परिचय जरबेरा, भारत में व्यावसायिक रूप से उगाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण कंदीय फूल है। यह एक विदेशी और सजावटी फूल का पौधा है, जो पूरी दुनिया में उगाया जाता है। इसके फूल अत्यंत आकर्षक होते है और इसे ‘अफ्रीकन डेजी’ या ‘ट्रांसवाल डेजी’ के नाम से भी जाना जाता है। इस फूल की उत्पत्ति अफ्रीका और एशिया महाद्वीप से हुई है और यह ‘कंपोजिटा’ परिवार से संबंध रखता है। भारतीय महाद्वीप में जरबेरा, कश्मीर से लेकर नेपाल तक 1200 मीटर से लेकर 3000 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है। इसकी ताजगी और ज्यादा समय तक टिकने की खासियत के वजह से इस फूल का इस्तेमाल पार्टियों, समारोहों और बुके में किया जाता है। भारत के घरेलू बाजार में इसकी कीमत काफी अच्छी मिल जाती है। भारत में जरबेरा कट फ्लावर के प्रमुख उत्पादक राज्य-पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, तेलंगाना, ओडिशा, कर्नाटक, गुजरात, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश हैं। किसी फसल/पौधे को स्वस्थ रहने के लिए 16 प्रकार के तत्वों की आवश्यकता होती है। आर्नोंन वैज्ञानिक के अनुसार इनमें से किसी तत्व की कमी होने पर पौधे अपना जीवन स्वस्थ तरीके से पूर्ण नहीं कर पाते हैं। मुख्य पोषक तत्व कार्बन, हाड्रोजन, ऑक्सीजन (ये तत्व पौधों को जल एवं वायु से प्राप्त होते हैं), नाइट्रोजन, फ़ॉस्फोरस, पोटाश। माध्यमिक पोषक तत्व कैल्शियम, मैग्नीशियम, सल्फर। सूक्ष्म पोषक तत्व बोरॉन, मैगनीज, माँलिब्डेनम, जिंक, लोहा, कॉपर, क्लोरीन। जरबेरा में पोषक तत्वों की कमी ज्यादा दिखाई देती है। इसके कारण फसल की पैदावार और फूलों की गुणवत्ता कम हो जाती है। यदि किसान पोषक तत्व की कमी को पहचानकर, उचित नियंत्रण उपायों का उपयोग करें तो फसल की पैदावार बढ़ा सकते है। जरबेरा में पोषक तत्वों की कमी एवं लक्षण नाइट्रोजन की कमी ये लक्षण पुरानी पत्तियों में पहले दिखाई देते है एवं पौधे की बढ़वार रुक जाती है। पत्तियाँ पीली दिखाई देती है। फ़ॉस्फोरस की कमी इसमें पत्तियाँ छोटी रह जाती है और हरी व बैंगनी रंग की हो जाती है। पोटाश की कमी कमी के लक्षण पुरानी पत्तियों पर भी दिखाई देते है। इसमें पत्तियों के किनारे झुलसे से लगते हैं। कैल्शियम की कमी ये लक्षण नई पत्तियों में पहले दिखाई देते हैं। पत्तियाँ छोटी व विकृत हो जाती हैं व किनारे कटे-फटे हो जाते हैं। मैग्नीशियम की कमी पत्तियों पर धारियां बन जाती हैं। पत्तियों की नसों के बीच की जगह पीली हो जाती है। सल्फर की कमी ये लक्षण नई पत्तियों में पहले दिखाई देते हैं। पत्तियों में हरिमाहीनता हो जाने के कारण पूरी सफेद बन जाती हैं। जिंक की कमी इसकी कमी से पूरी पत्ती सफेद, पीली एवं हरे रंग में बदल जाती है। मैंगनीज की कमी इसमें पत्तियों की अंत: शिराओं में छोटे-छोटे हरिमाहीन धब्बे विकसित हो जाते हैं। अधिक कमी होने पर धब्बे हल्के हरे रंग से बदलकर पीले या भूरे सफेद हो जाते हैं। बोरॉन की कमी इसमें कमी के लक्षण प्राय: नई निकलती हुई पत्तियों पर पाए जाते हैं। इसकी कमी होने पर पत्तियाँ छोटी होकर मुड़ जाती हैं। लौह तत्व की कमी यह कमी नई पत्तियों में पहले दिखाई देती हैं। पत्तियों की शिराओं के बीच हरिमाहीनता हो जाती है। कॉपर की कमी यह नई पत्तियों में पहले दिखाई देती है। पत्तियाँ मुड़ने लगती हैं। उर्वरक प्रबंधन फर्टिगेशन अनुसूची का पौधरोपण के 3 सप्ताह के बाद से पालन करना चाहिए। भूमि की तैयारी के समय नीम केक: 2.5 टन हैक्टर के लिए फ़ॉस्फोरस: 400 ग्राम/100 वर्ग फीट के लिए मैग्नीशियम सल्फेट: 0.5 किग्रा./100 वर्ग फीट के लिए स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार