-3 प्रितशत) का छिड़काव अथवा बोर्डों पेस्ट का शाखाओं के कटे भाग पर लेपन करना चाहिए। बागों की निराई-गुड़ाई एवं सफाई का कार्य करें। अमरूद के नवरोपित बागों की सिंचाई करें। बात करें कटहल की यदि दिसंबर में खाद एवं उर्वरक न दिए गए हों तो जनवरी में यह कार्य पूर्ण करें। छोटे पौधों की पाले से रक्षा के उपाय करें। फरवरी के अंत में मीलीबग के प्रकोप से बचने के लिए पेड़ों पर आम की भांति पॉलीथीन की पट्टी लगाएं। फालसा-बात काट-छांट की उत्तरी भारत में फालसे में जनवरी में गहन काट-छांट करनी चाहिए। काट-छांट के बाद कटे भागों पर बोर्डोलेप लगाएं। पौधों को उपयुक्त मात्रा में गोबर की खाद और उर्वरक दें। शीत ऋतु में की जाने वाली मेहनत, वसंत में खिलने वाली वाली स्वस्थ कोपलों के रूप में जब खिलती है तब बागबान के मन को मिलने वाले सुख का पारावार नहीं होता है। शीत ऋतु में किए जाने वाले कृषि कार्यों में कोई कोताही नहीं बरतनी चाहिए। तो इन हिदायतों पर गौर करें और फलों की सफल खेती करें। बाजार जाएगा आंवला उत्तरी भारत में, आंवला के फलों की तुड़ाई जनवरी-फरवरी तक जारी रह सकती है। अतः इन क्षेत्राों में इस दौरान फलों से लदे वृक्षों को बांस-बल्ली की सहायता से सहारा देने की व्यवस्था की जानी चाहिए, ताकि शाखाओं को टूटने से रोका जा सके। अतः बिक्री की उचित व्यवस्था करें। इस दौरान फलों का भी विकास होता है, अतः सिंचाई की भी समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। परंतु ध्यान रहे कि तुड़ाई से 15 दिनों पूर्व सिंचाई रोक दी जाए, ताकि फल समय से तैयार हो सकें। जिन क्षेत्रों में सिंचाई की समुचित व्यवस्था हो, उन क्षेत्रों में बसंत के आगमन के साथ ही पौध रोपण का कार्य फरवरी के दूसरे पखवाड़े से प्रारंभ किया जा सकता है, जोकि मार्च तक जारी रखा जा सकता है। इसके साथ ही जिन क्षेत्रों में शीत ऋतु में पाले की आशंका हो, वहां गंधक के अम्ल (0.1 प्रतिशत) का छिड़काव पूरे वृक्ष पर किया जाना चाहिए। जरूरत पड़े तो छिड़काव को दोहराएं। फरवरी में फूल आने का समय होता है जो नई पत्तियों के साथ आते हैं, इस समय सिंचाई न करें। आंवला के बाग में गुड़ाई करें एवं थाले बनाएं। आंवला के एक वर्ष के पौधे के लिए 10 कि.ग्रा. गोबर/कम्पोस्ट खाद, 100 ग्राम नाइट्रोजन, 50 ग्राम फॉस्फेट व 75 ग्राम पोटाश देना आवश्यक होगा। 10 वर्ष या इससे ऊपर के पौधे में यह मात्रा बढ़ाकर 100 कि.ग्रा. गोबर/कम्पोस्ट खाद, 1 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 500 ग्राम फॉस्फेट व 750 ग्राम पोटाश हो जाएगी। उक्त मात्रा से पूरा फॉस्फोरस, आधी नाइट्रोजन व आधी पोटाश की मात्रा का प्रयोग जनवरी से करें। बागों की निराई-गुड़ाई एवं सफाई का कार्य करें। केले की सेवा, देती मेवा जनवरी के प्रथम एवं तृतीय सप्ताह में सिंचाई करें ताकि पाले से बचाव हो सके। पाले से बचाव के लिए किसी पलवार (मल्च) का प्रयोग करें तथा बागों में सायंकाल में धुआं भी करें। पौधों को यदि सहारा न दिया हो तो बांस के डंडे से सहारा प्रदान करें। फरवरी के प्रथम तथा तृतीय सप्ताह में सिंचाई करें। केवल एक तलवारी पत्ती (भूस्तारी) को छोड़कर पौधे के आधार से निकलने वाली अन्य पत्तियों को काट दें। नाइट्रोजन की 60 ग्राम मात्रा प्रति 10 लीटर पानी में डालकर छिड़काव करें। बागों की निराई-गुड़ाई एवं सफाई का कार्य करें। यूं ही लुभाता रहे लोकाट जिन क्षेत्रों में सिंचाई की समुचित व्यवस्था हो, उन क्षेत्रों में बसंत के आगमन के साथ ही पौधरोपण का कार्य फरवरी के दूसरे पखवाड़े से प्रारंभ किया जा सकता है, जोकि मार्च तक जारी रखा जा सकता है। एक मीटर गहरे और एक मीटर व्यास के गड्ढे की खुदाई का कार्य वास्तविक वृक्षारोपण से कम से कम एक महीने पहले किया जाना चाहिए। जिन क्षेत्रों में दीमक का प्रकोप हो, वहां क्लोरपाइरीफॉस 10 मि.ली. प्रति गड्ढे की दर से प्रयोग किया जाना चाहिए। प्रति पौध 25-30 कि.ग्रा. अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद दी जानी चाहिए। इस माह के दौरान, शील्ड अथवा 'टी' कलिकायन विधि द्वारा तीन माह पुरानी शाखा से कालिका लेने पर पौध-प्रवर्धन में भी अपेक्षित सफलता मिलती है। उत्तर भारत के कुछ कुछ स्थानों पर जनवरी तक लोकाट में फूल आते हैं। फलों के सैट होने के बाद, 15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई की जानी चाहिए, ताकि फलों का विकास हो सके। फरवरी में नाइट्रोजन उर्वरक की आधी खुराक दी जा सकती है, ताकि फलों की वृद्धि हो सके। यदि फलमक्खी का प्रकोप हो तो कीटनाशी इमिडाक्लोरपिड (0.5 मि.ली./लीटर) का छिड़काव फरवरी में 15 दिनों के अंतराल पर दो बार किया जा सकता है। स्त्राेत : फल-फूल पत्रिका(आईसीएआर), राम रोशन शर्मा, 'खाद्य विज्ञान एवं फसलोत्तर प्रौद्योगिकी संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली-110012 हरे कृष्ण, स्वाति शर्मा, भाकृअनुप-भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, वाराणसी-२२१००५,और विजय राकेश रेड्डी भाकृअनुप-भारतीय बागवानी अनुसंधन संस्थान, बेंगलुरु-