गन्ने की फसल के सफलतम उत्पादन व उत्पादकता को बनाये रखने के लिये रोग प्रबंधन का विशेष महत्व है। यह लंबी अवधि की फसल है। गन्ने की फसल एक ही खेत में उगाई जाती है व इसका प्रवर्धन भी गन्ने के टुकड़े लगाकर किया जाता है, जिसके कारण रोगों के पनपने व फैलाव की आशंकाएं बनी रहती हैं। रोगों के नियंत्रण के लिये उनकी पहचान के लक्षणों को जानना आवश्यक होता है। आज के बदलते वातावरण में यह आवश्यक हो गया है कि रोगों का वैज्ञानिक तरीकों से एकीकृत प्रबंधन किया जाये, ताकि गन्ने की खेती में ज्यादा से ज्यादा मुनाफा लिया जा सके। सेट राॅट इस रोग का कारक सीराटोसिस्टिस पेराडाेक्सा है जाे कि एक प्रकार की फफूंदी है। इस रोग के कारण अंकुरित हो रहे संक्रमित गन्ने के टुकड़े (सेट)में सड़न हो जाती है व नये तने सूख जाते हैं, जिससे खेत में पौधों के बीच अंतराल बढ़ जाता है। अंदर के ऊतक को चीरकर देखने पर लाल रंग का दिखाई देता है व इससे अनन्नास की तरह सुगंध आती है। इसका प्रकोप बाद वाली अवस्था में भी होता है। प्रसार गन्ना बीज व मृदा कंडवा रोग यह रोग स्पोरिसोरियम सीटामिनियम नामक फफूंदी से होता है। इसकी विशेष पहचान यह है कि इसमें पौधे से चाबुक के समान काली रंग की संरचना निकलती है। यह शुरूआत में एक पतली झिल्ली द्वारा ढकी रहती है। बाद में इसके फूटने से काला पाउडर, जिसमें फंफूदी के बीजाणु होते हैं, पौधे व जमीन पर फैल जाता है। यही बीजाणु आगे दूसरे निकलते हुये गन्ने व पेड़ी की फसल में द्वितीयक संक्रमण का कारण बनते हैं। इसके कारण गन्ने की संख्या व रस की मात्रा कम हो जाती है। एक क्लम्प या टिलर से निकलने वाले गन्ने संक्रमित हो जाते हैं। ऐसे गन्ने को बीज के रूप में इस्तेमाल करने पर अगली फसल में इस रोग का प्रकोप बढ़ जाता है। रोग दिखाई देने का माह अप्रैल-जून एवं सितंबर-नवंबर प्रसार रोगग्रसित बीज दिखाई देने का समय वर्षा ऋतु के उपरांत। प्रसार गन्ने के टुकड़े, फसल अवशेष, बाढ़ व सिंचाई पानी। उकठा रोग यह रोग फ्यूजेरियम सेकरोई नामक फफूंदी से होता है। इस रोग के प्रमुख लक्षण खड़ी फसल में गन्ने के पौधों का पीला पड़ना, सूख जाना आदि हैं। उकठा रोग से ग्रसित गन्ना अंदर से खोखला हो जाता है व अंदर के ऊतक लाल भूरे रंग का दिखाई देता है। इससे गन्ने के भार में बहुत कमी आ जाती है। रोग दिखाई देने का समय वर्षा ऋतु उपरांत। प्रसार संक्रमित बीज, मृदा व सिंचाई पानी के माध्यम से होता है। पोक्का बोइंग रोग यह रोग फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरम नामक फफूंदी से होता है। इसके प्रभाव से ऊपर से निकलने वाली पत्तियां विकृत हो जाती हैं। पत्तियां आपस में चिपकी हुई व चूड़ीदार निकलती हैं एवं उस भाग में हरापन नहीं होता। इस रोग की तीव्रता अधिक होने पर ऊपरी भाग में स़ड़न तक हो सकती है। रोग दिखाई देने का समय वर्षा ऋतु के आरंभ के साथ। प्रसार बीज व हवा द्वारा घासीय प्ररोह रोग यह माइकोप्लाज्मा के समान सूक्ष्मजीव से होने वाला रोग है। इसके कारण संक्रमित गन्ने से बहुत सारे पतले प्ररोह व तने निकलते हैं, जिनमें हरापन नहीं होता है। यह पूरा समूह घास के समान दिखाई देता है। इस रोग से ग्रसित समूह में गन्ने नहीं बनते या छोटे पतले आकार के बनते हैं। रोग दिखाई देने का समय प्रारंभिक अवस्था से लेकर गन्ना बनने की अवस्था तक। प्रसार रोगग्रसित बीज पीला पत्ती रोग रोगग्रसित बीज पीला पत्ती रोग यह एक विषाणुजनित रोग है, जिसका प्रारंभिक कारक शुगरकेन येलो लीफ वायरस होता है। इस रोग में पौधे की पत्तियों की मध्य शिरा ऊपर से पीली होनी शुरू होती है व इसका पीलापन बढ़ता जाता है। इसके लक्षण 6-8 माह के गन्ने में दिखाई देते हैं। इस रोग की अधिक तीव्रता में पत्तियां ऊपर से नीचे की ओर सूखती जाती हैं। इसके प्रकोप से गन्ने के ऊपरी भाग की इंटरनोड छोटी हो जाती है। हाल के दिनों में इस रोग का प्रकोप बहुत तेजी से बढ़ रहा है। प्रसार संक्रमित बीज व माहूं कीट गन्ने के रोगों का एकीकृत प्रबंधन बीज किसी भी रोग से ग्रसित गन्ने को बीज के रूप में उपयोग न करें। प्रमाणित व अपने क्षेत्र के लिये संस्तुत प्रजाति का ही प्रयोग करें। बीज शोधन कार्बेन्डाजिम (0.2 प्रतिशत) के घोल में 15-20 मिनट तक गन्ने के टुकड़ों को डुबोयें एवं इसके बाद बुआई करें। यह उपचार फफूंदी रोग से बचाव में लाभकारी होता है। ऐरेटेड स्टीम थेरेपी (गर्म-गर्म उपचार) घासीय प्ररोह रोग व पेड़ी संकुचन रोग के कारकों को निष्क्रिय करने के लिये इस विधि से 50 डिग्री तापमान पर 1 घंटे तक बीज का उपचार करें। बुआई के समय खेत तैयार करते समय सभी फसल अवशेषों को निकाल देना चाहिये। ट्राइकोडर्मा कल्चर को 10 कि.ग्रा./ हैक्टर की दर से नाली में डालने से लाल सड़न की समस्या कम करने में मदद मिलती है। शरदकालीन बुआई के लिये सहफसली खेती में सरसों या धनिया आदि लाभकारी हैं। खड़ी फसल में अप्रैल से जून में कंडवा रोग व घासीय प्ररोह रोग से ग्रसित पौधों को उखाड़कर नष्ट करें। कंडवाग्रसित पौधों में आ रही चाबुक के समान संरचना को उसकी झिल्ली टूटने से पहले निकालकर बोरों में भर दें व खेत से दूर ले जाकर जला दें या गड्ढे में दबा दें। लाल सड़न यह गन्ने को सर्वाधिक नुकसान पहुंचा सकने वाला रोग है। पहले भी इसके द्वारा भारत के विभिन्न राज्यों में गन्ने की खेती में अवरोध पैदा किया जा चुका है। गन्ने की खड़ी फसल में रोगी पौधों की पहचान ऊपरी पत्तियों व तना को देखकर की जा सकती है। शुरुआत में ऊपर की तीन पत्तियों को छोड़कर नीचे की पत्तियां पीली पड़कर मुरझाने लगती हैं और बाद में पूरा पौधा मुरझा जाता है। ऐसे गन्ने को फाड़कर देखने पर अंदर का ऊतक लाल दिखाई पड़ता है व इसके साथ-साथ सफेद धारी तथा सफेद धब्बे दिखाई देते हैं। लाल सड़न रोग कोलेटोट्राइकम फेलकेटम नामक फफूंदी से होता है। वर्षा ऋतु या उसके उपरांत ऐसे पौधे, जिनकी ऊपरी पत्तियां पीली पड़ रही हैं या सूख रही हो, उसे तुरंत पफाड़कर देखें और लाल सड़़न के निश्चित होने पर पूरे थान को जड़ से उखाड़कर दूर ले जाकर जला दें। खेत की मेड़बंदी कर वर्षा या सिंचाई के पानी को समीप के स्वस्थ गन्ने के खेत में न जाने दें। कंडवा से ग्रसित कल्ले वर्षाकाल समाप्त होने के पश्चात पिफर निकलते हैं। इन्हें देखते ही काटकर बोरों में बंद करके जला दें। इसी तरह उकठा से ग्रसित गन्नों को भी काटकर नष्ट करें। पेड़ी फसल में प्रबंधन गन्ने की पहली फसल में रोग-व्याधि होने पर इसकी समस्या पेड़ी फसल में बढ़ती जाती है। अतः पेड़ी लेने के लिए विशेष सावधानी बरतनी चाहिये। पेड़ी फसल लेने के लिए गन्ने की कटाई सतह से करनी चाहिये। ठूंठाें व फसल अवशेषों को नष्ट कर देना चाहिये। यदि लाल सड़न, उकठा और कंडवा रोग का प्रकोप अधिक हो तो प्रथम पेड़ी व दूसरी पेड़ी लेना लाभकारी नहीं होगा। यदि कंडवा रोग का प्रकोप हो, तो खेत में सिंचाई करते रहना लाभकारी होता है। किसी भी प्रकार के रोग से ग्रसित पौधों को तुरंत उखाड़कर खेत से अलग कर देना चाहिये। स्त्राेत : खेती पत्रिका(भा.कृ.अनु.प.) दिनेश कुमार पंचेश्वर, रमेश अमुले, मोनिका सिंह, बी.के. शर्मा और आशीष तिवारी’ गन्ना अनुसंधान केन्द्र, बोहानी, नरसिंहपुर, जवाहर लाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर (मध्य प्रदेश)