<p style="text-align: justify;">वर्तमान परिवेश में परंपरागत कृषि में बदलाव करते हुए हमें औषधीय एवं सगंधीय पौधों की ओर ध्यान देने की जरूरत है। इससे एक तरफ जहां किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य साकार हो सकेगा और वहीं दूसरी तरफ फसल विविधीकरण को नई दिशा मिल सकेगी। इस परिप्रेक्ष्य में गुलाब की खुशबूयुक्त जिरेनियम की खेती किसानों के लिए अत्यन्त लाभकारी साबित हो सकती है। जिरेनियम के तेल की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए उन्नत कृषि तकनीकें विकसित की गई हैं, जो पैदावार बढ़ाने में सहायक हैं। इन कृषि तकनीकों को अपनाकर किसान उच्च गुणवत्ता वाले तेल को प्राप्त कर अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।</p> <p style="text-align: justify;">रेनियम एक सुगन्धित पौधा है, जो व्यावसायिक रूप से तेल के लिए उगाया जाता है। इसे गुलाब की खुशबूयुक्त जिरेनियम भी कहा जाता है। यह गरीबों के गुलाब के रूप में जाना जाता है। जिरेनियम का मुख्य उत्पाद इसकी पत्तियों, तने और फूलों से निकलने वाला तेल है। इसमें स्वास्थ्य लाभ के उत्कृष्ट गुण हैं और इसका उपयोग सुगंधित उपचारों में भी किया जाता है। तेल निष्कर्षण के लिए जिरेनियम की सबसे आम प्रजाति पेलागोनियम ग्रेवोलेंस है। इसकी वर्तमान में अंतर्राष्ट्रीय मांग 600 टन से अधिक है, जो ज्यादातर चीन, मोरक्को, मिस्र और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों द्वारा परी की जाती है। 149 टन वार्षिक खपत के मुकाबले भारत में सालाना 5 टन जिरेनियम तेल का उत्पादन होता है। शेष मात्रा का बड़े पैमाने पर आयात किया जाता है, जिसमें काफी विदेशी मुद्रा खर्च होती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">जलवायु</h3> <p style="text-align: justify;">जिरेनियम की फसल को विविध जलवायु परिस्थितियों में उगाया जा सकता है, लेकिन यह कम आर्द्रता वाली हल्की जलवायु में अच्छा प्रदर्शन करती है। इसे 1000 से 2000 मीटर तक अलग-अलग ऊंचाई पर उगाया जा सकता है। इस फसल को 100 से 150 सें.मी. वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है। इस मात्रा से अधिक वर्षा कई कवक रोगों का कारण बनती है और फसल की पैदावार को प्रभावित करती है।</p> <h3 style="text-align: justify;"> मृदा</h3> <p style="text-align: justify;">जिरेनियम की फसल बारीक, बलुई, दोमट एवं शुष्क मृदा में अच्छा प्रदर्शन करती है। खारी एवं क्षारीय मृदा इसकी खेती के लिए अयोग्य है। जैविक कार्बन समृद्ध मृदा इसकी खेती के लिए अच्छी है और यदि मृदा में कैल्शियम मौजूद है, तो यह बहुत अच्छा प्रदर्शन करती है। इसकी खेती के लिए मृदा का पी-एच मान 5.5 से 7.5 होना चाहिए। </p> <h3 style="text-align: justify;">प्रजातियां</h3> <p style="text-align: justify;">बोरबोन/रियुनियन, अल्जीरियन/ट्यूनीस्पिन इजिप्सियन/केलकर, सिम-पवन जिरेनियम की प्रमुख किस्में हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">भूमि की तैयारी</h3> <p style="text-align: justify;">अच्छी तरह से पौधों की स्थापना जिरेनियम की फसल में प्राथमिक आवश्यकता है, क्योंकि यह लंबी अवधि की फसल है। इसकी खेती के लिए सभी प्रकार के खरपतवारों को हटाने के बाद मृदा को बारीक अवस्था में रखना चाहिए। खेत से अतिरिक्त पानी निकालने के लिए भूमि में हल्की ढलान होनी चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;">पौध तैयार करना</h3> <p style="text-align: justify;">साधारणत भारत में जिरेनियम के बीज नहीं बनते हैं, इसलिए इसकी पौध तैयार करने के लिए कलमों का प्रयोग किया जाता है। भूमि का चुनाव करते समय ध्यान दें कि पौधशाला में सूर्य के प्रकाश की समुचित व्यवस्था हो तथा मृदा बलुई दोमट होनी चाहिए।</p> <h4 style="text-align: justify;">क्यारियां बनाना</h4> <p style="text-align: justify;"> क्यारियों में सितंबर अथवा फरवरी में अच्छी प्रकार की जुताई की जानी चाहिए। खरपतवाररहित भूमि में खाद पर्याप्त मात्रा में डाल देनी चाहिए तथा क्यारी भूमि से 8-10 सें.मी. उठी हुई बनानी चाहिए।</p> <h4 style="text-align: justify;">कलम बनाना</h4> <p style="text-align: justify;">प्रायः 5 माह से अधिक आयु के लिए फरवरी-मार्च अथवा सितंबर-अक्टूबर का समय सबसे उपयुक्त है। इसके लिए 5-7 गांठ वाली टहनी को चुनते हैं। टहनी की लंबाई 10 से 15 सें.मी. और मोटाई पेन्सिल के समान होनी चाहिए।</p> <h4 style="text-align: justify;">कलमों का उपचार</h4> <p style="text-align: justify;">कटिंग के रोपण से पहले, कटिंग का विकास हार्मोन (इंडोल-3 ब्यूटिरिक एसिडः 'रूटेक्स') और कवकनाशी (0.3 प्रतिशत डाइथेन एम-45) के साथ किया जाना चाहिए। कटिंग को लगभग 30 मिनट के लिए कवकनाशी घोल में डुबोया जाना चाहिए। नर्सरी रोपण क्षेत्र को भी एक ही कवकनाशी के साथ उपचारित किया जाना चाहिए।</p> <h4 style="text-align: justify;"><strong>पौध रोपण</strong></h4> <p style="text-align: justify;">पौध रोपण के लिए तैयार खेत में 45 से 60 दिनों पुरानी जड़युक्त पौध को 50 सें.मी. x 50 सें.मी. की दूरी पर रोपित करते हैं। जड़युक्त पौधों को रोपित करने से पहले फफूंदीनाशक (थीरम या बाविस्टीन या डाइथेन एम-45) के 0.3 प्रतिशत घोल में 30 मिनट तक उपचारित करें।</p> <h4 style="text-align: justify;">खाद व उर्वरक</h4> <p style="text-align: justify;"> जिरेनियम एक पत्तीदार फसल है। इसलिए पत्तियों के उत्पादन की दृष्टि से खाद एवं उर्वरकों की उचित मात्रा में व्यवस्था करना ठीक रहता है। खेत तैयार करते समय 50 क्विंटल/हैक्टर की दर से वर्मीकम्पोस्ट अथवा 300 क्विंटल गोबर की सड़ी हुई खाद डाल देनी चाहिए। पौध रोपण के 15 दिनों बाद रासायनिक उर्वरकों का उपयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करना चाहिए। नाइट्रोजन, फॉस्फोरस तथा पोटाश 150:60:40 कि.ग्रा. का प्रति हैक्टर की दर से प्रयोग करना चाहिए। फॉस्फोरस तथा पोटाश की सम्पूर्ण मात्रा अंतिम जुताई के समय मिलाएं तथा नाइट्रोजन को पांच बार 30 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर की दर से 15-20 दिनों के अंतराल पर डालें। </p> <h4 style="text-align: justify;">सिंचाई</h4> <p style="text-align: justify;">पौध लगाते समय पौधों को जीवित रखने के लिए सिंचाई करना अति आवश्यक है। सिंचाई का अंतराल व पानी की मात्रा मृदा के प्रकार और मौसम पर निर्भर करती है। सामान्य तौर पर फसल को 5 से 6 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। आवश्यकता से अधिक सिंचाई से फसल में जड़गलन रोग की आशंका बढ़ जाती है, जिसके फलस्वरूप पौधे मरने लगते हैं और पैदावार प्रभावित होती है।</p> <h4 style="text-align: justify;"> खरपतवार नियंत्रण</h4> <p style="text-align: justify;">किसी भी फसल की पैदावार को बढ़ाने में खरपतवार नियंत्रण की एक महत्वपूर्ण भूमिका है। सामान्यतः जिरेनियम में खरपतवार कम उगते हैं, किन्तु शुरूआत में पौध रोपण के बाद निराई-गुडाई करके काफी हद तक खरपतवारों को रोका जा सकता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">कीट व रोग</h3> <h4 style="text-align: justify;"> उकठा रोग</h4> <p style="text-align: justify;">यह रोग फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरियम नामक फफूंद के संक्रमण से होता है।</p> <h4 style="text-align: justify;">उपचार</h4> <p style="text-align: justify;">इस रोग के जैसे ही लक्षण दिखाई दें, तुरन्त सिंचाई रोक देनी चाहिए। बेनलेट अथवा बाविस्टीन का घोल/छिड़क देना चाहिए। पौध रोपण के समय पौधों को सेरेसान, थीरम या इमिसान के घोल से उपचारित कर लेना चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;">जड़गलन रोग</h3> <p style="text-align: justify;">मुख्य रूप से फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरियम, पीथियम प्रजातियां व वलीओस्पोरियम प्रजातियां यह रोग उत्पन्न करती हैं।</p> <h4 style="text-align: justify;"> उपचार</h4> <p style="text-align: justify;">रोग की पहचान होने पर 0.25 प्रतिशत (25 ग्राम दवा 10 लीटर की बाल्टी में मिलाकर) डाइथेन एम-45 अथवा कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का छिडकाव करना चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;">दीमक का प्रकोप</h3> <p style="text-align: justify;"> फ्यूराडान या फोरेट 20 कि.ग्रा./हैक्टर धूल या रेत में मिलाकर पौध रोपण से पूर्व मृदा में प्रयोग किया जाना चाहिए। खड़ी फसल में क्लोरोपायरीफॉस 800 मि.ली./हैक्टर की दर से भूमि नमी की अवस्था में छिड़काव कर देना चाहिए।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>कटवा कीट एवं गुबरैला/व्हाइट ग्रब का </strong></p> <h3 style="text-align: justify;">प्रकोप</h3> <p style="text-align: justify;">खेत में कच्चे गोबर के प्रयोग से ये कीट आक्रमण करते हैं। ये पौधों की पत्तियों को काट देते हैं, जिससे पौधा धीरे-धीरे सूख जाता है।</p> <h4 style="text-align: justify;">उपचार</h4> <p style="text-align: justify;">दर से रेत में मिलाकर भूमि में बुरकाव अथवा छिड़काव करना चाहिए। इसके बाद सिंचाई अवश्य कर देनी चाहिए। निमेटोड या कटवा कीटजनित रोगों के लिए 20 कि.ग्रा. एल्ड्रिन/ हैक्टर की दर से उपयोग किया जा सकता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">जैविक नियंत्रण</h3> <p style="text-align: justify;">इन कीटों से फसल को बचाने के लिए नीम की खली, केंचुए की खाद, अथवा एप्रीकोट इत्यादि का प्रयोग करने से मृदाजनित रोगों से बचाव किया जा सकता है। अमलतास के छिलकों का गूदा भी सूत्रकृमिजनित रोगों के नियंत्रण में प्रभावी होता है।</p> <h3 style="text-align: justify;"> पत्तियों की कटाई</h3> <p style="text-align: justify;">सामान्यत अच्छी देखरेख किये जाने पर जिरेनियम की पत्तियों की पहली कटाई रोपण के 3-4 माह बाद कर सकते हैं। इनकी कटाई उनके पूर्ण विकसित होने पर की जानी चाहिए। पत्तियां अधिक रसीली या अधिक पीली नहीं होनी चाहिए।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>नोटः</strong> पत्तियों का रंग गहरे हरे रंग से बदलकर हल्का पीला पड़ गया हो। इन्हें मसलने पर गुलाब जैसी खुशबू आनी चाहिए। - तीखी नीबूयुक्त खुशबू का होना यह दर्शाता । है कि उस समय पत्तियों में 'सिट्रानेलोल' की । मात्रा जिरेनिओल की तुलना में अधिक है।</p> <p style="text-align: justify;"><strong>व्यावसायिक स्तर पर जिरेनियम तेल </strong></p> <p style="text-align: justify;"><strong><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/1234a31.jpg" width="160" height="115" /></strong></p> <h4 style="text-align: justify;">उत्पादन</h4> <p style="text-align: justify;">पत्तियों में जिरेनियम तेल की मात्रा कई । बातों पर निर्भर करती है जैसे-जलवायु, समुद्रतल । से ऊंचाई, परिवहन के तरीके, प्रजाति, पौधों । की आयु, आसवन के तरीके,खेती की देख रेखआदि। समुद्रतल से 1000-1800 मीटर ऊंचाई होने पर इससे 0.12-0.20 प्रतिशत तक तेल । प्राप्त किया जा सकता है। प्रति हैक्टर पत्तियों । की मात्रा 250 से 300 क्विंटल, तेल 0.1 ई प्रतिशत के आधार पर 25 से 30 कि.ग्रा./हैक्टर । प्रतिवर्ष प्राप्त किया जा सकता है। ।</p> <h3 style="text-align: justify;">तेल की गुणवत्ता एवं मूल्य वृद्धि</h3> <p style="text-align: justify;">जिरेनियम से प्राप्त तेल सुगन्धित होता है। प्राप्त तेल को छानकर नमीयुक्त करने के बाद एल्यूमिनियम के बर्तन में रखकर बन्द कर देना चाहिए। 20 डिग्री तापमान पर जिरेनिओल 50-80 प्रतिशत तथा सिट्रोनेलोल 20 से 50 प्रतिशत तक होती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">आय-व्यय</h3> <p style="text-align: justify;">व्यय प्रति हैक्टर 80,000 रुपये, आय प्रति हैक्टर 2 50,000 रुपये एवं शुद्ध लाभ प्रति हैक्टर-1,70,000 रुपये। </p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), सीमैप अनुसंधान केन्द्र, पन्तनगर, ऊधम सिंह नगर-263149 (उत्तराखंड)-दिपेन्द्र कुमार, अमित तिवारी, सोनवीर सिंह,गुंजन भट्ट, आर.सी. पडालिया, वेद राम सिंह एवं प्रियंका सूर्यवंशी-सीमैप, लखनऊ-226002 (उत्तर प्रदेश)<br /><br /></p>