महत्व केला, मूल रूप से एक उष्णकटिबंधीय फसल है। इसकी जड़ें उथली होने के कारण, इससे अधिक उत्पादन लेने के लिए प्रचुर मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। इसे लगभग 1 800-2,000 मि.मी. पानी की आवश्यकता प्रतिवर्ष पड़ती है। सर्दियों में 7-8 दिनों के अंतराल पर, जबकि गर्मियों में इसे 4-5 दिनों के अंतराल पर सिंचित किया जाना चाहिए। कुल मिलाकर केले की फसल को लगभग 70-75 सिंचाइयों की आवश्यकता पड़ती है। हालांकि, बारिश के मौसम में भी आवश्यकता पड़ने पर पौधों की सिंचाई की जानी चाहिए। केले की उच्च सघनता बागवानी में प्रति इकाई क्षेत्र में पौधों की संख्या काफी अधिक होती है। यह जल तनाव के लिए अत्यधिक सहिष्णु फसल है, इस कारण इसमें जल प्रबंधन एक विशेष महत्व रखता है। जल तनाव की स्थिति के परिणामस्वरूप कम उत्पादन और खराब गुणवत्ता वाली फसल प्राप्त होती है। केले के अधिक उत्पादन के लिए मृदा में अनुकुल नमी बनाये रखने की आवश्यकता होती है, जो कि एकीकृत जल प्रबंधन को अपनाने से संभव है। कीकृत जल प्रबंधन से आशय है'सिंचाई के लिए सिर्फ एक ही स्रोत पर निर्भर न होना। केले की वृद्धि और विकास के लिए जल जरूरी है, किन्तु लंबी अवधि व अधिक जलमांग होने के कारण इसके सम्पूर्ण जीवन काल में उपयुक्त नमी स्तर को खेत में बनाये रखना एक बड़ी चुनौती है। केले की फसल को मृदा जल तनाव से बचाने के लिए केवल सिंचाई पर निर्भर नहीं रहा जा सकता है। आवश्यकता है एकीकृत जल प्रबंधन को अपनाने की, जिसमें सिंचाई विधि, फसल की अवस्था, जल संरक्षण, सुरक्षात्मक सिंचाई व जल गुणवत्ता आदि को ध्यान में रखते हुए खेत में उचित नमी बनाये रखी जाती है। एकीकृत जल प्रबंधन का उद्देश्य एकीकृत जल प्रबंधन का मुख्य उद्देश्य फसल को जल तनाव से बचाना तथा मृदा में नमी को लंबे समय तक बनाये रखना है। इसके अंतर्गत निम्नलिखित बिंदु आते हैं: सिंचाई विधि मृदा की किस्म, ढाल आदि के आधार पर ऐसी सिंचाई विधि का चुनाव करें, जिसमें केले की फसल, जल का दक्षतापूर्ण उपयोग कर सके। यदि सम्भव हो, तो टपक सिंचाई विधि का प्रयोग करना चाहिए। इससे अधिक उपज प्राप्ति व जल की बचत होती है। केंद्र व विभिन्न राज्य सरकारों ने कृषकों की सुविधा के लिए टपक सिंचाई प्रणाली की स्थापना पर अनुदान देने की व्यवस्था (सारणी-2) की है। इसका लाभ किसान अपने जिले में स्थित कृषि विभाग से संपर्क कर प्राप्त कर सकते हैं। फसल अवस्था व जल मांग फसल को उसके विकास की किस अवस्था पर कितना जल चाहिए, इसका सम्पूर्ण ज्ञान कृषक को होना चाहिए, जिससे फसल को उसके जीवनकाल में कभी भी जल तनाव का सामना न करना पड़े। सारणी-3 में केले की विभिन्न विकास अवस्थाएं एवं उन अवस्थाओं पर प्रति पौधा जलमांग को दर्शाया गया है। गहरी जुताई बागान स्थापना से पर्व खेत में वर्षा आरंभ होने से पहले मोल्ड बोर्ड हल से गहरी जुताई अवश्य करनी चाहिए। इससे मृदा द्वारा जल का अवशोषण बढ़ता है, भू-जलस्तर सुधरता है और खेत में नमी लंबे समय तक बनी रहती है। केले की जल क्रांतिक अवस्थाएं जल क्रांतिक अवस्था फसल की ऐसी स्थिति होती है, जिसमें यदि फसल को जल न मिले तो उपज में सर्वाधिक गिरावटआती है। जब जल सीमित हो, तब केले में प्रारंभिक वानस्पतिक अवस्था, पुष्पनावस्था तथा फल बनने की अवस्था पर सिंचाई करना बहुत फायदेमंद होता है। लवणयुक्त जल का उपयोग सिंचाई के लिए लवणीय जल का प्रयोग करने से फसल व मृदा को क्षति पहुंचती है। ऐसे जल को अच्छी गुणवत्ता वाले पानी में मिलाकर पहले तनुकृत कर लें, इसके बाद सिंचाई के लिए उपयोग करें। टपक सिंचाई टपक सिंचाई जैसी कुशल सिंचाई प्रणाली द्वारा केले की जल उपयोग क्षमता में सुधार लाया जा सकता है। इसके परिणामस्वरूप केले के गुच्छों का जल्दी विकास होता है। ये गुच्छे 30-45 दिनों पहले परिपक्व हो जाते हैं। टपक विधि से सिंचाई करने पर 58-60 प्रतिशत पानी की बचत होती है और उपज में 15-30 प्रतिशत की वृद्धि होती है। इसके अलावा, टपक प्रणाली के माध्यम से पानी में घुलनशील उर्वरकों का भी उपयोग किया जा सकता है। पलवार भूमि पर बिछाई गयी सामग्री जैसे-फसल अवशेष, पॉलीथीन शीट आदि पलवार कहलाती हैं। ये भूमि की सतह से हो रहे वाष्पीकरण में प्रतिरोध पैदा करती हैं। वर्षा जल के अपवाह को रोककर अंत:स्पन्दन (जल को मृदा के अंदर पहुंचाना) में सहायता करती हैं। इससे जड़ क्षेत्र में नमी बनी रहती है। सारणी 1. टपक व कूड सिंचाई विधि का केले पर प्रभाव विवरण कूड (फर्रा) सिंचाई टपक सिंचाई अन्तर १. पौधे की ऊंचाई (सें.मी.) 153.66 169.94 +16.28 २ . पौधे की परिधि (सें.मी.) 60.39 71.28 +11 ३ .पत्तियों की औसत संख्या (प्रति पौधा) 34.11 35.29 +1.18 ४. फूलों की औसत अवधि (दिन) 342 310 -32 ५. कटाई की औसत अवधि (दिन) 433 397 -36 6. औसत वजन (कि.ग्रा.) 14 17 +3 7. उपज (टन/हैक्टर) 46.40 69.72 +23.32 8. प्रति हैक्टर उपज में वृद्धि (प्रतिशत) - 46 - 9. पानी की बचत (प्रतिशत) - 58-60 - सारणी 2. विभिन्न राज्यों द्वारा टपक सिंचाई पर दिया जाने वाला अनुदान क्र. योजना का नाम राज्य जिसके लिए लागू पात्रता एवं सब्सिडी प्रतिशत 1 प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना सभी राज्य लघु/सीमांत कृषक (55 प्रतिशत), अन्य कृषक (45प्रतिशत 2 राज्य सूक्ष्म सिंचाई योजना मध्य प्रदेश 80 प्रतिशत या अधिकतम 40000 रुपये 3 पर ड्रॉप मोर क्रॉप' सिंचाई योजना उत्तर प्रदेश लघु/सीमांत कृषक (90 प्रतिशत), अन्य कृषक (80प्रतिशत पांच हैक्टर क्षेत्रफल के लिए) 4 आंध्र प्रदेश सूक्ष्म सिंचाई परियोजना आंध्र प्रदेश अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लघु/सीमांत कृषक (100 प्रतिशत या अधिकतम 2,00,000 रुपये) अन्य सभी लघु/सीमांत कृषक (90 प्रतिशत या अधिकतम 2,00,000 रुपये) मध्यम जोत कृषक (70 प्रतिशत या अधिकतम 2,80,000 रुपये) 10 एकड़ से अधिक जोत वाले कृषक (50 प्रतिशत या अधिकतम 4,00,000 रुपये) 5 महा ठिबक सिंचन योजना महाराष्ट्र लघु और मध्यम कृषक (45-60 प्रतिशत) अन्य सभी कृषक (35-45 प्रतिशत) 6 तेलंगाना सूक्ष्म सिंचाई परियोजना तेलंगाना सभी अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के कृषक100 प्रतिशत) सभी पिछड़ी जाति के कृषक (90 प्रतिशत) अन्य सभी लघु व मध्यम कृषक (90 प्रतिशत) अन्य सभी जाति के किसान 80 प्रतिशत अनुदान के पात्र हैं। नोट : अधिकतम 12.5 एकड़ भूमि पर अनुदान देय सरणी 3. केले की विभिन्न अवस्थाओं पर जल मांग क्र.सं अवस्थाएं अवधि (सप्ताह) पानी की मात्रा (लीटर/पौधा) 1 पौध रोपण के बाद 1-4 4-6 2 किशोर अवस्था 5-9 8-10 3 क्रांतिक विकास अवस्था 10-19 12 4 कली विभेदन अवस्था 20-32 16-20 5 शूटिंग अवस्था 33-37 20-23 6 गुच्छ विकास अवस्था 38-50 24-28 सारणी 4. परंपरागत एवं उच्च सघनता बागवानी में अंतर क्र.सं. विवरण परंपरागत बागवानी उच्च सघनता बागवानी 1 . पेड़ों की संख्या 2500/हैक्टर 5200/हैक्टर 2 उपज कम (50-60 टन/हैक्टर) ज्यादा (75-80 टन/हैक्टर) 3 प्रबंधन कठिन काफी सरल 4 श्रमिक की जरुरत अधिक कम 5 उत्पादन लागत ज्यादा कम उद्यान विज्ञान विभाग, कृषि विज्ञान संस्थान, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी-221005 (उत्तर प्रदेश)