भूमि तैयारी भूमि को अच्छी तरह से जोता और समतल किया जाता है। बेल पंक्तियों को उत्तर-दक्षिण दिशा में उन्मुख किया जाता है ताकि बेलों के दोनो ओर पत्तियों पर सूर्य की रोशनी आ सके। जब बेलों को टेलीफोन, निफिन या तातुरा टरेलिसस के लिए प्रशिक्षित किया जाता है तो पक्तियों की अभिविन्यास ही महत्वपूर्ण है। पौधरोपण का सीजन आम तौर पर मध्य भारत में रोपण नवंबर से जनवरी के दौरान, दक्षिणी कर्नाटक और तमिलनाडु में दिसंबर-जनवरी के दौरान तथा उत्तरी भारत में फरवरी-मार्च में किया जाता है। सीमित सिंचाई सुविधाओं वाले क्षेत्रों में रोपण मानसून की शुरुआत के साथ किया जा सकता है। स्पेसिंग बेलों की स्पेसिंग प्रशिक्षण प्रणाली और विविधता के साथ बदलता रहता है। मध्य महाराष्ट्र और उत्तरी आंतरिक कर्नाटक में, कुंज प्रशिक्षित थॉम्पसन बीजरहित बेलों के लिए 1.2 x 3.6 m या 1.8 x 2.4m स्पेसिंग को अपनाया गया है। 'टी' ट्रेलस पर प्रशिक्षित बेलों की पंक्तियों के बीच स्पेसिंग 1.8-2.4 m से अलग हो सकती है। हालांकि, ट्रैक्टर आपरेशन के मामले में, पंक्ति से पंक्ति की दूरी 3 m रखी जानी चाहिए। जिन्स हेतु अपनाई जाने वाली स्पेसिंग 4.5 x 4.5m (अनब-ए-शाही), 7.2 x 3.6m (बंगलौर ब्लू) और 3.0 x 3.0m सौंदर्य बीजरहित किस्मों के लिए है। गड्ढा खुदाई लेआउट योजना के अनुसार गड्ढ़े क्षेत्र में चिह्नित किए जाते हैं। रोपण से कम से कम एक माह पहले 60-90cm आकार के गड्ढे को खोला जाना चाहिए और उनमें सूर्य की रोशनी आनी चाहिए। सबसे पहले प्रत्येक गड्ढे को टॉपसोल से भरा जाए और उसके बाद अवभूमि में अच्छी तरह से विघटित FYM, 1 किग्रा. सुपरफास्फेट और 500 गारम पोटास सल्फेट के साथ मिश्रित किया जाए। रोपण से पूर्व, गड्ढों में पानी भरा जाए और इन गड्ढों में एक वर्ष की रूटिड कटिंगों को रोपित किया जाए। रोपण के बाद नई ग्रोथ 20-25 दिनों में शुरू हो जाएगी। रोपण के एक माह के बाद युवा पौधों को खूटी से बांधना और ट्रेन्ड किया जाता है। ग्रेप वाइन्स का प्रशिक्षण अंगूर की बेलों का प्रशिक्षण महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एक तरीके से बेलों के कद और प्रसार को बनाए रखने में मदद करता है जो कि इन्टरकल्चर ऑपरेशनों को क्रियान्वित करने में सुविधजनक हो। विभिन्न ढांचें जो अंगूर की बेलों को सहायता देते है उन्हें ट्रेलिस कहा जाता है। एक आदर्श ट्रेलिस को किफायती होना चाहिए, विभिन्न कल्चर ऑपरेशनों को सरल बनाता है, अच्छा लीफ एक्सपोजर देता है, अधिकांश फल वाली इकाईयों के लिए क्षेत्र उपलब्ध कराता है और बेल कनोपी में ज्यादा रोशनी और वेंटिलेशन देता है। सबसे अधिक प्रचलित बोवर है - ‘टी ट्रेलिज, कनइफिन और हैड सिस्टम। बोवर सिस्टम इस प्रणाली को ओवरहैड, अरबोर या परगोला कहा जाता है। बेलों के ओजपूर्ण होने और उष्णकटिबंधीय में स्पष्ट शिखर प्रभुत्व की वजह से इस प्रणाली को अधिकांश व्यावसायिक अंगूर की खेती के लिए सबसे उपयुक्त पाया गया है। यद्यपि यह बहुत महंगी है, फिर भी इसे अधिकतम उपज के लिए सबसे उपयुक्त पाया गया है। बोवर प्रशिक्षण सिस्टम बेल कनोपी में एक वांछनीय माइक्रोक्लामेट प्रदान करता है और बेल चयापचय और जीवन पर शुष्क और गर्म मौसम के प्रतिकूल प्रभाव को कम करता है। इस प्रणाली में बेलें कंक्रीट, पत्थर या लोहे के बने हुए खंभे पर जमीन के ऊपर 2-2.4 मीटर की ऊंचाई पर एक पंडाल के रूप में फैले हुए हैं। वर्टिकल पोलों की स्पेसिंग बेलों की स्पेसिंग पर निर्भर करती है। प्रत्येक एक पोल को पंक्तियों के दोनों किनारों पर फिक्स किया जाता है जबकि इन्टरनल पोलों को इस प्रकार से फिक्स किया जाता है कि एक पंक्ति के भीतर दो ध्रुवों के बीच दो बेलें हों। पोलों को रोपण से पहले फिक्स किया जाता है जबकि तारों के क्रिस-क्रोस नेटवर्क को रोपण के बाद फिक्स किया जाता है। जमीनी स्तर से 1m की ऊंचाई तक की एक्जलरी शूट ग्रोथ हतोत्साहित हो जाती है। पंडाल लेवल से नीचे 15-20 सेमी पर ग्रोविंग टिप पिन्च्ट ऑफ किया जाता है। पिंचिग के बिन्दु पर कलियों को 6एमएम से अधिक मोटा होना चाहिए। मुख्य तने से विपरीत दिशा में बढ़ रही दोनों कलियों को बढ़ने दिया जाए। इन्हें मुख्य शाखा कहा जाता है। इन प्रत्येक मुख्य शाखा पर शाखा के दोनो ओर सुखे क्षेत्र में 45-50 सेमी की दूरी पर सकेन्डरी आर्मस के 3-4 जोड़ों को कुछ देर के लिए तुलनात्मक रूप में कूलर और आर्द्रता वाले क्षेत्रों में रोका जाता है और इन्हें 60-75 सेंमी के अन्तराल पर अलाउ किया जाता है। 6 मिमी मोटाई से भी अधिक बढ़ती हुई गौण शाखाओं को आधे में इसके बेसल हिस्से के नजदीक 5-6 तृतीयक शाखाएं विकसित करने के लिए पहले पिन्चड किया जाना चाहिए जबकि दूसरा कट गौण की अंतिम लम्बाई के नजदीक किया जाए। यह प्रत्येक गौण शाखा की 12-15 तृतीयक शाखाओं को विकसित होने देगा। 'टी' सलाखें इसे स्थानीय स्तर पर टेलीफोन कहा जाता है। यह प्रणाली अधिक शिखर प्रभुत्व वाली मामूली जोरदार किस्मों के लिए उपयुक्त है । यह वेंटिलेशन और प्रकाश के संबंध में 'कुंज' प्रणाली पर एक सुधार है। यह ‘बोबर' की तुलना में अपेक्षाकृत कम खर्चीला है, और यंत्रीकृत छिड़काव और अन्य कई कल्चरल आपरेशनों को सुगम बनाता है। हालांकि प्रति इकाई क्षेत्र में बेतों की कम संख्या हाने की वजह से इस प्रणाली में पैदावार 'बोरो' प्रणाली की तुलना में कम होती हैं। 'टी' सलाखें में, बेलें 1.5-1.6m की ऊंचाई तक सीधे ऊपर की ओर बढ़ती जाती है। मुख्य तने पर दो प्राइमरी विकसित होती है। इन प्राइमरी में से प्रत्येक पर 30-45 सेमी की कम वितीयक वाली प्राइमरी के दोनों किनारों पर एक छाता प्रकार के ढांचे से विकसित होती है। इन कम दवितीयकों पर केनों का विकास होता है। 'वाई' सलाखें इस प्रणाली में प्रकाश अवरोधन और अनुकूल फल कली गठन के लिए अच्छा प्रावधान है। जब सलाखें पूरी तरह से पत्ते के साथ कवर की जाती है, पत्ते और गुच्छों दोनों को सन्बर्न से सुरक्षित किया जाता है । जमीनी स्तर से ऊपर 120135 सेंमी वर्टिकल पोस्ट की 'वाई' सलाखें बनती है और 90-120 सेमी की दो इनकलाइनड आर्मस को 90-110 डिग्री कोण पर रखा जाता है। जमीनी स्तर से 120-135 सेमी ऊपर मुख्य तना पिन्च्ट होता है और प्राइमरी आर्म की एक जोड़ी तार पर विकसित होती है। इनक्लाइनड ‘वाई' सरफेस से अलग वितीयक और बेतों को 10-15 सेंमी स्थिर तारों पर छाने दिया जाता है। गेबल सिस्टम यह प्रशिक्षण की विकसित प्रणाली है जिसे बोवर कंबाइनिंग एडवान्टेजिज और 'वाई' सिस्टम द्वारा विकसित किया गया था। यह तेजी से बढ़ रही बेलों के लिए बहुत उपयुक्त है जहां फल कली गठन के लिए कलियां सूर्य की रोशनी में खिलती है जबकि गुच्छे कनोपी से नीचे लटके रहते हैं और इस तरह से सूर्य की सीधी रोशनी से सुरक्षित रहते है। इस प्रणाली में 'वाई' तने की लम्बाई और इसकी दोनों भुजाएं 1.2m की है। प्रत्येक भुजा से अलग कनोपी तारों को 3035 सेंमी स्पेस पर लगाया जाता है। पंक्तियों के किसी भी तरफ 'वाई' की दोनों भुजाओं को पतली तारों से जोड़ा जाता है। पतली तारों को आपसे में जोड़ते हुए दो और तारों को अलग किया जाता है, दो पंकियों के मध्य संकीर्ण कुंज बन जाता है। स्रोत: भारत सरकार का राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड अब किसान कर सकेंगे अंगूर से पूरे साल कमाई, अंगूर की आधुनिक खेती