भूमिका विश्व में सोयाबीन व मूंगफली के बाद सूर्यमुखी का तिलहनी फसलों में तीसरा महत्वपूर्ण स्थान है। कम अवधि, सूखा सहनशीलता, अप्रदीप्तिकाल व सभी प्रकार की भूमि में उगने की क्षमता होने के कारण इसकी खेती विश्वभर में बड़े पैमाने पर की जाती है। हमारे देश में मूंगफली, सरसों एवं सोयाबीन के बाद तिलहनी फसलों में इसका चौथा स्थान है। इसमें लगभग 45-50 प्रतिशत तक उच्च गुणों से भरपूर तेल पाया जाता है। इसके तेल का रंग हल्का पीला व उच्च सुगंधयुक्त होता है। तेल का उपयोग कई प्रकार की खाद्य सामग्रियों के साथ-साथ सौंदर्य प्रसाधन बनाने में भी किया जाता है। सूर्यमुखी के बीजों से तेल आसानी से निकाला जा सकता है।इस तेल में लगभग 64 प्रतिशत लिनोलिक अम्ल पाया जाता है । यह मनुष्य के हृदय में कोलेस्ट्राल को कम करने में सहायक होता है । इसलिए सूर्यमुखी के तेल को हृदय रोगियों के लिए उत्तम माना जाता है । सूर्यमुखी की खली में लगभग 40-44 प्रतिशत प्रोटीन पाई जाती है, जिसका मुर्गियों व पशुओं के लिए आहार के रूप में उपयोग किया जाता है। इसके द्वारा ‘बेबी फूड' भी तैयार किया जाता है।सूर्यमुखी के दानों को कच्चा व भूनकर भी खाया जाता है । यह विटामिन ए, डी व ई का अच्छा स्रोत है। सूर्यमुखी को निम्न विशेषताओं के कारण हमारे देश में आसानी से उगाया जा सकता है: फोटो इंसेंसिटिव होने के कारण खरीफ, रबी एवं जायद सभी मौसम में इसकी खेती की जा सकती है। कम अवधि (80-120 दिनों) की फसल सभी प्रकार की भूमि एवं जलवायु में उगने की क्षमता। अधिक बीज व तेल उत्पादन। उच्च गुणों से युक्त खाने योग्य तेल। खेती कम लागत में आसानी से की जा सकती है । कम जल आवश्यकता । बाजार में अच्छे दाम का मिलना । बीजों से तेल गांवों में उपलब्ध घानी द्वारा भी आसानी से निकाला जा सकता है । जलवायु इसकी खेती के लिए जमाव के समय ठंडा मौसम, जमाव के पश्चात से पकने की अवस्था तक गर्म व साफ मौसम की आवश्यकता होती है।फूल आते समय अधिक आर्द्रता, बादल व वर्षा का होना दाना बनने की अवस्था के लिए हानिकारक होता है।यदि पकते समय तापमान की अधिक हो जाये तो लिनोलिक अम्ल की मात्रा कम होती है । सूर्यमुखी फोटो इंसेंसिटिव फसल है। इसलिए इसकी खेती वर्ष भर सफलतापूर्वक की जा सकती है । सामान्यतः यह 80-90 दिनों, रबी में 105-130 दिनों एवं जायद में 110-115 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। प्रजातियां खेती के लिए उन्नतशील संकुल व संकर सूर्यमुखी प्रजातियों को सारणी-1 में दर्शाया गया है। भूमि का चयन सूर्यमुखी की खेती मुख्य रूप से उदासीन, गहरी, अच्छा जल निकास एवं सिंचाई की उत्तम सुविधा वाली दोमट भूमि, जिसका पी-एच मान 6.5-8.5 के मध्य हो, में सफलतापूर्वक की जा सकती है। भूमि की तैयारी हल्की मिट्टी की 1 या 2 गहरी जुताई तथा दो जुताई हैरो द्वारा करनी चाहिए, ताकि खेत को खरपतवाररहित बनाया जा सके। मध्यम व भारी मिट्टी की वर्षा होने के बाद 2-3 जूताई हैरो द्वारा करने के पश्चात खेत को समतल कर बुआई करें। सिंचाई प्रबंधन खरीफ ऋतु में सूर्यमुखी को सिंचाई की कोई खास आवश्यकता नहीं होती। परंतु सूखा पड़ने की स्थिति में फूल आने से दाने बनने की अवस्था पर सिंचाई अवश्य करें। रबी एवं जायद में बुआई से पूर्व पलेवा करें ताकि बीजों का अच्छा व समान मात्रा में जमाव हो सके। रबी फसल में सामान्यतः 3 सिंचाइयां क्रमशः 4-5 पत्ती अवस्था, फूल आने पर व दाने बनते समय करनी चाहिए। जायद की फसल में 6-7 सिंचाइयां 10-15 दिनों के अंतराल पर करें। सारणी-1. भारत के विभिन्न प्रांतों के लिए संस्तुत संकुल व संकर प्रजातियां प्रदेश संकर प्रजातियां संकुल प्रजातियां महाराष्ट्र एमएसएफएच 8, केबीएसएच 1, एमएसएफएच 17, एलएसएच 1, एलएसएच 3, पीएसी 36, पीएसी 1091, एमएलएचएफएच 47, केबीएसएच 44, डीआरएसएच 1 एवं एलएसएफएच 35 मॉडर्न, सूर्या, एलएस 11, डीआरएसएफ 108,डीआरएसएफ 113, टीएएस 82 एवं एलएस 8 कर्नाटक ज्वालामुखी, सनजीन 85, एमएसएफएच 8, एमएलएचएफएच 47, केबीएसएच 44, डीआरएसएच 1, एमएसएफएच 17, पीएसी 36, पीएसी 1091 एवं डीएसएच 1 मॉडर्न, टीएनएयूएसयूएफ 7,डीआरएसएफ 108 एवं डीआरएसएफ 113 तमिलनाडु एमएसएफएच 8, केबीएसएच 1, एमएसएफएच 17, ज्वालामुखी, सनजीन 85, पीएसी 36 पीएसी 1091, टीसीएसएच 1, एमएलएचएफएच 47, केबीएस 44 एवं एसएच 416 मॉडर्न, टीएनएयूएसयूएफ 7, को 1, को 2, डीआरएसएफ108, डीआरएसएफ 113 एवं कोएसएफवी 5 आंध्र प्रदेश एपीएसएच 11, एमएसएचएफ 8, केबीएसएच 1, एमएसएफएच 17, ज्वालामुखी, सनजीन 85,, पीएसी 36, पीएसी 1091, केबीएसएच 44, एसएच 416, डीआरएसएच1 एवं एनडीएसएच1 मॉडर्न, टीएनएयूएसयूएफ 7डीआरएसएफ 108 एवं डीआरएसएफ 113 पंजाब केबीएसएच 1, ज्वालामुखी, सनजीन 85, पीएसी 36, पीएसएफएच 67, पीएसएफएच 118, केबीएसएच 44 एवं डीआरएसएच 1 मॉडर्न, डीआरएसएफ 108 एवं डीआरएसएफ 113 हरियाणा केबीएसएच 1, ज्वालामुखी, सनजीन 85, पीएसी 36, केबीएसएच 44, डीआरएसएच 1 एवं एचएसएफएच 848 मॉडर्न, डीआरएसएफ 108 एव आरएसएफ 113 गुजरात केबीएसएच 1, ज्वालामुखी, सनजीन 85, पीएसी 36, पीएसी 1091, एमएलएचएफएच47, केबीएसएच 44, एसएच 41 एवं डीआरएसएच 1 जीएयूएसयूएफ 15, टीएनएयूएसयूएफ 7, मॉडर्न, डीआरएसएफ 10एवडीआरएसएफ 113 प्रदेश संकर प्रजातियां संकुल प्रजातियां अन्य राज्य केबीएसएच 1, ज्वालामुखी, सनजीन 85, पीएसी 36, पीएसी 1091, केबीएसएच 44 एवं डीआरएसएच 1 टीएनएयूएसयूएफ 7, मॉडर्न, डीआरएसएफ 108 एवं डीआरएसएफ 113 बुआई का समय सूर्यमुखी की बुआई वर्ष भर की जा सकती है । परंतु ऐसे समय पर बुआई न करें ,जब फूल व दाने बनते समय अधिक वर्षा हो और तापमान भी 38 डिग्री सेल्सियस से अधिक रहे । खरीफ ऋतु में इसकी बुआई जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के अंतिम सप्ताह तक । रबी में अक्टूबर से नवम्बर तक । जायद में जनवरी के अंतिम सप्ताह से फरवरी के अंतिम सप्ताह तक। बीज की मात्रा सूर्यमुखी की बुआई के लिए संकुल क़िस्मों के लिए 10-12 व संकर क़िस्मों के लिए लगभग 6 कि॰ग्रा॰ बीज प्रति हैक्टर का प्रयोग करें । दूरी एवं गहराई कतार से कतार कि दूरी 60 से॰मी॰ एवं पौधे से पौधे की दूरी 30 से॰मी॰ रखी जाये । कम अवधि वाली व संकर प्रजातियों के लिए कतार से कतार की दूरी 45 सें.मी. एवं पौधे से पौधे की दूरी 30 सें.मी रखनी चाहिए। जमाव के पश्चात यदि पौधे की दूरी 30 सें.मी. रखनी चाहिए। जमाव के पश्चात यदि पौधों की संख्या अधिक हो तो 10-12 दिनों बाद विरलीकर्ण अवश्य करें। बीज शोधन सूर्यमुखी का शीघ्र जमाव व सूखे की स्थिति से बचाव के लिए बुआई से पूर्व बीजों को 12-14 घंटे शुद्ध पानी में भिगोने के पश्चात छाया वाले स्थान पर सुखा देना चाहिए। बीजजनित बीमारियों से बचाव के लिए थीरम या कैप्टॉन/2-3 ग्राम प्रति कि.ग्रा. तथा पाउडरी मिल्डय से बचाव के लिए मेटालाक्सिल/6 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करें। दीमक व अन्य कीटों से बचाव के लिए बआई से पूर्व इमिडाक्लोप्रिड/5-6 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करने के पश्चात बुआई करें। परसेंचन ( परपरागण ) क्रिया सूर्यमुखी एक परसेंचित फसल है। इसकी अच्छी पैदावार के लिए परसेंचन क्रिया का होना आवश्यक है।यह किया भौरों एवं मधुमक्खियों के माध्यम से होती है।जहां इनकी कमी हो,वहां हाथ से परसेंचन क्रिया करना लाभदायक होता है । अच्छी तरह फूल आने पर हाथ में दस्ताने पहनकर या किसी मुलायम रोयेंदार कपड़े को लेकर सूर्यमुखी के फूल के मुंडक पर चारों ओर धीरे-धीरे घुमा देना चाहिए। पहले फूल के किनारे वाले भाग पर फिर बीच के भाग पर यह क्रिया प्रात:काल 7:30 बजे तक की जा सकती है। खरपतवार नियंत्रण सूर्यमुखी की फसल को जमाव से 60 दिनों तक खरपतवारों से मुक्त रखना आवश्यक है। इसके लिए बुआई के 18-20 दिनों बाद 15 दिनों के अंतराल पर हाथ द्वारा निराई-गुड़ाई करें। फसल की लंबाई जब 60-70 सें.मी. हो जाये तो पौधों पर मिट्टी चढ़ाने का कार्य अवश्य करें। खरपतवारों के रासायनिक नियंत्रण के लिए पेंडीमेथालीन 01 कि.ग्रा. अथवा एलाक्लोर 01-1.5 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हैक्टर का 600 से 700 लीटर पानी में घोल बनाकर बुआई के 1 से 2 दिन बाद छिड़काव करें। रोग एवं कीट प्रबंधन रोग प्रबंधन रस्टः पानी लगने वाले खेतों में सूर्यमुखी की फसल को लगाने से बचें। कैप्टॉन अथवा थीरम 3 ग्राम प्रति कि.ग्रा. अथवा कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम प्रति कि.ग्रा. की दर से बीजों को उपचारित करें। डाईथेन एम-45 अथवा डाईथेन जेड-78 प्रति 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर 15 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करें। अल्टरनेरिया ब्लाइटः रोगाणुमुक्त बीजों का प्रयोग करें। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से फसलचक्र अपनायें। डाउनी मिल्ड्यूः रोगरोधी संकर प्रजातियों की बुआई करें। बीजों को मेटालॉक्सिल 6 ग्राम प्रति कि.ग्रा. की दर से उपचारित करके बुआई करें। कीट प्रबंधन सूर्यमुखी की फसल में लगने वाले कीटों को सारणी-2 में दर्शाया गया है। कटाई व मड़ाई सूर्यमुखी के बीजों में नमी की मात्रा 20 प्रतिशत अथवा मुंडकों का पिछला भाग पीला भूरा रंग का हो जाये तब मुंडकों की कटाई करनी चाहिए।काटने के पश्चात मुंडकों को छाया में सुखा लें। इसके बाद डंडे अथवा श्रेसर के द्वारा इसकी मंडाई की जा सकती है।बीजों का भंडारण करते समय नमी की मात्रा 10 प्रतिशत से रहनी आवश्यक है। उपज कृषि की उन्नत तकनीकियों को अपनाकर सूर्यमुखी की खेती की जाये तो असिंचित क्षेत्रों में इसकी पैदावार 12-15 क्विंटल तथा सिंचित क्षेत्रों में 20-25 क्विंटल प्रति हैक्टर प्राप्त होती है। खाद एवं उर्वरक शीघ्र बढ़ने व अधिक तेल उत्पादन वाली तिलहनी फसल होने के कारण अधिक पोषक तत्वों की आवश्यकता होती । इसके लिए बुआई से 2-3 सप्ताहपूर्व 8-10 टन गोबर की सड़ी हुई खाद अथवा कम्पोस्ट खाद का प्रयोग करें। इसके पश्चात 80-90 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 60 कि.ग्रा. फॉस्फोरस व 40 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हैक्टर देना आवश्यक है। नाइट्रोजन की आधी मात्रा तथा फॉस्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा बुआई के समय प्रयोग करें। शेष नाइट्रोजन की मात्रा को टॉप ड्रेसिंग के रूप में बुआई के 30 व 45 दिनों बाद समान भागों में प्रयोग करें। सारणी 2. सूर्यमुखी में लगने वाले कीट व उनका प्रबंधन कीट का प्रकार प्रबंधन कट वर्म सिंचाई के साथ क्लोरोपाइरीफॉस का 3.75 ली प्रति हैक्टर की दर से प्रयोग करें। केपिटूलम बोरर इस कीट के अंडों व लार्वा को एकत्रित कर नष्ट कर देना चाहिए। साइपरमेथ्रीन (0.005 प्रतिशत) दवा का 500-600 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। टोबेको केटरपिलर इस कीट के अंडों व लार्यों को एकत्रित कर नष्ट कर देना चाहिए। बिहार हेयर केटरपिलर हरा सेमीलूपर डाईक्लोरवास (0.05 प्रतिशत) अथवा फेनीट्रोथियान (0.05 प्रतिशत) दवा काउपज 500-600 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। लीफ हॉपर खेत व मेड़ की साफ-सफाई रखें। फास्फोमिडान (0.03 प्रतिशत) अथवा डाईमेथोएट(0.03 प्रतिशत) दवा को 500-600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।अथवा मेलाथियोन (5 प्रतिशत) अथवा क्यूनालफॉस (5 प्रतिशत) की दर से 25 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर दवा का प्रयोग करें। लेखन : कमलेश मीना, अनुराधा रंजन कुमारी और आर.पी. शर्मा स्त्रोत: कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार