भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल (329 मिलियन हैक्टर) का 131 मिलियन हैक्टर (37 प्रतिशत) अर्द्धशुष्क जलवायु के अंतर्गत आता है। अर्द्धख्य रूप से उत्तर-पश्चिमी भारत में तथा कुछ भाग दक्षिणी भारत में फैला हआ है। भारत में सबसे ज्यादा अर्द्धशुष्क परिस्थितियां महाराष्ट्र (19 प्रतिशत), कर्नाटक (15 प्रतिशत), आंध्र प्रदेश (15 प्रतिशत), राजस्थान (13 प्रतिशत), गुजरात (9.50 प्रतिशत), तमिलनाडु (10 प्रतिशत), उत्तर प्रदेश (7 प्रतिशत) एवं मध्य प्रदेश (6 प्रतिशत) में हैं। अर्द्ध शुष्क क्षेत्रों की मुख्य समस्याएं जैसे-नमी की कमी, खराब मृदा और पानी की गुणवत्ता आदि हैं। इन क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा 300-750 मि.मी. तथा कल वाष्पीकरण 2-3 गुना ज्यादा होता है। गर्मी के महीनों (मई-जून) में अत्यधिक गर्मी के साथ तापमान 44 से 50 डिग्री सेल्सियस तक हो जाता है। इन क्षेत्रों के लिए उपयुक्त फलदार पौधे अजैविक तनाव के प्रति सहिष्णु होने चहिये। किस्मों का चयन अर्द्धशुष्क क्षेत्रों के लिए फलदार पौधे और उनकी किस्मों का चयन बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है। इनका चुनाव करते समय निम्न बातों को ध्यान में रखना चाहियेः पौधे गहरी जड़ों वाले होने चाहिए गर्मियों के दौरान सुषुप्तावस्था में रहने चाहिए कम पानी से अच्छी गुणवत्ता वाले फलों का उत्पादन दे सकें मानसून की बारिश के बाद फूल व फल लगने वाले होने चाहिए लवणता और क्षारीयता के प्रतिरोधी होने चाहिए। अर्द्धशुष्क क्षेत्रों के लिए उपयुक्त फलदार पौधे और उनकी किस्में सारणी-1 में दर्शाई गयी हैं। सारणी 1. अर्द्धशुष्क क्षेत्रों के लिए उपयुक्त फलदार पौधे और उनकी किस्में क्र.स. फल किस्में 1 आम केसर, राजापुरी, लंगड़ा, दशहरी, मल्लिका, हाफूस 2 चीकू क्रिकेट बाल, काली पत्ती, भूरी पत्ती 3 आंवला चकैया, बनारसी, एन.ए.-7, गोमा ऐश्वर्या, आनंद-2 4 बेर गोला, गोमा कीर्ति, उमरान, थार सेविका, थार भूमिराज 5 बेल गोमा यशी, थार नीलकंठ, थार दिव्य, सी.आई.एस.एच. बेल-1,एन.बी.-5, एन.बी.-9, पंत सुजाता, पंत उर्वशी, पंत अपर्णा 6 इमली गोमा प्रतीक, पी.के. एम.-1 7 जामुन गोमा प्रिंयका, थार क्रांति, पारस, राय जामुन 8 अंजीर पूना फीग, दिनोंकर, दियाना, एक्स्केल 9 लसोडा थार बोल्ड, मरु समृद्धि, पुष्कर लोकल 10 शहतूत थार लोहित, थार हरित, चाइना व्हाइट 11 करौंदा थार कमल, पंत मनोहर, पंत सुदर्शन, पंत स्वर्ण, कोंकण बोल्ड 12 खिरनी थार ऋतुराज 13 फालसा थार प्रगति 14 महुआ थार मधु, एन. एम.-2, एन. एम.-4, एन. एम.-7, एन. एम.-9 15 चिरौंजी थार प्रिया 16 अंजीर दियां, दिनोकर, पूना फीग, 17 कैंथ थार गौरव 18 मनीला टमारिंड पी.के.एम.-1 प्रवर्धन फलदार पौधों का प्रवर्धन बीज व कायिक, दोनों विधियों से, किया जा सकता है। बीज से प्रवर्धन करने से फलन में ज्यादा समय (7-10 वर्ष), पेड़ की लंबाई ज्यादा, जिससे फल की तुड़ाई करने में मुश्किल होती है, उत्पादन कम व फल निम्न गुणवत्तावाले होते है। जबकि कायिक विधि से प्रवर्धन करने से फलन में कम समय (3-4 वर्ष) लगता है। पेड़ की लंबाई कम होती है। इससे दवाइयों के छिड़काव और फलों की तुड़ाई करने में आसानी रहती है। फल उत्पादन ज्यादा व उच्च गुणवत्ता वाला होता है। अतः कायिक विधि से प्रवर्धन करना चाहिये।अर्द्धशुष्क क्षेत्रों के फलदार पौधों की प्रवर्धन विधि, उचित समय व रोपण दूरी सारणी-2 में दी गई है। सारणी 2. अर्द्धशुष्क क्षेत्रों के फलदार पौधों की प्रवर्धन विधि, उचित समय व रोपण दूरी क्र.सं. फल प्रवर्धन विधि उचित समय रोपण दूरी(मीटर) 1 आम सॉफ्टवुड ग्राफ्टिंग अक्टूबर-नवंबर 8x8, 8x6 2 चीकू सॉफ्टवुड ग्राफ्टिंग फरवरी-मार्च 8x8 3 आंवला पैच बडिंग मई-जून 8x8, 8x6 4 बेर पैच बडिंग मई-जून 8x8, 8x6, 5 बेल सॉफ्टवुड ग्राफ्टिंग, पैच बडिंग मई-जून 5x5, 8x6 6 इमली सॉफ्टवुड ग्राफ्टिंग, पैच बडिंग जुलाई-अगस्त 8x8, 5x5 7 जामुन सॉफ्टवुड ग्राफ्टिंग, पैच बडिंग अप्रैल-मई 6x6, 5x5 8 अंजीर कटिंग और पैच बडिंग जुलाई-फरवरी 8x6 9 लसोडा पैच बडिंग, क्लेफ्ट ग्राफ्टिंग अप्रैल-मई 8x6 10 शहतूत कटिंग फरवरी-मार्च 8x6, 5x5 11 करौंदा कोटग, बाज जून-जुलाई 4x4, 4x2 12 सीताफल सॉफ्टवुड ग्राफ्टिंग अप्रैल-मई 8x6, 5x5 13 खिरनी सॉफ्टवुड ग्राफ्टिंग अप्रैल-मई 5x5 14 फालसा सेमी हार्ड वुड कटिंग, बीज दिसंबर-जनवरी 4x2, 2x2 15 महुआ सॉफ्टवुड ग्राफ्टिंग मार्च-अप्रैल 6x6, 5x5 16 16 चिरौंजी सॉफ्टवुड ग्राफ्टिंग जुलाई-अगस्त 6x6, 5x5 17 कैंथ सॉफ्टवुड ग्राफ्टिंग, पैच बडिंग अप्रैल-जून 6x6, 5x5 18 मनीला टमारिंड पैच बडिंग मई-जून 8x8, 5x5 19 ताड़ सकर्स, बीज जुलाई-अगस्त 4x4 फलदार पौधों को खरीदते समय निम्नलिखित बिंदुओं को ध्यान में रखना चाहिए। विश्वसनीय स्रोत से ही पौधे खरीदने चाहिए। क्षेत्र विशेष के अनुसार उचित किस्म का चुनाव करना चाहिए। पौधे अलैंगिक विधि से व उचित विधि से तैयार होने चाहिए। पौधे स्वस्थ होने चाहिए। पौधा एक वर्ष से ज्यादा उम्र का न हो। पौधे को टैग किया हुआ होना चाहिए। बाग की स्थापना बाग की स्थापना एक दीर्घकालीन निवेश है। इससे जुड़े हुये मुद्दे जैसे-उचित स्थान का चुनाव करना, पौधों को उचित दूरी पर लगाना, सही रोपण प्रणाली का उपयोग करना इत्यादि पर सावधानी से विचार कर निर्णय लेना चहिए। रोपण प्रणाली और दूरी रोपण के विभिन्न तरीके जैसे-वर्गाकार, आयताकार, क्विनक्स, षट्कोण, त्रिकोणीय, युग्मित पंक्ति प्रणाली हैं। सभी विधियों के गुण और अवगुण हैं, लेकिन शुष्क और अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में वर्गाकार और आयताकार प्रणालियों को मुख्य रूप से अपनाया जाता है। इन प्रणालियों का रेखांकन करना व अंत:सस्य क्रियायें (इंटरकल्चरल ऑपरेशन) करना आसान रहता है। गड्ढे तैयार करना और पौधे लगाना चयनित भूमि से पेड़-पौधों को निकालकर समतल कर लेते हैं, जिससे उचित जल निकास हो सके। मुख्य रूप से बरसात के मौसम में पानी का ठहराव नहीं होना चाहिये। रोपण प्रणालियों और फसल की किस्मों के अनुसार उचित दूरी (सारणी-2) के हिसाब से लेआउट बना लेना चाहिए। निश्चित की हुई जगह पर अप्रैल में 1x1x1 मीटर आकार के गड्ढे खोद लेने चाहिए। गड्ढों को 15-20 दिनों के लिये खुला छोड़ना चाहिए, जिससे रोगजनकों और कीटों के इनोकुलम, अंडे, प्यूपा इत्यादि गर्मी से मर जायें। गड्ढों को 1/3 भाग खेत के ऊपर की मृदा व 3/4 भाग अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद (फार्म यार्ड खाद) और उर्वरकों (एन-50 ग्राम, पी-100 ग्राम प्रति गड्ढे ) के साथ मिलाकर भर देना चाहिए। गड्ढों की मृदा को कॉम्पैक्ट और व्यवस्थित हो जाने के बाद मानसून की पहली बरसात के बाद पौधों का रोपण करना चाहिए। सुनिश्चित सिंचाई सुविधा हो, तो रोपण फरवरी के दौरान भी किया जा सकता है। स्व-स्थानिक कलिकायन (इन-सीटू बडिंग)यह तकनीक अर्द्धशष्क क्षेत्रों में वर्षा आधारित बागवानी हेतु बहुत ही कारगर है। इस तकनीक में देसी बीज या पौधों को रेखांकित स्थानों पर लगा देते हैं। लगभग एक वर्ष बाद तैयार मूलवन्त को 20-25 सें.मी. छोड़कर काट दिया जाता है। उचित प्रजाति, जो कि अधिक फल, अच्छी गुणवत्ता व कीट व रोगों से कम प्रभावित होती हो, से सांकुर डाली या आंख लेकर प्रवर्धन की उचित विधि से व सही समय पर कलिकायन या ग्रॉफ्टिंग करनी चाहिए। पंचमहल (गुजरात) के वातावरण में मध्य मई से जब तक बरसात शुरू न हो, तब तक 'पैच' बडिंग विधि, सॉफ्टवुड ग्रॉफ्टिंग से 80-100 प्रतिशत तक सफलता पाई जा सकती है। इस तकनीक से पौधे तैयार करने से पौधे खरीदने का खर्च बच जाता है, कम पौधे मरते हैं व पौधों में दो वर्ष में फल लगने लगते हैं। रोपण पौधे ठीक उसी जगह लगाने चहिये जिस स्थान पर रेखांकन करते समय डंडे खड़े किये हुये हों या चूने से निशान लगाये गये थे। पौधों की पॉलीथीन को ब्लेड या चाकू की सहायता से काटकर पिंडी को अलग कर चिन्हित स्थान पर ग्रॉफ्टिंग और बडिंग के चिन्ह को जमीन से 15-20 सें.मी. ऊपर रखते हुये रोपण करते हैं। इसे प्लांटिंग बोर्ड की मदद से भी आसानी से किया जा सकता है। अंतःसस्य बागों में अंतःसस्य एक प्रभावी आर्थिक विकल्प है, खासकर जब बाग से पैसा नहीं मिल रहा होता है। फलों के पेड़ 4-5 वर्ष की उम्र से फलने लगते हैं। बगीचे में अल्प अवधि की सब्जियां (टमाटर, बैंगन, मिर्च, भिन्डी, फूलगोभी, ककड़ी व फसलें (सरसों, तिल, चना, मूंग, मोठ) और फलदार पौधे (पपीता और फालसा) उगाए जा सकते हैं। पोषक तत्व प्रबंधन पौधों की बढ़वार, फूलने व फलने के लिए सभी 18 पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। पौधों में खाद व उर्वरक की मात्रा पौधे की किस्म, आयु, मृदा की गुणवत्ता, सिंचाई की सुविधा, मृदा जांच इत्यादि के आधार पर विभिन्न संस्थानों की सिफारिश के अनुसार उचित मात्रा, उचित समय और सही विधि से देनी चाहिए। फल वृक्षों में पेड़ के फैलाव तक 1.0-1.5 फीट चौड़ी व 1.0 फीट गहरी खाई खोदकर खाद व उर्वरकों की पूरी मात्रा मानसून की पहली बरसात के बाद भरकर मृदा से ढक देना चाहिये। स्थान का चयन बाग लगाने से पहले उचित स्थान और साइट का चयन करना बहुत ही महत्वपूर्ण विषयों में से एक है। निम्नलिखित मानदंडों को ध्यान में रखते हुये इसकी योजना बनानी चाहिये। चयनित स्थान फलदार पौधों की खेती के लिए प्रचलित होना चाहिए, जिससे उत्पादकों के अनुभवों का लाभ मिल सके। अन्य फल उत्पादकों के साथ सहकारी संगठनों के माध्यम से उपज बेचने का लाभ भी मिल सकता है। मृदा की उपयुक्तता का आकलन इसकी उर्वरता, सबसॉयल की प्रकृति और मृदा की गहराई से करना चाहिये। चयनित जगह में उचित जल निकास की सुविधा होनी चाहिये। मुख्य रूप से बरसात के मौसम में और पानी का ठहराव नहीं होना चाहिये। क्षेत्र बाजार के नजदीक होना चाहिए। उगाई जाने वाले फल व उनकी किस्मों की उचित मांग होनी चाहिये। चुने हुये फलों व उनकी किस्मों को उगाने के लिए मृदा व जलवायु उपयुक्त होनी चाहिये। वर्षभर उचित गुणवत्तायुक्त सिंचाई के लिए पर्याप्त जलापूर्ति होनी चाहिये। चयनित स्थान, यातायात के साधन जैसे-रेल व रोड़ से जुड़ा होना चाहिये। श्रमिकों की उपलब्धता होनी चहिये। जहां तक सम्भव हो स्थान मालिक के निवास के पास होना चाहिये। बागवानी से संबंधित इनपुट की उपलब्धता होनी चहिये। स्त्राेत : भाकृअनुप- राज कुमार, कनक लता’, बी.एस. खद्दा’, ए.के. राय और एस. खजुरिया भाकृअनुप-कृषि विज्ञान केन्द्र-पंचमहल-389340, गुजरात (भाकृअनुप-केंद्रीय शुष्क बागवानी संस्थान)।