पुष्प जगत में गुलाब का महत्वपूर्ण स्थान है। इसको फूलों का राजा भी कहा जाता है। गुलाब के पुष्पों की मांग, भारत सहित विश्वभर में 12-13 प्रतिशत वार्षिक दर से बढ़ रही है। इसकी खेती देश में खपत व विदेश में निर्यात करने के लिए, दोनों रूप में, महत्वपूर्ण है। गुलाब को कट फ्लावर, गुलाब जल, गुलाब तेल, गुलकंद आदि उत्पादों के लिए भी उगाया जाता है। गुलाब के लिए बीच की जलवायु, अर्थात न अधिक ठंड एवं न अधिक गर्मी होनी चाहिए। दूसरे शब्दों में दिन का तपमान 25-30 डिग्री सेल्सियस तथा रात का 12-14 डिग्री सेल्सियस अति उत्तम माना जाता है। खुले क्षेत्र में गुलाब उगाना मृदा गुलाब के लिए मृदा दोमट तथा अधिक कार्बनिक पदार्थ वाली होनी चाहिए, जिसका पी-एच मान 5.3 से 6.5 तक हो। पौध तैयार करना जंगली गुलाब के ऊपर 'टी' बडिंग द्वारा इसकी पौध तैयार होती है। इसकी कलम जून जुलाई में क्यारियों में लगभग 15 सें.मी. की दूरी पर लगा दी जाती है और इनमें पत्तियां फूट जाती हैं। नवंबर-दिसंबर में चाकू की सहायता से फुटाव आई टहनियों पर से कांटे साफ कर दिये जाते हैं। जनवरी में अच्छी किस्म के गुलाब से टहनी लेकर 'टी' आकार कलिका निकालकर जंगली गुलाब के ऊपर लगाकर पॉलीथीन से कसकर बांध देते हैं। इस प्रकार जुलाई-अगस्त में रोपाई के लिए पौध तैयार हो जाती है। ले-आउट और तैयारी सुन्दरता की दृष्टि से औपचारिक ले आउट करके क्यारियां तैयार की जा सकती है, जिनका आकार 5x 2 मीटर रखा जा सकता है। क्यारियों को अप्रैल-मई में एक मीटर गहराई तक खोदें और 15-20 दिनों तक खुला छोड़ दें। क्यारियों में 30 सें.मी. तक सूखी पत्तियों को डालकर खोदी गई मिट्टी से इन्हें भर दें। इसके साथ ही गोबर की सड़ी खाद खेत (क्यारी) में डाल दें। इसके बाद क्यारियों को पानी से भर दें। दीमक से बचाव के लिए फॉलीडाल धूल या कार्बोफ्यूरॉन 3 जी. का प्रयोग करें। लगभग 10-15 दिनों बाद ओट आने पर इन्हीं क्यारियों में पक्ति बनाते हुए पौधे से पौधे व पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 x 60 सें.मी. रखी जाती है। प्रजातियां संकरः क्रिमसन ग्लोरी, मिस्टर लिंकन, लव, जॉन एफ. केनेडी, जवाहर, मृणालिनी, प्रेसीडेन्ट, राधा कृष्णन, फर्स्ट लव, अपोलो, पूसा सोनिया, गंगा टाटा सेटनरी, आर्किड, सुपर स्टार, अमेरिकन हेरिटेज आदि। पाली एन्थाः अन्जनी, रश्मि, नर्तकी, प्रीति, स्वाती। फ्लोरीबन्डाः बन्जारन, देहली प्रिंसेज, डिम्पल, चन्द्रमा, सदाबहार, सोनोरा, नीलाम्बरी, करिश्मा, सूर्य किरण आदि। गैन्डी फ्लोराः क्वीन एलिजाबेथ, मान्टे जुमा आदि। मिनीपेचरः ब्यूटी सीक्रेट, रेड फ्लश, पुश्कला, बेबी गोल्ड स्टार, सिल्वर टिप्स आदि। लता गुलाबः कॉकटेल, ब्लैक ब्वाय लैमार्क पिंक मैराडोन मैरीकल नील आदि। पौध रोपाई पौध रोपाई में सावधानीपूर्वक खोदकर उत्तर भारत के मैदानी भागों में सितंबर-अक्टूबर में पौध की रोपाई करनी चाहिए। ध्यान दें कि कलिकायन वाला भाग रोपाई के समय भूमि की सतह से 15 सें.मी. ऊंचा रहे। पौधे से पौधे व पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30x60 सें.मी. रखी जाती है। पौध लगाने के तुरन्त बाद सिंचाई कर दें। सिंचाई गुलाब के लिए सिंचाई का उत्तम प्रबंध होना चाहिए और आवश्यकतानुसार गर्मी में 5-7 दिनों बाद तथा सर्दी में 10-12 दिनों बाद सिंचाई करनी चाहिए। कटाई-छंटाई (प्रनिंग) काट-छांट के लिए उत्तर प्रदेश के मैदानी भागों में अक्टूबर का दूसरा सप्ताह उपयुक्त होता है, बशर्ते काट-छांट के समय वर्षा न हो। पौधों में 3-5 मुख्य टहनियों को 30-45 सें.मी. लंबाई में काट दिया जाता है। इन्हें 45 अंश (डिग्री) पर आंख के 5 मि.मी. ऊपर से काटा जाता है, जिससे आंख खराब न हो पाये। खाद एवं उर्वरक गुलाब के विकास के लिए ठंड के दिनों में 3-4 घण्टे की धूप और रात्रि की ओस बहुत आवश्यक है। उत्तम कोटि का फूल लेने के लिए (प्रूनिंग के बाद) प्रति पौधा 10 कि.ग्रा. गोबर की सड़ी खाद मृदा में मिलाकर सिंचाई करनी चाहिए। गोबर की खाद देने के एक सप्ताह बाद जब पौधों में नई कॉपलें फूटने लगें तब 200 ग्राम नीम की खली, 100 ग्राम हड्डी का चूरा तथा रासायनिक खाद का मिश्रण 50 ग्राम प्रति पौधा जिसमें यूरिया, सुपर फॉस्फेट तथा पोटेशियम सल्फेट 1:2:1 अनुपात में हो, देना चाहिए। फूलों की कटाई सफेद, लाल और गुलाबी रंग के फूलों में अधखुली पंखुड़ियों में जब ऊपरी पंखुड़ी नीचे की ओर मुड़ना शुरू हों, तब काटना ठीक रहता है। फूलों को काटते समय एक या दो पत्तियां टहनी पर छोड़ देनी चाहिए, जिससे पौधों को वहां से फिर बढ़वार मिलती है। फूलों की कटाई के बाद देखरेख फूल काटते समय पानी की बाल्टी साथ रखें, जिससे फूलों को कटने के तुरन्त बाद पानी में रखा जा सके। बाल्टी में कम से कम 10 सें.मी. पानी अवश्य होना चाहिए, ताकि पफूलों की डंडी अच्छी तरह से भीग जाये। पानी के अंदर प्रिजर्वेटिव भी मिलाते हैं। रोग एवं कीट नियंत्रण पाउडरी मिल्ड्यू रोग (खर्रा) इस फफूंदीजनित रोग में पत्तियों, तनों तथा कलियों पर सफेद चूर्ण फैला दिखाई देता है। उपचार पौधों पर रोग की रोकथाम के लिए घुलनशील गंधक (2 ग्राम प्रति लीटर पानी में) या डाइनोकैप (1 मि.ली. प्रति लीटर पानी में) या ट्राइडेमार्फ (1 मि.ली. प्रति लीटर पानी में) का घोल बनाकर 15 दिनों के अंतर पर दो छिड़काव दवाओं को अदल-बदल कर करें। डाईबैक या उल्टा सूखा रोग इस रोग का प्रकोप वर्षा के बाद से प्रारंभ होकर दिसंबर के अंत तक होता है। इसमें टहनियां ऊपर से शुरू होकर नीचे की ओर सूखना शुरू कर देवी हैं तथा पौधे का तना काला पढ़कर मर जाता है। उपचार 50 प्रतिशत कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का 3 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें। कीट माहू अथवा चैंपा (एफिड) गुलाब में ये कीट छोटे, गोल, हरे, गहरे हरे या काले रंग के होते हैं। ये पौधे से रस चूसते रहते हैं। इनके प्रकोप से गुलाब की पत्तियां सिकुड़ जाती हैं एवं पौधा सुख जाता है। उपचार कौट दिखाई देते ही तुरन्त डाईमिथोएट 1.5 मि.ली./लीटर पानी में अथवा मोनोक्रोटोफॉस 1 मि.ली./लीटर पानी में घोलकर 2-3 छिड़काव करें। शल्क कोट इसका प्रकोप गुलाब के पौधे पर बहुतायत में होता है। ये लाल और भूरे रंग के शल्क कौट मुलायम तने का रस चूसकर उन्हें कुरूप बना देते हैं। नियंत्रण फोरेट 10-जी 3-4 ग्राम या फॉलीडाल 2 प्रतिशत धूल की 10-15 ग्राम प्रति पौधे की दर से गुड़ाई करके मृदा में अच्छी तरह से मिला देनी चाहिए। स्त्राेत : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), मनोज कुमार,सह प्राध्यापक, कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर साइंस, टी.एम.यू., मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश); सुनील कुमार, सह प्राध्यापक, आई.आई.ए.एस.टी., इंटीग्रल यूनिवर्सिटी, की रोड, लखनऊ-226026 (उत्तर प्रदेश): और शिवांशु तिवारी एस.आर.एपफ., गोबिन्द बल्लभ पन्त कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पन्तनगर (उत्तराखंड)