आम की बागवानी आम भारतवर्ष का राष्ट्रीय फल है। स्वाद एवं गुणों के आधार पर आम को “फलों का राजा” कहा जाता है। आम का जन्म स्थान पूर्वी भारत, वर्मा व मलाया खंड में है तथा यहाँ से यह फल सारे भारतवर्ष, लंका, उत्तरी आस्ट्रेलिया, फिलीपाइन्स, दक्षिणीय चीन, मध्य अफ्रीका, सूडान एवं विश्व के अन्य गर्म तथा नम जलवायु वाले स्थानों में फ़ैल गया। अपने देश में आम के बाग़ लगभग 18 लाख एकड़ भूमि में हैं, जिसमें आधा क्षेत्रफल उत्तर प्रदेश में ही है। शेष आधे भाग में बिहार, बंगाल, उड़िसा, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, मद्रास एवं अन्य राज्यों में अवस्थित है। आम सर्वोपयोगी फल है। कच्चे आम से विभिन्न प्रकार के आचार, मुरब्बे तथा चटनी बनाई जाती है। पके आम से खाने के अतिरिक्त आम स्मवायम (रस) तथा अमावट बनाने में होती है। अधपके आम से जैम बनाया जाता है। आम से विटामिन “ए” तथा “सी” अच्छी मात्रा में प्राप्त होते हैं। इसमें शकरा का प्रतिशत 11 से 20 तक होता है तथा थोड़ा मात्रा में फ़ॉस्फोरस, लोहा एवं कैल्शियम भी मिलता है। जलवायु आम उष्ण कटिबन्धीय फल है। इसके लिए जून से अक्टूबर तक नम तथा शेष सात माह तक शुष्क जलवायु अति उत्तम है। अच्छे फल प्राप्त होने के लिए फल आने के कुछ सप्ताह पूर्व हल्की ठंड (औसत तापमान 150 सें. ग्रे. से 200 सें.ग्रे.) एवं शुष्क मौसम रहने से फूल अधिक संख्या में आते हैं तथा अच्छी उपज प्राप्त होती है। ग्रीष्म ऋतु में अधिक ऊँचे तापमान से भी फलों तथा वृक्षों को हानि पहुँचती है। साधारणतय 400 सें.ग्रे. से 420 सें.ग्रे. तक तापमान आसानी से सह लेता है। साधारणतय: आम 100 से भी अधिक वार्षिक वर्षा वाले स्थानों में अधिक पाया जाता है। इससे कम वर्षा वाले क्षेत्र में आम लगाने के लिए सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। मिट्टी आम गहरी व फैलनेवाली जड़ों वाल बहु वार्षिक पौधा है। इसको बहुत उपजाऊ मिट्टी की आवश्यकता पड़ती है। मिट्टी से जल निकास उत्तम होना चाहिए। आम के लिए दोमट मिट्टी सर्वोत्तम है। अधिक चिकनी अथवा बलुई मिट्टी में आम सफलतापूर्वक उन्नत नहीं किया जा सकता है। अधिक चूने वाली मिट्टी में पौधा धीरे-धीरे बढ़ता है तथा क्षारीय होने के कारण पौधों की पत्तियाँ शीघ्र झुलस जाती है। चिकनी वाली मिट्टी भी आम के लिए बहुत उपयोगी नहीं है क्योंकि वर्षा ऋतु में इनमें कीचड़ हो जाता है तथा अधिक जल संचय के कारण जड़ें वायु की कमी के कारण मर जाती है। जिससे पौधा भी धीरे-धीरे मर जाता है। किस्मे भारतवर्ष में लगभग आम की 1000 किस्में पाई जाती है लेकिन व्यवसायिक स्तर पर मुख्यत: 30 किस्मों को ही उगाया जाता है। भिन्न-भिन्न राज्यों में आम की अलग-अलग किस्में हैं जो जलवायु एवं मिट्टी के आधार पर ज्यादा लोकप्रिय है। उत्तर भारत में दशहरी, लंगड़ा, समरबहिस्त, चौसा, बम्बई, हरा लखनऊ, सफेद एवं फजली, पूर्वी भारत में बम्बई, माल्दा, हिमसागर, जरदलु, किसनभोग, गोपाल ख़ास, पश्चिम भारत में अल्फान्जो, पायरो, लंगड़ा, राजापुरी, केसर, फरनादिन, मानबुराद, मलगोवा तथा दक्षिण भारत में बोगनपाली, बानीशान, लंगलोढ़ा, रूमानी, मालगोवा, आमनपुर बनेशान, हिमायुदिन, सुवर्णरेखा एवं रसपुरी किस्में प्रसिद्ध हैं। काटकर उपयोग की जाने वाली किस्में इन किस्मों में फलों के गूदा कड़ा होता है जैसे – लंगड़ा, दशहरी, नीलम, चौसा,आल्फान्जो, मल्लिका, आम्रपाली आदि। चूसकर उपयोग की जाने वाली किस्में इन किस्मों के फल रेशदार व रसयुक्त होते हैं, जिन्हें चूसकर उपयोग किया जाता है। इन फलों का प्रवर्धन मुख्यत: बीज द्वारा किया जाता है। इनमें उत्तर प्रदेश की मिठुवा गाजीपुर, मिठुवा सुंदरशाह, शरवती, विजरौन, लखनऊ सफेदा, हरदिलअजीज और रसकुनिया। पकने के समय के आधार पर आम की किस्में तो तीन भागों में विभाजित किया जाता है अगेती पकने वाली: बम्बई हरा, बम्बई पीला, गोपाल भोग, जाफरान, गुलाब ख़ास, हिमसागर, केसर एवं स्वर्णरेखा आदि। उचित समय पर पकने वाली: इन किस्मों में दशहरी, लंगड़ा, रतोल, जरदालु, कृष्णभोग, खासूल ख़ास, हुस्नआरा, अल्फान्जो मुख्य है। पछाती पकने वाली किस्में: चौसा, तेमुरिया, बानेशन, फजली, जाफरानी, फरवानडोन, नीलम और मलगोवा आदि। उत्तरी भारत के किस्मों के फल दक्षिणी भारत की किस्मों की अपेक्षा गुणों में अधिक अच्छे होते हैं लेकिन इनमें फलन क्रिया एक वर्ष के अंतर पर होती है। दक्षिणी भारत के किस्मों के फल न्यून क्षणी के होते हैं। लेकिन इसमें फल परिवर्तन लगते। हाल ही में नीलम और दशहरी के संकरण से मल्लिका और आम्रपाली किस्में विकसित की गई है। इन किस्मों के फल अच्छे गुणों वाले होते हैं। यह अनुमान लगाया जाता है कि यदि पेड़ की देखरेख ठीक प्रकार से की जाय तो यह किस्में प्रतिवर्ष फल दे सकती है। आम के कुछ प्रमुख किस्मों का वर्णन निम्नलिखित हैं बम्बई हरा: यह शीघ्र पकने वाली है तथा जून माह में पकने लगती है। पकने पर डंठल के निकट का स्थान थोड़ा पीला रंग लिए रहता है तथा शेष भाग हरा ही रहता है। इसमें उपज अधिक होती है तथा फल आकार में मध्यम (150 से 200 ग्राम तक) गूदा ठोस बिना रेशे का मध्यम मिठास वाला तथा तीव्र सुगंध युक्त होता है। लंगड़ा: यह उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश की मुख्य किस्म है। यह पंजाब, राजस्थान व गुजरात में भी सफलतापूर्वक पैदा की जा रही है। इसके फल बहुतायत से किन्तु अनियमित रूप से आते हैं। इसका फल पकने के पश्चात भी हरे रंग का रहता है। गूदा हल्के पीले रंग का रसदार, रेशा रहित, विशिष्ट सुगंध वाला व मीठा होता है। इसकी गुठली पतली व चौड़ी होती है। दशहरी: यह उत्तर प्रदेश की सर्वोत्तम किस्म मानी जाती है। इसका फल लम्बा व पकने पर छिलका हल्का पीला रंग का होता है। बाजार में इसकी अधिक मांग रहती है तथा मूल्य अधिक मिलता है। कुछ वर्षो से यह विदेशों में भेजी जा रही है। इसका औसत वजन 100 ग्राम है। चौसा: यह देर से पकने वाली, पीले छिलके की ठोस गूदेदार मीठी व चीनी सुगंध युक्त किस्म है। फल का आकार थोड़ा बड़ा व भार (150 ग्राम से 250 ग्राम तक) होता है। इसमें फल अनियमित रूप से आते हैं। फजली: इसका छिलका पकने पर हल्का हरा, गूदा ठोस व मीठा होता है। यह भी देर से पकने वाली किस्म है। फल का आकार बड़ा व औसत भार 400 से 700 ग्राम तक होता है। गुलाब ख़ास: फल छोटा तथा रंग आकर्षक होता है। इसकी सुगंध अति सुहानी एवं मीठी होती है। यह बिहार राज्य की मुख्य किस्मों में से है। जरदालु: यह अधिक उपज देने वाली किस्म है। फलों का आकार मध्यम, लम्बा और रंग सुनहरा पीला होता है। फल का स्वाद अत्यंत मीठा होता है। हिमसागर: यह बंगाल की प्रसिद्ध किस्म है। फलों का आकार लम्बा होता है। फलों का रंग पीला और फलन अच्छा होता है। फलों का भंडारण क्षमता अच्छी रहती है। हुस्नआरा: इस किस्म के फल मध्य आकार के और लम्बे होते हैं। फलों का रंग हल्का पीला होता है। गूदा हल्के पीला रंग का और मोठा होता है। रेशा बहुत कम और रस अधिक होता है। नीलम: यह एक अधिक फलनेवाली किस्म है, जो दक्षिणी भारत में दो बार फलती है। फल मध्यम आकार के होते हैं। यह दक्षिण भारत के व्यवसायिक और देर से पकने वाली किस्म है। इसमें दिवसीय फलन की समस्या नहीं है। स्वर्णरेखा: इसके फल मध्यम आकार के गोलाकार, चपटे आधारयुक्त और गहरे सिन्दुरी रंग के होते हैं। छिलका मध्यम मोटा, गूदा मुलायम, रेशाहीन और पीले रंग का होता है। फल मीठे रसयुक्त और सुगन्धित होते हैं। वह अगेती किस्म है। यह बहुत अधिक फलती है। इसके भण्डारण में समस्या नहीं है। मल्लिका: इसके फल मध्यम आकार के अच्छे स्वाद और सुवासयुक्त होते हैं। इसका रंग हल्का पीला होता है। फल दशहरी से भी देर से पक कर तैयार होता है। फलों को काफी दिनों तक सामान्य अवस्था में सुरक्षित रखा जा सकता है। यह किस्म गुच्छा रोग से प्रभावित होती है। आम्रपाली: यह आम की एक नई किस्म है, जो भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा दशहरी और नीलम के संकरण से सन 1979 में निकाली गई है। यह हर साल फल देती है और इसके पौधे बौने होते हैं। इसलिए यह किस्म भविष्य में भी सघन बागवानी के लिए अच्छी सिद्ध हो सकती है। इसमें सम्पूर्ण घुलनशील पदार्थ 22 प्रतिशत, सम्पूर्ण चीनी 17.2 प्रतिशत, अम्ल 0.12 प्रतिशत, विटामिन “सी” 35 मिग्रा./100 ग्राम और सम्पूर्ण केरोटिन वर्णाक 1683 मिग्रा./100 ग्राम पाये जाते हैं। पादप प्रवर्धन या वानस्पतिक प्रसारण आम का प्रवर्धन मुख्य रूप से दो विधियों से किया जाता है - बीज द्वारा: चुने हुए पके आम की गुठलियाँ इकट्ठी कर ली जाती है। इनको अच्छी तरह धो ली जाती है। इन गुठलियों को 15-25 सें.मी. ऊँची उठी हुई क्यारियों में 15 सें.मी. की दूरी पर 3-4 सें.मी. गहरी बो देते हैं। लगभग 15-20 दिनों में बीज जम जाता है। एक माह के बाद उन्हें दूसरे पौधशाला में लगा देना चाहिए। करीब दो वर्षो में पौधा रोपाई के लायक हो जाता है। कायिक विधियों द्वारा: बीज पौधों में मातृ वृक्षों के समान गुण नहीं आ पाते हैं। अत: एक समान पौधा प्राप्त करने के लिए कायिक विधियों का प्रयोग किया जाता है। कायिक विधि से आम का प्रवर्धन निम्नलिखित विधियों से किया जा सकता है – 1.गुटी बाँधना 2. ठंठ प्ररोह दाव लगाना 3.कलम बाँधना – (क) भेंट कलम बाँधना ईनारचिंग (ख) कलिकायन बडिंग उपरोक्त विधियों में वर्त्तमान समय में कमल भेंट बाँधना काफी महत्वपूर्ण है। खासकर व्यवसायिक एवं सफलता को ध्यान में रखकर यह विधि काफी अपनाई जा रही है जिसके कारण आम वृक्षों का प्रसारण आसानी से किया जा रहा है। भेंट कलम: बीज द्वारा तैयार किये गए एक से डेढ़ वर्ष की उम्र के पौधा को मूल वृक्ष के लिए उपयोग किए जाते हैं। इसकी इच्छित किस्म के वृक्ष को समान मोटाई व उम्र वाली शाखा से मिलाकर उपरोपित कर दिया जाता है। शाखा भाग उपरोपन के समय में अपने मातृ वृक्ष से संलग्न रहता है तथा मिलन के पश्चात ही उपरोपित स्थान से थोड़ा नीचे से अलग किया जाता है। इसी प्रकार मूल वृंत का ऊपरी भाग भी मिलन के पश्चात उपरोपित स्थान के ऊपर काट दिया जाता है तथा एक नया इच्छित जाति का आम का पौधा तैयार हो जाता है। मूल वृंत आधा सें.मी. से एक से.मी. तक की मोटाई का होना चाहिए। यदि शाखाएँ ऊपर है तो गमला मचान बनाकर रखना चाहिए। खर्च को कम करने के लिए मातृ वृक्ष की डाली को ट्रेंडकर नीचे झुका दिया जाता है। ताकि डाले भूमि के निकट रहे और मचान बनाने की आवश्यकता नहीं पड़े। शुष्क मौसम में गमलों में पानी देना अनिवार्य होता है। शाखा उपरोपन जुलाई से सितम्बर माह तक किया जाता है क्योंकि इस समय शाखाओं में रस बहुतायत से बहता है। इससे कटान के स्थान पर एधा की शाखाओं की शीघ्र वृद्धि होती है तथा दोनों काट आपस में संयुक्त हो जाते हैं। अधिक वर्षा वाले स्थानों में सितम्बर तथा कम वर्षा वाले स्थानों में जुलाई का महीना इस काम के लिए उपयुक्त है। मूल वृंत पर 20 से.मी. से 30 से.मी. की ऊँचाई पर 3 से 5 से.मी. लम्बी व 6 मिमी. से 8 मिमी. चौड़ी लकड़ी छाल सहित निकाल दी जाती है। इस काट की गहराई शाखा की मोटाई की एक तिहाई हो सकती है। मूल वृंत के समान शाखा पर भी काट बनाया जाता है तथा दोनों कटे भागों को मिलाकर मोमो कपड़े, सुतली या पोलीथिन की पट्टी बाँध देते हैं। इस प्रकार दो से तीन माह में मूल वृंत व शाखा आपस में जुड़ जाते हैं। तत्पश्चात वृंत का जोड़ से ऊपर वाला भाग तथा शाखा के जोड़ से नीचे वाला भाग दो या तीन बार में अलग कर लेना चाहिए। ईनारचिंग में सावधानी नया वानस्पतिक पौधा तैयार होने के पश्चात बंधी हुई सुतली अथवा कपड़े को थोड़ा ढीला कर देना चाहिए अन्यथा उपरोपित स्थान पर गहरे निशान पड़ जायेंगे और वृद्धि रुक जायेगी। जड़े हुए पौधों को कुछ सप्ताह तक छाया में रखना चाहिए। तत्पश्चात उन्हें धीरे-धीरे खुले में लाना चाहिए। वृंत तथा शाखा के सिरे बाहर की ओर न छोड़ना चाहिए। कटे हुए भाग पर मोम या कोल तार लगाया जा सकता है। शाखा को वृंत पर उलटा नहीं बाँधना चाहिए। इससे कमजोर या बे ढंगा पौधा बनता है। कलिकायन इसके लिए बीज पौधों को मूलवृंत के काम के लिए क्यारी में तैयार किया जाता है। एक वर्ष की आयु में ये पौधे कलिकायन के उपयुक्त हो जाते हैं। इसके लिए जुलाई या अगस्त माह उपयुक्त है। कली का चुनाव एक या दो वर्ष की आयु वाली शाखाओं से करना चाहिए। पत्तियों की कोख में कली पुष्ट तथा स्वस्थ दिखनी चाहिए। इन कली शाखों को काटने के पश्चात पत्तियाँ निकाल देना चाहिए तथा गीले कपड़े या मोम में लपेटकर रखना चाहिए। कली निकालकर वर्म विधि द्वारा वृंत में बैठा दी जाती है तथा केले के रेशे, रशियाँ इत्यादि से इस प्रकार बाँध देते हैं कि अंखुआ न ढंकने पाये। लगभग तीन सप्ताह में कली जुड़ जाती है तथा हरी रहती है और लगभग 6 सप्ताह बाद कली बढ़ना शुरू कर देती है। इस समय मूलवृंत के ऊपरी भाग को काट देना चाहिए। जुलाई माह में (कलिकायन) किये गये पौधे करीब एक साल में एक मीटर तक लम्बे हो जाते हैं तथा निश्चित स्थान पर लगाने योग्य हो जाते हैं। पौधा लगाने की विधि एवं समय आम के पौधे लगाने के लिए इच्छित स्थान पर एक मीटर लम्बे, चौड़े तथा गहरे गड्ढ़े मार्च या अप्रैल माह में 11 से 13 मीटर के अंतर पर खोदना चाहिए। लगभग एक माह पश्चात इसमें अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद 40 किलो, 2 किलो राख व 2 किलो हड्डी का चूर्ण मिट्टी में मिलाकर भरें। एक वर्ष हो जाने के पश्चात जुलाई अथवा अगस्त माह में पौधा सावधानी से गमले से निकालकर गड्ढे के बीचो बीच में सीधा लगायें। लगने के बाद तने के निकट मिट्टी को दबाएँ व पानी दें। पौधे अधिकतर जुलाई व अगस्त माह में लगायें जाते हैं किन्तु भारी वर्षा होने वाले स्थानों में सितम्बर अथवा फरवरी में लगाना उचित होगा। आम वृक्षों की देखभाल एवं खाद का व्यवहार करें आम के लिए बहुत कम उर्वरक परीक्षण किये गये हैं। अत: प्रत्येक क्षेत्र व भूमि में इसकी संस्तुती ठीक से कर पाना कठिन है। आम के पेड़ों को उनकी आयु के अनुसार सारिणी में दी गी खाद एवं उर्वरकों की मात्रा का प्रयोग गोविन्द वल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, पंतनगर के आम उद्यान में संतोषजनक पाया गया है। आम के लिए गोबर की खाद/उर्वरकों की मात्रा पौधे की आयु (वर्षो में) गोबर की खाद (कि.ग्रा.) नेत्रजन (कि.ग्रा.) स्फूर (कि.ग्रा.) पोटाश (कि.ग्रा.) 1 10 0.100 0.075 0.100 2 20 0.200 0.150 0.200 3 30 0.300 0.225 0.300 4 40 0.400 0.375 0.400 5 50 0.500 0.450 0.500 6 60 0.600 0.525 0.600 7 70 0.700 0.600 0.700 8 80 0.800 0.675 0.800 9 90 0.900 0.150 0.900 10 वर्ष एवं बाद 100 1.00 0.750 1.00 सबौर में किए गए परीक्षण के अनुसार दस वर्ष या इससे अधिक आयु के पेड़ों को 0.72 किग्रा. नेत्रजन, 0.18 किग्रा. स्फूर और 0.675 किग्रा. पोटाश प्रतिवर्ष प्रति पेड़ देना चाहिए। आम अनुसंधान केंद्र लखनऊ से 73 ग्राम नेत्रजन, 18 ग्राम फ़ॉस्फोरस तथा 68 ग्राम पोटाश प्रति पेड़ प्रतिवर्ष दस वर्ष की आयु तक बढ़ाकर प्रयोग करने की संस्तुती की गई है। सिंचाई आम की अच्छी उपज के लिए सिंचाई का बहुत महत्व है। नये पौधों में गर्मियों के दिनों में एक सप्ताह के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिए। उत्तर भारत में फलदार पेड़ों को अक्टूबर से दिसम्बर तक सिंचाई नहीं करनी चाहिए, परन्तु अगर सितम्बर में उर्वरक दिए गये हों तो एक सिंचाई कर देनी चाहिए, जिससे उर्वरक आसानी से पेड़ों को उपलब्ध हो सके। फूल आने के समय भी सिंचाई नहीं करना चाहिए क्योंकि एस समय आर्द्रता अधिक होने के कारण चूर्णी कवक का प्रकोप बढ़ जाता है। जाड़े में छोटे पौधों को पानी देते रहना चाहिए ताकि पाला का प्रकोप नहीं हो सके। सिंचाई की आवश्यकता मिट्टी के अनुसार करनी चाहिए। भारी मिट्टी कम एवं बलुआही मिट्टी में अधिक सिंचाई करनी चाहिए। ऐसे क्षेत्रों में जहाँ पाला पड़ता हो व लू चलती हो, पौधों को पाला से या लू से बचाने में सावधानी बर्तनी चाहिए। पौधे लगाने के बाद मूल वृंत पर निकलने वाले किस्में को समय-समय पर तोड़ते रहना चाहिए। गर्मी के दिनों में बाग़ की सिंचाई 7-10 दिनों के अंतराल पर और जाड़ों में 15-20 दिनों के अंतराल पर करनी चाहिए। मुख्य कीट रोग तना छेदक: यह तने में छेद करके अंदर की छाल को खा जाता है। परिणामस्वरूप शाखें सूख जाती हैं एवं वृक्ष कमजोर पड़ जाता है। छाल के समाप्त होने से वलयन का प्रभाव पड़ता है। छेद में थोड़ा पेट्रोल, तारपीन या मिट्टी का तेल रुई में भिंगोकर मलना चाहिए तथा चिकनी मिट्टी में बंद कर देना चाहिए। ऐसा करने से कीड़ा अंदर ही मर जाएगा। सूखी हुई डालों को काटकर जला देना चाहिए। मधुआ: यह छोटा सा सड़ने वाला कीड़ा है जो फल एवं पत्ती का रस चूसकर फसल को नष्ट कर पेड़ को कमजोर बना देता है। इससे फल कच्ची अवस्था में ही गिर जाते हैं। मधुआ फूलों पर एक चिपकने वाला मीठा पदार्थ छोड़ देता है जिससे सेचन-क्रिया में बाधा पहुँचती है तथा काली फफूंदी भी पनप जाती है। इसके आक्रमण से आधी फसल तक नष्ट हो जाती है। इससे बचाव के लिए इमीडाक्लोप्रीड 17.8 एस.एल. दवा का 1 मिली. चार लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। दूसरा छिड़काव एसीफेट 75 डब्लू.पी. का 0.5 ग्राम प्रति लीटर पानी के साथ करें एवं 15 दिनों बाद इसी दवा का तीसरा छिड़काव आवश्यकतानुसार करें। मिली बग (दहिया कीट): ये कीट चिपके गोल आकार के और पंखहीन तथा शरीर पर सफेद दही के रंग का पाउडर चिपका रहता है। ये कीट मुलायम डालों और मंजर वाले भाग में चिपके रहते हैं एवं उनसे लगातार रस चूसते रहते हैं। जिससे पौधों के आक्रांत भाग सूख जाते हैं और मंजर झड़ जाते हैं। इससे बचाव के लिए मई-जून में बगीचा की जुताई करनी चाहिए। कीड़ों को पेड़ों पर चढ़ने से रोकने के लिए पेड़ के तने पर जड़ से आधा मीटर की ऊँचाई पर 10 से.मी. चौड़ी आस्टिको ग्रीस की पट्टी या 20 सें.मी. चौड़ी पोलीथिन जमीन से ऊपर तने के चारो तरफ लपेट दें। ऐसा करने से कीट चिकनी सतह के कारण पेड़ों पर चढ़ नहीं पाते हैं। यदि कीड़े पेड़ों पर चढ़ गये हों तो डाइमेठेएट का 30 मिली. 30 लीटर पानी में घोलकर प्रति पेड़ की दर छिड़काव करें। हरदा रोग: पत्तियों पर छोटे-छोटे गोल लाल एवं पीले रंग के फफोले बनते हैं जो फटकर पत्तियों को क्षति पहुँचाते हैं। इससे बचाव के लिए मैन्कोजेब 75 घुलनशील चूर्ण का 2 ग्राम अथवा कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50 घुलनशील चूर्ण का 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर वृक्ष पर छिड़काव करें। दीमक: यह सफेद भूरे रंग का कीट होता है। यह आम के पौधों के जड़ को खाता है, जिससे पौधे सूख कर मर जाते हैं। इससे बचाव के उपाय प्रारम्भ में ही करना चाहिए। इसके लिए पौधे की जड़ में नीम की खल्ली या क्लोरोपाइरीफ़ॉस 20 ई.सी. का 2.5 मिली. प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर डालें। ब्लैक टीप रोग: यह बीमारी आम के उन बागों में पाई जाती है, जो ईट के भट्ठों के पास होते हैं। इस बीमारी में पहले फल का अग्र भाग काला पड़ने लगता है जो पीला पड़ता है फिर गहरा भूरा और अंत में काला हो जाता है। इससे बचाव के लिए फलों की बढ़वार की विभिन्न अवस्थाओं के दौरान आम के पेड़ों पर 0.5 प्रतिशत कपड़ा धोने वाले सोडे या बोरेक्स का छिड़काव करने से इस रोग का प्रसार रुक जाता है। मृदरोमिल रोग: बौर आने की अवस्था में यदि मौसम बदली वाला हो या बूंदा-बांदी हो रही हो तो यह बीमारी प्राय: लग जाती है। इस बीमारी के प्रभाव से रोगग्रस्त भाग सफेद दिखाई पड़ने लगता है। अंतत: मंजरियाँ एवं फल सूखकर गिर जाते हैं। इस बीमारी के लक्षण दिखाई पड़ते ही पेड़ों पर सल्फर 80 घुलनशील चूर्ण का 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। इसके अलावा प्रति लीटर पानी में 0.5 मिली. लीटर कैराथेन 80 ई. सी. घोल बनाकर छिड़काव करने से भी इस बीमारी पर नियंत्रण किया जा सकता है। अनियमित फलन आम की सभी व्यवसायिक किस्मों में अनियमित फलन की समस्या है। ये किस्में दो वर्ष में एक बार फूलती-फलती है। फलने के प्रमाण पिछले वर्ष की फसल पर निर्भर करता है। जिस वर्ष आम की अच्छी फसल होती है उसे फसली वर्ष कहते हैं। जिस वर्ष फल कम या बिल्कुल नहीं आती है, उसे निष्फल वर्ष कहते हैं। उत्तर भारत की लंगड़ा और बम्बई किस्में द्विवर्षीय या अनियमित रूप से फलती हैं। दूसरी किस्में, जैसे – चौसा और फजली मध्यम श्रेणी की द्विवर्षीय फलती हैं। दशहरी, हिमसागर और सफदर पसंद किस्में इस समस्या से कुछ कम प्रभावित हैं। इन किस्मों में फल प्रतिवर्ष आते हैं। कुछ शाखाएं एक वर्ष फलती हैं, तो कुछ दूसरी वर्ष आते हैं। देश में केवल दो-तीन किस्में ऐसी है, जो प्रतिवर्ष नियमित रूप से फलती हैं, वे किस्में हैं – नीलम, बंगलोरा, तोतापरी, रेड स्माल। ये दक्षिण भारत में अच्छी तरह पनपती है। अनियमित फलनेवाली व्यवसायिक किस्में जब फलों से लदी होती हैं, तो उसमें नये प्ररोह नहीं बनते हैं। फल तोड़ने के बाद ही उसमें नये प्ररोह निकलते हैं, तो उसमें अगले वर्ष फल नहीं आते हैं, फलस्वरूप एक वर्ष का अंतर आ जाता है और द्विवर्षीय फलन का प्रादुर्भाव होता है। अनियमित फलन के विषय में वैज्ञानिकों में काफी मतभेद है। कुछ लोगों का कहना है कि अनियमित फलन एक पैत्रिक गुण है। कुछ दूसरे वैज्ञानिकों का विचार है कि द्विवर्षीय फलन के मुख्य कारण है – नई वृद्धि में कमी तथा अपर्याप्त कार्बोहाइड्रेट में स्टार्च का विशेष महत्व है, जिसकी मात्रा अधिक होनी चाहिए। अनुसंधान कार्यों से यह पता चलता है कि फूल आने के लिए प्राराहों में ऑक्सीजन जैसे पदार्थो और निरोधक तत्वों की मात्रा अधिक तथा जिव्रेलिन जैसे पदार्थ की मात्रा कम होनी चाहिए। अभी हाल ही में इथरेल नामक दवा का प्रयोग समस्या के समाधान के लिए किया गया है, परन्तु दवा का विभिन्न क्षेत्रों में परीक्षण करने पर कुछ जगहों पर इसे सफलता मिली है। दवा का 200-250 भाग प्रति दस लाख भाग पानी में मिलाकर पुष्प कलिकाओं के बनने के पहले ही 12-15 दिनों के अंतर पर 4-5 छिड़काव करने पर फूल आने की संभावना बढ़ जाती है। छिड़काव सितम्बर माह में प्रारम्भ करनी चाहिए। उत्तर भारत में पुष्ट कलिकाएँ बनने का समय नवम्बर-दिसम्बर माह है। फलन एवं ऊपज उपज में द्विवार्षिक फलन की समस्या पाई जाती है। एक वर्ष वृक्ष में अधिक फल लगते हैं तो अगले वर्ष बहुत कम यह समस्या अनुवांशिक है। अत: इसका कोई बहुत कारगर नहीं है। विगत वर्षो में आम को कई संकर किस्में विकसित हुई है। जो इस समस्या से मुक्त है अत: प्रति वर्ष फल लेने के लिए संकर किस्मों को प्राथमिकता देनी चाहिए। आम के वृक्ष चार-पाँच साल की अवस्था में फलना प्रारम्भ करते हैं और 12-15 साल की अवस्था में पूर्ण रूपेण प्रौढ़ हो जाती है अगर इनमें फलन काफी हद तक स्थाई हो जाती है। एक प्रौढ़ वृक्ष से 1000 से 3000 तक फल प्राप्त होता है कलमी पौधे अच्छी देखभाल से 60-70 साल तक अच्छी तरह फलते हैं। स्त्रोत: कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंध अभिकरण (आत्मा), बिहार