गन्ने की प्रजातियां प्रश्नः कौन-सी सूखा सहनशील गन्ना प्रजातियां उपलब्ध हैं? उत्तरः को.86032, को.88006, को.टी.एल. 88322, को.95014, को.97008, को.99004, को.95003, को.95006, को. 94012, को. 96009, को.जे.एन. 86-600, वी.एस.आइर्. 9/20, को.99012, को.97001 और को.96023 सूखा सहनशील प्रजातियों का प्रमुख तौर पर उल्लेख किया जा सकता है। प्रश्नः जलप्लावन के लिए कौन सी गन्ना किस्में सहनशील हैं ? उत्तरः प्रजातियां, जैसे कि को. 8231, को. 8232, को.8145, को.एस.आई. 86071, को.एस.आई. 776, को. 8371, को. 99006, 93ए. 4, 93ए.11, 93ए.145 और 93ए.21, जलप्लावन के लिए सहनशील हैं। प्रश्नः लवणताग्रस्त उपयुक्त के लिए प्रजातियों के बारे में बताएं? उत्तरः को. 95003, को. 93005, को. 97008, को. 85019, को. 99004, को. 2001-13 को लवणता वाली मृदाओं के लिए उपयोगी कहा जा सकता है। कुछ दूसरी प्रजातियां भी, जैसे कि को. 94012, को. 94008, को. 2000-10, को. 2001-15 और को. 97001, लवणताग्रस्त क्षैत्रों के लिए सहनशील हैं। प्रश्नः लोहे की कमी वाले क्षैत्रों के लिए उपयुक्त गन्ना किस्मों के बारे में बताएं? उत्तरः को. 8021, को. 86032, को. 86249, को. 88025, को. 94005 और को. 94012 लोहे की कमी वाले क्षेत्रों के लिए सहनशील हैं। प्रश्नः कटाई के बाद आने वाली गिरावट के प्रति सहनशील गन्ने की किन किस्मों को लगाना चाहिए? उत्तरः को.सी. 671, को. 7314 और को. 775 को को.जे. 64, को.एस. 510, को. 7240, को.सी. 8001, को. 6907 और को. 62175 से कटाई के बाद आने वाली गिरावट के लिए बेहतर प्रतिरोधिता पायी गयी। कोयम्बटूर में किए गए अध्ययन में को.सी. 671 में को. 6304 के मुकाबले कटाई के बाद होने वाली विपरीतता (इनवर्जन) के कारण आने वाली गिरावट में कमी देखी गई। को.सी. 671 को यदि 14-16 महीने बाद भी काटा गया हो तो इसमें कम विपरीतता और डेक्स्ट्रॉन का बनना देखा गया। कौन सी गन्ने की प्रजातियां गुड़ बनाने के लिए अच्छी हैं? आंध्र प्रदेशः को. 6907, को.टी. 8201, को. 8013, को. 62175, को. 7219, को. 8014, को.आर. 8001 बिहारः को.एस. 767, बी.ओ. 91, को. 1148 गुजरातः को.सी. 671, को. 7527, को. 6217, को. 8014, को. 740 हरियाणाः को. 7717, को. 1148, को. 1158, को.एस. 767 कनार्टकः को.7704, को.62175, को.8014, को.8011, का.ेसी. 671, को.86032 मध्य प्रदेशः को. 775, को. 7314, को. 6304, को. 62175 महाराष्ट्रः को. 775, को. 7219, को.सी. 671, को. 740, को. 7257, को. 86032 ओडिशाः को. 7704, को. 7219, को. 62175, को. 6304 पंजाबः को.जे. 64, को. 1148, को.जे. 81 राजस्थानः को 997, को. 419 तमिलनाडुः को.सी. 671, को. 62175, को. 7704, को. 6304, को. 8021, को. 86032, को.सी. 92061 उत्तर प्रदेशः को.एस. 687, को.जे. 64, को.1148, को.एस. 767, को.एस. 802, कोएस. 7918, को. 1158, को.एस. 8408, को.एस. 8432, बी.ओ. 91, को.एस. 8315, को.एस. 8016, को.एस. 8118, को.एस. 8119, बी.ओ. 19, को.एस. 837 पश्चिम बंगालः को.जे. 64, को. 1148 प्रश्न : पेय पदार्थ बनाने के लिए कौन-सी प्रजातियों की रस की गुणवत्ता बेहतर है? उत्तरः को.सी. 671, को.7717, को.86032, को.86249 और को.94012 के रस में शर्करा की उच्च मात्रा होने के साथ हल्के रंग और कम रेशे होने के कारण इन्हें पेय पदार्थ बनाने के लिए उपयुक्त कहा जा सकता है। संवर्धन प्रक्रियाएं प्रश्न गन्ने के रोपण के लिए खेत की कितनी गहराई तक जुताई की जानी चाहिए? उत्तरः गन्ने की करीब 80 प्रतिशत जड़ें 60 से.मी. की गहराई तक जाती है। अतः गन्ने के खेतों की गहरी जुताई करना आवश्यक है। शुरुआत में एक या दो जुताईयां कम-से-कम 30 से.मी. की गहराई तक, टैक्टर द्वारा खीचें गए डिस्क पलो या मोल्ड बोर्ड पलो या पशु द्वारा खीचें गए मोल्ड बोर्ड पलो की सहायता से की जानी चाहिए। इसके बाद हल्के कृषि जुताई यंत्रों से जुताई की जानी चाहिए। प्रश्नः गन्ने की रोपाई के लिए उपयुक्त पंक्तियों की दूरी क्या होनी चाहिए? उत्तरः गन्ने में उपयुक्त पंक्तियों की दूरी प्रजाति तथा मृदा की उर्वरता के स्तर पर निर्भर करती है। निम्न स्तर की उर्वरता वाली भूमि में एक कम ब्यांत (टिलर) उत्पन्न करने वाली प्रजाति के लिए 60 सें.मी. वाली नजदीकी पंक्तियों की दूरी अच्छी रहेगी, जबकि इस प्रकार की भूमि में अत्यधिक उत्पादन वाली प्रजाति के लिए 75 सें.मी. वाली मध्यम दूरी आवश्यक है। उच्च उर्वरता वाली मृदाओं में अत्यधिक उत्पादन वाली प्रजाति के लिए 90 सें.मी. की दूरी अति उत्तम है। यद्यपि मशीनीकृत खेती के लिए 150 सें.मी. की अत्यधिक दूरी वाली रोपण पद्धति अपनाई जाती है। अतः अत्यधिक उत्पादन वाली प्रजातियों का चुनाव आवश्यक है। प्रश्नः गन्ने के रोपण के लिए बीज की गुणवत्ता कैसी हो? उत्तरः एक अच्छी रोपण सामग्री को रोग एवं हानिकारक जीवरहित, अक्षत कलिकाओं वाले बीज टुकड़ों को, 6-8 महीने की फसल से काटकर प्राप्त किया जाता है। जल प्लावन प्रश्न : जलप्लावन में किन प्रबंधन प्रक्रियाओं का प्रयोग किया जाना चाहिए? फालतू पानी की निकासी व खेत में से जल निकासी के लिए नालियों को बनायें। अधिक नमी को कम करने के लिए जल्द रोपण। बीज की अधिक मात्रा का प्रयोग ताकि अधिक गन्ने प्राप्त हो सकें। मिट्टी चढ़ायें ताकि जड़ों का बेहतर विकास हो सके। जलप्लावन सहनशील प्रजातियां जैसे कि को. 8231, को. 8232, को. 8145, को.एस.आई 86071, को.एस.आई 776, को. 8371, को. 9006, 93 ए. 4, 93ऐ.145 और 93, ए. 21 को उगायें। प्रश्नः गन्ने की व्यावसायिक खेती के लिए एक, दो या तीन कलिकाओं वाले बीज रोग एवं कीट प्रतिरोधी गन्ना प्रजाति गन्ने का बढ़ता व्यावसायिक महत्व टुकड़ों में से कौन से बेहतर हैं? उत्तरः एक कलिका वाले बीज टुकड़े सर्वाधिक 90 प्रतिशत के करीब अंकुरण करते पाये गए हैं। दो कलिकाओं वाले बीज टुकड़े 60 प्रतिशत के करीब और तीन कलिकाओं वाले बीज टुकड़े रोपण करने पर और भी कम करीब 50 प्रतिशत अंकुरण प्रदर्शित करते हैं। एक कलिका वाले बीज टुकड़ों से उत्पन्न हुए पौधे प्रतिकूल वातावरण को सहन करने में सक्षम नहीं होते जबकि 2 या 3 कलिकाओं वाले बीज टुकड़ों से उत्पन्न हुए पौधे प्रतिकूल वातावरण को सहन कर सकते हैं। अतः दो कलिकाओं वाले बीज टुकड़े रोपाई के लिए बेहतर हैं। प्रश्नः गन्ने में खरपतवार नियंत्रण के लिए कौन से खरपतवारनाशी उपयुक्त हैं? उत्तरः गन्ने में फुटाव से पहले खरपतवारों के नियंत्रण के लिए एट्राजिन (2.0 कि.ग्रा. क्रियाशील तत्व/हैक्टर) और मेट्रिबुजिन (1.0 कि.ग्रा. क्रियाशील तत्व/ हैक्टर) उपयुक्त है। चौड़े पत्तों वाले खरपतवारों के नियंत्रण के लिए 2,4-डी (1.0 कि.ग्रा. क्रियाशील तत्व/हैक्टर) को तभी प्रयोग किया जाये जब यह गन्ने की फसल में तीव्रता से वृद्धि कर रहे हों। सिंचाई प्रबंधन प्रश्नः गन्ने की एक अच्छी फसल लेने के लिए कितनी सिंचाइयों की आवश्यकता होती है? उत्तरः ऊष्णकटिबंधीय क्षेत्रा में पहले 35 दिनों तक हर 7वें दिन, 36-110 दिनों के दौरान हर 10वें दिन, 101-270 दिनों वृहत वृद्धि अवस्था के दौरान हर 7वें दिन की और परिपक्वता प्रवस्था के दौरान हर 15वें दिन सिंचाई की जानी चाहिए। इन दिनों को वर्षा पड़ने के अनुसार अनुकूलित करना पड़ता है। करीब 30 से 40 सिंचाइयों की आवश्यकता रहती है। प्रश्नः कम से कम पानी के साथ गन्ने की खेती कैसे की जा सकती है? उत्तरः गन्ना एक अधिक पानी की आवश्यकता वाली फसल है। एक टन गन्ने के उत्पादन के लिए 250 टन पानी की आवश्यकता होती है। वैसे तो बिना उत्पादन में कमी लाये पानी की आवश्यकता को अपने आप में कम नहीं किया जा सकता मगर सिंचाई के पानी की आवश्यकता में कमी, पानी को इसके स्रोत से पाईप लाइन के द्वारा खेत जड़ क्षेत्रा तक लाकर, रास्ते में होने वाले रिसाव के कारण नुकसान को रोककर या फिर सूक्ष्म सिंचाई विधियों को अपनाकर लाई जा सकती है। जब पानी की कमी के हालात हों तब हर दूसरी खांच में पानी से सिंचाई की जा सकती है। मल्च का प्रयोग कर पानी की आवश्यकता में कमी लाई जा सकती है। सूखे के हालात के दौरान 2.5 प्रतिशत यूरिया और 2.5 प्रतिशत म्यूरेट ऑपफ पोटाश के घोल को पाक्षिक अंतराल पर 3 से 4 बार स्प्रे कर उसके प्रभाव को कम किया जा सकता है। तरल गुड़ बनाने की प्रक्रिया गुड़ बनाने की विधि के दौरान ही तरल गुड़ भी बनाया जा सकता है। इसमें पानी, शर्करायें और गैर शर्करायें शामिल हैं। इसमें ग्लुकोस व फ्रक्टोज बराबर अनुपात में पाये जाते हैं जिनके साथ प्रोटीनों, कार्बनिक अम्लों और खनिजों का पाया जाना शामिल है। रस के निष्कर्षण के बाद पोटाश एलॅम के रवों को इसमें डाला जाता है। इससे रस में से ठोस पदार्थों को नीचे बैठ जाने में सहायता मिलती है। इस प्रकार साफ किए गए रस को कढ़ाहे में उबाला जाता है। करीब 50 ग्राम चूने को मिलाकर पी-एच को 6.0 तक लाया जाता है। जब तापमान 850 सी. पहुंचता है तो भिंडी की गोंद को डालने के बाद पहली बार झागवाली मैल को हटाया जाता है। रासायनिक निर्मलकारियों में फॉस्फोरिक अम्ल और सुपर फॉस्पेट का प्रयोग किया जा सकता है। उबालने को जारी रखा जाता है और दूसरी बार मैली को 980 सी. पर हटाया जाता है। इस कार्य को पूरा करने का समय तब आता है जब तापमान 1060 सी. पर पहुंच जाता है और इस अवस्था में कढ़ाही को आग से उतार लिया जाता है और 0.04 प्रतिशत साइट्रिक अम्ल मिला दिया जाता है। तरल गुड़ चीनी और गुड़ दोनों से मीठा होता है। पूरी तरह शांत होने पर तरल गुड़ को साफ व कीटाणुरहित बोतलों में भरा जाता है। इसे 1-1.5 साल तक भंडारित किया जा सकता है। बेहतर भंडारण के लिए इसमें 0.1 प्रतिशत साइट्रिक अम्ल व 0.1 प्रतिशत सोडियम मेटाबाईसल्फाइट मिलाना आवश्यक है। प्रश्नः टपक सिंचाई प्रणाली में अवरोधों को कैसे रोका जा सकता है? उत्तरः पानी के सही प्रयोग के लिए टपक सिंचाई व्यवस्था को ठीक-ठाक रखना अति आवश्यक है। इसके लिए समय-समय पर पानी की नलियों के अंत के ढक्कन खोलकर इनमें से पानी को तेजी से बहाकर सापफ करें। टपक प्रणाली के अंदर की सतह पर जमें लवणों को हटाने के लिए 30 प्रतिशत हाइड्रोक्लोरिक एसिड को इंजैक्ट करें। जब सिंचाई के पानी का स्रोत नदी, नहर या खुला कुआं इत्यादि हो तो बैक्टीरिया, कवक इत्यादि के लिए 1 पीपीएम ब्लीचिंग पाउडर से क्लोरिनेशन करना चाहिए। एसिड उपचार और कलोरिनेशन करने की समयावधि पानी की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। पोषक तत्व प्रबंधन प्रश्नः गन्ने की फसल के लिए पोषक तत्वों की कितनी आवश्यकता होती है? उत्तरः गन्ने की 100 टन/हैक्टर की फसल औसतन 208 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 53 कि.ग्रा. पफॉस्पफोरस, 280 कि.ग्रा. पोटाश, 30 कि.ग्रा. गंधक, 3.4 कि.ग्रा. लोहा, 1.2 कि.ग्रा. मैंगनीज और 0.6 कि.ग्रा. तांबे को मृदा से निकालती है। अतः मृदा की उर्वरता को बनाये रखने के लिए इन पोषक तत्वों की मृदा में पुनः पूर्ति करना आवश्यक है। प्रश्नः गन्ने के खेत में कार्बनिक और रासायनिक खादों की कितनी मात्रा की आवश्यकता होती है? उत्तरः गन्ने के खेत में कार्बनिक और रासायनिक खादों की आपूर्ति सदा मृदा परीक्षण के आधार पर सिफारिश की गई मात्रा द्वारा की जानी चाहिए। मृदा परीक्षण सिफारिशों के अभाव में आप 12.5 टन/हैक्टर कार्बनिक खादों का खेत तैयार करते समय डालें। विभिन्न राज्यों की मृदाओं के उर्वरता स्तरों और गन्ना उत्पादन क्षमता के आधार पर इन राज्यों की खादों की सिपफारिश की गई मात्रायें अलग अलग होती हैं। प्रश्नः गन्ने में खादों का प्रयोग करने का सही समय क्या है? उत्तरः फॉस्फोरस की सारी मात्रा रोपण से पहले ही डाल दी जाती है जबकि नाइट्रोजन व पोटाश की मात्रा दो बराबर हिस्सों में बांटकर 45 और 90 दिनों पर ऊपरी सतह के रूप में प्रयुक्त की जाती है। खुले टैक्सचर वाली रेतीली मृदाओं और अगेती प्रजातियों के लिए नाइट्रोजन व पोटाश की मात्रा तीन बराबर हिस्सों में बांटकर 30, 60 और 90 दिनों पर ऊपरी सतह के रूप में प्रयुक्त की जाती है। मृदा प्रबंधन प्रश्नः गन्ने की खेती के लिए आदर्श मृदा किस प्रकार की होती है? उत्तरः गन्ना उत्पादन के लिए एक अच्छी जल निकासी वाली, पीएच. प्रतिक्रिया 6.5 से 7.0 के बीच हो, जिसमें पोषक तत्वों की उपयुक्त मात्रा हो और बिना संघनन वाली मृदाएं आदर्श होती हैं। मृदा ढीली व भुरभरी, जिसमें कम से कम 45 सें.मी. की गहराई तक हानिकारक लवण न हो और न ही उनमें पोषक तत्वों की कमी होनी चाहिए। प्रश्नः गन्ने की खेती के लिए मृदा से किस प्रकार की अपेक्षायें होती हैं? उत्तरः मृदा के भौतिक गुणों पर खेती करने की तकनीक निर्भर करती है। दोमट मृदाएं, जिनकी आकृति स्थिर कणों वाली हो, उनमें गन्ने की खेती के लिए तैयारी अपेक्षाकृत बहुत ही आसान होती है, क्योंकि इनमें खेत की तैयारी केवल खांचे और मेड़ों को आवश्यक दूरी पर बनाने तक ही सीमित रहती है। चिकनी मृदा के कारण सख्त मृदाओं में खेत की तैयारी कापफी उच्च स्तर की करनी पड़ती है। इसके लिए खांचे और मेड़ों को आवश्यक दूरी पर बनाने से पहले गहरी जुताई या रूखानी से कटाई करनी पड़ती है। गन्ने की जड़ें काफी गहराई तक जाती हैं और 5 मीटर से ऊपर दूरी तक पहुंचती हैं। इस प्रकार की गहरी मृदाओं में उग रही फसल में सूखे को सहने की कापफी क्षमता रहती है। मृदा का स्थूल घनत्व 1.4 मि.ग्रा./ मीटर 3 और छिद्रिता करीब 50 प्रतिशत होना चाहिए। इससे अपनी धारण क्षमता के स्तर पर इसके छिद्रों में वायु और जल की मात्रा एक जैसे अनुपात में होगी। अगर मृदा का स्थूल घनत्व 1.5 मि.ग्रा./मीटर 3 से अधिक होगा तो यह जड़ों के फैलाव में बाधक होने के कारण पौधों की वृद्धि में कमी का कारण बनता है। मूल्यवर्ध्दित गुड़ मूल्यवर्धित गुड़ क्या होता है? ठोस गुड़ को बनाते समय उसमें पोषक पदार्थों, जैसे कि मुरमरे, चने, तिल तथा विभिन्न प्रकार के नट्स जैसे कि काजू, बादाम, विटामिन, लोहा, स्वादवर्धक चॉकलेट पाउडर को मिलाकर इस प्रकार के गुड़ की मांग बढ़ाई जा सकती है। मुरमरे, चने, तिल और मूंगपफली को विभिन्न अनुपातों, 1:0.75, 1:1, 1:1.25, 1:1.5 और 1:1.75 में मिलाकर गुड़ पटि्टयां बनाई जाती हैं, जिससे पोषकता व स्वाद में वृद्धि होती है। गुड़-गेहूं के आटे और गुड़-बेसन निःस्रावित स्नैक्स, गुड़ को आटे या बेसन के साथ 90:10, 80:20, 70:30, 60:40, 50:50 और 40:60 के अनुपात में मिलाकर बनाये जाते हैं। गुड़ को 10 प्रतिशत कोको पाउडर के साथ मिलाकर जो उत्पाद बना, वह चाकलेट की जगह पर लोगों को कापफी पसंद आया। मूल्यवर्धित गुड़ गरीब व कुपोषित बच्चों के लिए पोषक आहार साबित होगा। सूखा प्रबंधन प्रश्नः सूखे के प्रभावों को दूसरे तनावों से भिन्न कैसे पहचाना जा सकता है? उत्तरः छोटी-छोटी पोरियां, नीचे वाली पत्तियों का सूखना और ऊपर वाली पत्तियों का अंदर की तरफ मुड़ना आदि सूखे के कुछ पहचाने जा सकने वाले लक्षण हैं। प्रश्नः सूखे का गन्ना उत्पादन व शर्करा की मात्रा पर क्या प्रभाव है? उत्तरः सूखे का गन्ना उत्पादन पर शर्करा की मात्रा पर अधिक प्रभाव देखा जाता है। इससे गन्ने की लंबवत वृद्धि करीब 30 प्रतिशत तक कम हो जाती है। प्रश्नः किस अवस्था पर सूखे का प्रभाव सबसे घातक होता है? उत्तरः शुरुआती अवस्थाएं, विशेषकर कल्ले निकलने की अवधि, सबसे अधिक हानिकारक होती है। प्रश्नः खेत के हालातों में सूखे के प्रबंधन के कौन से आसान तरीके हैं? उत्तरः रोपण से पहले बीज टुकड़ों को 40 प्रतिशत चूने से संतृप्त पानी में भिगोना, 2.5 कि.ग्रा. यूरिया और 2.5 कि.ग्रा. पोटाश का 100 लीटर पानी में घोल बनाकर 15-20 दिनों के अंतराल पर स्प्रे किया जाना और गन्ना अवशेषों का पलवार के रूप में प्रयोग प्रबंधन के कुछ आसान तरीके हैं। गन्ने में पुष्पण का नियंत्रण प्रश्नः पुष्पण के गन्ना उत्पादन व रस की गुणवत्ता पर क्या प्रभाव पड़ते हैं? उत्तरः गन्ने की फसल में पुष्पण होने से गन्ना उत्पादन व रस की गुणवत्ता पर प्रभाव इस बात पर निर्भर करते हैं कि पुष्पण के बाद कटाई कब की जाती है। इसके अलावा चोटी की वृद्धि रुकने से गन्ने की कलिकाओं में फुटाव प्रारंभ हो जाता है और गन्ने में खोखलापन बनना शुरू हो जाता है। अगर फसल को उष्णकटिबंधीय क्षेत्रा में मार्च के बाद काटा जाना है तो इसमें पुष्पण को रोकना अति आवश्यक है। प्रश्नः गन्ने में पुष्पण को कैसे रोका जा सकता है? उत्तरः पुष्पण को रोकने के लिए 500 पीपीएम ईथरल (100 मि.ली./100 लीटर पानी/एकड़ की दर से) को जुलाई के दूसरे सप्ताह में फसल के ऊपर मिस्ट के रूप में प्रयोग करने से पुष्पण को पूरी तरंह से रोका जा सकता है। इसकी उच्च सांद्रता का प्रयोग मत करें। गुड़ व उसकी गुणवत्ता प्रश्नः गन्ने के गुड़ के संघटकों का ब्यौरा दें? उत्तरः गुड़ में करीब 60-85 प्रतिशत शर्करा, 5-15 प्रतिश ग्लूकोज और फक्टोज होते हैं, जिसके साथ 0.4 प्रतिशत प्रोटीन, 0.1 ग्राम वसा, 0.6 से 1.0 ग्राम तक खनिज पदार्थ (8 मि.ग्रा. कैल्शियम, 4 मि.ग्रा. फॉस्पफोरस और 11.4 मि.ग्रा. लोहा) 100 ग्राम गुड़ में पाये जाते हैं। इसके अलावा विटामिन और अमीनो अम्ल भी नाम मात्रा में पाये जाते हैं। सौ ग्राम गुड़ से 383 किलो कैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है। आयुर्वेद में दवाइयां बनाने के लिए गुड़ को सर्वोत्तम मूल पदार्थ माना जाता है। इसके मुकाबले सपेफद रवेदार चीनी में 99.5 प्रतिशत शर्करा ही होती है, जबकि खनिज पदार्थ बिल्कुल भी नहीं होते। गुड़ भंडारण की विधियां कौन-सी हैं? गुड़ को बड़ी मात्रा में भंडारगृह, जिसमें कैल्शियम, क्लोराइड या चूने जैसे नमी सोखने वाले पदार्थ रखे हों, में भंडारित किया जा सकता है गुड़ की तहों के बीच गन्ने के अवशेष, फ्रलाई ऐश, पामीराह के पत्ते, चावल की भूसी इत्यादि रखें विशेषकर मानसून ऋतु के दौरान भंडारगृह में चावल की भूसी का धुआं करें कम तापमान पर भंडारण करने से गुड़ की ताजगी और सुगंध बनी रहती तैयार गन्ने की फसल है तथा इसके शर्करा के स्तर में भी गिरावट नहीं होगी। गुड़ को टाट के बोरे, जिनके अंदर काली पॉलीथीन की परत लगी हो, में भंडारित किया जा सकता है। गर्मियों में गुड़ की नमी को छाया में सुखाकर 6 प्रतिशत से कम लाकर इसे टाट के बोरे, जिनके अंदर काली पॉलीथीन की परत लगी हो, में भंडारित करने से इसकी भंडारण की अवधि और उपयोगिती बढ़ जाती है। आम मिट्टी के बर्तन, जिन्हें बाहर अंदर से पेंट किया गया हो, लकड़ी के डिब्बे, पामिराह के पत्तों से बनी टोकरियों को घर में गुड़ को भंडारित करने के लिए प्रयोग किया जा सकता है। प्रश्नः गुड़ बनाने की विधि क्या है? उत्तरः आमतौर पर बाजार में मिलने वाले गुड़ में हानिकारक रसायनों, जैसे कि सल्फरडाईऑक्साइड अधिक मात्रा में पाया जाता है। गुड़ बनाने के लिए रसायनों के प्रयोग से स्वाद और भंडारण प्रभावित होते हैं। उच्च गुणवत्ता वाले गुड़ को बनाने के लिए पहले तो गन्ने की खेती को प्राकृतिक तौर पर कार्बनिक पदार्थों के प्रयोग से किया जाना चाहिए और उससे गुड़ बनाते समय कार्बनिक निर्मलकारियों का प्रयोग ही किया जाना चाहिए। देश में और निर्यात के लिए भी कार्बनिक विधि से उगाई गई फसल और गुड़ बनाने की मांग बढ़ती जा रही है। कार्बनिक गुड़ बनाने के लिए गन्ने की खेती उन मृदाओं में की जानी चाहिए जो पिछली फसल के रासायनिक खादों, खरपतवारनाशियों, कीटनाशकों इत्यादि के अवशेषों से मुक्त हों। कार्बनिक खेती के लिए सभी सिफारिश की गई तकनीकों का प्रयोग किया जाये और पोषक तत्वों के लिए केवल कार्बनिक स्रोतों का ही उपयोग किया जाये। खरपतवारनाशियों व कीटनाशकों का बिल्कुल भी प्रयोग न किया जाये। रोगों व हानिकारक जीवों के प्रबंधन के लिए केवल जैव-नियंत्रकों का ही प्रयोग किया जाये। गन्ने के संघटक पानीः 75-88 प्रतिशत शर्कराः 10-21 प्रतिशत रिडयूसिंग शर्कराएं: 0.3-3.0 प्रतिशत शर्कराओं के अलावा दूसरे कार्बनिक पदार्थः 0.5-1.0 प्रतिशत अकार्बनिक सयांजेकः 0.2-0.6 प्रितशत नाइट्रोजन वाले संयोजकः 0.5-1.0 प्रतिशत स्त्रोत: खेती की पत्रिका,(आईसीएसआर)भाकृअनपु-गन्ना प्रजनन सस्ंथान, कोयम्बटूर की वेबसाइट