परिचय आडू शीतोष्ण जलवायु की प्रमुख फसल है। भारत में मुख्यत: उत्तरांचल, हिमाचल प्रदेश, जम्मूकश्मीर की ऊँची घाटियों एवं उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में इसका सफलतापूर्वक उत्पादन किया जाता है। देश में इसकी खेती लगभग 21605 हेक्टेयर क्षेत्रफल में की जा रही है जिससे लगभग 47426 मैट्रिक टन उत्पादन होता है। उत्तरांचल, आडू उत्पादन में अग्रणी प्रदेश है। प्रदेश में 13166 हेक्टेयर क्षेत्रफल में आडू की खेती की जा रही है जिससे लगभग 31715 मैट्रिक टन उत्पादन होता है। उत्पादकता 2.4 टन प्रति हेक्टेयर है। पर्वतीय क्षेत्रों में आडू का उत्पादन बहुत पहले से बाग़ बीजू किस्म के हैं, लेकिन बहुत से बाग़ बीजू किस्म के है, जिसके कारण फलत देर से तथा गुणवत्ता एवं उत्पादन निम्न स्तर का प्राप्त होता है। लेकिन पर्वतीय क्षेत्र की घाटियों में इसका अच्छा उत्पादन होता है तथा हाल के वर्षो में दिये गये महत्व से इस फसल के क्षेत्रफल एवं उत्पादकता में भी वृद्धि हुई है। अब तो पर्वतीय क्षेत्र की घाटियों से इस फल का निर्यात भी विदेशों में किया जा रहा है जिससे किसानों को अच्छी आमदनी हो रही है। घाटियों में यह ऐसे मौसम में पककर तैयार होती है जब ताजे फल बाजार में कम होते है। फल अच्छे स्वाद वाले एवं देखने में आकर्षक होने के साथ-साथ काफी समय तक टिकने वाले भी होते हैं। इसलिए घाटियों में आडू की बागवानी हेतु विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। प्रमाणित किस्मों का वानस्पतिक प्रसारण कर इनके व्यवसायिक कास्त को गर्म घाटियों में जहाँ सेब, खुबानी, चेरी की बागवानी नहीं हो सकती वहाँ बढ़ावा दिया जाय, जिससे कास्तकार अच्छी गुणवत्ता के साथ-साथ पैदावार भी कम समय में प्राप्त कर सकें। झारखंड में गुमला तथा लातेहार जिलों के पार क्षेत्र जहाँ पर शीतोष्ण जलवायु पायी जाती है, में सतालू की कम ठंड चाहने वाली किस्मों की खेती की जा सकती है। जलवायु शीतोष्ण तथा समशीतोष्ण जलवायु इसकी खेती के लिए सफल है। परन्तु वे क्षेत्र जहाँ पर देर से (बसंत ऋतु) में पाला पड़ता है। इसके लिए उपयुक्त नहीं माने जाते है। आडू की खेती मध्य पर्वतीय क्षेत्र, घाटी तथा तराई एवं भावर क्षेत्रों में की जाती है। विभिन्न किस्मों के अनुसार समुद्रतल से 750 मीटर तक की ऊँचाई के पठारी एवं 800-1815 मीटर समुद्रतल से ऊँचाई वाले पर्वतीय क्षेत्र उचित होते है। इसके सफल उत्पादन हेतु वातावरण में आर्द्रता की प्रतिशतता कम होनी चाहिए। सभी किस्मों में फलन के लिए 70 सेल्सियस या इससे कम का तापक्रम कुछ निश्चित घंटे के लिए आवश्यक है। इससे पौधों को समुचित अभिशीन (चिलिंग) मिलता है। फूल आने के समय वर्षा, पाला एवं ओला से इसकी खेती को काफी नुकसान होता है। भूमि हल्की दोमट अथवा बलुई दोमट भूमि इसके सफल उत्पादन के लिए उत्तम होता है। मिट्टी का पी.एच. मान 5.5-6.2 तक होना चाहिए, साथ ही काफी जीवांशयुक्त होना आवश्यक है। जिस भूमि में इसकी खेती की जा रही हो वहाँ जल निकास का समुचित प्रबंध होना बहुत जरूरी है अन्यथा पौधे जड़ सड़न से ग्रसित हो जाते है। प्रमुख किस्में आडू की उन्नत खेती के लिए आवश्यक है कि उत्तम किस्मों का चयन किया जाय जिससे अच्छी गुणवत्ता एवं अधिक पैदावार प्राप्त किया जा सके। परीक्षण के आधार पर चयनित किस्में निम्न प्रकार हैं। ऊँचाई वाले क्षेत्रों के लिए शीघ्र पकने वाली किस्मे- रेडजून, फ्लोरडासन, अलेक्जैन्डर। मध्य में पकने वाली किस्में – अर्ली एलवर्टा, क्रार्फोड अर्ली (तोतापरी), पैराडिलक्स, जे.एच.हेल्स। देर से पकने वाली किस्में – जुलाई अलवर्टा, रेड नेक्ट्रिन, गोल्डन क्रश। पाट, तराई एवं भावर क्षेत्रों के लिए शीघ्र पकने वाली किस्में – शान-ई-पंजाब, फ्लोरडाप्रिंस, सहारनपुर प्रभात, प्रताप। मध्य में पकने वाली किस्में – फ्लोरडा रेड, खुरमानी। देर से पकने वाली किस्में – शरवती परागण अधिकांश किस्मों में स्वयं परागण से फल बनते हैं, कुछ किस्में जैसे जे.एच.हेल्स, एवं अलेक्जेंडर की लिए परागणकर्ता किस्मों की जरूरत होती है। इन किस्मों के साथ एक ही समय पर फूलने वाली दो-तीन किस्मों को मिलाकर लगाना चाहिए। अर्ली एल्वर्ट एलवर्टा फलत उत्तम होती है एवं फल जून के मध्य में पकने लगते हैं। फल गोल कुछ अंडाकार मध्यम आकार के पकने पर लाल चित्तियाँयुक्त हल्का पीला होता है। गूदा काफी स्वादिष्ट तथा गुठली गूदे से आसानी से अलग नहीं हो पाती है। यह डिब्बाबंदी के लिए अच्छी किस्म है। अलेक्जैंडर फलत अच्छी होती है तथा फल जून के मध्य से पकना प्रारम्भ करते है, फल गोल तथा बड़े परिमध्य में पकने पर हल्का पीला हो जाता है। गूदा कुरकरा, रसीला, स्वादिष्ट एवं गुठली गूदे से लगी हुई होती है तथा आसानी से अलग की जा सकती है। पैराडिलक्स यह प्रजाति क्रोफोर्ड अर्ली का स्ट्रेन है। इसका पौधा मध्यम आकार का होता है। इसके फल जून के अंतिम सप्ताह में पककर तैयार होते हैं तथा प्रति वृक्ष उपज 30-40 कि.ग्रा. तक होती है। पैरीग्रीन इस प्रजाति में फलत अच्छी होती है तथा फल जून के मध्य में पक जाते हैं। फल गोल तथा मध्यम से बड़े आकार के होते है। पकने पर फल पीला हो जाता है तथा गूदा हल्का खटास लिए काफी मीठा होता है। गुठली आसानी से अलग हो जाती है। फ्लोरिडासन फलत अति उत्तम होती है तथा फल मई के प्रारम्भ में ही पक जाते हैं। फल गोल हल्का, अंडाकार एवं मध्यम आकार के पकने पर लाल चित्तियाँयुक्त गहरा पीला हो जाता है। गूदा रसीला काफी मीठा एवं गुठली आसानी से अलग हो जाती है। जे.एच.हेल्स फल जून के तृतीय सप्ताह में पक जाते हैं। फल कुछ अंडाकार, मध्यम गोल पकने पर लाल-पीला युक्त, गूदा हल्का खटास लिए होता है। गुठली आसानी से अलग हो जाती है। शान-ई-पंजाब यह प्रजाति मई माह के मध्य तक पककर तैयार हो जाती है। गूदा पीला और गुठली से आसानी से अलग से हो जाता है, यह डिब्बाबंदी के लिए उत्तम किस्म मानी गयी है। सहारनपुर प्रभात फलों का आकार बड़ा, छिलका हरापन लिए लाल रंग का होता है। फल अप्रैल के अंतिम सप्ताह में पकने लगते हैं। शरबती इस किस्म के फल जून के प्रथम सप्ताह में पकते हैं। फल मध्यम आकार का, छिलका पीलापन लिए सफेद होता है। फल के ऊपरी भाग पर लाली होती है। फल रसदार एवं मीठा होता है। औसत उपज 100-120 कि.ग्रा. प्रति वृक्ष होती है। प्रभात यह प्रजाति मध्य अप्रैल तक पक कर तैयार हो जाती है फल मध्यम गोलाकार रेड ब्लस, गूदे का रंग सफेद होता है। औसत उत्पादन 50 कि.ग्रा. प्रति वृक्ष होता है। प्रताप इसके फल अप्रैल माह के अंतिम सप्ताह में पक कर तैयार हो जाते हैं इसके पकने में लगभग 76 दिन लगते हैं। औसत उत्पादन लगभग 70 कि.ग्रा. प्रति वृक्ष होता है। फ्लोरडा प्रिंस यह प्रजाति फ्लोरडा (यू.एस.एस.) से आयातित की गई है। यह अप्रैल के अंतिम सप्ताह में पककर तैयार होती है पकने में 70 दिन लगते हैं। औसत उत्पादन 100 कि.ग्रा. प्रति वृक्ष होता है। फ्लोरडा रेड इसके गूदे का रंग सफेद एवं फ्रीस्टोन होता है। यह प्रजाति जून के प्रारम्भ में तैयार होती है इसके छिलके का रंग गहरा लाल होता है। खुरमानी यह प्रजाति जून के दूसरे पखवारे में पककर तैयार होती है। फल मध्यम आकार, जिसका औसत भार 70 ग्राम होता है। औसत उपज 100-120 कि.ग्रा. प्रति वृक्ष होती है। पौधा प्रवर्धन इसका व्यवसायिक रूप से प्रवर्धन कलम बंधन व कलिकायन (बडिंग) द्वारा किया जाता है। आडू के बीज को दिसम्बर-जनवरी में बुवाई कर मूलवृंत तैयार कर लिए जाते हैं। फिर इनमें भूमि की सतह से 15-20 सें.मी. ऊँचाई पर चीरा लगाकर नाव की शक्ल में 2 सें.मी. की सांकुर कलिका (बडवुड) मातृवृक्ष से लेकर चीरे में लगा दी जाती है तथा इसको 200 गेज पोलीथीन सीट से बांध दी जाती है। यह क्रिया सितम्बर-अक्टूबर में की जाती है। जब कलिका में बढ़वार प्रारम्भ हो जाये तो नियमित रूप से साइड सर्कस की पिचिंग करते रहना चाहिए जिससे सांकुर कलिका की बढ़वार अच्छी तरह हो सके। ऐसा करने से अगले वर्ष वांछित किस्म के क्लिकायित (बडेड) पौध क्लेफ्ट ग्राफ्टिंग विधि द्वारा फरवरी-मार्च में आडू के बीजू पौधे पर तैयार किये जाते है। इस विधि में भी आडू के बीज की बुवाई दिसम्बर-जनवरी में कर मूलवृंत तैयार की जाती है फिर अगले वर्ष फरवरी-मार्च में सांकुर (बड बुड) को मूलवृंत पर टंग ग्राफ्टिंग विधि से बाँधा जाता है। बादाम और खुबानी पर भी पेड़ अच्छे बनाये जा सकते हैं । पौधों की कीमत एवं उपलब्धता आडू के पौधे उद्यान विभाग के राजकीय उद्यानों एवं शोध संस्थानों, गो.ब. पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, पंतनगर एवं पर्वतीय परिसर, रानीचौरी तथा निजी पौधालय से प्राप्त किये जा सकते है। रेखांकन एवं रोपण प्राय: पर्वतीय क्षेत्रों में कन्टूर विधि से रेखांकन करके पौधे रोपित किये जाते हैं। सामान्य बागवानी के लिए 5 x 5 मीटर पौधे से पौधे व कतार से कतार की दूरी रखते हुए रेखांकन करते हैं। ग्यारह प्रतिशत परागण किस्म रोपण योजना को अपनाया जाता है इसमें बाग में हर तीसरी पंक्ति का हर तीसरा पौधा परागण किस्म का लगाया जाता है। यदि दो परागण किस्में बगीचे में लगानी हो तो वह एकान्तर लगाई जाती है (पहली परागण किस्म, पहली परागण किस्म की पंक्ति में तथा दूसरी किस्म अगली परागण किस्म वाली पंक्ति में) । सधन बागवानी में पौध रोपण 3 x 3 मीटर की दूरी पर करते हैं। रेखांकन वर्गाकार विधि से करते हैं। गड्ढे का आकार 1 x 1 x 1 मीटर रखते हैं। गड्ढे को भरने से पूर्व उसमें घास-फूस जलाकर उपचारित कर लेते है। एक गड्ढे में 40-50 कि.ग्रा. अच्छी तरह सड़ी गोबर की खाद, 500 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट, 50 ग्राम मैलाथयान धूल, 50 ग्राम फफूंदीनाशक अच्छी तरह मिट्टी में मिलाकर गड्ढे को भूमि से 10 सें.मी. ऊपर तक भर देना चाहिए। गड्ढा भरने के पश्चात उसकी सिंचाई करें अथवा अच्छी तरह थाला बनाकर वर्षा के जल से गड्ढे को दबने दें। जनवरी/फरवरी माह में पौधों का रोपण करें, पौधों की पूरी जड़ गड्ढे के अंदर होनी चाहिए तथा कलम बंधन के जुड़ाव वाली भाग भूमि से 15-20 सें.मी. ऊपर होना चाहिए। पौधों को रोपण से पूर्व डाइथेन एम-45 के 0.3 प्रतिशत के बाद देनी चाहिए। फास्फोरस तथा पोटाश शाखाओं के फैलाव क्षेत्र में भूमि में 15-20 सें.मी. गहरी चौड़ी नालियाँ बनाकर देना चाहिए। नाईट्रोजन तथा गोबर की खाद पौधे के फैलाव के अनुसार छिड़ककर भूमि में भली भांति मिला दें। घाटी, तराई एवं भावर क्षेत्र में नाइट्रोजन की 70 ग्राम, फास्फोरस की 40 ग्राम तथा पोटाश की 40 ग्राम मात्रा प्रति पौधा प्रति वर्ष की आयु के अनुसार देना चाहिए। यह मात्रा 6 वर्ष बाद स्थिर कर देना चाहिए। खाद एवं उर्वरक की संपूर्ण मात्रा दिसम्बर/जनवरी में देना चाहिए। फलदार वृक्ष में फल तोड़ने के पश्चात नाइट्रोजन प्रति वृक्ष अतिरिक्त देना चाहिए। सिंचाई, गुड़ाई एवं नमी संरक्षण जहाँ पानी की पर्याप्त व्यवस्था हो, फल लगने के पश्चात आवश्यकतानुसार सिंचाई करनी चाहिए। थॉवलों की निराई-गुड़ाई करके खरपतवार निकालते रहना चाहिए। पर्वतीय क्षेत्रों में नमी संरक्षण हेतु पलवार (मल्चिंग) का प्रयोग मार्च-अप्रैल से जून तक करना चाहिए। खाद एवं उर्वरक को मिलाते समय थॉवलों की अच्छी तरह गुड़ाई करनी चाहिए। नये लगे बाग़ में यदि पानी की सुविधा उपलब्ध है तो गर्मी में आवश्यकतानुसार पानी देना चाहिए जिससे पौधा सूखने न पायें। सधाई एवं कटाई-छंटाई पौधे का मजबूत ढांचा तैयार करने के लिए सधाई क्रियाएँ की जाती है । पहले वर्ष मुख्य तने पर तीन-चार शाखाएँ चुनी जाती हैं। दूसरे वर्ष पेड़ की आकृति में संतुलन लाने के लिए सभी मुख्य शाखाओं से दो-तीन उपशाखाओं को निकलने देते हैं। तीसरे वर्ष भी इन उपशाखाओं से पुन: दो-दो उपशाखाओं को निकालते हैं। चौथे वर्ष हल्की छंटाई करके केवल एक दूसरे से रगड़ती हुए एवं रोगग्रस्त शाखाओं या टहनियों को ही काटकर अलग करते रहना चाहिए। इस आयु में पेड़ से फलत होने लगती है तथा बाद की कटाई छंटाई व सधाई मजबूत ढांचा बनाने एवं फलत को बढ़ाने हेतु की जाती हैं। आडू के पौधों की सधाई दो विधियों से की जाती है। इसमें खुला मध्य विनयम विधि प्रयोग की जाती है। इस विधि में पौध रोपण के बाद मुख्य तनों को 45-60 सें.मी. पर काट देते हैं और 3 से 5 टहनियां रखी जाती है, इनकी आपस की दूरी 3-5 सें.मी. रखते हैं। दूसरी विधि रूपांतरित अग्रप्ररोह प्रणाली है। इसमें मुख्य तनों को एक मीटर पर काटते हैं। आडू में एक वर्ष पुरानी शाखाओं पर फल आते हैं एवं पेड़ के ऊपरी तिहाई भाग में सबसे ज्यादा फलत होती है। अत: प्रत्येक वर्ष पिछली वृद्धि की हुई न फलने वाली शाखाओं की काट-छांट करना आवश्यक है। जिससे नई फल बनने वाली शाखाएं निकलें। ऐसी शाखाओं के ऊपर लगभग एक तिहाई भाग काट देना चाहिए। पेड़ के अंदर की ओर जाने वाली टहनियों, रोगग्रस्त, कमजोर शाखाओं तथा अवांछित शाखाओं को काट कर अलग कर देना चाहिए। कटी हुई शाखा के पास वाली कली बाहर की ओर हो जिससे पौधों की बढ़वार बाहर की ओर हो सके। कटाई-छंटाई में सावधानियाँ 1. काट-छांट संस्तुत विधियों से उचित समय पर करें। 2. काट-छांट करने वाले व्यक्ति अनुभवी होना चाहिए। 3. प्रत्येक वर्ष काट-छांट करने वाले व्यक्ति को न बदलें। 4. काट-छांट करने वाले औजार तेज धार वाले हों, ताकि काटने पर ठूंठ न रहे। 5. काट-छांट के बाद कॉपर आक्सीक्लोराइड (600 ग्राम प्रति 200 ली. पानी में) के घोल का छिड़काव करें। 6. बड़े-कटे भागों पर चौबटिया पेस्ट (1 भाग कैल्सियम कार्बोनेट + एक भाग रेड लेड + सवा भाग अलसी का तेल) लगाना चाहिए। प्रमुख कीट एवं व्याधियां पत्ती मोड़कर मांहू (लीफ कर्ल एफिड) इस कीट का प्रकोप फरवरी-अप्रैल के मध्य होता है। इसके शिशु एवं वयस्क पेड़ों की पत्तियाँ से रस चूसते हैं, जिस कारण पत्तियाँ मुड़ जाती हैं और बाद में पीली पड़कर गिर जाती हैं। मुड़ी हुई पत्तियों को खोलने पर अंदर से हरे रंग के मांहू दिखाई देते हैं। ग्रसित पेड़ों पर फलों का विकास रुक जाता है और बाद में गिर जाते हैं। सफेद शल्क कीट (हवाइट स्केल कीट) पेड़ों को टहनियों, शाखाओं एवं तनों पर पीले रंग के शिशु व वयस्क पाये जाते हैं तथा स्थिर होकर इनका रस चूसते हैं। परिणामस्वरूप ग्रसित भाग सूखने लगता है और पेड़ की बढ़वार रुक जाती है तथा फलत पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। पत्ती मोड़क बीमारी (लीफ कर्ल डिजीज) रोगग्रस्त पत्तियाँ किनारे से मुड़ जाती हैं। पत्तियाँ मोटी, माँसल तथा लाल रंग की हो जाती हैं। उस अवस्था में पत्तियों की जड़ों में गोंद निकलने लगता है तथा पत्तियाँ सूख जाती हैं। गोंद निकलने की बीमारी (गमोसिस) वर्षा ऋतु में इसका प्रकोप सर्वाधिक रहता है। ग्रसित फलों, टहनियों एवं शाखाओं में गोंद निकलने लगता है। ग्रसित फलों का बाजार में उचित मूल्य नहीं मिलता जबकि ग्रसित पेड़ों की बढ़वार रुक जाती है। आडू का एक्स बीमारी (पीच एक्स डिजीज) मई के प्रारम्भ में आडू के पेड़ों की पत्तियों पर रोग के प्रथम लक्षण दिखाई देते हैं। पत्तियों का रंग धीरे-धीरे पीला हो जाता है। साथ ही पत्तियों पर लाल रंग के धब्बे बन जाते हैं। अंत में रोगग्रस्त पत्ते लाल रंग में परिवर्तित हो जाते है। रोगग्रस्त पौधे व टहनी की पत्तियों का लम्बाई में ऊपर की ओर मुड़ जाना भी रोग का प्रमुख लक्षण है। पत्ते की धमनियां भी लाल-पीले रंग की हो जाती है। पौधों में लक्षण अधिकतर किसी एक टहनी या कुछ ही टहनियों तक सीमित रहते हैं। एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन जनवरी माह में प्रुनिंग (कटाई-छंटाई) करते समय कीट/रोग ग्रस्त सूखी शाखाओं को काट-छांट कर जला दें तथा चौबटिया पेस्ट का लेप करें। इसके बाद लाइम सल्फर 1:20 के अनुपात में छिड़काव करें ताकि डाई बैंक, फल सड़न एवं स्कैब का नियंत्रण हो सके। फरवरी माह में आडू को 3-4 दिनों पर सर्वेक्षण करते रहें तथा गुलाबी कली अवस्था (फूल खिलन के पहले) आने पर मिथाइल डिमेटान की 1.5 मि.ली. मात्रा + बावेस्टीन की एक ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर पेड़ों पर छिड़काव करें। इस उपचार से आडू में पत्ती मोड़क माँह (लीफ कर्ल एफीड) तथा पत्ती मोड़क रोग (लीफ कर्ल बीमारी) का प्रकोप नहीं होता है उपरोक्त कीट एवं रोग के नियंत्रण में छिड़काव करने का समय बहुत महत्वपूर्ण होता है। अत: समय से छिड़काव करें। मार्च माह में पेड़ों के थॉवलो में चारों तरफ दो इंच मोटी सड़ी गोबर की खाद फैला दें। जिससे गर्मी में नमी संरक्षित की जा सके। जून में थॉवलों की हल्की गुड़ाई करके गोबर की खाद को मिला दें। मई माह में आडू बाग़ का सर्वेक्षण करते रहें। जब आडू में एक्स रोग के लक्षण दिखाई देते हैं। एन्टीबाईटिक आक्सीटैट्रासाइक्लीन, हाइड्रोक्लोराइड दवा 1 से 2 ग्राम प्रति वृक्ष के हिसाब से टीके के रूप में पौधे के अंदर डालना चाहिये। भूमि सतह से लगभग 30 सें.मी.ऊपर चारों ओर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर 45 डिग्री. कोण के लगभग 6 से 8 मि.मी. दायरे के क्षेत्र में वर्मे की सहायता से छेद करें और थोड़े से पानी (10 से 20 मि.ली.) में दवा का मिश्रण बूंद-बूंद कर डालें। यह टीके फल तोड़ने के बाद और पत्ते झड़ने के मध्य समय में लगाये जाते हैं। इस बीमारी का फैलाव लीफ हापर द्वारा होता है। उनके नियंत्रण के लिए मोनोक्रोटोफास 0.04 प्रतिशत का छिड़काव करना चाहिए। रोगग्रस्त भाग या पौधे को बाग़ से काट कर नष्ट कर देना चाहिए। जून-जुलाई माह में गमोसिस के नियंत्रण हेतु 25 दिनों के अंतराल पर कॉपरआक्सीक्लोराइड 0.3 प्रतिशत + बोरेक्स 0.3 प्रतिशत (3 + 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर) के घोल का दो छिड़काव करें। दूसरा छिड़काव फल तोड़ने के 20 दिन पहले अवश्य समाप्त कर लें। जुलाई से अक्टूबर माह के मध्य स्केल कीट का प्रकोप अधिक होता है। अत: इस अवधि में उद्यान की निगरानी करें तथा ग्रसित पत्तियों को काटकर जला दें। प्रकोप अधिक होने की अवस्था में मिथाइल डिमेटान 0.04 प्रतिशत (1.5 मि.ली. प्रति लीटर में मिलाकर) का छिड़काव करें। अक्टूबर माह में बगीचे का खुदाई कर थॉवले बना दें। थॉवलों में सड़ी गोबर की खाद 30-40 कि.ग्रा. प्रति वृक्ष की दर से डालें। थॉवलें बनाते समय जड़ के पास मिलने वाली सुंडियो/कीटों को एकत्रित कर नष्ट करे दें। उद्यान में पूरे वर्ष उन्नत शस्य क्रियाओं को अपनाकर सफाई बनायें रखें तथा समय-समय पर निगरानी कर कीट-व्याधियों का स्तर देखते रहे, इसे पौध सुरक्षा उपायों को अपनाने में सहायता मिलेगी। फलों की तुड़ाई आडू के ताजे फलों को खाने के लिए वृक्ष तोड़कर निकट अथवा दूर के बाजारों में भेजना पड़ता है। विदेशी मुद्रा अर्जित करने के उद्देश्य से उनका निर्यात भी किया जाता है। आडू के परिपक्व फलों को ही तोड़ना चाहिए। अपरिपक्व फल स्वाद रहित होते हैं और क्रेताओं द्वारा पसंद नहीं किये जाते हैं। फलत: उत्पादकों को इनके अच्छे मूल्य न मिलने के कारण आर्थिक हानि उठानी पड़ती है। इसके विपरीत अधिक परिपक्व हो जाने पर जब इनको वृक्षों से तोड़ा जाता है तो इनकी भण्डारण क्षमता भी कम हो जाती है। आडू को दूर की मण्डियों में उनके वांछित मूल्य प्राप्त करने के लिए उनको ठीक समय पर तोड़कर विक्रय हेतु भेजा जाना चाहिए। आडू के फल के सतह का रंग जब हरे से पीले या गुलाबी में बदलने लगे तथा छूने पर हल्का नरम लगे, उस समय दूर की मंडियों के लिए तोड़कर भेजना चाहिए। निकट के बाजारों एवं मंडियों के लिए उस समय तोड़ना चाहिए, जब फल का रंग पूरी तरह हरे से पीले या गुलाबी में बदल जाए। आडू के पौधों में सभी फल एक साथ नहीं पकते है। इसलिए तीन-चार बार में तोड़ना चाहिए। फलों की ग्रेडिंग, पैकिंग एवं भंडारण जिस प्रकार फल की तुड़ाई में परिपक्वता का महत्व है, उसी प्रकार से रंग एवं आकार के आधार पर श्रेणीकरण अत्यंत आवश्यक है। क्योंकि उचित प्रकार से श्रेणीकृत फल बाजार में न सिर्फ उद्यानपति की शाख बढ़ाता है, बल्कि इसकी बिक्री से अधिक लाभ मिलता है। साथ ही साथ बाजार में उपभोक्ता भी उसकी तरफ आकर्षित होता है। पैकिंग से पूर्व चोट खाये, रोगग्रस्त, अपरिपक्व एवं बहुत छोटे फलों को छांट लेते हैं। आडू को मुख्य रूप से आकार के अनुसार श्रेणीकरण किया जाता है। फलों को बड़े, मध्यम एवं छोटे आकार में श्रेणीकृत कर लेते हैं। फलों को निर्यात करने या दूर की मंडियों में भेजने के लिए श्रेणीकृत फलों को दो-तीन विभिन्न क्षमता वाले सी.एफ.बी. बाक्सों में पैक कर भेजना चाहिए। निकट के मंडियों में पूर्ण पके हुए फलों को बाँस की टोकरी या लकड़ी के बक्सा में भेजा जा सकता है। आडू के फल सी.एफ.बी. बक्सों में अच्छी तरह पैक कर 0-3 डिग्री सेल्सियस तापमान एवं 85-90 प्रतिशत अपेक्षित आर्द्रता पर 20-25 दिन तक रखा जा सकता है। आडू उत्पादन का आय-व्यय विवरण आडू उद्यान स्थापित करने में खेत की तैयारी, पौध रोपण, गड्ढे का खुदान, खाद एवं उर्वरक का प्रयोग, कीट/फफूंदीनाशी रसायनों एवं उद्यान में अन्य कर्षण क्रियाओं पर बाग़ स्थापना करने के समय से फल आने तक (चार वर्षो तक) लगभग रु. 35,000/- प्रति हैक्टेयर व्यय होता है। आडू के कलमी पौधों में चौथे वर्ष से फलत शुरू हो जाती है। प्रारम्भ में उत्पादन लगभग 8 से 10 कि.ग्रा. प्रति वृक्ष (3200 से 4000 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर) होता है। उद्यान स्थापना के चौथे वर्ष यदि उत्पादन रु. 10/- प्रति कि.ग्रा. की दर से बिकता है, तो उद्यानपति को रु. 32,000/- प्राप्त होगा। चौथे वर्ष के बाद उत्पादन क्रमश: बढ़ता जायेगा जबकि व्यय कम होगा। इस प्रकार उद्यानपति को पाँचवें वर्ष से आडू से आय प्राप्त होना शुरू हो जाएंगा। आडू उत्पादन में ध्यान देने योग्य बातें बाग़ स्थापना हेतु स्वस्थ, कीट एवं व्याधि से मुक्त उन्नतशील प्रजाति के कायिक प्रवर्धन द्वारा तैयार पौधों का चयन करें। पौध रोपण करते समय इस बात का ध्यान रखें कि सांकुर शाखा का भाग भूमि समह से नीचे न आने पाएँ। आवश्यकतानुसार परागणकर्ता किस्मों का रोपण उद्यान में अवश्य करें। उद्यान में परागण हेतु मधुमक्खियों के 4-5 बक्से उचित स्थान पर रखें। ग्रीष्म ऋतु में नवरोपित पौधों की सिंचाई करते रहें। मार्च माह में पौधों के थावलों में अवरोध पर्त् का प्रयोग आवश्यक करें। पेड़ों की कटाई-छंटाई के उपरांत चौबटिया पेस्ट का प्रयोग अवश्य करें। आडू के बगीचों में वर्षभर अपनाये जाने वाले मासिक कार्य का विवरण जनवरी रोपण से पूर्व गड्ढों को बावेस्टीन 0.2 प्रतिशत या डाइथेन-जेड-78 (0.3 प्रतिशत) से मिट्टी को उपचारित करें तथा 40-50 कि.ग्रा. गोबर की खाद + 500 ग्राम सुपरफास्फेट + 50 ग्राम मैलाथियान धूल मिला कर गड्ढे को पुन: भर दें। पौध रोपण कार्य करें तथा रोपण उपरांत सिंचाई करें। बड़े पेड़ों की कटाई-छंटाई का कार्य करें तथा चौबटिया पेस्ट लगायें। मूलवृन्तों पर टंग ग्राफ्टिंग करें। पुराने बाग़ में यदि लाइकेन बीमारी का प्रकोप हो, तो कास्टिक सोडा 1.0 प्रतिशत (10 ग्राम प्रति लीटर पानी) का छिड़काव करें। फरवरी उर्वरकों का प्रयोग करें। ग्राफ्टिंग का कार्य यदि जनवरी माह में न हुआ हो तो करें। पौध रोपण का कार्य यदि जनवरी माह में न हुआ हो तो करें। रोपित पौधों में सिंचाई करें। आडू के पत्ती मोड़क कीट के नियंत्रण हेतु मिथाइल डिमेटान 0.04: का छिड़काव करें। मार्च आडू के बाग़ में कर्षण क्रियाओं द्वारा सफाई रखें। थावलों में पलवार का प्रयोग करें। नवरोपित पौधों की सिंचाई करें। अप्रैल बागीचे में नमी बनायें रखें। आडू के प्रवर्धित पौधों में पिंचिंग कार्य करें। जिन पौधों में मल्चिंग या पलवार न किए हों, उसमें करें। नवरोपित पौधों में सहारे की आवश्यकता हो, तो उनमें सहारा दें। मई पौधालय एवं बाग़ में नमी बनाये रखें। बाग़ को साफ़ रखें। परिपक्व फलों की तुड़ाई कर विपणन कार्य करें। जून आडू पौधों के थावलों में बिछाई गई पलवार को मिट्टी में मिला दें। आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहें। फलों की तुड़ाई, ग्रेडिंग, पैकिंग एवं विपणन कार्य करें। जुलाई फलों की तुड़ाई एवं विपणन कार्य करें। उद्यान में उगी घासों की पलटाई करें। आडू के बाग़ को स्वच्छ बनाये रखें। कीटों एवं बीमारियों की बाग में निगरानी करते रहें एवं नियंत्रण हेतु आवश्यकतानुसार दवाओं का प्रयोग करें। अगस्त उद्यान की सफाई करें। यदि घासों की पलटाई जुलाई में नहीं हुई है, तो इस माह अवश्य करें। सितम्बर पौध प्रवर्धन के लिए बडिंग कार्य करें। अक्टूबर मूलवृंत तैयार करने के लिए परिपक्व बीजों को एकत्र करें। बागीचे की सफाई करें। नवम्बर मूलवृंत तैयार करने के लिए परिपक्व बीजों की बुवाई करें। आडू के बाग़ की खुदाई का कार्य करें। नये बाग़ की स्थापना के लिए रेखांकन कार्य करें। रोपण हेतु गड्ढे की खदाई करें। दिसम्बर आवश्यकतानुसार कटाई-छंटाई का कार्य करें तथा कटे भाग पर चौबटिया पेस्ट का लेप करें। पौध रोपण हेतु गड्ढे भरने का कार्य करें। स्त्रोत एवं सामग्रीदाता : समेति, कृषि विभाग , झारखण्ड सरकार