केला पोषक तत्वों से भरपूर एक फल है। इसके उपयोग से बहुत सारी कुपोषण की समस्याएं दूर होती हैं एवं ऊर्जा भी प्राप्त होती है। विगत कई वर्षों से देश के विभिन्न केला उत्पादक राज्यों में समय के साथ विभिन्न प्रकार की समस्याएं आने लगी हैं। इसका सीधा प्रभाव केले के उत्पादन एवं गुणवत्ता पर पड़ रहा है। अधिक उत्पादन एवं गुणवत्तायुक्त फल प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है कि फसल की कटाई तक मासिक प्रबंधन प्रक्रिया वैज्ञानिक ढंग से की जाए। रोपाई पूर्व महत्वपूर्ण सुझाव क्षेत्रानुसार अनुशंसित प्रजाति का चयन करें। पौध सामग्री (टिश्यूकल्चर या प्रकन्द) स्रोत विश्वसनीय हों। पौध सामग्री उपचारित करके ही रोपाई करें। अनुशसित समय एवं दूरी पर रोपाई करें। प्रथम माह पौध लगाने के बाद इसके चारों तरफ की मिट्टी अच्छी तरह से दबा दें, जिससे अच्छा एवं शीघ्र विकास हो। बिना अंकुरित या सड़े हुए सकर्स की जगह गैप फीलिंग की प्रकिया कर प्रति इकाई पौध संख्या सुनिश्चित कर लें। हरी खाद के लिए लोबिया या लैंचा के बीज की बुआई इसी की शुरूआत में करें। अतिरिक्त आय के लिए कम अवधि वाली फसलें जैसे-मूंग, उड़द एवं सब्जियों की खेती अंत:फसल के रूप में ले सकते हैं। यह ध्यान रहे कि टमाटर, मिर्च एवं कबूवर्गीय फसलें अंत:फसल के रूप में न लें द्वितीय माह खरपतवार नियंत्रण के लिए दो पंक्तियों के बीच गुड़ाई करें एवं मिट्टी चढ़ा दें सका फ्यजेरियम विल्ट (उकठा) रोग से प बचने के लिए सुरक्षात्मक छिड़काव के रूप में 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव इस प्रकार करें कि पौध के साथ-साथ जड़ के पास मिट्टी में भी फफूंदनाशक पहुंच जाए। 30 ग्राम ट्राइकोडर्मा विरिडी 1 कि.ग्रा. कम्पोस्ट या एफवाईएम में मिलाकर पौधों के चारों तरफ मिट्टी में मिला दें, जिससे उकठा की समस्या को रोका जा सके। रोपाई के 30 दिनों के बाद 60 ग्राम यूरिया प्रति पौधा की दर से पौधों के चारों तरफ मिट्टी में मिला दें। तीसरा माह यदि सूत्रकृमि की समस्या दिखाई पड़े, तो 20-25 ग्राम कार्बोफ्यूरॉन प्रति पौधे की दर से पौधे के चारों तरफ मिट्टी में मिला दें। खेत की हल्की गुड़ाई कर खरपतवार का नियंत्रण करते रहें। उर्वरक की दूसरी खुराक रोपाई के 75दिनों बाद दें, जिसमें यूरिया 60 ग्राम वरी +सुपर फॉस्फेट 125 ग्राम +सूक्ष्म पोषक तत्व 25 ग्राम + मैग्नीशियम सल्फेट25 ग्राम प्रति पौधा उपयोग करें। चौथा माह फॉस्फोबैक्टेरिया 30 ग्राम + ट्राइकोडर्मा विरिडी 30 ग्राम 5 कि.ग्रा. एफवाईएम के साथ मिलाकर प्रति पौधा प्रयोग करें। यह ध्यान रहे कि कम से कम दो सप्ताह का अंतराल रासायनिक खाद एवं जैव उर्वरक के बीच होना चाहिए। 30 से 40 दिनों के अंतराल पर मात पौधे के आसपास उग रहे सकर्स की कटाई सामान्य रूप से करते रहें। कटे भाग के मध्य पर 2-3 मि.ली. केरोसिन तेल डाल दें। खेत का निरीक्षण करते रहें, यदि एक भी पौधा विषाणु से ग्रसित दिखाई पड़ता है, तो उसे अविलंब उखाड़कर नष्ट कर दें एवं कीटनाशक का छिड़काव कर रोगवाहक कीट को नियन्त्रित करें। फफूंदजनित और सिगाटोका रोग की समस्या से बचने के लिए पहला छिड़काव रोपाई के 120-125 दिनों बाद करें, जिसमें कार्बेण्डाजिम 1 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़कावकरें। पांचवां माह रोपाई के 125 दिनों बाद उर्वरक की तीसरी खुराक में यूरिया 60 ग्राम + सुपर फॉस्फेट 125 ग्राम प्रति पौधा प्रयोग करें। सुखी एवं ग्रसित पत्तियों को निकालकर जला दें या नष्ट कर दें। खुदाई एवं खरपतवार की सफाई सामान्य रूप से करते रहें। सिगाटोका रोग की समस्या से बचने के लिए दूसरा छिड़काव रोपाई के 150 दिनों के बाद करें, जिसमें प्रोपीकोनाजोल 1 मि.ली. प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। छठा माह गुड़ाई कर पौधों पर मिट्टी चढ़ा दें। सूखी एवं ग्रसित पत्तियों को निकालकर जला दें या नष्ट करने की प्रक्रिया करते रहें। रोपाई के 165 दिनों बाद उर्वरक की चौथी खुराक में 60 ग्राम यरिया +100 ग्राम पोटाश प्रति पौधा प्रयोग करें। पीली पड रही पत्तियां लौह की कमी का लक्षण है। इस कमी को दूर करने के लिए 0.5 प्रतिशत फेरस सल्फेट +1 प्रतिशत यूरिया के साथ चिपकने वाले पदार्थ का घोल बनाकर छिड़काव करें। जिंक की कमी को पूरा करने के लिए 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट + वेटिंग एजेन्ट के घोल का छिड़काव करें। बोरॉन की कमी को पूरा करने के लिए 0.5 प्रतिशत बोरेक्स का छिड़काव करें। सिगाटोका रोग की समस्या से बचने के लिए तीसरा छिड़काव रोपाई के 175 दिनों बाद करें। इसमें कम्पेनियम 1 ग्राम प्रति लीटर पानी मिलाकर छिड़काव करें। सातवां माह . रोपाई के 210 दिनों बाद उर्वरक की पांचवीं खुराक में यूरिया 60 ग्राम प्रति पौधा प्रयोग करें। सूखी पत्तियों की सफाई करते रहें एवं सिगाटोका रोग की समस्या से बचाव के लिए चौथा छिडकाव रोपाई के 200 दिनों बाद करें। इसमें ट्राइडमार्फ 1 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। मातृ पौधे के पास उग रहे सकर्स की कटाई की प्रक्रिया 25-30 दिनों केअंतराल पर करते रहें। आठवां माह फूल आने के बाद केवल एक स्वस्थ सकर्स को छोड़कर बाकी सभी सकर्स को पहले रैटून फसल के रूप में बढ़ने दें। गहर (घौद) में फल पूर्ण रूप से लग जाने के बाद अग्र भाग यानी नर पुष्प को काटकर अलग कर दें। 20 ग्राम पोटेशियम सल्फेट प्रति लीटर पानी में घोलकर गहर (घौद) पर अच्छी तरह से छिड़काव करें ऐसा करने से फलों की बढ़वार एवं गुणवत्ता अच्छी होगी। सिगाटोका रोग की समस्या से बचने के लिए पांचवां छिडकाव रोपाई के 230 दिनों बाद करें, जिसमें प्रोपीकोनाजोल 1 मि.ली. प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिडकाव करें। नवां माह रोपाई के 255 दिनों बाद उर्वरक की छठी खुराक में यूरिया 60 ग्राम एवं 100 ग्राम पोटाश प्रति पौधा व्यवहार करें। पोटेशियम सल्फेट का दूसरा छिड़काव पहले छिड़काव के 30 दिनों बाद करें। केले की खेती को तेज हवा से बचाने के लिए दो बांसों को आपस में बांधकर कैंची की तरह फलों के गुच्छों के बीच से लगाकर सहारा देते हैं। सिगाटोका रोग की समस्या से बचने के लिए छठा छिड़काव रोपाई के 250 दिनों बाद करें, जिसमें कम्पनियां 1 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। पौधों में गहर (घौद) आ जाने पर वे एक तरफ झुक जाते हैं। यदि उनका झुकाव पूर्व या दक्षिण की तरफ होता है, तो फल तेज धूप से खराब होजाते हैं। अतः केले के अयन को पौधे की ऊपर वाली पत्तियों से ढक देना चाहिए। अयन (घड़) में कुछ अपूर्ण हत्थे होते है, जो गुणवत्तायुक्त फल उत्पादन में बाधक होते हैं। ऐसे अपूर्ण हत्थों को अयन सेअविलंब काटकर हटा देना चाहिए। दसवां माह रोपाई के 300 दिनों बाद उर्वरक की सातवीं खुराक में यूरिया 60 ग्राम एवं पोटाश 100ग्राम प्रति पौधा उपयोग करें। पेड़ी फसल का चयन पेड़ी फसल के लिए पौधों का चयन करते समय साधारणत: 20-25 प्रतिशत केला बाहर निकलने पर अंकुरित पौधे निकालना बंद करें। 60-70 प्रतिशत केला बाहर निकलने पर जिस दिशा में फलों के तनों का गुच्छा है, उसकी विपरीत दिशा में सभी अंकुरित पौधे रखें। पौधे का चयन करते समय यह ध्यान रखें कि एक समान ऊंचाई व मोटाई वाला व तलवार जैसे पत्तों वाला अंकुरित पौधा पेड़ी फसल के लिए रखें व अन्य पौधों को काट दें। पेड़ी के लिए चुने हुए अंकुरित पौधों को तुरन्त फॉस्फोरस व पोटाश दें। सर्दियों में करें विशेष देखभाल सर्दी के मौसम में देश के विभिन्न हिस्सों जैसे-उत्तर एवं मध्य भारत में शीत लहर का प्रकोप होता है। इसके कारण पौधों की वृद्धि व विकास बाधित होता है। परिणामस्वरूप पौधों में पोटाश, मैग्नीशियम, लोहा व अन्य पोषण तत्वों की उपलब्धता की कमी के लक्षण दिखाई देते हैं। कम आयु वाले बगीचे के शीर्ष सफेद आते हैं व पत्तों का आकार काफी छोटा हो जाता है। थ्रोट चोकिंग की समस्या आती है व डंडी बाहर नहीं आ पाती है। ठंड के समय बगीचे में पानी का तनाव नहीं होने दें। बगीचे में ठंडी हवा न प्रवेश कर सके इसके लिए वायुरोधक फसल या ग्रीन शेड नेट का प्रयोग करें। अनुशंसित उर्वरक एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों को टपक सिंचाई प्रणाली द्वारा पौधों को दें। इसके लिए बड़े बगीचे में 5 कि.ग्रा. यूरिया, 6 कि.ग्रा. सफेद पोटाश, 1.5 कि.ग्रा. फॉस्फोरिक एसिड एवं 1 कि.ग्रा. मैग्नीशियम, सल्फेट प्रति एक हजार पौधे की दर से अत्यधिक ठंड के समय सप्ताह में एक बार अवश्य दें। छोटे पेडों में सूक्ष्म पोषक तत्व 30 ग्राम एवं 30 ग्राम फेरस सल्फेट 15 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। ठंड से पत्ते पीले व जलते हैं, परन्तु फरवरी में जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, बगीचे पुनः ठीक हो जाते हैं। फल की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए आठवें माह में 20 ग्राम पोटेशियम सल्फेट प्रति लीटर पानी में घोलकर गहर (घौद) पर अच्छी तरह से छिड़काव करें। इसके बाद स्र्कीटिग बैग से घौद को ढक दें। अन्य महत्वपूर्ण सुझाव अप्रैल, मई और जून में देश के कई राज्यों में ग्लोबल वार्मिंग के कारण तापमान में काफी वृद्धि होती है व आर्द्रता कम हो जाती है। इसके कारण अधिक क्षति की आशंका बनी रहती है। इसके प्रबंधन के लिए पौधे की रोपाई के समय परिवर्तन कर इस प्रकार रोपाई करें कि अप्रैल, मई और जून में फल कटाई का समय न आए। इसके अलावा बगीचे के चारों तरफ वायु अवरोधक के रूप में लैंचा लगाएं या ग्रीन शेड नेट का प्रयोग करें। बगीचे में पानी का तनाव न होने दें एवं प्रति पौधा पोटाश 350-400 ग्राम से कम न दें। स्त्राेत : खेती पत्रिका(आईसीएआर),अजीत सिंह,-वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख; मेघा विभूत-वैज्ञानिक (उद्यानिकी);कार्तिकेय सिंह-वैज्ञानिक (पौध संरक्षण); 'वैज्ञानिक (प्रसार); मोनिका जयसवाल-वैज्ञानिक (सस्य विज्ञान); भूपेन्द्र सिंह -कृषि विज्ञान केन्द्र बुरहानपुर (मध्य प्रदेश)।