सामान्यतः गन्ने की खेती उत्तर भारत में अधिक की जाती है। इसके अलावा गन्ने का उत्पादन गंगा के ऊपरी मैदानों तथा पंजाब के मैदानी भागों में खूब किया जाता है। यहां पर सिंचाई की अच्छी सुविधाएं सुलभ हैं। अकेले उत्तर प्रदेश में देश के गन्ने के कुल उत्पादन का 50 फीसदी उपज होती है। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु व कर्नाटक गन्ने के अन्य प्रमुख उत्पादक राज्य हैं। वर्ष 1950-51 में गन्ने का उत्पादन 5.70 लाख टन था, जो वर्ष 2005-06 में बढ़कर 27.84 लाख टन हो गया। इस अवधि में उत्पादन में चार गुने से भी अधिक वृद्धि हुई है। गन्ने की उत्पादकता इस अवधि में 33 टन प्रति हैक्टर से बढ़कर 65.6 टन प्रति हैक्टर हो गई, दूसरे शब्दों में उत्पादकता में भी वृद्धि लगभग दोगुनी हुई। गन्ने की उत्पादकता की दृष्टि से देश में तमिलनाडु का पहला स्थान है। यहां गन्ने की प्रति हैक्टर औसत उपज 100 टन है। इसी को देखते हुए उत्तर भारत में हमारे किसान भाई गन्ने की बुआई को लेकर कई विधि अपना रहे हैं। इस लेख में उन्हीं विधियों में से एक रिंग-पिट विधि का उल्लेख किया गया है। रिंग-पिट विधि से गन्ने की बुआई करने के लिए खेत की जुताई करने की आवश्यकता नहीं होती है। इसमें सर्वप्रथम रिंग-पिट डिगर मशीन अथवा फावड़े से खेत में गड्ढे तैयार किये जाते हैं। इसमें एक गड्ढे से दूसरे गड्ढे की केन्द्र से केन्द्र की दूरी 105 सें.मी. होती है। प्रत्येक गड्ढा 90 सें.मी. व्यास का होता है। इस तरह एक हैक्टर में लगभग 9000 गड्ढे तैयार हो जाते हैं। इन गड्ढों की गहराई लगभग 30 सें.मी. से 45 सें.मी. के आसपास रखी जाती है। इन गड्ढों में बुआई से पहले 3.5 से 5 कि.ग्रा. कम्पोस्ट खाद या गोबर की खाद, 60 ग्राम एनपीके, 40 ग्राम यूरिया और 5 ग्राम फोरेट या फ्यूराडॉन डालकर मृदा में अच्छी तरह मिला दिया जाता है। इस प्रकार प्रति एकड़ लगभग 100 क्विंटल गोबर की खाद, 150 कि.ग्रा. एनपीके, 104 कि.ग्रा. यूरिया तथा 12 कि.ग्रा. फ्यूराडॉन लगता है। इसमें खाद, पानी उतना ही लगता है, जितना पौधे को जरूरत होती है। सूखी पत्तियों को निकालना गन्ने की बढ़वार के साथ-साथ नीचे की सूखी पत्तियों को निकाल देना चाहिए, ताकि खेत और फसल को हवा आसानी से मिल सके तथा सामयिक कीट विशेष रूप से स्टॉक बोरर अपना प्रभाव न दिखा सके।सूखी पत्तियों को खेत में ही पंक्तियों के बीच में बिछाया जा सकता है। ये बाद में सड़कर खाद का काम करती हैं। इसके साथ ही ये ट्रैश मल्च के रूप में भी सहायक होती हैं व खरपतवार पर भी नियंत्रण रहता है। इसके बाद गन्ने के बीज का चयन करते हैं। गन्ने से दो या तीन आंख वाले टुकड़े काटकर, इन्हें 0.2 प्रतिशत बाविस्टिन के घोल में 20 मिनट तक डुबोकर उपचारित कर लेते हैं। बीज के लिए पूर्णतः स्वस्थ तथा तापशोधित बीज का ही प्रयोग करें। यहां यह भी ध्यान रखें कि जो गन्ना आप बीज के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं, उसकी सभी आंखें स्वस्थ हों। अब प्रत्येक गड्ढे में 20 से 25, दो आंखों वाले गन्ने के टुकड़े या प्रत्येक गड्ढे में 35 से 40 गन्ने की आंखें बो दी जाती हैं। गन्ने के टुकड़ों को गड्ढे के किनारे-किनारे यानी कि साइकिल के पहिये की तीलियों की तरह केन्द्र की तरफ जाते हुए बोते हैं। ऐसे में प्रति एकड़ में लगभग 55 से 60 क्विंटल गन्ना बीज का प्रयोग होता है। इस प्रकार बोये हुए गन्ने के बीज के टुकड़ों पर 5 से 7 सें.मी. मिट्टी की हल्की परत डाल देते हैं, ताकि जमाव अच्छा हो। इस तरीके की बुआई से लगभग 80-85 प्रतिशत जमाव हो जाता है। यह मिट्टी दो गड्ढों के बीच से इस प्रकार ली जाती है कि दोनों गड्ढों के मध्य में क्यारी बन जाती है। यह आगे चलकर सिंचाई के काम आती है। बुआई के समय गड्ढों में उचित नमी का होना आवश्यकहै। यदि नमी नहीं है तो बोने के तुरन्त बाद हल्की सिंचाई कर दें, ताकि जमाव अच्छा हो सके। दो गड्ढों के बीच के खाली भाग में हम विभिन्न समय अवधि में तैयार होने वाली पफसलों को भी ले सकते हैं, जैसे-लाही, मूंग, उड़द, तरबूज, खरबूज व घिया इत्यादि। गड्ढों में मिट्टी डालना एवं चढ़ाना जब गन्ने के पौधे जमीन की सतह से 8-10 इंच ऊपर आ जाएं, तब लगभग आधी मिट्टी गड्ढे में गिरा दें। मिट्टी गिराने से पूर्व प्रति गड्ढा 40 ग्राम एनपीके एवं 20 ग्राम यूरिया डाल दें। जून के अन्तिम सप्ताह में प्रति गड्ढा 40 ग्राम यूरिया और 5 ग्राम फ्यूराडॉन डालकर बची हुई मिट्टी से गड्ढों को भर दें। इस प्रकार गड्ढा पूरा समतल हो जाता है। जुलाई में गन्ने के प्रत्येक झुंड पर चारों तरफ से मिट्टी चढ़ा देते हैं। इससे प्रत्येक गन्ने के झुंड के चारों तरफ क्यारी बन जाती है। यह अधिक वर्षा की स्थिति में जल निकासी के काम आती है। सिंचाई और खरपतवार नियंत्रण रिंग-पिट विधि से बुआई की गई फसल को वर्षा से पूर्व 6 से 8 सिंचाइयां दें। आवश्यकता होने पर निराई एवं गुड़ाई कर दें। बंधाई एवं फसल सुरक्षा गन्ने को गिरने से बचाने के लिए प्रत्येक गड्ढे को पहले चार हिस्सों में बांधे, फिर दूसरी बंधाई में दो हिस्सों को आपस में बांधें तथा तीसरी बंधाई करते समय प्रत्येक गड्ढे को एक गन्ने के साथ बांध दें। इस प्रकार प्रत्येक गन्ने का गड्ढा एक पिरामिड का आकार ले लेगा तथा गन्ना गिरने की आशंकाएं समाप्त हो जाती हैं। चौथी बंधाई करते समय पहली बंधाई को खोल देना चाहिए। बुआई से लेकर फसल पकने तक आवश्यकतानुसार कीटों और रोगों की रोकथाम करना आवश्यक है। फसल की कटाई एवं पेड़ी रखना रिंग-पिट विधि में उगाई गई गन्ना फसल की कटाई, जहां तक संभव हो सके, जमीन की सतह के नीचे से करनी चाहिए, ताकि पेड़ी की अच्छी फसल प्राप्त हो सके। कटाई के तुरन्त बाद सिंचाई करके, प्रति गड्ढा 100 ग्राम एनपीके तथा 50 ग्राम यूरिया देकर गुड़ाई कर दें। इससे कल्ले तेजी से बढ़ते हैं एवं अच्छी पेड़ी की उपज प्राप्त होती है। पैदावार रिंग-पिट विधि से बुआई करने पर लगभग 700 से 1000 क्विंटल या इससे अधिक प्रति एकड़ की पैदावार तथा उत्पादकता 125 टन/हैक्टर प्राप्त की जा सकती है। गन्ने की उपज बढ़ाने की दिशा में विभिन्न क्षेत्रों के गन्ना किसानों, देश के कई गन्ना अनुसंधान संस्थानों तथा कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा प्रयोग और शोधकार्य किए गए हैं। रिंग-पिट गन्ना उत्पादन विधि से गन्ने की बुआई करने से इसकी पैदावार लगभग तीन से चार गुना अधिक हो जाती है। इसके साथ ही किसानों की आय में भी इतनी ही बढ़ोतरी संभव है। स्त्राेत : खेती पत्रिका(आईसीएआर), राम निवास- पौध रोग विज्ञान विभाग, दीपक मौर्या-सब्जी विज्ञान विभाग और अंकित कुमार पाण्डेय -फल विज्ञान विभाग, बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर, भागलपुर-813210 (बिहार)