<p style="text-align: justify;">गुलाब दुनिया में पाए जाने वाले फूलों में सुन्दरता में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसकी खूबसूरती को देखकर किसी भी इंसान का मन आनन्द से भर सकता है। गुलाब का उपयोग कट फूलों के लिए तथा लूज फूलों के साथ-साथ कई प्रकार के मूल्यवर्द्धक पदार्थ उत्पादन करने में भी किया जाता है। इससे तैयार किये गए उत्पादों की बाजार में काफी मांग रहती है। गुलाब जल, गुलाब से तैयार किया जाने वाला एक महत्वपूर्ण उत्पाद है, जिसका लंबे समय से काफी महत्व रहा है। इसको बनाने के लिए गुलाब के फूल का 80 प्रतिशत भाग का उपयोग किया जाता है। भारत में गुलाब की खेती सुगन्धित पदार्थों के लिए मुख्यतः हिमाचल प्रदेश, मध्यप्रदेश तथा तमिलनाडु में की जाती है। उत्तर प्रदेश का अलीगढ़ जिला गुलाब जल और गुलाब तेल के लिए प्रसिद्ध है। महारानी गुलाब की राजस्थान में चित्तौड़गढ़ से हल्दीघाटी तक मुख्य रूप से मूल्यवर्द्धक पदार्थ बनाने के लिए खेती की जाती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">गुलाब की प्रमुख प्रजातियां </h3> <h4 style="text-align: justify;">रोजा डेमेसियाना </h4> <p style="text-align: justify;">गुलाब की यह प्रजाति महारानी के नाम से भी जानी जाती है। सभी प्रजातियों में इसका उपयोग परफ्यूम बनाने के लिए गुलाब की अन्य प्रजातियों की तुलना में बहुतायत से किया जाता है। इस प्रजाति के फूलों में तेल की मात्रा 0.03 प्रतिशत तक पाई जाती है। भारत में मुख्य रूप से इस प्रजाति की उगाई जानी वाली किस्मों में मुख्यतः नूरजहां, ज्वाला और हिमरोज आती हैं। मैदानी भागों में नूरजहां तथा ज्वाला किस्मों को मुख्य रूप से उगाया जाता है, जबकि हिमरोज किस्म को पहाड़ी भागों में उगाया जाता है। </p> <h4 style="text-align: justify;">रोजा बार्बोरियाना </h4> <p style="text-align: justify;">इस प्रजाति का उपयोग मुख्य रूप से गुलाब जल और गुलकन्द बनाने तथा कलम बांधने के लिए किया जाता है।</p> <h4 style="text-align: justify;">रोजा सेंटीफोलिया </h4> <p style="text-align: justify;">रोजा सेंटीफोलिया प्रजाति का उपयोग मुख्यतः गुलाब जल और गुलाब तेल बनाने के लिए फ्रांस में किया जाता है। </p> <h4 style="text-align: justify;">रोजा मोसचाटा </h4> <p style="text-align: justify;">यह गुलाब की एक जंगली प्रजाति है जो हिमालय में पाई जाती है। </p> <h4 style="text-align: justify;">रोजा अल्बा </h4> <p style="text-align: justify;">इस प्रजाति को मुख्यतः बुल्गारिया में उगाया जाता है। इसमें मुख्यतः सफेद रंग के फूल आते हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">गुलाब के मूल्यवर्द्धक उत्पाद</h3> <h4 style="text-align: justify;">गुलाब तेल </h4> <p style="text-align: justify;">गुलाब के फूल में मुख्य रूप से 12 घटकों को खोजा गया है, जिनमें से केवल एक घटक ही पानी में घुलनशील है। इसमें से 11 घटकों का उपयोग गुलाब के तेल के रूप में किया जाता है। परफ्यूम उद्योग में उपयोग होने वाले तेलों में गुलाब का तेल सबसे महंगा है। गुलाब के लगभग 35 से 40 हजार कि.ग्रा. फूलों से लगभग एक लीटर गुलाब का तेल प्राप्त किया जाता है। गुलाब के तेल में कई प्रकार के ऐसे औषधीय गुण पाए जाते हैं, जो तनाव को कम करते हैं। बाजार में गुलाब के तेल की कीमत काफी महंगी होती है। रोजा डेमेसियाना गुलाब के एक हैक्टर क्षेत्रफल से लगभग 800 मि.ली. तेल प्राप्त किया जा सकता है। गुलाब तेल की मांग लगातार बढ़ती जा रही है। इसलिए किसानों को इससे काफी अच्छा लाभ प्राप्त होता है।</p> <h4 style="text-align: justify;">गुलाब जल</h4> <p style="text-align: justify;">यह एक ऐसा द्रव पदार्थ है, जिसको गुलाब के फूल की पंखुड़ियों से निकाला जाता है। गुलाब जल का उपयोग मुख्यतः सौंदर्य प्रसाधन, धार्मिक कार्यों, औषधीय रूप में तथा खाने में फ्लेवर के लिए किया जाता है। देसी विधि से तैयार किया जाने वाला गुलाब जल बड़ी-बड़ी भट्टियों पर तैयार किया जाता है। गुलाब जल तैयार करने के लिए सबसे पहले गुलाब के फूलों को सूर्योदय से पहले तोड़ लेना चाहिए। इस विधि में तांबे की बड़ी-बड़ी कड़ाहियों का उपयोग किया जाता है। तांबे की देग में 40 कि.ग्रा. फूल लेकर उतनी ही मात्रा में पानी लेकर देग को भट्टी पर चढ़ा दिया जाता है। फिर इसको गर्म किया जाता है। तांबे की देग को बांस की नली द्वारा तांबे के मटके से जोड़ा जाता है। देग को गर्म करने पर निकलने वाली भाप को तांबे के मटके में एकत्रित किया जाता है, जब मटके में एकत्रित भाप को ठंडा किया जाता है, तो यह गुलाब जल में बदल जाती है। गुलाब के 40 कि.ग्रा. फूलों से लगभग 35 लीटर गुलाब जल तैयार किया जा सकता है। इस विधि में निकाले गए गुलाब जल को 3 श्रेणियों में बांटा जाता है। श्रेणी-ए तथा बी को गुलाब जल के रूप में काम में लिया जाता है। श्रेणी-सी को वापस देग में डाल दिया जाता है। इस विधि से गुलाब जल तैयार करने में लगभग 6 से 7 घण्टे का समय लगता है।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC2.jpg" width="218" height="191" /></p> <h4 style="text-align: justify;">गुलकंद</h4> <p style="text-align: justify;">गुलकंद, गुलाब से तैयार की जाने वाली एक स्वादिष्ट मिठाई है। यह गुलाब की पंखुड़ियों तथा मिश्री को साथ में मिलाकर तैयार की जाती है। गुलकंद को बनाने के लिए गुलाब की पंखुड़ियों तथा मिश्री को 1:1 के अनुपात में उपयोग किया जाता है। गुलकंद स्वादिष्ट होने के साथ-साथ सेहत के लिए भी फायदेमंद होता है। शरीर में गर्मी बढ़ जाने पर इसका सेवन करने से बढ़ी हुई गर्मी को कम किया जा सकता है। इसके साथ-साथ गुलकंद का सेवन शरीर में गर्मी की वजह से पैदा होने वाली समस्याओं से भी निजात दिलाता है। इसका नियमित सेवन करना दिमाग के लिए भी लाभकारी होता है। रोजाना सुबह और शाम गुलकंद की एक चम्मच मात्रा का सेवन करने से दिमाग शांत रहता है। जिन लोगों को अधिक गुस्सा आता है, उनके लिए गुस्से को कम करने में काफी लाभदायक साबित होता है। गुलाब से तैयार गुलकंद पोषक तत्वों का खजाना होने के साथ-साथ कई प्रकार के एंटीऑक्सीडेंट्स का भी अच्छा स्रोत होता है, जिसके कारण यह शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता भी बढ़ाता है। इसके अलावा यह त्वचा संबंधित रोगों के लिए भी काफी लाभदायक होता है। यह एक अच्छा एंटीबैक्टीरियल भी है। गुलकंद का सेवन खाना खाने के बाद करने से यह खाने को पचाने में मदद करता है तथा पाचन शक्ति को भी बढ़ाता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">अगरबत्ती और धूपबत्ती</h3> <p style="text-align: justify;">अगरबत्ती और धूपबत्ती बनाने के लिए पहले से काम में लिए हुए गुलाब के फूलों, जिनको अपरिष्कृत आसवन विधि से काम में लिया गया हो, का उपयोग किया जाता है। अपरिष्कृत आसवन विधि में फूलों का उपयोग पूरी तरह से नहीं हो पाता है। इसलिए उनमें कुछ मात्रा में सुगंध बच जाती है। इन फूलों को धूप में सुखाकर अगरबत्ती और धूपबत्ती बनाने के लिए काम में लिया जाता है। धूप में सूखे हुए फूलों को अगरबत्ती और धूपबत्ती बनाने के अलावा इनका उपयोग हवन सामग्री के रूप में किया जाता है।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : फल-फूल पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर),हीरा लाल अटल, महेन्द्र मीना और देवेन्द्र कुमार, बिधान चन्द्र कृषि विश्वविद्यालय, मोहनपुर (पश्चिम बंगाल) एवं राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान, जयपुर (राजस्थान)</p>