लीची उपोष्ण जलवायु का एक सदाबहार फल वृक्ष है। इसके फल अपने मनमोहक सुगंधयुक्त स्वाद,आकर्षक रंग एवं पौष्टिक गुणों के लिए मशहूर है। भारत वर्ष में देश का सर्वोत्कृष्ट लीची फलों का उत्पादन उत्तर बिहार में होता है। लीची के पौधों एवं फलों को विभिन्न प्रकार के कीट नुकसान पहुँचाते हैं जिनमें फल एवं टहनी बेधक कीट सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, जिससे बागवानों को बड़ी आर्थिक हानि उठानी पड़ती है एवं लीची के क्षेत्र विस्तार के लिए यह कीट एक बड़ी चुनौती है। इस कीट का प्रकोप फल परिपक्वता के समय वातावरण में आद्र्रता अधिक होने पर अधिक तीव्र हो जाता है। इस कीट के प्रभावी नियंत्रण (प्रबन्धन) हेतु केन्द्र द्वारा एक नई तकनीक का विकास किया गया है, जिसे अपनाकर बागवान समुचित एवं प्रभावी नियंत्रण कर अधिक आमदनी प्राप्त कर सकते हैं। सामान्य विवरण लीची फल एवं टहनी बेधक कीट फलों को 24-48 प्रतिशत एवं मुलायम टहनियों को 7-70 प्रतिशत तक नुकसान पहुँचाता है। मादा कीट मुलायम टहनियों, पुष्पवृंत, नवजात एवं विकासशील फलों के डंढल के पास अण्डा देती है। कीट के पिल्लू (लार्वा) नई कोपलों के मुलायम टहनियों में प्रवेश कर उनके भीतरी भाग को खाते हैं परिणामस्वरूप ग्रसित टहनियाँ सूख जाती हैं और उनमें पुष्पन एवं फलन नहीं होता है। टहनी बेधक कीट का अधिकतम प्रकोप सितम्बर-अक्टूबर माह में देखा गया है। इस कीट के पिल्लू नवजात फलों में अप्रैल-मई माह के दौरान डंठल के पास छिद्र बनाकर प्रवेश करते हैं जिनके प्रकोप से फल झड़ जाते हैं, जिससे किसानों को काफी आर्थिक नुकसान होता है। कीट के पिल्लू की उपस्थिति की जानकारी नवजात, गिरे एवं परिपवक्व फलों के डंढल के पास काले रंग के बुरादे (बिष्ठा) के रूप में होती है। इस कीट की अगली पीढ़ी का प्रकोप पुनः पूर्णविकसित फलों में (जब फल लालिमायुक्त अवस्था में हों) मई के प्रथम एवं द्वितीय सप्ताह में होता है। अण्डों से पिल्लू निकल कर सर्वप्रथम फलों/मुलायम टहनियों को खाकर अपना जीवन यापन करते हैं, तद्नोपरांत पूर्ण विकसित पिल्लू बाहर निकलकर पत्तियों की सतह पर झिल्ली बनाकर उसमें प्यूपेट करते हैं। किसान भाईयों के लिए यही सबसे महत्वपूर्ण समय होता है कि कीट की पहचान कर इसकी रोकथाम हेतु संस्तुति के अनुसार प्रबंधन करें। समेकित प्रबंधन कार्यक्रम नई कोपलों के आने के समय उन पर लगने वाले कीटों की रोकथाम अवश्य करें । आंतग्रही (सिस्टेमिक) कीटनाशी रसायन जैसेः थियाक्लोप्रीड 21.7 एस. सी. या इमिडाक्लोप्रीड 17.8 एस. एल. कीटनाशी का छिड़काव 0.5-0.7 मिली/लीटर की दर से 15 दिनों के अंतराल पर सितम्बर माह में 2बार करें । पुष्पन के समय (फूल खिलने से पहले) नीम बीज अर्क या नीम तेल (4 मिली/लीटर) का छिड़काव करने से मादा कीट अण्डे नहीं दे पाती है।फल के लौंग आकार की अवस्था होने पर नोवाल्यूरान 10 ई.सी. (1.5 मिली/लीटर) या ल्यूफेन्यूरान 5 ई.सी. (0.6 मिली/लीटर) नामक कीटनाशी का दो छिड़काव 10-15 दिनों के अंतराल पर करें। मंझोले आकार के फल होने पर (फल लगने के लगभग 30 दिन उपरांत) होने पर सायपरमेथ्रिन 25 ई.सी. (0.5 मिली/लीटर) या इमामेकटिन बेन्जोएट 5 एस. जी. (0.4 मिली/लीटर) नामक कीटनाशी का एक छिड़काव सुनिश्चित करें । संभावित फल तुड़ाई के लगभग 15 दिन पूर्व नोवाल्यूरान 10 ई.सी. (1.5 मिली/लीटर) या सायपरमेथ्रीन २५ ई.सी. (0.5 मिली/लीटर) कीटनाशी का एक छिड़काव अवश्य करें। एहतियात/सजगता बदलते मौसम की दशा में (असमय वर्षा, फल तैयार होने के समय पूर्वा हवा का बहना या वातावरण में आद्र्रता की अधिकता होने पर) फलों को फल बेधक कीट से बचाव हेतु एक अतिरिक्त छिड़काव थियाक्लोप्रीड 21.7 एस. सी. या इमिडाक्लोप्रीड 17.8 एस. एल. कीटनाशी का 0.5-0.7 मिली/लीटर की दर से अनुमानित तुड़ाई के 15 दिन पूर्व अवश्य करें । जैविक प्रबंधन कार्यक्रम (शिडयूल) कीटनाशी रसायनों के दुष्परिणामों को ध्यान में रखते हुए यह आवश्यक हो गया है कि कम से कम रसायनिक दवाओं का प्रयोग किया जाय एवं कीटों के नियत्रण व रोकथाम हेतु दूसरे उपायों जैसे जैव-कीटनाशी (बायोपेस्टीसाइड) कृषिगत क्रियाएँ, यान्त्रिक उपायों एवं कार्बनिक उत्पादों, आदि को जहाँ तक सम्भव हो अपनाया जाय। इसमें दो या दो से अधिक नियंत्रण विधियों को समन्वित कर इस प्रकार उपयोग में लाते हैं ताकि हानिकारक कीटों की संख्या में इनती कमी आ जाय कि वे लीची फसल को आर्थिक हानि न पहुँचा सकें। मंजर निकलने के बाद एवं फूल खिलने से पूर्व नीम तेल (4 मिली/लीटर) घोल का एक छिड़काव अवश्य करें । पंचगव्या (30 मिली/लीटर) घोल का पहला छिड़काव जब फल के दानंे लौंग आकार के हों तथा दूसरा छिड़काव फलों में लाली आने के समय करें। पंचगव्या को गाय के घी, मूत्र, गोबर, दही एवं दुग्ध को मिलाकर केला एवं ईख के रस के साथ मिश्रित कर बनाया जाता है। बायोडायनेमिक जैव कीटनाशी (गाय के मूत्र, गोबर, नीम के हरे पत्ते या अकवन (मदार) के पत्तों को एक निश्चित मात्रा में मिलाकर एवं उसके पूर्ण रूप में सड़ने एवं गलने के उपरान्त छान कर बनाया जाता है) (50 मिली/लीटर) को 10 दिनों के अंतराल पर दो छिड़काव फल विकास की अवस्था तथा दूसरा छिड़काव फल तुड़ाई के संभावित समय से 10 दिन पूर्व करें। एहतियात एवं सजगता उत्तम कृषि क्रियाओं जैसे प्रभावित/ग्रसित एवं सूखी टहनियों की जून माह में कटाई-छंटाई तथा पौधों के जड़ फैलाव क्षेत्र में 4 किग्रा अंडी खल्ली तथा 1 किग्रा. नीम खली का व्यवहार करें, साथ ही साथ कीटनाशी (नीम आधारित रसायन 4 मिली/लीटर) का नये कल्लों के निकलने के समय पर छिड़काव करने से जैविक कार्यक्रम का बेहतर प्रभाव पड़ता है। सामान्य रखरखाव तुड़ाई उपरांत पौधों की कटाई-छंटाई तथा बगीचे की सफाई के साथ गिरें हुए फलों को हटाने से बागों में कीटों की संख्या में कमी आती है। खरपतवार की सफाई एवं नीचे गिरे फलों को हटाने से बगीचे में कीटों की सख्यां में अप्रत्याशित कमी आती है। लीची फलों के गुच्छे को पाली प्रोपलीन (नान ओवेन बैग) थैलों के अंदर रखने पर मादा कीट फलों पर अण्डे नहीं दे पाती है। हॉलो कोन नोजल युक्त पावर स्प्रयेर की सहायता से पौधों के भीतरी एवं बहारी भागों में तथा चारों दिशाओं से छिड़काव करना श्रेयस्कर होता है। कीटनाशी के घोल में पत्तियों पर दवा को चिपकने वाले द्रव्य (स्टीकर) को 0.4 मिली/लीटर की दर से अवश्य मिलायें, इससे दवा का असर ज्यादा होता है एवं वर्षा के दिनों में अगर 4 घंटे तक भी वातावरण खुला रहा तो छिड़काव असरदार साबित होता है। बेहतर परिणाम प्राप्त करने के लिए इस कीट की रोकथाम हेतु सामुहिक स्तर पर किया गया प्रयास अधिक कारगर सिद्ध होगा । गुणवत्तायुक्त फलोत्पादन हेतु संस्तुति के अनुसार खाद, उर्वरक एवं खली का व्यवहार करें। मृदा में कार्बिनक पदार्थ की मात्रा को समुचित बनाये रखने हेतु हरी खाद (ढैंचा/सनई/ दलहन) का प्रयोग करें। समुचित परागण हेतु बागों में फूल खिलने के पूर्व मधुमक्खी के बक्से (10-15/हे.) अवश्य रखें। स्त्राेत : संकलन एवं संपादन कुलदीप श्रीवास्तव, रामकिशोर पटेल, अमरेन्द्र कुमार एवं शेषधर पाण्डेय, प्रो. (डाॅ.) विशाल नाथ, निदेशक विशेष जानकारी के लिए संपर्क करें निदेशकः भाकृअनुप-राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केन्द्र, मुशहरी, मुजफरपुर-842002 (बिहार) वेबसाईटः https://www.nrclitchi.org/