भूमिका विश्व में खट्टे फलों की खेती विशाल भूखंड पर होती है। इसका क्षेत्र भारत के उत्तर में स्थित हिमालय की पहाड़ियों से लेकर चीन के उत्तर मध्य इलाके, पूर्व में फिलिपीन्स और दक्षिण पूर्व में बर्मा, इंडोनेशिया और न्यू केलेडोनिया तक फैला हुआ है। भारत में क्षेत्रवार दृष्टि से केले और आम के बाद तीसरा स्थान खट्टे फलों की खेती का है। इंडोनेशिया, तुर्की, ब्राजील तथा यूएसए (22-25 टन/हेक्टेयर) जैसे विकसित देशों की तुलना में भारत में खट्टे फलों की औसत उपज अत्यधिक कम (8.8 टन/हेक्टेयर) है। भारत में नागपुर मैंडेरिन (मध्य भारत), किन्नौ मैंडेरिन (उत्तर-पश्चिम भारत), कूर्ग मैंडेरिन (दक्षिण भारत) और खासी मैंडेऋण (उत्तर पूर्वी भारत) वाणिज्य खेती के क्षेत्र हैं। जबकि महाराष्ट्र में मोसंबी, आन्ध्र प्रदेश में सतगुरी, और पंजाब में माल्टा एवं जफ्फा जैसे मीठे संतरों की खेती परंपरागत रूप से की जाती है। खट्टे फलों की खेती की संभावनाएं और उसका राष्ट्रीय महत्व भारत में खट्टे फलों की खेती पर उत्पादन की समिति दशाओं, सीमित जल संसाधनों, कीटों और बीमारियों जैसी कई समस्याओं का बुरा असर पड़ रहा है। इसलिए पौध रोपण से लेकर फलोत्पादन तक बहुत सावधानी बरतने की जरूरत है तभी उसकी 15-20 साल उत्पादक काल का बनाए रखा जा सकता है। खट्टे फलों की खेती करनेवालों ने इसकी वाणिज्यिक खेती करने के लिए आधुनिक तकनीकों को अपनाने में काफी रुचि दर्शाई है। नेशनल रिसर्च सेंटर फॉर सिट्रस, नागपुर ए देश के विभिन्न क्षेत्रों में खट्टे फलों की खेती हेतु उन्नत पद्धतियों का एक पैकेज विकसित किया है। खट्टे फलों की खेती के इस बैंक ग्राह्य प्रोजेक्ट को तैयार करने में नेशनल रिसर्च सेंटर फॉर सिट्रस की अनुशंसाओं और उसके उत्पादकों के मंतव्य एवं अनुभवों को ध्यान में रखा गया है। तालिका 1 में प्रमुख सिट्रस फलों का वितरण दिया गया है:- तालिका 1 : प्रमुख सिट्रस फलों का वितरण वैश्विक परिदृश्य राष्ट्रिय परिदृश्य मैंडेरिन 44 लाइम एंड लेमन 10 28 मीठे संतरे 71 18 अन्य 6 10 देश में प्रमुख सिट्रस फलों का क्षेत्र, उत्पादन और उत्पादकता प्रमुख सिट्रस फल क्षेत्र (000 हे) उत्पादन (000 टन) उत्पादकता (टन/हे) मैंडेरिन 324 3255 10.0 मीठे संतरे 157 1316 8.50 लाइम एंड लेमन 219 2108 9.75 अन्य 146 785 5.5 कुल 846 7464 9.00 स्रोत: नेशनल हार्टिकल्चर बोर्ड इन्फोर्मेशन सर्विस – 2010 -11 देश के 26 से अधिक राज्यों में सिट्रस पैदा किये जाते हैं। देश में सिट्रस फलों की महत्वपूर्ण उत्पादक राज्य तालिका 3 में दिए गए है। तालिका 3 – देश में सिट्रस फलों के महत्वपूर्ण उत्पादक राज्य सिट्रस फलों के नाम राज्य किस्म 1. मीठे संतरे पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश पाइनएप्पलए, जफ्फा, हामलिन, वेलेंसिया, लेट केंबल वेलेंसिया 2. मेंडेरिन महाराष्ट्र, मध्यप्रेदश, आंध्रप्रदेश, उत्तरप्रदेश, उत्तरपूर्वी क्षेत्र, पंजाब, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और सिक्किम नागपुर मैंडेरिन, खासी मैंडेरिन, किन्नौ, नागपुर मैंडेरिन और स्थानीय दार्जलिंग मैंडेरिन कर्नाटका और तमिलनाडू कुर्ग मैंडेरिन 3. एसिड लाइम आन्ध्रप्रदेश, कर्नाटका, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र कागजी लाइम, इंदौर सीडलिंग, बारामासी, कागजी लाइम 4. अंगूर आन्ध्रप्रदेश, पीके एम (जयदेवी) 5. नींबू गुजरात, आंध्रप्रदेश, उत्तरप्रदेश, असम यूरेका पहाड़ियां, जलजल असम का नींबू कर्नाटका बारामासी नेपाली औब्लोंग, इटालियन नींबू, लिसबन नींबू, यूरेका नींबू सेवाइल 6. प्यूमेलो आन्ध्रप्रदेश, असम, एनईएच रेड फ्लेस्द, व्ह़ाइट फ्लेस्द स्रोत: नेशनल हार्टिकल्चर बोर्ड इन्फोर्मेशन सर्विस -2010-11 सिट्रस फलों की खेती के लिए तकनीकी आवश्यकताएं मौसम भारत में सिट्रस फलों का उत्पादन विभिन्न कृषि – मौसमी दशाओं में होता है इसमें दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्र की शुष्क और अर्द्ध शुष्क मौसम से लेकर दक्षिण पूर्व का आर्द्र उष्णकटिबंधी मौसम में विकसित होते हैं। विश्व के उष्णकटिबंधी इलाकों में उनका चक्रीय विकास होता है और व वहाँ की फसल पद्धति को नियमित करना अपेक्षित होता है। सिट्रस फल 13 डिग्री सेल्सियस से 37 डिग्री सेल्सियस के तापमान में लगते हैं। नए पौधों के लिए – 4 डिग्री सेल्सियस से कम का तापमान 25 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए। उच्च आर्द्रता से कई बीमारियाँ फैलने लगती हैं। तुषार तो सर्वाधिक खतरनाक है। ग्रीष्मकाल में गरम हवाओं से फूल और विकासशील फल सूखकर झड़ने लगते हैं। सिट्रस फलों के लिए अर्द्ध शुष्क मौसम सर्वाधिक उपयुक्त होता है। शीत दशाओं में अनुकुलता हासिल कर लेने के कारण 2000 मीटर तक के ऊँचे खासी और दार्जलिंग इलाकों में मैंडेरियनस फल उगाए जाते हैं। मृदा सिट्रस फलों का उत्पादन विभिन्न तरह की मृदाओं पर संभव होता है। इसमें उत्तर भारत की बुलाई दुम्मट अथवा कछारी मिट्टी से लेकर दक्षिणी पठार और उत्तर- पूर्वी पहाड़ियों की गहरी चिकनी मिट्टी अथवा लेटेरिक/एसिडिक मृदा शामिल है। हल्की मिट्टी और पानी के निकास की अच्छी व्यवस्था हो तो सिट्रस फलोद्यान खूब फलते हैं। 5.5 से 7.5 पीएच तक की गहरी मिट्टी सर्वाधिक उपयुक्त है। तथापि, 40 से 90 पीएच की मिट्टी में भी वे विकसित हो मिट्टी हैं। पेड़ की जड़ों के निकट कैल्शियम कार्बोनेट के उच्च मात्रा नुकसान दायक होता है। रोपण सामग्री सिट्रस फलों का उत्पादन के लिए अच्छे किस्म की रोपण सामग्री जरूरी होती है। सिट्रस के पौधे बायोटिक और एबियाटिक दबावों के प्रति अत्यधिक संवदेनशील होते हैं। इसलिए भारत में सिट्रस उद्योग के लिए अच्छे रूट-स्टॉक का चयन हमेशा से एक चुनौती रहा है। वर्तमान में जिन रूट स्टॉक अर्थात रफ लेमन और रंगपुर लाइम का उपयोग किया जा रहा है, वे पिछले पांच दशकों में कई भिन्नताओं से होकर गुजरे हैं। इसलिए नेशनल रिसर्च सेंटर फॉर सिट्रस, नागपुर तथा राज्य कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा परंपरागत रूट स्टॉक से विकसित अच्छे रूट स्टॉक का रोपण सामग्री के रूप में प्रचार प्रसार किया जाना चाहिए। बड-वुड का चयन करने के लिए नेशनल रिसर्च सेंटर फॉर सिट्रस, नागपुर में उपलब्ध निरोगी मदर प्लांट को लिया जाना चाहिए। प्राइमरी नर्सरी बेड्स हल्की उपजाऊ भूमि पर अथवा किसी शेड के नीचे एचडीपीई ट्रे में तैयार की जाती है। नर्सरी बेड में कमजोर, बेकार एवं असमान सिडलिंग्स को 2-3 अवस्थाओं में हटाकर न्यूसिलर सिडलिंग्स को चूना जाता है। सेकंडरी नर्सरी सिडलिंग्स पोलीथिन बैग में भी उगाए जा सकते हैं। ये सिडलिंग्स एक वर्ष में 30 से 40 सेंटीमीटर की ऊँचाई प्राप्त कर लेते हैं और बागान में रोपने के लिए तैयार हो जाते हैं। जमीन की तैयारी जमीन की अच्छी तरह सर जुताई करके इसे समतल किया जाता है। पहाड़ी क्षेत्रों में ढालूआ भूमि में पौधे लगाए जाते हैं। इन ढालूआ भूमि पर समतल भूमि की तुलना अधिक सघनता से पौधे लगाए जा सकते हैं। नींबू प्रजाति के पौधे जल भराव और पौधों के पास ठहराव से अत्यधिक प्रभावित होने लगे हैं। इसलिए फलोद्यान के चारों और ढलान पर 3-4 फीट गहरा निकासी मार्ग बनाना जरूरी हो जाता है। पौधों की सघनता (क) मंडरिन पौधों के बीच की सामान्य दूरी – 6 मी × 6 मी, पौधों की संख्या : 277 पौधे प्रति हेक्टेयर ख) मीठी नारंगी पौधों के बीच सामान्य दूरी- 5 मी. × 5 मी, 5.5 मी × 5.5 मी, पौधे जनसंख्या : 400/३३० पौध प्रति हेक्टेयर ग) लाइम्स/लेमन पौधों के बीच सामान्य दूरी- 6 मी. × 6 मी. / 5 मी. × 5 मी, पौधों की जनसंख्या : 277/400 पौध प्रति हेक्टेयर हल्की मिट्टी में पौधों की दूरी 45 मी. × 45 मी. /5 मी. × 5 मी रखी जाएगी। पौध रोपण जून से अगस्त का समय पौध रोपण के लिए सबसे अच्छा मौसम होता है। नींबू के पौधे रोपने के लिए 1 मी. × 1 मी. × 1 मी. आकार के गड्ढे बनाए जाते हैं। पौधे रोपते समय प्रत्येक गड्ढे में 15 से 20 कि ग्राम गोबर की खाद और 500 ग्राम सुपर फास्फेट डाला जाता है। यदि सिंचाई की अच्छी व्यवस्था हो, तो साल के अन्य महीनों में भी पौधे रोपण का कार्य किया जा सकता है। सिंचाई नींबू प्रजाति के पौधों को आरंभिक वर्ष में आवश्यकतानुसार पानी देना बहुत जरूरी है। इससे फलों का झड़ना कम हो जाता है और फलों का आकार भी बड़ा हो जाता है। पौधों के चारों ओर जल भराव होने की स्थिति में पौधों में स्तंभ मूलसंधि विगलन और जड़ विगलन कि बीमारी लग जाती है। इन पौधों के लिए हल्की लेकिन बार-बार की सिंचाई फायदेमंद होती हैं सिंचाई के पानी में 1000 पीपीएम से अधिक लवण की मात्रा पौधों को नुकसान पहुंचा सकती हैं। सिंचाई में पानी की मात्रा और पानी देने की बारंबारता मिट्टी के स्वरुप और पौधों के विकास की अवस्था पर निर्भर करती है। यह ध्यान देने योग्य है कि सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध होने के बावजूद सिंचाई की सूक्ष्म प्रणाली अधिक कारगार होती है। इससे पानी के संरक्षण के साथ –साथ पोषक तत्वों का भी संरक्षण होता है और अप्रैल- जून के दौरान पौधों के महत्वपूर्ण विकास अवस्था में इन पौधों की फल रिटेंशन क्षमता बढ़ती है। खाद और उर्वरक पौधों को साल में तीन बार फरवरी, जून और सितंबर में खाद की बराबर- बराबर खुराक दी जाती है। पौधों के लिए अनुशंसित खाद और उर्वरक की खुराक की विवरण क्रमशः सारणी 4 और 5 में अंकित है। सारणी 4 : गोबर की खाद की वर्ष- वार आवश्यकता किग्रा./प्रति वर्ष / प्रति पौधा) गोबर की खाद 1 वर्ष 2 वर्ष 3 वर्ष 4 वर्ष 5 वर्ष 6 वर्ष 7 वर्ष और आगे किग्रा./पौधा 20 10 15 20 25 30 40 सारणी 5: पौधों के लिए अन्य पोषक तत्वों की वर्ष वार- आवश्यकता (ग्रा./पौधों/वर्ष) पोषक तत्व 1 वर्ष 2 वर्ष 3 वर्ष 4 वर्ष 5 वर्ष 6 वर्ष और आगे नाइट्रोजन 100 200 300 400 450 500 फास्फोरस 50 100 150 200 200 250 पोटाश 25 50 75 200 200 250 जेड एन एसओ4 25 25 50 50 100 150 एफएन एसओ4 25 25 50 50 100 150 एमएन एसओ4 25 25 50 50 100 150 पौधों पर आवश्यकतानुसार एक या दो बार सूक्ष्म पोषक तत्वों से बने घोल का छिड़काव किया जा सकता है। निराई/गुड़ाई मिट्टी को अच्छी स्थिति में रखने के प्रयोजन से थाली/क्यारियां की हल्की खुदाई के साथ - साथ खरपतवार निकलते रहना चाहिए। खरपतवार नशी दवाइयों (डियूरोन -3 किग्रा. प्रति हेक्टेयर) (सिमाज़िने- 4 किग्रा प्रति हेक्टेयर) ( गल्याफोसेट 4 लीटर/हेक्टेयर) (पाराक्यूट 2 लीटर/हेक्टेयर) का उपयोग भी किया जा सकता है। अन्तवर्ती फसलें नींबू के बागानों में सोयाबीन, चना, मूंगफली, लोबिया, फरस बीन और मटर आदि फलीदार फसलें उगाई जा सकती हैं। इस प्रकार की फसलें नींबू के पौधें रोपने को आरंभिक तीन – चार वर्षों के दौरान उगाई जानी चाहिए। पौधों की कटाई छंटाई करके इन्हें बढ़ने के लिए सही दिशा देना आरंभ में जमीन से ऊपर की 40-50 से. मी. की पतली टहनियों को काटकर निकाल दिया जाता है ताकि पौधे का एक मजबूत तना विकसित हो सके। पौधें के बीच का हिस्सा खुला होना चाहिए। शाखाएँ सभी दिशाओं में अच्छी तरह से फैली होनी चाहिए। आड़े-टेढ़े टहनियों और पौधे की जड़ों से निकलने वाले अंकुरों को पहले ही हटा दिया जाना चाहिए। फल लगने के बाद पौधों की छंटाई नहीं करनी चाहिए। पौधों पर से सभी प्रकार की क्षतिग्रस्त और नीचे की ओर झूकी टहनियां तथा सखी शाखाओं को समय-समय पर हटाते रहना चाहिए। कीटों और बीमारियाँ पर नियंत्रण 3.12.1 कीट नियंत्रण नींबू प्रजाति के पौधे सिट्रस ब्लैक प्लाई, सिट्रस सायला, सिट्रस थ्रिप्स, लिफ़ माइनर, स्केल इन्सेक्ट,छाल भक्षी कैटरपिलर/ट्रंक बोरर फ्रूट प्लाई, फ्रूट सकिंग मोथ, माइट्स आदि कीटों से प्रभावित होते हैं। नींबू जाति के पौधों विशेषत: मंडरिन ओरेंज के पौधों पर आर्द्र जलवायु में मीली बग, नेमाटॉड आदि जैसे कीट आक्रमण करते हैं। इन कीटों पर नियंत्रण के उपाय नीचे वर्णित हैं: लीफ माइनर : इस कीट का प्रभाव दीखते ही क्वीनाफोस (12.5 मि.ली.) या फेन्वालेरेट (05. मि ली) अथवा मोनोक्रोटोफास (10 मि ली) दवा को एक लीटर पानी में मिलाकर साप्ताहिक आधार पर नये पत्तों पर छिड़काव किया जाना चाहिए। सिट्रस ब्लैक फ्लाई एंड व्हाइट फ्लाई : प्रौढ़ कीटों पर एक छिड़काव और अंडों के हैंचिग की स्टेज पर दो छिड़काव (अप्रैल और दिसंबर के पहले पखवाड़े और जुलाई के दुसरे पखवाड़े में) 15 दिनों के अंतराल पर 12.5 ग्राम एसीफेट आ 15. मिली क्विनाफोस अथवा 05. मिली इमिडाक्लोप्रिड एक लीटर पानी मिलाकर किया जाना चाहिए। सिट्रस सायला: इस पर नियंत्रण करने के लिए बड - ब्रस्ट स्टेज अथवा फरवरी, मार्च, जून, जुलाई, अक्टूबर, नवंबर में जब भी रोग के लक्षण दिखाई पड़े 10 मिली क्वीनालफास अथवा 10 ग्रा. एसेफेट या 05 मिली कीटनाशक को एक लीटर पानी में मिलाकर पत्तों पर छिड़काव किया जाना चाहिए। सिट्रस थ्रिप्स : इस पर नियंत्रण के लिए एक लीटर पानी में 15 मिली मिली दीमेथेएट या 1 मिली मोनोक्रोटोफास मिलकर बड-ब्रस्ट स्टेज और बेरी आकार के फल हो जाने पर छिड़काव किया जाना चाहिए। स्केल इन्सेक्ट : पाराथिऑन (00.3) इमल्सन, 150 मिली दिमेंथोएट और 250 मिली किरोसिन तेल को 100 लीटर पानी में मिलाकर, 0.1 मालाथऑन या 00.5 कारबरिल और 1 तेल का घोल बनाकर किया जाना चाहिए। ट्रंक बोरर: 01 दिक्लोरवस या 1 कारबारिल या 00.2 मोनोक्रोटोफास से टनेल को साफ करने से यह कीट नष्ट हो जाता है। छाल भक्षी कीट: 0.1 दिक्लोरवास या 1 कारबरिल या 00.1 मोनोक्रोटोफास के घोल में रूई भिगोकर टनेल के बंद करने से इस कीट पर नियंत्रण पा जा सकता है। 3.12.2 बीमारियाँ नींबू जाति के पौधों पर मुख्यत: फाइटफथोरा गूमोसिस, स्क्तर्स ट्रिस्टेजा वायरस, सिट्रस ग्रीनिंग सिट्रस कैंकर, पावडरी मिल्डीऊ, एन्थ्राक्नोस आदि बीमारियाँ लग जाती हैं। इन बीमारियों को निम्नलिखित उपायों से नियंत्रित किया जा सकता है: फाइटोफथोरा गूमोसिस: इस स्थिति में प्रभावित भाग को कुरेदकर वहाँ बोरदेउक्स पेस्ट या कॉपर औक्सिफ्लोराइड पेस्ट या रिडोमिल + कार्बेन्डाजिम लगाया जाना चाहिए। सिट्रस ग्रिनिंग : इस रोग से मुक्ति के लिए संक्रमित शाखाओं को हटा दिया जाना चाहिए। अनुपयोगी पेड़ों को निकालकर उ नके स्थान पर नये रोगमुक्त पौधे लगाए जाने चाहिए। 600 पी पीएम लेडरमासिन और जेड एसओ4 तथा एफइएसओ4 को मिलाकर लगाने से भी इस बीमारी से निपटा जा सकता है। सिट्रस सायल वेक्टर पर कड़ाई से नियंत्रण रखा जाना चाहिए। सिट्रस ट्रिस्टेजा वायरस: इससे निपटने के लिए एफिड वायरस पर नियंत्रण के साथ - साथ क्रॉस प्रोटेक्ट ग्राफ्ट और शूट टीप ग्राफ्टेड पौधे या बीमारी मुक्त ग्राफ्टेड पौधे लगाए जा सकते हैं। सिट्रस कैंकर : संक्रमित टहनियों को काटकर हटाने के बाद 1 बोरोडियूक्स मिश्रण अथवा कॉपर फंफूदी नाशक का पत्तों पर छिड़काव किया जाना चाहिए। ऐसे में, 100 पीपीएम स्ट्रप्टोमाइसिन सल्फेट को पत्तों पर छिड़काव करने से भी लाभ होता है। (भूकड़ी) भूरभूरी फफूंदी : इस पर नियंत्रण के लिए प्रभावित टहनियों की छंटाई करके 2 ग्राम वेटेबल सल्फर एक लीटर पानी में मिलाकर और 1 लीटर पानी में 3 ग्राम कॉपर आक्सीक्लोराइड का घोल बनाकर अप्रैल और अक्टूबर में पत्तों पर छिड़काव करना चाहिए। अन्थ्राकनोस: प्रभावित टहनियों की छंटाई करके 1 लीटर पानी में 1 ग्रा. काबैंन्दाजिम अथवा 1 लीटर पानी में 3 ग्रा कॉपर आक्सीक्लोराइड का घोल बनाकर पन्द्रह दिनों के अन्तराल पर पत्तों पर छिड़काव करना फायदेमंद होता है। फसल होना मंडरिन और स्वीट ओरेंज में मुख्यत: दो फसलें होती हैं। जनवरी माह के दौरान आल के पेड़ों पर फूल लगने के समय इन नींबू के पेड़ों पर भी फूल आते हैं. इसीलिए इन्हें अम्बिबार कहते हैं। इनके फल अक्टूबर-दिसंबर के दौरान तैयार हो जाते हैं। इनकी दूसरी फसल को मृगबहार (मानसून के दौरान फूल आते हैं) कहते है, इन पर जून - जुलाई के दौरान फूल लगे हैं और फरवरी-अप्रैल में फल तैयार हो जाते हैं। सामान्यत: इन फसलों को तैयार होने में 240 -280 दिन लगते हैं। रंग परिवर्तन की स्थिति में पहुँच चुके परिपक्व फलों को 10 से 15 दिनों के अंतराल पर दो से तीन बात तुड़ाई की जाती है। एक वर्ष में लाइम और लेमन के 2 या 3 फसलें ली जा सकती हैं। उपज मंडरिन : इस जाति के नींबू के पेड़ पांचवे साल से फल देना आरंभ करते हैं। आरंभ में लगभग प्रति पेड़ 50 फल मिलते हैं आठवें साल से ये पड़े पोरी तरह तैयार हो जाते हैं। इसके बाद प्रति पेड़ औसतन 700 से 800 फलों की उपज प्राप्त होती हैं। स्वीट ओरेंज : इनके पेड़ 5 वें साल से प्रति पेड़ 40 से 50 देना शुरू कर देते हैं। आठवें साल में पूरी तरह तैयार हो जाते हैं। इसके बाद प्रति पेड़ औसतन 500-600 फलों की उपज मिलने लगती हैं। लाइम लेमन : इनके पेड़ तीसरे साल से प्रति 50 से 60 फल देना शुरू कर देते हैं। आठवें साल से पूरी तरह तैयार हो जाते हैं। इसके बाद प्रति पेड़ औसतन 1000 से 1500 फलों की उपज मिलने लगती है। नींबू के बागान 15 से 25 वर्षों तक उपज देते रहते हैं। 3.15 फलों की तुड़ाई के उपरांत प्रबंधन व्यवस्था फलों के समरूप पीत-नारंगी स्वरूप बनाए रखने के लिए इनके परिपक्व होने की स्थिति में 250 पीपीएम इथोफोन के साथ 1 कैल्सियम एसेटेट का घोल बनाकर पत्तों पर छिड़काव किया जाता है। स्वीट ओरेंज और मंडरिन को डिग्रिनिंग के लिए इथिलिन गैस से ट्रीट किया जाता है ताकि इन पर सही रंग आ सके। किसी डिग्रीनिंग चैंबर में 6-7 सेंटीग्रेड तापक्रम पर, 5-10 पीपीएम इथिलीन और 90-95 आरएच की स्थिति में रखने पर 48 घंटे में फलों पर रंग आ जाता है। नींबू के विभिन्न प्रकार के फलों को दीर्धकालीन भंडारण हेतु कोल्ड स्टोरेज की सुविधा उपलब्ध है। इन फलों की प्री कूलिंग फोर्स्ड एअर सिस्टम से की जाती है। इन फलों के प्रत्येक समूह के लिए भंडारण स्थिति का ब्यौरा नीचे दिया गया है। फलों को हवादार सीएफबी बॉक्स (30 सें मि × 30 सें मि × 30 सें मि) में पैक किया जाता है। नींबू के विभिन्न फलों के लिए भंडारण की स्थिति : मंडरिन : इन्हें 5-7 सेंटीग्रेड के तापमान पर 85-90 आरएच की स्थिति में 4 से 8 सप्ताह तक रखा जा सकता है। स्वीट ऑरेंज : इन्हें 7-8 सेंटीग्रेड के तापमान पर 85 – 90 आरएच की स्थिति में 4 से 8 सप्ताह तक रखा जा सकता है। लाइम/लेमन : इन फलों को 9 से 10 सेंटीग्रेड के तापमान पर 80-90 आरएच की स्थिति में 6-8 सप्ताह तक रखा जा सकता है इन फलों को 7 सेंटीग्रेड से नीचे के तापमान पर रखने उपरांत इनमें कुछ खराबी आने लगती है। फलों पर वैक्सिंग करने से अधिक लंबे समय तक नमी बनाए रखने में मदद मिलती है और इससे फलों को अधिक दिन तक सही स्थिति में रखा जा सकता है। विपणन नींबू के फल नाशवान संवर्ग में आते हैं। इनका रख - रखाव सावधानी से और साफ सुथरे तरीके से किया जाना चाहिए। स्वीट ऑरेंज, लाइम्स और लेमन सामान्य स्थिति में ताजा बने रहते है। इस वजह से इन्हें विपणन के लिए सुदूर स्थानों तक ले जाया जा सकता है। मंडरिन फलों के रख रखाव और ट्रांसपोर्टेशन के दौरान विशेष ख्याल रखे जाने की जरूरत है। नींबू के फलों के बागान के मॉडल प्रोजेक्ट के तकनीकी- आर्थिकी पैरामीटर अनुबंध 1 में अंकित हैं। वित्तीय व्यवहार्यता और बैंक साध्यता परियोजना लागत इस वर्तमान मॉडल प्रोजेक्ट में 1 हेक्टेयर भूमि पर मंडरिन के बागान लगाने के लिए अपिक्षित इकाई लागत को ध्यान में रखा गया है। किसी अन्य नींबू के बागान लगाते समय स्थानीय परिस्थितियाँ, तकनीकी-आर्थिकी पैरामीटर और संबंधित राज्य में प्रचलित न्यूनतम मजदूरी दरों को ध्यान में रखते हुए परिवर्तन किया जा सकते है इस मॉडल में 5 वर्षों की अवधि में प्रति हेक्टेयर रू. 1,40,700/- की इकाई लागत आती है। मंडलरिन ऑरेंज के बागान विकास के लिए इकाई लागत का ब्यौरा अनुबंध II में अंकित है। मार्जिन मनी इस परियोजना के लिए छोटे, मध्यम और अन्य किसानों के लिए क्रमश: 10 और 15 मार्जिन मनी/डाउन पेमेंट का प्रावधान है। इस परियोजना के लिए शेष राशि बैंक ऋण से प्राप्त की जाएगी। लेकिन, इस वर्तमान मॉडल में इकाई लागत की 10 राशि अर्थात प्रति हेक्टेयर 14,100 रूपए की राशि मार्जिन के रूप में रखी गयी है। बैंक ऋण इस परियोजना की कुल लागत में 85 से 95 बैंक ऋण के रूप में उपलब्ध होगा। यहाँ इंगित परियोजना मॉडल में 90 बैंक ऋण रखा गया है। इसके अनुसार यह प्रति हेक्टेयर रू 1,26,600/- बनता है। ब्याज दर इस परियोजना के लिए अंतिम उधारकर्ता को प्रदत्त ऋण पर भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा समय-समय पर जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार ब्याज प्रभारित किया जाएगा। लेकिन, इस मॉडल प्रोजेक्ट की बैंक व्यवहार्यता के लिए अंतिम उधारकर्ता को 12 की दर पर ऋण उपलब्धता को ध्यान में रखा गया है। प्रतिभूति इस प्रयोजना हेतु भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा समय-समय पर जारी दिशा-निर्देश लागू होंगे। वित्तीय विश्लेषण इस मॉडल में एक हेक्टेयर भूमि में नींबू बागान के लिए वित्तीय विश्लेषण किया गया है। इस प्रोजेक्ट के वित्तीय विश्लेषण के लिए आय का मोटे तौर पर अनुमान लगाया गया है। इस संबंध में आय और व्यय का विस्तृत ब्यौरा अनुबंध III में अंकित है। परियोजना का आईआरआर, एनपीडब्ल्यू और बीसीआर क्रमशः 341, रू. 1,76,556 और 1.98 होता है। इसका ब्यौरा अनुबंध IV में अंकित हैं। ऋण की चुकौती अवधि परियोजना के कैश फ्लो के आधार पर चुकौती तैयार की गयी है। यह अनुबंध V में अंकित है। मूलधन के लिए कुल चुकौती अवधि 9 वर्ष है। इसमें 4 साल की छूट अवधि भी शामिल है। डिस्क्लेमर इस मॉडल प्रोजेक्ट में व्यक्त विचार परामर्शी हैं, कोई व्यक्ति किसी प्रयोजन के लिए इस रिपोर्ट का उपयोग करता है तो इसमें नाबार्ड की कोई वित्तीय जिम्मेदारी नहीं होगी। किसी प्रोजेक्ट की वास्तविक लागत और इससे प्राप्य आय प्रत्येक परियोजना की विशेष आवश्यकताओं पर निर्भर है। अनुबंध I : तकनीकी – आर्थिक मानदंड दूरी 6 मी × 6 मी किस्में नागपूरी मेंडरिन पौध सामग्री कलमें पौधों की संख्या (पौधे/है) 275.00 भूमि तैयार करना (‘/है) 2500.00 श्रम (रू/श्रम दिवस) 200.00 पौध सामग्री (‘/पौधा) 30.00 फार्म यार्ड मैन्योर (‘/मैट्रिक टन) 1200.00 यूरिया (‘/किग्रा) 5.70 सिंगल सुपर फास्फेट (‘/किग्रा) 5.80 पोटास ((‘/किग्रा) 16.60 पौध संरक्षण सामग्री (‘/लीटर) 350.00 नागपूरी मैंडेरिन कामूल्य (‘/किग्रा) 8.00 अनुबंध II : प्रोजेक्ट लागत (राशि रूपये में.) मदें वर्ष कुल 1 2 3 4 5 6 भूमि तैयार करना 2500 0 0 0 0 गढ्डे खोदना और भरना 4000 0 0 0 0 पौध सामग्री 9060 0 0 0 0 पौध रोपण और स्टेकिंग 2000 0 0 0 0 एफवायएम की लागत 7200 3600 4800 6000 9600 31200 उर्वरक की लागत 1030 2090 3020 4750 4920 15810 खाद और उर्वरकों का प्रयोग 2000 3000 3000 3000 4000 15000 सिंचाई 2000 4000 4000 5000 6000 21000 पौध संरक्षण के उपाय 1750 1750 1750 3500 3500 12250 पौध संरक्षण सामग्री का प्रयोग 400 1200 1200 1600 1600 6000 इंटर कल्चर 2000 3000 4000 4000 5000 1800 फसल काटना 0 0 0 0 4000 4000 कुल 33890 18630 21760 27840 38610 14030 पूरा किया हुआ (राउंड डेड ऑफ) 33900 18600 21800 27800 38600 140700 मार्जिन मनी 14100 बैंक ऋण 126600 अनुबंध III : आय – व्यय का स्टेटमेंट (राशि रूपये में) मदें वर्ष 5 6 7 8 9 10 11 12 आय उपज (कि. ग्रा प्रति पौध) 10 30 50 60 70 90 80 80 उपज (कि. ग्रा प्रति हेक्टेयर) 2750 8250 13750 16500 19250 22000 22000 22000 आय 22000 67000 110000 132000 154000 176000 176000 176000 व्यय एफवायएम की लागत 4000 4000 4000 4000 4000 4000 4000 4000 उर्वरक की लागत 5463 5463 5463 5463 5463 5463 5463 5463 खाद और उर्वरकों का प्रयोग 4000 4000 4000 4000 4000 4000 4000 4000 सिंचाई 6000 6000 6000 6000 6000 6000 6000 6000 पौध संरक्षण के उपाय 3500 3500 3500 3500 3500 3500 3500 3500 पौध संरक्षण सामग्री का प्रयोग 1600 1600 1600 1600 1600 1600 1600 1600 इंटरकल्चर 5000 5000 5000 1600 1600 1600 1600 1600 फसल काटना 4000 5000 5000 5000 5000 5000 5000 5000 कुल 33553 34553 34553 5000 5000 5000 5000 5000 राउंड डेड 34000 35000 35000 34553 34553 34553 34553 34553 आधिक्य -12000 31000 75000 35000 35000 35000 35000 35000 अनुबंध IV : वित्तीय विश्लेषण मदें वर्ष 1 2 3 4 5 6 7 8 9 विनिवेश लागत 33900 18600 21800 27800 38600 0 0 0 अनुरक्षण लागत 0 0 0 0 0 35000 35000 35000 35000 कुल लागत 33900 18600 21800 27800 38600 35000 35000 35000 35000 लाभ 0 0 0 0 22000 66000 110000 132000 निवल लाभ -33900 -18600 -21800 -27800 -16600 3100 75000 97000 15 पर डीएफ 0.87 0.75 0.66 0.57 0.5 0.43 0.38 0.33 डिस्काउंट लागत 29493 14062 14062 15902 19184 15120 13125 11445 डिस्काउंट लाभ 0 0 0 0 10934 28512 41250 43164 निवल डिस्काउंट के लाभ -29943 -14062 -14344 -15902 -8250 13392 28125 31719 एन पी डब्ल्यू 176556 बीसीआर 1.98 आई आर आर 34.11 अनुबंध V : ऋण चुकौती अनुसूची वर्ष वर्ष के शुरू में बकाया ऋण ब्याज @ 12.0 सकल आधिक्य चुकौती कुल व्यय निवल अधिशेष वर्ष के अंत में बकाया ऋण मूलधन ब्याज 1 30510 3661 10000 0 3661 3661 0 2 47250 5670 10000 0 5670 5670 0 3 66870 8024 10000 0 8024 8024 0 4 91890 11027 10000 0 11027 11027 0 5 126630 15196 22000 3000 15196 18196 3804 6 123630 14836 31000 8000 14836 22836 8164 7 115630 13876 75000 13876 43876 43876 31124 8 85630 10276 97000 10276 50276 50276 46724 9 45630 5476 119000 5476 51106 51106 67894 पहले चार वर्षों में ब्याज का भुगतान अत: फसलन से प्राप्त आय से किया जाएगा। स्त्रोत:नाबार्ड बैंक