नीबूवर्गीय फलों की खेती आर्थिक और पोषण सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। भारत में विभिन्न प्रकार के फलों की व्यावसायिक खेती की जाती है, जिनमें से नीबवर्गीय फल प्रमुख हैं। हमारे देश में इन फलों का क्षेत्रफल की दृष्टि से दूसरा तथा फलोत्पादन की दृष्टि से तीसरा स्थान है। नीबूवर्गीय फलों की उत्पादकता 10.3 मीट्रिक टन प्रति हैक्टर है। माल्टा, संतरा, कागजी नीबू, लेमन, ग्रेपफ्रूट और चकोतरा प्रमुख नीबूवर्गीय फल हैं। कोरोना महामारी काल में विटामिन-सी समृद्ध नीबूवर्गीय फलों के सेवन पर जोर दिया जा रहा है। नीबूवर्गीय फलों के रस में पाए जाने वाले विटामिन 'सी' (एस्कॉर्बिक अम्ल) और बी-9 (फोलेट), प्रतिरोधक तंत्र के सामान्य क्रियान्वयन में भूमिका निभाते हैं। विटामिन 'सी' कोशिकाओं को हानिकारक ऑक्सीडेटिव क्षति से भी बचाता है। पोषक महत्व व उपयोग नीबूवर्गीय फल विटामिन 'सी' के अच्छे स्रोत के रूप में प्रचलित हैं। इसके साथ ही ये फल शर्करा, सिट्रिक अम्ल, खनिज तत्वों (कैल्शियम, पोटेशियम) के भी अच्छे स्रोत होते हैं। नीबूवर्गीय फलों में पोषक तत्वों के साथ-साथ कुछ अति महत्वपूर्ण स्वास्थ्यवर्द्धक संगटक जैसी-फ्लेवनॉयड, कैरोटिनॉयड तथा पैक्टीन भी पाए जाते हैं। इसके साथ ही इन फलों का मूल्यसंवर्द्धन कर विभिन्न प्रकार के परिरक्षित उत्पाद जैसे-अचार, जूस, स्क्वै श, कैंडी, जैम, मुरब्बा बनाए जा सकते हैं। इन सभी उत्पादों के प्रसंस्करण के लिए ग्रामीण स्तर पर ही कुटीर उद्योगों को लगाकर आय के अतिरिक्त साधनों को विकसित किया जा सकता है। बुंदेलखंड क्षेत्र भारत के मध्य भाग में स्थित है। इसमें उत्तर प्रदेश के जालौन, झासी, ललितपुर, चित्रकूट, हमीरपुर, बांदा और महोबा तथा मध्य प्रदेश के सागर, दमोह,टीकमगढ़, निवाड़ी, छतरपुर, पन्ना, दतिया जिले शामिल हैं। नीबूवर्गीय फलों की खेती बुंदेलखंड के सिंचित क्षेत्रों के लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद हो सकती है। यहां के किसान पारंपरिक खेती के साथ-साथ फसल विविधीकरण द्वारा नीबू की खेती करके अपनी आर्थिक स्थिति में सुधार कर सकते हैं। नीबूवर्गीय फलों के अंतर्गत विभिन्न किस्में शामिल हैं, जिनमें से फलोत्पादन की दृष्टि से माल्टा, संतरा, कागजी नीबू, लेमन, ग्रेपफ्रूट और चकोतरा प्रमुख हैं। बागवानी तकनीक जलवायु तथा मृदा नीबूवर्गीय फलों की बागवानी सभी उष्ण तथा उपोष्ण जलवायु वाले क्षेत्रों में सफलतापूर्वक की जा सकती है। इन फलों को वायुमंडल की आर्द्रता की अपेक्षा प्रत्यक्ष रूप से मृदा की नमी की अधिक आवश्यकता होती है। इन फलों को विभिन्न प्रकार की मृदा में आसानी से उगाया जा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि मृदा की गहराई कम से कम 1 मीटर हो और अच्छे जल निकास वाली हो। मृदा का पी-एच मान 5.4-7.3 तक उचित होता है। पौध पोषण प्रबंधन नीबूवर्गीय फलों के सफल उत्पादन के लिए खाद और उर्वरकों की मात्रा पौधों की उम्र तथा मृदा की उर्वराशक्ति पर निर्भर करती है। इसलिए मृदा की जांच करवानी आवश्यक है। 5 वर्ष और इससे अधिक आयु के पौधे को 50 कि.ग्रा. गोबर की खाद, 750 ग्राम यूरिया, 2000 ग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट तथा 1000 ग्राम पोटेशियम सल्फेट देना चाहिए। गोबर की खाद प्रति पेड़ प्रतिवर्ष दिसंबर-जनवरी में देनी चाहिए। रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग दो बराबर भागों में बांटकर करना चाहिए। पहली बार मार्च में और दूसरी बार जुलाई में देना चाहिए। लेमन में उर्वरक की पूरी मात्रा एक बार में ही मार्च-अप्रैल में देनी चाहिए। फलों के उचित विकास व गुणवत्ता के लिए सूक्ष्म पोषक तत्वों जैसे-बोरॉन, जिंक, कैल्शियम आदि भी देने चाहिए। प्रमुख किस्में नीबूवर्गीय फलों की सफल बागवानी के लिए यह ध्यान रखना आवश्यक है कि किसी स्थान विशेष की जलवायु अनुसार ही उचित किस्म का चयन किया जाए। (सारणी-1)नीबूवर्गीय फलों की उन्नत किस्में नाम प्रमुख किस्में माल्टा माल्टा, मौसम्बी, जाफा, वेलेंसिया, पूसा शरद, पूसा राउण्ड संतरा (मैंडरीन) नागपुर संतरा, डेंसी, हनी, किन्नो कागजी नीबू पूसा उदित, पूसा अभिनव, प्रमालिनी, विक्रम लेमन कागजी कला, पंत लेमन, यूरेका, बारामासी ग्रेपफ्रूट मार्श सीडलेस, फलेम थाम्पसन, फस्टर चकोतरा पूसा अरुण, पेमेलो यू एस-145, एनआरसीसी पेमेलो-5, लोकल बाग स्थापना पौधरोपण वर्गाकार या आयताकार विधि से किया जा सकता है। पौधे से पौधे तथा पंक्ति से पंक्ति की दूरी संतरा व माल्टा के लिए 5x5 मीटर, ग्रेपफ्रूट व चकोतरा के लिए 7x7 मीटर तथा कागजी नीबू व लेमन के लिए 4x4 मीटर होती है। किसान इस बात का विशेष ध्यान रखें कि नीबूवर्गीय फलों के पौधे विश्वसनीय नर्सरी से ही खरीदें। इसके साथ ही कौन सी किस्म के पौधे हैं, इस बात की जानकारी आवश्य लें। बाग लगाने से पहले खेत को अच्छी तरह जताई करके तैयार कर लेना चाहिए। इसके बाद लगभग 10 से 15 दिन पूर्व 1 x 1 x 1 मीटर के गड्ढे खोद लें। गड्ढे में मृदा तथा 10-15 कि.ग्रा. गोबर की खाद भरने के बाद हल्की सिंचाई करें, जिससे कि मृदा अच्छी तरह बैठ जाए। जुलाई-अगस्त में पौधरोपण करना चाहिए। पौधे लगाने के बाद हल्की सिंचाई करना उपयुक्त होता है। खरपतवार नियंत्रण खरपतवारों को नियंत्रित करने के लिए सदैव हल्की जुताई ही करें। पौधों के थालों में निराई-गुड़ाई करके खरपतवार निकाल देने चाहिए। पौधों की पंक्तियों के मध्य में अंतरवर्ती फसलें उगाने से भी खरपतवार की समस्या कम की जा सकती है। विशेष परिस्थितियों में खरपतवारनाशियों का प्रयोग भी किया जा सकता है। सिंचाई प्रबंधन पौधों की सिंचाई उनके चारों ओर थाल बनाकर की जा सकती है। टपक सिंचाई पद्धति का प्रयोग भी कर सकते हैं। गर्मियों के मौसम में प्रत्येक 10-15 दिनों के अंतराल पर और सर्दियों में प्रति 4 सप्ताह के बाद सिंचाई करें। यह ध्यान दें कि सिंचाई का पानी पेड़ के मुख्य तने के आसपास संपर्क में न आए। मुख्य तने के आसपास मिट्टी डाल देनी चाहिए। रोगएवं कीट प्रबंधन नीबूवर्गीय फलों में विभिन्न प्रकार के कीट व रोग हानि पहुंचाते हैं। इनसे पौधे की लेमन में फल का फटना रक्षा करना आवश्यक है। (सारणी-2) प्रमुख कीट एवं रोग नियंत्रण कीट विवरण रोकथाम माहूं यह कीट नई पत्तियों का रस चूसकर उन्हें कमजोर कर देता है इमिडाक्लोप्रिड 0.04 प्रतिशत का छिड़काव करे नीबू की तितली इस कीट की इल्लियां कोमल पत्तियों व टहनियों को खा जाती हैं थायोडॉन या कार्बरिल (0.2 प्रतिशत) का उपयोग कर इल्लियों को नष्ट करें सिट्रिस सिल्ला यह कीट पत्तियों और टहनियों का रस चूसकर उन्हें कमजोर कर देता इमिडाक्लोप्रिड 0.04 प्रतिशत का छिड़काव करें पर्ण सुरंगी इस कीट की इल्लियां नई पत्तियों में टेढ़ी-मेढ़ी सुरंगें बना देती हैं साइपरमेथ्रिन 0.2 प्रतिशत का छिड़काव करें तनाबेधक इस कीट की इल्ली तने में छेद करती और धीरे-धीरे तने को खोखला कर देती है रूई में पेट्रोल, फार्मेलिन या कार्बनडाईसल्फाइड भिगोकर छेद के अंदर भरें, मिट्टी के लेप से छेद को बन्द करें रोग विवरण रोकथाम सिट्रिस यह जीवाणुजनित रोग है। इसको जेन्थोमोनाज सिट्राई कहते हैं प्रभावित शाखाओं को काटकर, कॉपरऑक्सीक्लोराइड 3 ग्राम प्रति लीटर पीनी के घोल का छिड़काव करे ट्रिस्टिजा यह एक विषाणु रोग है, माहू कीट इसका रोगवाहक है प्रतिरोधी मूलवृत का प्रयोग करें माहूं का नियंत्रण करें फाइटोप्थोरा जड़ों व तनों का सड़ना, गोंद का निकलना तथा पौधों का सूखना इस रोग के मुख्य लक्षण हैं तने पर 60 सें.मी. तक बोर्डेक्स मिश्रण का लेप करें रोगग्रस्त और कीटग्रस्त पत्तियों, फलों, शाखाओं आदि को नष्ट कर देना चाहिए। प्रमुख समस्याएं एवं समाधान फलों का गिरना, फलों का फटना, ग्रेन्यूलेशन आदि अन्य प्रमुख समस्याएं हैं, जो नीबूवर्गीय फलों में उत्पन्न होती हैं। फलों को गिरने से रोकने के लिए 2-4डी या जिब्रेलिक अम्ल हार्मोन की 1.5 ग्राम तथा 1.0 कि.ग्रा. यूरिया की मात्रा का 100 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। फलों का फटना यह समस्या कागजी नीबू और लेमन में अधिक पाई जाती है। इससे बचने के लिए मृदा नमी पर नियंत्रण रखें तथा जिब्रेलिक अम्ल (10 पीपीएम अर्थात 10 मि.ग्रा.) या पोटेशियम सल्फेट (4 प्रतिशत) का मई-जून में तीन बार छिड़काव करें। ग्रेन्यूलेशन यह मुख्यत: माल्टा और संतरा के फलों की समस्या है। इसमें रस की थैलियां सूख जाती हैं। इससे बचने के लिए नाइट्रोजन की कम मात्रा का प्रयोग करें। उचित किस्मों तथा मूलवृन्त का प्रयोग करें। तुड़ाई एवं उपज नीबूवर्गीय पौधे 5-6 वर्षों बाद पर्याप्त फल देने लगते हैं। फलों की तुडाई बाजार की मांग के अनुसार की जानी चाहिए। विभिन्न नीबूवर्गीय फलों जैसे-मीठी नारंगी से 500 फल प्रति पेड़, कागजी नीबू एवं लेमन से 1000-1200 फल प्रति पेड़, संतरे से 700-800 फल प्रति पेड़, और ग्रेपफ्रूट एवं चकोतरा से 150-200 फल प्रति पेड़ की औसत उपज प्राप्त होती है। उद्यान एवं वानिकी महाविद्यालय, रानी लक्ष्मी बाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झांसी-284 003 (उत्तर प्रदेश)