खेती के तहत क्षेत्र व्यावसायिक रूप से अंगूर की खेती नासिक, पुणे, सांगली, शोलापुर, सतारा, अहमदनगर, लातूर, बीड और औरंगाबाद (महाराष्ट्र), बंगलौर, मैसूर, तुमकुर, कोलार, बीजापुर, गुलबर्गा, रायचूर और बेल्लारी (कर्नाटक), मदुरै, सलेम, और कोयम्बटूर (तमिलनाडु), लुधियाना (पंजाब); तेलंगाना और रायलसीमा (आंध्र प्रदेश); हिसार (हरियाणा) और उत्तर प्रदेश में की जाती है। अंगूर की उत्पत्ति वानस्पतिक नाम - विटिस विनीफेरा परिवार - विटासिए पौधा विवरण - यह एक चढ़ाई वाली बेल है जो पतली और मुलायम चमकदार पत्तियों वाली होती है और इसमें 3,5 या 7 लोबस होते हैं। ये बेलें एडबल स्कीन वाली गोल और अंडाकार बेरों को उत्पादित करती है जो बेरी का पौधा के अनुकूल होती है। उत्पत्ति का केन्द्र - पश्चिमी एशिया और यूरोप परागण प्रणाली - परागणत पार क्रोमोजोम सं. - 2n=38 अंगूर के लिए जलवायु जलवायु अंगूरों को आमतौर पर अपने विकास और फलने की अवधि के दौरान गर्म और शुष्क जलवायु की आवश्यकता होती है। यह उन क्षेत्रों में सफलतापूर्वक उगाया जाता है जहां तापमान रेंज 15-40 डिग्री सेल्सियस हो। फलों की ग्रोथ और विकास के दौरान 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान होने पर यह बेरी साईज और फल की स्थिरता का कम करता है। अग्रणी छंटाई के दौरान 15 डिग्री सेल्सियस के कम तापमान होने पर कलियां टूट जाती है जिससे फसल खराब हो जाती है I कलियों की परिपूर्णता प्रकाश से प्रभावित है। अधिकतम ग्रोथ के लिए 2400 फीट हल्की तीव्रता वाली कैन्डल आवश्यक है। हालांकि, सक्रिय ग्रोथ स्टेज (छंटाई के बाद 45-75 दिन) और फल कलियों के फारमेशन के दौरान कम रोशनी की तीव्रता फसल पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है। यह सबसे सफलतापूर्वक 200-250m से ऊपर m.s. ऊंचाई रेंज में उगाया जाता है। वह क्षेत्र जहां पूरे वर्ष में वार्षिक वर्षा 900mm से अधिक न हो, उस क्षेत्र को अच्छा माना गया है। हालांकि, फलावरिंग और फ्रट राइपनिंग के दौरान बारिश होना अनुकूल नहीं माना जाता है क्योंकि इससे कोमल फफूदी रोग फैलता है। उच्च वायुमंडलीय आर्द्रता वनस्पति विकास और फलने के दौरान हानिकारक है। उच्च आर्द्रता की स्थिति में बेलों का वनस्पति विकास ओजपूर्ण होता है जो फल आकार और गुणवत्ता को प्रभावित करता है। इसी प्रकार, अग्रणी छंटाई के बाद 30-110 दिनों के दौरान उच्च आर्द्रता फंगल रोग को बढ़ाने में अनुकूल है। अंगूर की खेती के लिए मिट्टी अंगूरों की खेती विभिन्न प्रकार की मिट्टी अर्थात रेतीले लोमस, रेतीले क्ले लोमस, लाल रेतीली मिट्टी , हल्की काली मिट्टी और लाल लोमस पर की जा सकती है। मिट्टी अच्छी तरह से शुष्क होनी चाहिए, अच्छा पानी रोकने की क्षमता हो और किसी भी हाई पैन से मुक्त हो या उच्च 90 सेंमी. में प्रबल लेयर की हो तथा कम से कम 6.5 एम से नीचे वाटर टेबल की हो। अंगूरों को सफलतापूर्वक मिट्टी की विस्तृत रेज पीएच (4.0-9.5) से ज्यादा होने पर भी उगाया जा सकता है, हालांकि, मिट्टी की 6.5-8.0 पीएच रेंज को ही आर्दश माना गया है। अधिक अंगूर उगाने वाले क्षेत्र मिट्टी के प्रकार उत्तरप्रदेश व हरियाणा सैन्डी लोमस सैन्डी क्ले लोमस आन्ध्रप्रदेश लाल मिट्टी की धरती उत्तरी आंतरिक कर्नाटक व महाराष्ट्र शैलो-मिडियम डीप ब्लैक दक्षिणी आंतरिक कर्नाटक व तमिलनाडू लाल लोमस पोषाहार स्तर नमी(%) प्रोटीन(%) वसा(%) खनिज पदार्थ(%) रेशा (%) कार्बोहाइड्रेट(%) कैलोरी (%) 79.2 0.5 0.3 0.6 2.9 16.5 71 खनिज फॉस्फोरस (mg/100g) पोटेशियम (mg/100g) कैल्शियम (mg/100g) मैगनीशियम (mg/100g) आयरन (mg/100g) सोडियम (mg/100g) कॉपर (mg/100g) 30 0 20 82 0.52 0 0.2 मैगज़ीन (mg/100g) जिंक (mg/100g) सल्फर (mg/100g) क्लोरीन (mg/100g) मोलिब्डयम (mg/100g) क्रोमियम (mg/100g) 0.11 0.1 0 0 0 0.007 विटामिन कैरोटीन (mg/100g) थाइमीन (mg/100g) राइबोफलेविन (mg/100g) नियासिन (mg/100g) विटामिन सी (mg/100g) कोलीन (mg/100g) फोलिक एसिड फ्री (mg/100g) 0 0 0 0 1 0 0 फोलिक एसिड-कुल (mg/100g) स्रोत: भारत सरकार का राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड अंगूर की खेती से कमाएं मुनाफा