<h3 style="text-align: justify;">टपक विधि द्वारा अंतर फसलीकरण में सिंचाई </h3> <p style="text-align: justify;">गन्ने में अंतर फसलीकरण के दौरान उपसतह में टपक विधि द्वारा सिंचाई कर पुदीना, धनिया और उड़द की खेती की गई पुदीने का उत्पादन 1,548 कि.ग्रा./एकड़, धनिया का 864 कि.ग्रा./एकड़ और उड़द के दानों का 127 कि.ग्रा./एकड़ उत्पादन प्राप्त किया गया। इससे क्रमशः 61,920, 34,560 आरै 8,920 रुपये की अंतरिम आय प्राप्त हुई। </p> <h4 style="text-align: justify;">सिंचाई प्रबंधन </h4> <p style="text-align: justify;">किसी फसल से सामान्य वृद्धि और उत्पादन पाने के लिये फसल की पूरी अवधि के दौरान अनुकूलतम मृदा की नमी को बनाये रखना महत्वपूर्ण होता है। गन्ने की फसल के लिये यह और भी महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इसमें अन्तिम उत्पाद गन्ना होता है। इसके भार का 70 प्रतिशत जल ही होता है। कायिकी और संरचनात्क दृष्टि से जल गन्ने का एक प्रमुख तत्व है। एक टन गन्ना के उत्पादन के लिये 200 से 250 टन जल की आवश्यकता होती है।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/c1000TWU0.jpg" width="163" height="143" /></p> <p style="text-align: justify;">फसल उत्पादन के स्तर और देश के विभिन्न भागों में प्रचलित जलवायु के हालातों के कारण जल की आवश्यकता 1,200 से 3,000 मि.मी. के बीच देखी जा सकती है। लेकिन फसल द्वारा जल की वास्तविक आवश्यकता स्थान पर प्रचलित जलवायु, मृदा की स्थिति, फसल अवधि और सिंचाई विधि पर निर्भर करती है। आदर्श रूप से 12 महीने की उष्ण कटीबंध फसल के लिये 35 से 40 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। किसी स्थिति में यह सम्भव नहीं हो पाता है, अतः इससे फसल उत्पादन प्रभावित होता है। गन्ने में आमतौर पर सतही जल सिंचाई की जाती हैए जिसे खेत में भरकर या नालियों द्वारा दिया जाता है। सतही सिंचाई की प्रभाविता 30 से 50 प्रतिशत के बीच होती है। इसलिये सूक्ष्म सिंचाई तकनीकें प्रासंगिक हो गई हैं ताकि जल के उपयुक्त प्रयोग के लिये इसे संरक्षित किया जा सके।</p> <h3 style="text-align: justify;">सूक्ष्म सिंचाई</h3> <p style="text-align: justify;">पिछले कुछ समय में जल उत्पादकता को काफी हद तक बढ़ाने में सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों जैसे कि टपक सिंच, सूक्ष्म-स्प्रिंक्लर और उप-सतही टपक तकनीकों को प्रभावी पाया गया है भाकृअनपु-गन्ना प्रजनन सस्ंथान, कोयंबटूर में एक परीक्षण के दौरान पारंपरिक नालियों द्वारा सिंचाई के मुकाबले टपक सिंचाई द्वारा 44 प्रतिशत जल की बचत देखी गई। पौध फसल में सिंचाई प्रणालियों में से 40/140 सें.मी. की दूरियों पर उप-सतही टपक प्रणाली द्वारा उच्च पेराई योग्य गन्नों की संख्या, गन्नों की ऊंचाई और एकल गन्ना भार को, पारंपरिक नालियों द्वारा सिंचाई और संचई पैन वाष्पीकरण-आधारित सिंचाई जल को नालियों में देने के मुकाबले,सकारात्मक रूप से बेहतर पाया गया। पेड़ी फसल में 60/120 सें.मी. की दूरियों पर बाईवाल सिंचाई से गन्नों की ऊंचाई और एकल गन्ना भार को सकारात्मक रूप से दूसरी सिंचाई विधियों से बेहतर पाया गया। मगर गन्ना और चीनी उत्पादन को बाईवाल टपक सिंचाई और पारंपरिक नालियों द्वारा सिंचाई करने पर बराबर पाया गया, परन्तु सतही टपक सिंचाई या संचई पैन वाष्पीकरण आधारित नालियों द्वारा सिंचाईजल देने से बेहतर पाया गया।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : खेती पत्रिका(भा.कृ.अनु.प.) अर्जुन तायडे, पी. गीता, एस. अनुशा, ए. वेण्णिला, सी. पलणिसामी और बक्शी राम,’फसल उत्पादन विभाग, भाकृअनुप-गन्ना प्रजनन संस्थान, कोयंबटूर।</p>