<p style="text-align: justify;">ऑर्किड्स लंबे समय से मनुष्य के आकर्षण का केंद्र रहा है। इसके फूल अपने अद्भुत आकार, रंग, रूप और सुगंध के लिये विश्वविख्यात हैं। ऑर्किड्स के फूलों में एक अद्भुत आकर्षण क्षमता होती है, जो सबको अपनी ओर मोहित करती है। इसमें अन्य फूलों की अपेक्षा अधिक लंबे समय तक ताजा अवस्था में बने रहने की भी क्षमता होती है। ऑर्किड्स विशालतम कुसुमित पौधों के परिवार से संबंधित है। इसकी 2500 प्रजातियां अनुमानित हैं और बहुत सी किस्में खोज के द्वारा पंजीकृत की जा रही हैं। पूरे देश में लगभग 1350 ऑर्किड्स की प्रजातियां पाई जाती हैं और ये देश के उष्णकटिबंधीय से लेकर समशीतोष्ण जलवायु क्षेत्रों में वितरित हैं। इनकी खेती कटफ्लावर्स, पॉटेड पौधे और बहुत से बहुमूल्यवर्धित उत्पादों के लिये व्यावसायिक रूप से की जाती है। सबसे अधिक प्रसिद्ध और व्यावसायिक रूप से खेती की जाने वाली प्रमुख ऑर्किड्स प्रजातियां सिम्बिडीयम, डेंड्रोबियम, सिडियम, फेलोनोप्सिस, वंडा तथा पेफियोपेडिलम हैं। देश की विशाल ऑर्किड्स संपदा के महत्व को प्रकाश में लाने के लिए विभिन्न राज्यों से ऑर्किड्स जर्मप्लाज्म संग्रहण एवं संरक्षण तथा रखरखाव का काम वर्ष 1998 से भाकृअनुप-राष्ट्रीय ऑर्किड्स अनुसंधान केंद्र, पाक्योंग, पूर्व सिक्किम द्वारा किया जा रहा है।</p> <h3 style="text-align: justify;">कीट का जीवनचक्र</h3> <p style="text-align: justify;">टिपभेदक कीटों का जीवनचक्र 4 चरणों में पूरा होता है। प्रथम चरण अंडा, द्वितीय चरण डिम्भक, तृतीय चरण प्यूपा और चतुर्थ चरण वयस्क। मादा कीट ऑर्किड्स के प्ररोह के ऊपरी पत्तियों (सबसे कोमल पत्ती) के ऊपर अपने अंडे देती है। इन अंडों से डिम्भक निकलते हैं। इनसे कुछ समय के बाद प्यूपा बनते हैं, फिर प्यूपा से वयस्क टिपभेदक कीट तैयार हो जाते हैं। इस प्रकार इनका जीवनचक्र पूरा हो जाता है।</p> <p style="text-align: justify;">ऑर्किड्स के उत्पादन क्षेत्र में फसल की जीसीमित गुणवत्ता एवं कम उत्पादन के प्रमुख कारक अजैव कण और कीट हैं। विभिन्न कीट, जो कि ऑर्किड्स को प्रकोपित करते हैं, उनमें से स्केल कीट, माहूं, पर्णनाशी, झींगुर एवं गैर कीट जैसे-बरुथी, घोंघा तथा मल कीट प्रमुख हैं।संरक्षित अवस्था में ऑर्किड्स की खेती को कीटों से बचाया जा सकता है। इसलिये ग्लासगृह, हरितगृह आदि में कीटों का विकास अधिक तीव्र गति से होता है। हरितगृह में फसलों पर आर्थोपोड कीट द्वारा की गई क्षति, कीट और मौसम के अनुसार बदलती रहती है। फसल द्वारा सहन करने की क्षमता फसल की प्रजातियों के ऊपर निर्भर करती है। ऑर्किड्स को संक्रमित करने वाले टिपभेदक कीट, उनकी जैविकी और नुकसान करने के तरीके एवं एकीकृत कीट प्रबंधन निम्नलिखित हैं टिपभेदक कीटों की वयस्क मादा ऑर्किड्स के प्ररोह की ऊपरी पत्तियों पर अपने अंडे देती हैं। इनके वयस्क नर और मादा में थोड़ा अंतर होता है। वयस्क मादा, नर वयस्क की अपेक्षा आकार में थोडी बड़ी होती हैं। ऑर्किड्स को इनके अंडों सेनिकलने वाले डिम्भक सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>वैज्ञानिक नामः</strong></p> <p style="text-align: justify;">पेरीडिडाला स्पिसीज परिवारः टोरट्रिसाईडी वर्गः लेपिडोप्टेरा डेंड्रोबियम नोबिले, डेंड्रोबियम डेंसिफ्लोरम, डेंड्रोबियम संकर, अरंडा संकर, मोकारा संकर, वंडा, पेपीलियोनेन्थे, एरैडिस, अकैम्पे, इरिया, ईपीडेंड्रम तथा लिपेरिस इत्यादि।</p> <h3 style="text-align: justify;">वितरण</h3> <p style="text-align: justify;">केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कर्नाटक ओडिशा, अंडमान एवं निकोबार और देश के उत्तर-पूर्व राज्यों तथा हिमालय क्षेत्रों में पाये जाते हैं। </p> <h3 style="text-align: justify;">पहचान</h3> <p style="text-align: justify;">इस कीट के वयस्क छोटे और इनका रंग गहरा भूरा अथवा काला होता है। इनके पंखों पर छोटे-छोटे सफेद रंग के चमकीले धब्बे होते हैं। इनके पंखों का फैलाव लगभग 8-10 मि.मी. तक होता है। इस कीट का डिम्भक पीले रंग का होता है। इसके शरीर का अगला भाग (सिर) काला होता है और जैसे-जैसे डिम्भक बढ़ते जाते हैं, इनके शरीर का रंग हल्के हरे रंग में परिवर्तित होता जाता है। डिम्भक, ऑर्किड्स के प्ररोह को खाने के साथ-साथ अपने मल को ऊपर निकालते जाते हैं यही इनकी उपस्थिति की पहचान होती है।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/hh10.jpg" width="215" height="119" /></p> <h3 style="text-align: justify;"> क्षति पहुंचाने की प्रवृति</h3> <p style="text-align: justify;">ये कीट ऑर्किड्स की कई प्रजातियों को नुकसान पहुचाते हैं। इस कीट का आक्रमण मार्च से अक्टूबर तक होता है। जब मादा कीट अपने अंडों को प्ररोह के ऊपर छोड़ती है, उस समय वर्षा ऋतु का आरंभ होता है। इसके बाद डिम्भक निकलते ही ऑर्किड्स को अपने मुखांगों द्वारा खाना शुरू कर देते हैं। ये उस पर एक सुरंग बना लेते हैं तथा उसके अंदर प्रवेश कर जाते हैं। ये कीट अंदर के भागों (जाइलम एवं फ्लोयम) को खाते हैं, जिसके कारण पौधे का ऊपरी भाग सूख जाता है। इससे पौधों की वृद्धि रुक जाती है। टिपभेदक कीट के अधिक प्रकोप से फूल नहीं लगते और यदि लग भी गए तो फूल की गुणवत्ता खराब हो जाती है।इसका बाजार में उचित मल्य नहीं मिल पाता है और किसानों को आर्थिक रूप से नुकसान हो जाता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">एकीकृत कीट प्रबंधन </h3> <h4 style="text-align: justify;">परंपरागत प्रथाएं</h4> <p style="text-align: justify;">• स्वच्छ खेती के लिए संक्रमित पौधों को झुंड से अलग कर देना चाहिए। </p> <p style="text-align: justify;">वायु संचार, उर्वरक और सिंचाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए।</p> <p style="text-align: justify;">वर्षा ऋत में कम से कम 10-15 दिनों के अंतराल पर पानी देना चाहिए।</p> <p style="text-align: justify;">जिस प्ररोह पर इस कीट का प्रकोप हो जाये, उसको ऊपर से काटकर फेंक देना चाहिए, जिससे टिपभेदक कीट का जीवनचक्र पूरा न हो सके।</p> <p style="text-align: justify;">हरितगृह अथवा पॉलीगृह के चारों तरफ कीट अवरोधक जाली लगानी चाहिए, जिससे इनके मादा कीट अपने अंडे न दे पायें।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/hh9.jpg" width="260" height="191" /></p> <h4 style="text-align: justify;">जैविक नियंत्रण</h4> <p style="text-align: justify;">जैसे ही इस कीट के अंडे पौधों पर दिखाई दें, तुरन्त ही नीम तेल 0.03 प्रतिशत का 5 मि.ली. प्रति लीटर पानी के साथ मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।</p> <p style="text-align: justify;">सूक्ष्मजीव जैविक कीटनाशक बैसिलस थुरीजिएन्सिस अथवा मेटाराइजम ऐनिसोपलिए का 2-3 मि.ली. प्रति लीटर पानी के साथ मिलाकर छिड़काव 10-15 दिनों केअंतराल पर करते रहना चाहिए।</p> <h4 style="text-align: justify;">रासायनिक नियंत्रण</h4> <p style="text-align: justify;">जब टिपभेदक कीटों का प्रकोप ज्यादा हो जाये तो आवश्यकता पड़ने पर इनमें से किसी एक कीटनाशक जैसे-फिप्रोनिल, एंडोसल्फान, ट्राइजोफॉस अथवा क्लोरपाइरिफॉस का 0.05 प्रतिशत घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), राकेश कुमार सिंह, एस.एस. विश्वास, लक्ष्मण चन्द्र, डी.डी.आर. सिंह और रूमकी संगमा, भाकृअनुप-राष्ट्रीय ऑर्किड अनुसंधान केंद्र, <br />पाक्योंग-737106 (सिक्किम)</p>