वाटर बेरिज वाटरबेरी का संबंध फलों के पकने से है और प्राय: बेरी सॉफनिंग के बाद जल्दी ही इनका विकास शुरू हो जाता है। पकने पर प्रभावित बेरिज पानी वाली, नरम और पिलपली हो जाती है। वे आकार में लगभग सामान्य रहती है परन्तु उनका फलेश मजबून नहीं है। ये कटाई के समय तक सूख जाती है। ऐसी बेरियां प्राय: मुख्य पुष्पक्रमों या इनके गुच्छों की टिप तक सीमित रहती है। ये विकार अत्यधिक फसल होने और एक क्लस्टर की सभी शाखाओं में उपलब्ध अपर्याप्त पोषण की वजह से होते हैं। वाटर-बेरी निर्माण को कम करने के लिए बेरी विकास के दौरान अत्यधिक सिंचाई और नाइट्रोजन उर्वरकों से बचना चाहिए। क्लस्टर-टिप कारण विल्टिंग इस विकार के प्रति थॉम्पसन बीजरहित वैरायटी ज्यादा संवेदनशील है। मेरूदंड के शिखर छोर पर हल्के भूरे रंग के घाव मेरूदंड की चालकता को प्रभावित करते हैं। गुच्छे की टिप पर मेरूदण्ड का सिकुडना और सूखना इसी का परिणाम है। कई गंभीर मामलों में नोक पर छोटी कठोर और हल्की भूरी बेरियों को छोड़कर गुच्छा की नोक 30-40 प्रतिशत तक पूरी तरह सूख जाती है। बेलों पर अत्यधिक फसल दबाव को कम करने के लिए कलस्टर पिन्चिंग या बेरी का पतला होने की सिफारिश की गई है। बेरी विकास के दौरान पर्याप्त सिंचाई को सुनिश्चित करना और गुच्छों की सीधी सूर्य की रोशनी से सुरक्षा करने से कलस्टर-टिप विल्टिंग के प्रभाव को कम करने में मदद मिलती है। शूट बेरिज सामान्य बेरिज की तुलना में शूट बेरिज छोटी, मीठी, गोल और बीजरहित होती है। कुछ फूलों के परागण और निषेचन में देरी की वजह से अथवा स्थिर बेरियों में कार्बोहाइड्रेट का अपर्याप्त प्रभाव होने की वजह से ये पैदा होती हैं। शॉट-बेरी गठन के लिए बोरान की कमी, जीए लेप का गल्त चरण और ग्रिडलिंग को इसका कारण जाना गया है। बोरान या जिंक की कमी को सही किया जाना चाहिए। इसी प्रकार उचित स्तर पर जीए का लगाया जाना सुनिश्चत किया जाए। गुलाबी बेरी महाराष्ट्र में थॉम्पसन बीजरहित की एक गंभीर समस्या है। ज्योंही गुच्छा परिपक्वता की ओर अग्रसर होता है, गुच्छे की कुछ बेरियां यादृच्छिक पर गुलाबी रंग में विकसित हो जाती है। गुलाबी रंग से सुस्त लाल रंग में बदल जाता है और गुच्छा बदसूरत सा हो जाता है। जल्दी मौसम की फसल में गुलाबी बेरियों का प्रभाव कम हो जाता है और देरी के मौसम में तापमान में वृद्धि होने पर इनका प्रभाव बढ़ जाता है। बेरी के कलर के लिए ईथरल का अंधाधुध प्रयोग भी इस विकार का कारण हो सकता है। कली और फूलों का गिरना उत्तरी भारत के पंजाब, हरियाणा और राजस्थान राज्यों में इस घटना को पाया गया है। गुच्छों से फूलों का उनके खिलने से पहले और बाद में गिरना। पुष्पगुच्छ को हिलाने से कलियां गिर जाती हैं। ज्यादा कलियां और फूल गिरने से उपज पैदावार में कमी आती है। अधिकांश घटकों का संगठन जैसे वायुमंडलीय तापमान, उच्च फास्फोरस और मिट्टी की कुल नमक सामग्री को इस रोग के घटक के रूप में देखा गया है। इसलिए, फूलों के संवर्धन के दौरान फूल कली और युवा बेरियों के गिराव को कम करने में विवेकपूर्ण सिंचाई पद्धतियों और चंदवा प्रबंधन पद्धतियां मददगार होती है। निर्बल केन परिपक्वता निर्बल केन परिपक्वता प्रायद्वीपीय भारत में पाई जाने वाली एक आम घटना है। इस प्रकार के विकार से परिपक्व होना विफल हो जाता है और उनकी छाल शरद ऋतु में हरी ही रहती है। सर्दियों में कम तापमान की वजह से ऐसे शूटस गुलाबी-लाल हो जाते हैं। यह अंगूर के बागों में अधिक गंभीर और गहन है, बेलों को नजदीक से लगाया जाता है और अधिक सिंचाई और नाइट्रोजन दिया जाता है। टहनी परिपक्वता को प्रभावित करने में पिछले सीजन के फसल भार को पाया गया है। अत्यधिक वनस्पति विकास की जांच करने के लिए विवेकपूर्ण टहनी पिचिंग, टहनी की आपसी शेडिंग को रोकने के लिए गर्मी की छंटाई के बाद 30 दिन तक टहनी थिनिंग, और प्रकाश अवरोधन को बढ़ावा देना कुछ उपचारात्मक उपाय सुझाये गये हैं। पिछली छंटाई के बाद 40-70 दिनों के दौरान अत्यधिक सिंचाई और नाइट्रोजन उर्वरकों का प्रयोग न करने से केन परिपक्वता पर काबू पाने में मदद मिलती है। स्रोत: भारत सरकार का राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड