<p style="text-align: justify;">कोराेना संकट के इस दौर में दुनियाभर कामें रबड़ से बने उत्पादों, खासकर, कोरोना संक्रमण से बचने के लिए डॉक्टर और नसों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली पीपीई किट की मांग बढ़ी है। पीपीई किट समेत कोरोना से बचाव के लिए बनाए गए दूसरे उत्पादों में भी रबड़ का ज्यादा उपयोग होता है। रबड़ के पेड़ का वानस्पतिक नाम हैविया ब्राजीलिएन्सिस है। भारत में इसे केरल और उत्तर पूर्वी राज्यों में प्रमुख तौर पर उगाया जाता है। एक अनुमान के मुताबिक देश में लगभग सात लाख हैक्टर क्षेत्रफल में रबड़ के बागान हैं। प्राकृतिक रबड़ को पेड़ में चीरा लगाकर मिलने वाले दूध, जिसे लेटेक्स कहा जाता है, से प्राप्त किया जाता है। इसी लेटेक्स का उपयोग गाड़ियों के ट्यूब, टायर, वाटरप्रूफ कपड़े, सर्जिकल ग्लोव्स, जूते तथा विभिन्न प्रकार के दैनिक इस्तेमाल की वस्तुओं के उत्पादन में होता है। प्राकृतिक रबड़ में खास मजबूती, लचीलापन और जलरोधी (वाटरप्रूफ) गुण होते हैं।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccccccccccccccccPIC1.jpg" width="165" height="144" /></p> <p style="text-align: justify;">पिछले कुछ वर्षों में विश्व के चौथे रबड़ उत्पादक देश भारत, यह लगातार घट रही है। ऐसे में देश में रबड़ की खेती को बढ़ावा देने के लिए आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) रबड़ का पौधा असोम में गुवाहाटी के बाहरी इलाके सरुतारी अनुसंधान फार्म में लगाया गया है। इसे देशभर में रबड़ की खेती की दिशा में एक बड़ी सफलता कहा जा रहा है। जीएम रबड़ प्लांट विकसित करने का श्रेय केरल के कोट्टायम स्थित भारतीय रबड़ अनुसंधान संस्थान को जाता है। यह केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अधीन काम करने वाले रबड़ बोर्ड के अंतर्गत आता है।</p> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 98.6025%;"> <h3>केरल में उगाया गया था देश का पहला रबड़ वृक्ष</h3> <p style="text-align: justify;">भारत में खड़ का उत्पादन सबसे पहले पेरियार तट पर उत्तरी त्रावणकोर (केरल) में हुआ था। सर हेनरी विलियम 1876 पारा (ब्राजील) से रबड़ का बीज भारत लाए थे। देश में रबड़ का उत्पादन मुख्य रूप से दक्षिण भारत में, विशेषकर केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में होता है। केरल, देश का सबसे बड़ा रबड़ उत्पादक राज्य है। इसके अलावा पूर्वोत्तर में असोम और त्रिपुरा में भी रबड़ की खेती होती है। प्राकृतिक रूप से रबड़ के वृक्ष भूमध्य रेखीय सदाबहार वनों में पाए जाते हैं। ये सबसे पहले अमेजन बेसिन में जंगली रूप में उगते थे, वहीं से रबड़ को इंग्लैण्ड के निवासियों द्वारा दक्षिण-पूर्वी एशिया में लाया गया। वर्तमान में यह विश्व की महत्वपूर्ण व्यावसायिक फसलों में से एक है। थाईलैंड, इण्डोनेशिया, मलेशिया, भारत, चीन तथा श्रीलंका प्रमुख रबड़ उत्पादक देश है। आज रबड़ आधुनिक सभ्यता का एक महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है। इससे बने उत्पादों की संख्या एवं उपयोगिता आज इतनी बढ़ गई है कि इसके अभाव में काम चलाना असंभव समझा जाता है। विश्व के समस्त रबड़ उत्पादन का लगभग 78 प्रतिशत गाड़ियों के टायर और ट्यूब बनाने में तथा शेष जूतों के तले, बिजली के तार, खिलौने, बरसाती कपड़े, खेल के सामान, बोतल, बर्फ के थैले, सर्जरी के सामान इत्यादि, बनाने में इस्तेमाल होता है।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC1.jpg" width="146" height="128" /></p> </td> </tr> </tbody> </table> <p style="text-align: justify;">जीएम रबड़ पौधा, जिसे दुनिया में इस तरह का पहला पौधा बताया जा रहा है, को एमएनएसओडी (मैंगनीजयुक्त - सुपरऑक्साइड डिस्म्यूटेज) जीन कीअतिरिक्त प्रतिकृतियां डालकर संशोधित किया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह - जीन नए विकसित रबड़ प्लांट को जलवायु - की अत्यधिक प्रतिकूल स्थितियों, जैसे बेहदगर्म और ठंडे तापमान के साथ-साथ सूखे जैसी स्थितियों में खराब होने से बचाता है। रबड़ की इस नई फसल में परिपक्वता अवधि कम होने की उम्मीद है। इससे उपज में कम समय लगेगा। यह देश के उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में रबड़ के उत्पादन को भी बढ़ावा देगा। मल रूप से प्राकृतिक रबड गर्म आई अमेजन के जंगलों में पाई जाती है और यह स्वाभाविक तौर पर पूर्वोत्तर के ठंडे वातावरण के अनुकूल नहीं है।</p> <p style="text-align: justify;">भारत में रबड़ पैदा करने वाले किसान इसमें घाटा होने की वजह से इससे दूर हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में देश में घटती रबड़ की खेती को बढ़ावा देने के लिए केन्द्र सरकार और केरल सरकार ने रबड़ किसानों के लिए रबड़ उत्पादन प्रोत्साहन योजना शुरू की है। केरल के साथ ही पूर्वोत्तर राज्यों, खासकर असोम और त्रिपुरा में भी रबड की खेती को बढ़ावा देने के लिए रबड़ बोर्ड ऑफ इंडिया ने किसानों के लिए कई योजनाओं की शुरूआत की है। इसके अलावा प्राकृतिक रबड़ की उत्पादकता बढ़ाने के लिए 13 नई किस्मों का विकास भी किया जा रहा है।</p> <p style="text-align: justify;"> स्त्राेत : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), प्रस्तुति अश्वनी कुमार निगम, नई दिल्ली ।</p>