गन्ना के प्रमुख कीटों का प्रबंधन आवश्यक है, क्योंकि आर्थिक दृष्टि से गन्ना एक नगदी फसल है। इसकी खेती से किसानों को अन्य फसलों की तुलना में अध्कि लाभ मिलता है। गन्ने की खेती में प्रयुक्त सभी उपादानों के समुचित समावेश के उपरांत कीट प्रबंधन अति महत्वपूर्ण कार्य है। गन्ने की फसल पूरे वर्ष खेत में खड़ी रहकर विभिन्न प्रकार के कीटों को आश्रय प्रदान कर उनके जीवनचक्र को पूरा करने में सहयोग प्रदान करती है। इसके परिणामस्वरूप कई प्रकार के कीटों द्वारा अधिक नुकसान होता है। गन्ने में लगभग दो सौ से अधिक कीटों का प्रकोप होता है, परंतु एक दर्जन कीट ऐसे हैं जो गन्ने की बढ़वार की विभिन्न अवस्थाओं में नुकसान पहुंचाते हैं। प्रस्तुत लेख में गन्ना के प्रमुख कीटों एवं उनके समुचित प्रबंधन का उल्लेख किया गया है। पायरिला पायरिला (होमोप्टराःलीफोफिडी) पत्तियों से रस चूसने वाला हानिकारक कीट है। यह कीट पत्तियों की निचली सतह पर पाया जाता है, जहां यह पौधे का रस चूसता है। इनके कारण पहले पत्तियां पीली पड़ जाती हैं और बाद में सूख जाती हैं। कम प्रकोप होने पर, पत्ती की सतह पर पीले चकत्ते नजर आते हैं। प्रकाश संश्लेषण घट जाता है, जिससे पौधे की वृद्धि अवरु) हो जाती है। रोकथाम सूखी पत्तियां निकालने के बाद मैलाथियॉन (0.1 प्रतिशत), फेनीट्रोथियॉन (0.03 प्रतिशत), इंडोसल्फॉन (0.025 प्रतिशत), कार्बेरिल (0.025 प्रतिशत) अथवा मोनोक्रोटोफॉस (0.03 प्रतिशत) का छिड़काव इसके नियंत्रण में उपयोगी पाया गया है। गुलाबी चिक्टा (मिलीबग) तने से रस चूसकर गन्ने को हानि पहुंचाने वाला यह दूसरा नुकसानदायक कीट है। यह कीट अतिरिक्त रस को मधुरस जैसे-चिपचिपे पदार्थ के रूप में मलत्याग द्वारा बाहर निकालता है, जो चींटियों को आकर्षित करता है। यह मधुरस काली फफूंदी को विकसित करने में भी सहायता करता है। इससे पौधे की प्रकाश संश्लेषण क्रिया पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। पत्तियां सिकुड़कर मुड़ जाती हैं एवं पौधा पीला पड़कर सूखने लगता है। रोकथाम इस कीट के नियंत्रण में मैलाथियॉन 0.5-1.0 प्रतिशत का छिड़काव अत्यधिक प्रभावी व सुरक्षित सिद्ध हुआ है। बीज गन्नों को मैलाथियॉन के 0.1 प्रतिशत घोल में 20-30 मिनट डुबोने के बाद बोने से कीट द्वारा अंकुरण पर पड़ने वाला कुप्रभाव कम हो जाता है। काला चिक्टा गन्ने का काला चिक्टा या ब्लैक बग पत्तियों तथा पर्णच्छदों से रस चूसने वाला पेड़ी का मुख्य हानिकारक कीट है। इसका आक्रमण प्रायः ग्रीष्मकाल में अप्रैल से जून तक होता है। इस कीट के शिशु (निम्फ) तथा वयस्क (प्रौढ़) दिन में गोफ के अंदर छिपकर तथा रात में बाहर निकलकर पत्तियों तथा पर्णच्छदों से रस चूसते हैं। वर्षाकाल में इनकी संख्या कम हो जाती है। शीतकाल में इनके वयस्क पर्णच्छद निष्क्रिय पड़े रहते हैं और गर्मी आते ही पुनः सक्रिय हो जाते हैं। रोकथाम काला चिक्टा के यूमाइक्रोसोमा फियक्स (निक्सन) तथा यू. क्यूमियक्स (निक्सन) नामक दो अंड परजीवी प्रकृति में पाये जाते हैं। इनमें यू. फियक्स उत्तर भारत में काल चिक्टे के 80-90 प्रतिशत अंडों को नष्ट कर देता है। तनाबेधक ये कीट एकत्रित होकर ऊपर की 4-5 पोरियों में प्रवेश करना शुरू कर देते हैं। ताजा कीट मल चमकता लाल रंग का उसी के ऊपर वाली गांठों से निकलता मालूम पड़ता है, तो समझ लेना चाहिए कि इसमें तनाबेधक का आक्रमण शुरू हो गया है। किनारे से शाखाएं निकलना आरंभ हो जाती हैं। ऊपरी पत्तियां या तो बिल्कुल सूख जाती हैं या सूखने लगती हैं। जब सूंडी बड़ी हो जाती है, तो वह पास के गन्ने के तनों में छेद करना शुरू कर देती है। इस प्रकार की हानि में ऊपर का भाग नहीं सूखता है, लेकिन एक सूंडी 5-6 गांठों को बेध देती है। रोकथाम सितंबर-अक्टूबर में मासिक अंतर पर सूखी पत्तियां निकालने के बाद मोनोक्रोटोफॉस का 0.75 स.त. तत्व/हैक्टर की दर से छिड़काव कर तनाबेधक पर संतोषजनक नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है। चोटीबेधक सुंडियां पत्तों की मध्य शिरा में सुरंग बनाकर गन्ने की चोटी में घुस जाती हैं। छोटे ग्रसित पौधों की गोभ कानी हो जाती है और ऐसे में पौधे बाद में सूख जाते हैं। जुलाई से सितंबर में इसके आक्रमण से ऊपर की पोरियों की आंख फूट जाती है। इस कारण चोटी में अगोलों का झुण्ड नजर आता है। इसे ‘बन्ची टॉप’ कहते हैं। फसल में इस कीट का आक्रमण ‘बन्ची टॉप’ की वजह से आसानी से पहचाना जा सकता है। ग्रसित फसल की पैदावार तथा चीनी में कमी आती है। रोकथाम अप्रैल से जून तक ग्रसित पौधों को जमीन की सतह से गहरा काटकर नष्ट कर दें। पत्तों पर चिपके कत्थई रंग के बालों के गुच्छे से ढके अण्ड-समूहों को भी इस दौरान इकट्ठा करके नष्ट करें। फ्यूराडान 3 जी. का 10 कि.ग्रास.त. तत्व/हैक्टर या फोरेट 2-3 कि.ग्रा स.त. तत्व/हैक्टर दानेदार दवा का जून के अंतिम या जुलाई के प्रथम सप्ताह में प्रयोग करने से चोटीबेधक की तीसरी पीढ़ी (जो गन्ने के भार व उपज दोनों को कम कर देती है) के प्रकोप को कम कर सकते हैं। परंतु सफल नियंत्रण, समेकित रूप से सभी विधियों को मिलाकर समय पर करने से ही प्राप्त होता है। पोरीबेधक यह दक्षिण भारत में गन्ने का प्रमुख नाशीकीट है, परतु अब बिहार, ओडिशा तथा उत्तर प्रदेश में भी गन्ने को गंभीर रूप से हानि पहुंचाता है। इसका आक्रमण तनाबेधक की तरह पूरे गन्ने में न होकर एक ही पोरी तक सीमित रहता है। रोकथाम मोनोक्रोटोफॉस 0.75 स.त. तत्व 1000 लीटर पानी हैक्टर/घोल का अगस्त, सितंबर व अक्टूबर में सूखी पत्तियां निकलने के बाद छिड़काव करें। श्वेत मक्खी एल्युरोलोवस बैरोडेंसिस तथा नियमैसकेलिया वारगई नामक दो प्रजातियां गन्ने को सर्वाधिक नुकसान पहुंचाती हैं। प्रथम प्रजाति लगभग सभी गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में पायी जाती है और हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, तमिलनाडु तथा गुजरात के अधिक आर्द्रता वाले क्षेत्रों में विशेष रूप से हानिकारक हैं। नि. वारगाई प्रजाति की श्वेत मक्खी तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा तथा पंजाब में पायी जाती है। इनका प्रकोप पेड़ी, नाइट्रोजन की कमी वाले तथा जलाक्रांत गन्ना खेतों में अधिक होता है। रोकथाम इस कीट के कई परजीवी एवं परभक्षी की प्रकृति में पाये जाते हैं, जिनमें एजोटसडेल्हिन्सिस, एनकार्सिया आइजैकी, कार्डियोगैसटर सेकंटस, इरटोमोसेरस मुण्डस तथा प्रासपैल्टेला स्पी. आदि (परजीवी) तथा काइलोकोरस निगी्रटस, किलोमइनस सेक्समेकुलेटस, किलामेइनस स्पी., स्किमनस ग्रेसिलस तथा वरेानिया डिसकालेर (परभक्षी) प्रमुख हैं। एजाटेस डेलहियेन्सि श्वेत मक्खी की 60 प्रतिशत से अधिक की संख्या नष्ट करने में सक्षम है। स्त्राेत : खेती पत्रिका, सुबोध कुमार और बाल मुकुन्द पाण्डेय कीट विज्ञान विभाग, कमला नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ फिजिकल एंड सोशल साइंसेज, सुल्तानपुर (उत्तर प्रदेश), नीरज सिंह कृषि सांख्यिकीय विभाग, आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कुमारगंज-अयोध्या (उत्तर प्रदेश)