<div id="MiddleColumn_internal"> <h3 style="text-align: justify;">परिचय</h3> <p style="text-align: justify;">मिठास के लिए सबसे उपयुक्त गन्ना की फसल होती है। इसके उत्पादन में बदलाव, किसान तथा शर्करा उद्योग को आर्थिक रूप से प्रभावित करता है। नकदी फसल होने के कारण इसके घटते उत्पादन को बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। उत्पादकता वृद्धि में सबसे महत्वपूर्ण है, उन्नतशील रोगमुक्त गन्ने की प्रजातियों का विकास। कृषि वैज्ञानिकों के लिए यह एक चुनौती भरा कार्य है।</p> <p style="text-align: justify;">खेतों में उगाए जाने वाले सामान्य गन्ने की मूल रूप से पांच प्रकार की प्रजातियां होती हैं-सैकरम ऑफिसिनेरम, से. बारबेरी, से. साइनेन्स तथा दो जंगली देशी प्रजातियां से. स्पॉन्टेनियम तथा से. रोबस्टम है। इस पौधे की विभिन्न प्रजातियां विश्वभर में लोकप्रिय हैं। से. ऑफिसिरेनम का योगदान प्रजनन शोध कार्य में सबसे अधिक है।</p> <p style="text-align: justify;">वस्तुतः गन्ना हेट्रोजॉयगस प्रकृति की घास की एक किस्म है और कोशिकानुवंशिकी दृष्टिकोण से अलग-अलग गुणों के कारण अधिक महत्वपूर्ण है। इनमें सामान्यतः 70 से 130 संख्या में गुणसूत्र पाए जाते हैं।गन्ने को ज्वार तथा अन्य मिलते-जुलते पौधों से प्रजनन कराने में प्रजनक वैज्ञानिकों को अभूतपूर्व सफलता मिली है। किंतु, प्रजनन (क्रॉसिंग) से लेकर व्यावसायिक प्रजाति के विमोचन करने के बीच लंबी अवधि बीत जाने तथा प्रक्षेत्र प्रयोगों में कई बार निरीक्षण तथा आंकड़ों में आई त्रुटियों के कारण वांछित कांट-छांट से विकसित प्रजातियों के चयन में अशुद्धता आ जाती है। ऐसी स्थिति के समाधान हेतु 19वीं शताब्दी के अंत में गन्ने के जैव आणविक स्वरूप, जीनोमिक्स तथा जैव प्रौद्योगिकी के सामंजस्य से आनुवंशिक मार्कर का उपयोग किया जा रहा है। मार्कर से गुणसूत्र में विद्यमान विभिन्न प्रकार के गुणों तथा लक्षणों (ट्रेट) को प्रभावित करने वाले जीन की पहचान आसानी से की जाती है।जीन के आनुवंशिक अणु जैसे डीएनए(डी ऑक्सीरिबोन्यूक्लिक एसिड), आरएनए (रिबोन्यूक्लिक एसिड) तथा प्रोटीन के कोड ढूंढ लिए जाते हैं।बाद में सही जैविक सूचना को कम्प्यूटर द्वारा व्यवस्थित कर नई-नई प्रजातियों के विकास के उपयोग में लाया जाता है। इसे मार्कर सहायक चयन (मार्कर एसीस्टेड सेलेक्शन/एमएसएस) के नाम से जाना जाता है।</p> <p style="text-align: justify;">वस्तुत: आणविक मार्कर, जैविक अणु, डीएनए के खास समूह (फ्रेगमेन्ट्स) होते हैं, जो किसी खास जीनोम की विशिष्ट जगह पर अज्ञात डीएनए के अनुक्रम (सीक्वेन्स) को उजागर करने में सहायता प्रदान करते हैं। इनका समस्याग्रस्त जीन को चिन्हित करने में बहुमूल्य योगदान है। प्रायः मार्कर प्रमुख तथा सह-प्रमुख प्रकति के होते हैं, जिन्हें उपयोगिता के आधार पर तीन प्रमुख वर्गों में बांटा जाता है। इनमें प्रथम, द्वितीय तथा नई पीढ़ी के आणविक मार्कर होते हैं। इनकी सहायता से कई प्रकार के आनवंशिक गण (एलिल) तथा लक्षण (ट्रेट) को आनुवंशिक प्रतिचित्रण (मैपिंग) के माध्यम से दर्शाया जाता है। किसी भी जीनोम में आनुवंशिक मार्कर के खास विश्लेषण में दो स्थितियों में मैपिंग की जाती है।</p> <p style="text-align: justify;">पहली दशा में गुणसूत्रों के खास समूह के भौतिक रूप को दर्शाना तथा दसरी स्थिति में उनके गुणसूत्र की आनुवंशिक कड़ी/श्रृंखला (लिंकेज) को सप्रमाण प्रस्तुत करना। इस प्रकार मार्कर के लिंकेज को जीन के पॉलिमॉर्फिक स्वरूप में दर्शाया जाता है, जो वस्तुतः न्यूक्लियोटाइड (एक विशेष प्रकार के जैविक केन्द्रीय अम्ल) के अनुक्रम को परिभाषित करता है। पॉलिमॉर्फिक जरिए वैज्ञानिक किसी खास जाति, प्रजाति अथवा इसके जीवद्रव्य के डीएनए की बनावट तथा उनके बीच की परिवर्तनशीलता (वेरिएबिलिटी) को खास मैपिंग की मदद से दर्शाया जाता है। हालांकि ऐसे मार्कर को प्रमुख भूमिका, नए तथा विशिष्ट (नॉवेल) लक्षणों को पहचानने के उद्देश्य से सुरक्षित रखा जाता है। एक या एक से अधिक गुण तथा लक्षण को पहचानने वाले मार्कर को मार्कर सहायक चयन में इस्तेमाल किया जाता है। इससे प्रजनक संततियों को आनुवंशिक गुणों के आधार पर चयनित करने में सुगमता प्राप्त होती है।</p> <p style="text-align: justify;">आणविक मार्कर की सहायता से फायलोजेनेटिक संबंधों को सफलतापूर्वक निरूपित किया जाता है। इनमें डीएनए फिंगरप्रिंटिंग तथा विविधता विश्लेषण अत्यंत प्रमुख हैं, जिसमें खास पावन वर्ग, जाति तथा समुदाय को वर्गीकरण, तुलनात्मक मैपिंग,क्वांटिटेटिव ट्रेट लोसाई (क्यूटील) इत्यादि प्रयोजन प्रमुख होते हैं। मार्कर से चिन्हित डीएनए तथा प्रोटीन (एंजाइम) को जेल इलेक्ट्रोफोरेसिस के उपरांत लाभकारी जैविक अणु को बैण्ड के रूप में चिन्हित करके उनके कोडोन की जैविक सूचना जमा कर ली जाती है। इस कार्य में पॉलीमेरेज चेन रिएक्शन(पीसीआर) की सहायता से अध्ययन किया जाता है।</p> <h3 style="text-align: justify;">विविधता विश्लेषण</h3> <p style="text-align: justify;">किसी पादप समष्टि (पॉपुलेशन) में आणविक मार्कर को प्रजातियों के विकास के आधार पर दो प्रमुख भागों में वर्गीकृत किया जाता है-जीन लक्षित मार्कर (जीन टारगेटेड मार्कर या जीटीएम) तथा कार्यात्मक मार्कर (फंक्शनल मार्कर या एफएम)। जीन लक्षित मार्कर से जीन के अंदर पॉलीमार्फिज्म वाले रूपांतरित स्थान को सुगमतापूर्वक प्रदर्शित किया जाता है। इससे बाहरी खास स्वरूप (ट्रेट) से संबंधित मार्कर की लाईब्रेरी बनाने में सफलता मिलती है। उदाहरणस्वरूप गन्ने की विभिन्न प्रजातियों तथा जीवद्रव्य पौधों में शर्करा बनाने वाले जीन, जो गुणसूत्र के खास लोकाई (स्थान) पहचान के पर केन्द्रित होते हैं, को पहचान करने वाले मार्कर का विकास किया जा सकता है। ऐसे मार्कर को प्राइमर डिजाइन के संयोग से जैव अनुक्रम सूचना (खास प्रकार न्यूक्लियोटाइड कोडोन) सुरक्षित रखा जाता है। बाद में इन्हें प्रजनन कार्य में उपयोग लाया जाता है। दूसरी ओर कार्यात्मक मार्कर से कार्य संबंधित स्वरूप (ट्रेट) जैसे रोग प्रतिरोधकता, सहनशीलता में इत्यादि कार्यों में मदद मिलती है।</p> <h3 style="text-align: justify;">आणविक मार्कर की उपयोगिता</h3> <p style="text-align: justify;">आज के दौर में गन्ना फसल को सबसे अधिक नुकसान, शर्करा की प्रतिशत मात्राह्रास, लाल सड्न रोग, बेधक, नाशीकीट, सूखा तथा जल भराव इत्यादि से होता है।ऐसी दशा में गन्ने की नई-नई विमोचित प्रजातियां प्रायः अपना अस्तित्व पांच से दस वर्षों में खो देती हैं। इस प्रतिकूल दशा के समाधान तथा यथायोग्य उन्नयन के लिए प्रजातियों के प्रजनन में आणविक मार्कर का उपयोग किया जाता है। विश्व के प्रगतिशील राष्ट्र जैसे अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया में गन्ने की प्रजातियों के सुधारक जीनों के लाभकारी मार्कर इन दिनों काफी लोकप्रिय हो रहे हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">जीन टैगिंग तथा मैपिंग</h3> <p style="text-align: justify;">आणविक स्तर पर गन्ने के अनेक उपयोगी जीन जैसे बीमारी से प्रतिरोधक, शर्करा निर्माण में सहायक तथा अन्य अजैविक प्रतिकूल परिस्थितियों से मुकाबला करने वाले सहायक जीन इत्यादि गुणसूत्र के खास स्थान (लोसाई) पर केन्द्रित रहते हैं। ऐसे जीन को विशेष प्रकार के आणविक तथा जैव रासायनिक मार्कर की मदद से जीन टैगिंग किया किया जाता है। इस कार्य में आरएएफपीए आरएपीडीए एएफएलपी, एसएसआर, सिम्पल न्यूक्लियोटाइड पॉलीमार्फिज्म (एसएनपी) का भी उपयोग किया जाता है। इस क्रम में प्रसिद्ध जैव आणविक वैज्ञानिक गेल्डरमैन ने पहली बार क्वांटीटेटिव ट्रेट लॉसी (क्यूटीएल) के माध्यम से अनेक ट्रेट यानी गुणों वाले जीनोम क्षेत्र के बारे में बताया था।</p> <h3 style="text-align: justify;">क्वांटिटेटिव ट्रेट लोसाई के महत्व</h3> <p style="text-align: justify;">जीनोमिक्स के गहन प्रयोग से प्राप्त परिणाम के आधार पर ऐसा देखा गया है कि पादप प्रकृति में ढेर सारे उपयोगी गुण तथा लक्षणों से लैस ट्रेट पड़े होते हैं। इस प्रकार क्यूटीएल से ट्रेट की पहचान निम्नलिखित चरण में होती है:</p> <ul style="text-align: justify;"> <li>सम्यक पैतृक से सम्यक मैपिंग पॉपुलेशन विकसित होती है।</li> <li>विशेष एवं प्रभावी आणविक मार्कर से किसी विशेष लिंकेज मैप को संतृप्त किया जाता है।</li> <li>किसी सार्थक मैपिंग पॉपुलेशन से विश्वसनीय फीनोटॉइपिंग किया जाता है ।</li> <li>इसको स्टैटिस्टिकल पैकेज एनालिसिस की सहायता से क्यूटीएल की पहचान में उपयोग किया जाता है।</li> </ul> <h3 style="text-align: justify;">महत्वपूर्ण उपलब्धियां</h3> <ul style="text-align: justify;"> <li>बार्नस, शदरफोर्ड एवं बोथा ने सन् 1997 में गन्ने की समुन्नत प्रजातियों के विकास के लिए विशेषकर रोग तथा नाशीकीट के लिए विशिष्ट ट्रेट लिंक्ड मार्कर के उपयोग की चर्चा की।उन्होंने एल्डाना, मोसाएक और स्मट के लिए 54 पॉलीमॉर्फिक आरएपीडी मार्कर की पहचान संबंधित विस्तृत जानकारी को प्रतिपादित किया था।</li> <li>अमेरिका तथा ब्राजील के दो प्रसिद्ध जैव आणविक वैज्ञानिक, डी. सिल्वा और ब्रेसियानी ने सन् 2005 में गन्ने के संभ्रांत जीवद्रव्यों में शर्करा जीन के क्यूटीएल टैगिंग के लिए ईएसटी द्वारा आर.एफ.एल. मार्कर का उपयोग किया ।</li> <li>सन् 1996 में डाएग्रोइस और उनके साथियों ने ब्राजील की गन्ना प्रजाति आर 570 में एएफएलपी/बीएसए बल्क सेग्रीगेन्ट एनालिसिस तकनीक द्वारा रस्ट (पकसिनिया मेलानोसिफेला) बीमारी से संबंधित जीन ब्रू-1 का पता लगाया ।</li> <li>आजकल शोध द्वारा माइक्रो आरएनए चिन्हित किए जा रहे हैं। इसका जैविक तथा अजैविक त्रास की प्रतिरोधी क्षमता विकसित करने वाले जीन के एक्सप्रेशन में मुख्य योगदान होता है। गन्ने में लगभग 50 से अधिक माइक्रो आरएनए सूखा, 11 माइक्रो आरएनए लवणीयता, लगभग 240 माइक्रो आरएनए रोग तथा अन्य कई संबंधित परिवार के फसलों में शुगर ट्रेट के लिए पहचाने गए हैं। इस दिशा में अनेक उत्कृष्ट शोध कार्य सम्पन्न हुए हैं, लेकिन वस्तुत: गन्ना के पॉलीप्लाइड हेटराजायग्स फसल होने के कारणवश चुनौती भी अधिक देखी जाती है। नवीन सीक्वेंसिंग तकनीकी, कम्प्यूटेशनल सुविधा तथा कम्पेरेटिव जीनोमिक्स के द्वारा इन समस्याओं जीनोमिक्स के द्वारा इन समस्याओं को प्रभावी ढंग से समाधान किया जाता है ।</li> <li>ट्रांसजेनिक तकनीकी की मदद से इन दिनों दूसरे किसी जीव के व्यावसायिक रूप (जैसे सूखा जल प्लाविता आदि सहनशील तथा रोग प्रतिरोधी इत्यादि) से लाभकारी जीनों को आणविक मार्कर के लिए उपयोग में लाया जाता है।</li> </ul> <h3 style="text-align: justify;">भविष्य की संभावनाएं</h3> <p style="text-align: justify;">विश्व में कृषि क्षेत्र में प्रजातियों के उन्नयन में लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। इस संदर्भ में 19वीं शताब्दी के अंत में डीएनए मार्कर के इस्तेमाल तथा प्रतिचित्रण से संबंधित बड़ा शोध प्रोजेक्ट सबसे पहले अमेरिका, ब्राजील तथा ऑस्ट्रेलिया में शुरू किया गया था। इन दिनों गन्ने की प्रजातियों के विकास तथा अनुसंधान संबंधित खर्चे में कटौती की दिशा में नवीन तकनीकों को बड़े स्तर पर अपनाया जा रहा है। जीनोमिक्स के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के आणविक तथा जैव रासायनिक मार्कर संबंधित ज्ञान को विश्व स्तर पर लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के दो प्रमुख संस्थान भाकृअनुप-गन्ना प्रजनन संस्थान कोयम्बटूर तथा भाकृअनुप-गन्ना अनुसंस्थान संस्थान में लगातार सराहनीय कार्य राष्ट्रहित में निष्पादित किए जा रहे हैं।</p> <p style="text-align: justify;">गन्ना प्रजनन के अलावा ऐसे मार्कर से अनेक आनुवंशिक समस्याओं के समाधान में सफलता मिलती है। फिंगरप्रिटिंग से गन्ने की विविध प्रजातियों की पहचान संबंधित सभी वैज्ञानिक सूचनाओं (जैविक डाटाबेस) को आसानी से सुरक्षित रखा जाता है। ऐसे शोध कार्य की बदौलत पौधों को प्रक्षेत्र में उगाए जाने वाले खर्चे से बचा जा सकता है और वांछित प्रजातियों के नव सृजन में सफलता मिलती है। हालांकि महंगे प्रयोगशाला संबंधित रखरखाव जैसे डिजिटल उपकरण, रसायन, कम्प्यूटर इत्यादि के अलावा प्रशिक्षित कौशलपूर्ण मानव संसाधन अनेक कारण से इसकी लोकप्रियता के लिए जिम्मेदार है।</p> <p style="text-align: justify;">जीनोटाइपिंग तथा डाटा माइनिंग में मार्कर बहुत ही कारगर साबित हो सकता है। एसएसआर तथा एसएनपी डाटामाइनिंग की जबरदस्त लोकप्रियता को देखते हुए इन दिनों कृषि वैज्ञानिक फसलों के विविध स्वरूप जैसे अतिसूक्ष्म (नैनो) प्रौद्योगिकीय इत्यादि शोध कार्य में मार्कर ज्ञान को सबसे विश्वसनीय माना गया है। वह दिन दूर नहीं जब गन्ने को जानने तथा पहचानने के लिए विश्व को मार्कर का एक डिजिटल आधार जारी करने की जरूरत पड़ जाए।</p> <p style="text-align: justify;">लेखन: राघवेन्द्र कुमार, संगीता श्रीवास्तव और दिनेश कुमार</p> <p style="text-align: justify;">स्त्रोत: <a class="external_link ext-link-icon external-link" title="नए विंडोज में खुलने वाली अन्य वेबसाइट लिंक" href="https://agricoop.nic.in/" target="_blank" rel="noopener"> कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार </a></p> </div>