दक्षिण प्रशांत क्षेत्र में सबसे पहले हुई थी गन्ने की खेती गन्ने की खेती 8,000 साल पहले दक्षिण प्रशांत क्षेत्र में न्यू गिनी के द्वीप पर हुई थी और इसके बाद यह धीरे-धीरे सोलोमन द्वीप समूह में फैली। यहां से 2000 वर्ष बाद गन्ना, इंडोनेशिया, पिफलीपींस और उत्तर भारत पहुंचा। चीन में गन्ना लगभग 800 ईसा पूर्व भारत से पहुंचा था। 1520 तक मैदानी क्षेत्राों में गन्ने की खेती बढ़ रही थी। इसके बाद गन्ने की खेती पेरू, ब्राजील, कोलम्बिया और वेनेजुएला में भी होने लगी। 8वीं शताब्दी में हुई थी चीनी बनाने की शुरुआत चीनी बनाने की शुरुआत 8वीं शताब्दी के आसपास, मुस्लिम और अरब व्यापारियों ने भूमध्य सागर, मेसोपोटामिया, मिस्र, उत्तरी अप अफ्रीका और अंडाल लुसिया में अब्बासीद खलीफा के दक्षिण हिस्सों में की थी। स्पैनिश एक्सप्लोरर कोरटेज ने वर्ष 1535 में उत्तरी अमेरिकी में पहली चीनी मिल स्थापित की थी। वर्ष 1547 में प्यूर्टो रिको में भी चीनी मिल की स्थापना की गई। वर्ष 1600 तक अमेरिका के कई हिस्सों में चीनी उत्पादन दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे आकर्षक उद्योग बन गया। गन्ने की बढ़ती खेती के बाद वेस्टइंडीज के 'शर्करा द्वीप' इंग्लैंड और फांस के लिए आर्थिक रूप से काफी फायदेमंद साबित हुए। महंगी हुआ करती थी चीनी अपने शुरुआती समय में चीनी इतनी महंगी बिका करती थी कि लोग इसे विलासिता की वस्तु मानते थे। इतिहासकारों के अनुसार महारानी एलिजाबेथ अपनी मेज पर एक चीनी का कटोरा रखती थीं और रोजाना भोजन और मसाले के रूप में चीनी का इस्तेमाल करती थीं, ताकि वो ये प्रदर्शित कर सकें कि वो कितनी धनवान हैं। कोलंबस लाए थे गन्ना क्रिस्टोफर कोलंबस अमेरिका की अपनी दूसरी यात्रा के दौरान कैरेबिया में गन्ना लाए थे। औपनिवेशिक काल में चीनी को कैरेबिया से यूरोप या इंग्लैण्ड भेजा जाता था, जहां रम बनाने के लिए इसका इस्तेमाल होता था। 17वीं से 19वीं शताब्दी के बीच ब्वॉयलिंग हाउसेज में गन्ने के रस से कच्ची चीनी बनाई जाती थी। ये ब्वॉयलिंग हाउसे पश्चिमी उपनिवेश के चीनी के कारखानों से जुड़े होते हैं। इस तरह बनती थी चीनी उस समय ईंट या पत्थर के आयताकार बक्से की तरह भटिठयां बनाई जाती थीं, जिनमें नीचे की ओर थोड़ी सी खुली जगह होती थी, जहां से राख निकाली जाती थी। हर भट्ठी के ऊपर की ओर तांबे की सात केतली या ब्वॉयलर लगे होते थे। हर केतली पहले वाले से छोटी और ज्यादा गर्म होती थी। गन्ने का रस सबसे बड़ी केतली में होता था, जो गर्म होता रहता था, इसमें नीबू मिलाकर इसकी अशुद्धियां दूर की जाती थीं। यहीं पर रस में ऊपर जो झाग बनता था उसे हटाया जाता था और फिर ऊपर वाली केतलियों में भेजा जाता था। आखिरी केतली में पहुंचते हुए गन्ने का रस एक सिरप में बदल जाता था, इसके बाद इसे ठंडा करने की प्रक्रिया होती थी। इस प्रक्रिया में सिरप ठंडा होकर गुड़ के टुकड़ों में बदल जाता था। इन टुकड़ों को लकड़ी के बैरल जिन्हें होगशेड्स कहा जाता था, में इसे इकट्ठा करके इसे सापफ चीनी बनाने के लिए क्योरिंग हाउस में भेज दिया जाता था। गन्ने की खेती के लिए भारत से ब्रिटेन गए थे श्रमिक पश्चिमी अप्रफीका के गुलाम 1833 में आजाद हो गए और इसके बाद उन्होंने इंग्लैंड के गन्ने के खेतों में काम करना बंद कर दिया। गन्ना खेत मालिकों को नए श्रमिकों की जरूरत पड़ी और उन्हें ये श्रमिक कम दामों में चीन, पुर्तगाल और भारत से मिले। इन श्रमिकों को एक निश्चित समय के लिए अनुबंधित करके वहां ले जाया जाता था। राष्ट्रीय अभिलेखागार, ब्रिटिश सरकार की 2010 की रिपोर्ट के मुताबिक, 1836 में भारत का श्रमिकों से भरा हुआ पहला जहाज इंग्लैंड आया था। गन्ने के खेतों में काम करने के लिए भारत, दक्षिणपूर्व एशिया और चीन के कई हिस्सों के लोग ब्रिटेन चले गए। अभी भी यूनाइटेड किंगडम के कुछ द्वीपों में एशियाई प्रवासियों की आबादी 10 से 50 पफीसदी के बीच है। ऑस्ट्रेलिया के मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रिटिश उपनिवेश के दौरान क्वींसलैंड (अब ऑस्ट्रेलिया का एक राज्य) में 1863 से 1900 के बीच गन्ने के खेतों में काम करने के लिए 50,000 से 62500 लोग दक्षिणी प्रशांत द्वीप समूह से आए थे। स्त्रोत : खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली प्रस्तुति : अश्विनी कुमार निगम।