<h3 style="text-align: justify;"> परिचय </h3> <p style="text-align: justify;">स्वर्ग की चिड़िया' के नाम से प्रचलित यह पुष्प उष्णकटिबंधीय जलवायु प्रदेश का हरा भरा एवं मनमोहक पुष्प है। इसकी उत्पत्ति दक्षिण अफ्रीका में मानी जाती है। स्वर्ग की चिड़िया सादृश्य यह पौधा क्रेन पुष्प के नाम से भी जाना जाता है। खिलते हुए अरुणिमा रंग के कारण यह कर्तित्व पुष्प के रूप में भी लोकप्रिय है। विश्व के कई देशों, जैसे-दक्षिण अफ्रीका, संयुक्त राज्य अमेरिका, इजरायल, नीदरलैंड, पोलैंड, जापान, चीन आदि में इसकी खेती की जाती है। भारत में 'बर्ड ऑफ पैराडाइज' की खेती हिमाचल प्रदेश तथा विविध पहाडी क्षेत्रों जैसे-दार्जिलिंग, नीलगिरी में व्यापक रूप से की जाती है।</p> <p style="text-align: justify;">वर्ड ऑफ पैराडाइज' उष्णकटिबंधीय तथा सूखा प्रतिरोधी चमकदार शाकीय पुष्प है। इसे आर्द्र जलवायु प्रदेशों में भी उगाया जा सकता है। सूर्य प्रकाश के प्रति अनुकूलित इस पौधे की पत्तियां छोटे-छोटे केले की पत्तियों के समान होती हैं एवं पत्ती से लगी डंठल पतली तथा लंबी होती है। भारत में इसकी खेती उप-समशीतोष्ण तथा उपोष्ण कटिबंधीय प्रदेशों में की जा सकती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">मृदा</h3> <p style="text-align: justify;">बर्ड ऑफ पैराडाइज की खेती विभिन्न मृदाओं में की जा सकती है। नमीयुक्त मृदा इसके विकास के लिए उपयुक्त है, परंतु अधिक जल जमाव इसके प्रतिकूल है। समुद्र के काफी समीपवर्ती क्षेत्रों को छोड़कर समुद्र इसके इतर जीवाणु द्वारा होने वाले मुरझान रोग तथा जड़ों के सड़न जैसे रोग से प्रभावित हो सकते हैं। तटीय प्रदेशों में इसे आसानी से उगाया जा सकता है। तापमान की दृष्टि से देखा जाए, तो 21 से 32 डिग्री सेल्सियस इस पौधे के संवर्धन के लिए काफी उपयुक्त है।</p> <h3 style="text-align: justify;">प्रजनन</h3> <p style="text-align: justify;">'बर्ड ऑफ पैराडाइज' बीज द्वारा प्रसारित किया जाता है। इसके अलावा पौधे के विभक्त खंड द्वारा भी इसे सरलता से प्रजनित कर सकते हैं। बीज द्वारा प्रसारित पौधों में पुष्प बनने में काफी समय (3 से 5 वर्ष) लगता है, वहीं विक्त पौध खंड से तैयार पौधों में 1 से 2 वर्ष की अवधि में ही पुष्प का विकास संभव है। व्यावसायिक रूप से प्रसारण के लिए भी पौध खंड विधि सर्वाधिक उपयुक्त है। ध्यान देने योग्य है कि उक्त विधि से प्रसारण के लिए पौधे के टुकड़ों को वसंत ऋतु के उत्तरार्द्ध अथवा ग्रीष्म ऋतु के पूर्वार्द्ध में प्राप्त करना चाहिए।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC1.jpg" width="167" height="146" /></p> <h3 style="text-align: justify;">सिंचाई</h3> <p style="text-align: justify;">मौसम की दृष्टि से कम या अधिक सिंचाई की आवश्यकता होती है। ग्रीष्म ऋतु में सप्ताह में दो बार, तो शीत ऋतु में 10 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;">उर्वरक</h3> <p style="text-align: justify;">अधिक उत्पादकता प्राप्त करने के लिए 20 ग्राम प्रति वर्ग मीटर नाइट्रोजन, फॉस्फोरस दा तथा पोटाश उर्वरक का प्रयोग सर्वोत्तम है। रतु उर्वरकों का प्रयोग पुष्प की डाली के उद्भव मुद्र से पूर्व ही करना चाहिए। वसंत ऋतु के पूर्वार्द्ध में पुष्पण होता है। । इसके संपूर्ण जीवनकाल में प्रति पौधा लगभग 6 से 7 फूलों का उत्पादन होता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">तुड़ाई विधि</h3> <p style="text-align: justify;">स्थानीय बाजारों की मांग के लिए इस प्रथम पुष्प के खुलते ही इसकी तुड़ाई कर ली जाती है। वहीं दूरस्थ बाजार की मांग के लिए पुष्प न खुला हो इसे तोड़ लेते हैं। ऊषाकाल में भूतल के समीप से इसकी तुडाई कर इसे पानी भरी बाल्टी में रख देना सर्वाधिक उपयुक्त है।</p> <h3 style="text-align: justify;">कीट एवं रोग</h3> <p style="text-align: justify;">सामान्यतः इसमें रोगों व कीटों का प्रभाव नगण्य होता है। यदा-कदा कुछ कीटों जैसे-एफिड, मिलीबग और व्हाइटफ्लाई से क्षति की आशंका रहती है। प्रणालीगत कीटनाशक द्वारा इन्हें उपचारित किया जा सकता है।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : फल-फूल पत्रिका(आईसीएआर), मोनिका पटेल, अवधेश कुमार और नीतू कुमारी- सहायक प्राध्यापक-सह-कनीय वैज्ञानिक, उद्यान महाविद्यालय, खूटपानी, चाइबासा, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, रांची</p>