भारत पूरे विश्व में मसाला फसलों का सबसे बड़ा उत्पादक, उपभोक्ता व निर्यातक देश है। मसालों में मिर्च का एक महत्वपूर्ण स्थान है। इसको एक अद्भुत मसाला फसल के रूप में जाना जाता है। मिर्च का भारत में उत्पादन मुख्य रूप से दो प्रकार से उपभोग के या जाता है। हरी मिर्च के रूप में देश के विभिन्न भागों में मिर्च का उत्पादन, उपभोग के लिए किया जाता है। इसके साथ ही सूखी लाल मिर्च के रूप में इसका देश के विभिन्न राज्यों में उत्पादन किया जाता है। इस रूप में इसका घरेलू खपत के अतिरिक्त बड़े पैमाने पर निर्यात भी किया जाता है। वर्ष 2018-19 के दौरान भारत में 721145हैक्टर भूमि पर विभिन्न राज्यों में मिर्च की खेती की गई। इससे लगभग 1689524 मीट्रिक टन उत्पादन प्राप्त हुआ। देश में आंध्र प्रदेश, मिर्च उत्पादन में सबसे अग्रणी राज्य हैं। तेलंगाना, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, ओडिशा व पश्चिम बंगाल भी इसके प्रमुख उत्पादक राज्य हैं। भारत की घरेलू खपत के बाद वर्ष 2018-19 के दौरान 468500 मीट्रिक टन मिर्च का विभिन्न देशों को निर्यात किया गया। इसमें सूखी लाल मिर्च के निर्यात का प्रमुख स्थान रहा तथा इसके निर्यात से देश को कुल 5411 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा भी अर्जित हुई। पूरे विश्व में मिर्च के रंग, आकार, तीखेपन व उपयोग के आधार पर भिन्नता वाली लगभग 400 किस्में विद्यमान हैं। भारत में भी मिर्च का रंग, आकार, तीखेपन व उपयोग के आधार पर भिन्नता वाली लगभग 50 से अधिक किस्में मौजूद हैं। भारत, विश्व में सबसे बड़ा मिर्च उत्पादक देश है, जो दुनिया की लगभग 36 प्रतिशत से 38 प्रतिशत तक मिर्च का उत्पादन करता है। भारत, पूरी दुनिया की 25 प्रतिशत मिर्च की आवश्यकता की पूर्ति करने वाला सबसे बड़ा देश है। इसके बाद चीन 24 प्रतिशत निर्यात के साथ दूसरे स्थान पर है। मिर्च के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी विश्वभर में हरी व लाल मिर्च का क्षेत्रफल लगभग 3.9 मिलियन हैक्टर और कुल उत्पादन लगभग 34.6 मिलियन मीट्रिक टन है। वर्ष 2018 के दौरान भारत में लाल मिर्च का क्षेत्रफल 781737 हैक्टर, जबकि चीन में लाल मिर्च का क्षेत्रफल 47753 हैक्टर था। वर्ष 2018 के दौरान भारत में हरी मिर्च का क्षेत्रफल 9634 हैक्टर, जबकि चीन में इसका क्षेत्रफल 771634 हैक्टर था। वर्ष 2018 के दौरान भारत में सूखी लाल मिर्च का उत्पादन 1.80 मिलियन मीट्रिक टन, जबकि चीन में इसका उत्पादन 0.32 मिलियन मीट्रिक टन था। वर्ष 2018 के दौरान चीन में हरी मिर्च का उत्पादन 18.21 मीट्रिक टन, जबकि भारत में इसका उत्पादन लगभग 79668 मीट्रिक टन के साथ विश्व के सबसे बड़े उत्पादक देश के रूप में रहा था। भारतीय मिर्च रंग व तीखेपन के कारण दुनिया भर में प्रसिद्ध है। वर्ष 2018 के दौरान भारत की मिर्च की विश्व बाजार में 50 प्रतिशत के लगभग हिस्सेदारी, जबकि चीन की 19 प्रतिशत हिस्सेदारी थी। तीखेपन के आधार पर मिर्च की किस्मों का वर्गीकरण अत्यधिक तीखी किस्में: इनमें तीखेपन की मात्रा 80000 एसएचयू से अधिक होती है। अधिक तीखी किस्में: इनमें तीखेपन की मात्रा 25000 से 70000 एसएचयू होती है। मध्यम रूप से तीखी किस्में: इनमें तीखेपन की मात्रा 3000 से 25000 एसएचयू होती हैं। हल्की तीखेपन वाली किस्में: इन किस्मों में तीखापन 700 से 3000 एसएचयू तक होता है। बिना तीखेपन वाली किस्में: इन किस्मों में तीखापन नहीं के बराबर होता हैं तथा तीखेपन की सीमा 0 से 700एसएचयू तक हो सकती है। लाल मिर्च सुखाने के लिए सुरक्षित विधियों का प्रयोग वर्तमान में लाल मिर्च को तोड़कर सुखाने का तरीका सुरक्षित नहीं है। इसके कारण अक्सर इसमें सुखाने के दौरान एफ्लाटॉक्सिन विकसित हो जाती है, जो निर्यात में एक बाधा का कारण बनती है। इस प्रकार मिर्च को सुखाने के लिए सुरक्षित व संरक्षित संरचनाओं का उपयोग करना चाहिए। इसमें वॉक-इन-टनल, हाई-टनल व ग्रीनहाउस आदि का भी उपयोग किया जा सकता है। मिर्च को सुखाने के लिए जमीन पर नहीं फैलाना चाहिए। इसे सुखाने से पूर्व उस क्षेत्र पर काले रंग के प्लास्टिक का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसी प्रकार मिर्च को सुखाने के लिए साफ-सुथरे पक्के फर्श को भी उपयोग में लिया जा सकता है। देश में मिर्च उत्पादन की मुख्य चुनौतियां . प्रत्येक वर्ग में रोगरोधी संकर किस्मोंकी कम उपलब्धता। उत्पादन के समय किसानों द्वारा रोगों व कीटों की रोकथाम के लिए रसायनों का अंधाधुंध प्रयोग। अक्सर परंपरागत तरीके से पौध उत्पादन के दौरान पौध का विषाणु रोगों और सूत्रकृमियों से ग्रस्त होना। मिर्च उत्पादन के समय कृषकों को उत्पादन की उत्कृष्ट कृषि क्रियाओं के बारे में जानकारी न होना। लाल मिर्च के लिए उगाई गई मिर्च को तोड़ने के बाद सुखाने का सही व सुरक्षित तरीका न होने के कारण कई बार मिर्च के निर्यात में एफ्लाटॉक्सिन के कारण बाधा आना। आधुनिक तकनीकों से मिर्च उत्पादकता व गुणवत्ता में वृद्धि विषाणु रोगरहित पौध उत्पादन के लिए ग्रीनहाउस में प्लग ट्रे तकनीक द्वारा मृदारहित माध्यम के उपयोग से पौध तैयार करनाः रोग व विषाणु रोगरहित पौध तैयार करना संभव परंपरागत तरीके के मुकाबले बीज दर में 30 से 40 प्रतिशत तक की बचत रोपाई योग्य पौध पूर्ण रूप से ओजस्वी होती है। इसमे जड़ों व तने का एक समान विकास होता है प्लग ट्रे विधि द्वारा तैयार पौध के रोपण उपरांत कोई मरण नहीं व पौध की शीघ्र स्थापना संभव कम क्षेत्र वाले ग्रीनहाउस के संरक्षित क्षेत्र में वर्षभर पौध उत्पादन संभव प्लग ट्रे विधि से तैयार पौध को दूरस्थ क्षेत्रों में किसानों तक पहुंचाना संभव इस पौध उत्पादन तकनीक को एक स्वरोजगार सृजन के रूप में विकसित करना संभव जमीन से उठी हुई क्यारियों, टपक सिंचाई प्रणाली व पलवार का उपयोग मिर्च की खेती में उठी हई क्यारियों के साथ टपक सिंचाई प्रणाली के उपयोग द्वारा निश्चित रूप से सिंचाई जल की बचत की जा सकती है। इसके साथ ही साथ इस प्रकार की फसल में उर्वरक की मात्रा भी फसल व किस्मों की आवश्यकतानसार. फसल वद्धि की विभिन्न अवस्थाओं के अनुरूप दी जा सकती है। इस प्रकार की फसल में सतही सिंचाई प्रणाली द्वारा उगाई गई फसल के मुकाबले रोगों व खरपतवारों का कम प्रकोप होगा। यदि टपक सिंचाई प्रणाली के साथ इसमे प्लास्टिक पलवार का उपयोग किया जाए, तो मिर्च की फसल को खरपतवारों की प्रतिस्पर्धा से बचाया जा सकता है। इसप्रकार की फसल में कीटों व रोगों का भी काफी हद तक प्रकोप कम होगा। फसल से अधिक उपज के साथ अधिक गुणवत्ता भी प्राप्त होगी। रोगरोधी अधिक उपज देने वाली किस्मों का उपयोग इस प्रकार की किस्मों को उगाने से रोगों व कीटों के नियंत्रण पर उपयोग होने वाले रसायनों के प्रयोग में काफी कमी आएगी। इससे फसल की उपज के साथ गुणवत्ता में वृद्धि होगी। स्त्रोत : फल-फूल पत्रिका(आईसीएआर), बलराज सिंह, परियोजना समन्वयक (एआईसीआरपी-मधुमक्खी और परागणकर्ता), भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली-110012