सूक्ष्म पोषक तत्व गन्ने के वर्धन और विकास के लिए काफी कम मात्रा में आवश्यक होते हैं। हरे पौधों के लिए अनिवार्य पोषक तत्व हैं- लोहा, मैंगनीज, तांबा, जिंक, बोरॉन, मॉलिब्डीनम और कलोरीन। अधिकतर सूक्ष्म पोषक तत्व जीवों के द्वारा उत्पादित एंजाइमों और को-एंजाइमों के महत्वपूर्ण हिस्से हैं, जो उनके विभिन्न कार्य की प्रक्रियाओं को पूरा करने के लिए आवश्यक है। इन तत्वों की उपलब्धता बहुत कम होती है तो पौधे इनकी कमी को विशिष्ट लक्षणों द्वारा दर्शाते हैं और पौधे की वृद्धि प्रभावित होती है। दूसरी तरपफ अगर इनकी उपलब्धता अधिक हो जाती या पौधों द्वारा अधिक अवशोषित होते हैं, तब इनके पौधों में विषाक्तता के लक्षण दिखाई देते हैं और उत्पादन में कमी हो जाती है। अतः पोषक तत्वों की उपलब्धत्ता को ठीक अनुपात में उपयुक्त स्तर पर बनाये रखना उच्चतम उत्पादकता को प्राप्त करने के लिए आवश्यक है। दूसरी फसलों की तरह गन्ने की फसल के लिए भी सभी सूक्ष्म पोषक तत्वों की इष्टतम वृद्धि और उत्पादन के लिए आवश्यकता होती है। ये तत्व गुणवत्ता वाले गन्नों के उत्पादन के लिए भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। गन्ने की फसल उच्च जैवभार उत्पादक है। अतः यह सभी सूक्ष्म पोषक तत्वों की उच्च मात्राा को खेत से निकालकर ले जाती है। इसके अलावा आमतौर पर एक बार रोपित की गई गन्ने की फसल 3 वर्ष तक खेत में रहती है, जिसके कारण सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी के लक्षण इसमें आमतौर पर देखे जाते हैं। लोहे की कमी के लक्षण पूरी पत्ती में पीलापन आना, जिसके बाद हरी और पीली प्रत्यावर्ती धारियां, पत्ती की पूरी लंबाई तक विकसित होती दिखाई देने लगती हैं। इसे अंग्रेजी में इंटरवीनल क्लोरोसिस का नाम दिया जाता है। अंत में पूरी पत्ती पीली हो जाती है। इस कमी के लक्षण सर्वप्रथम नये पत्तों में दिखाई देते हैं, क्योंकि लोहा पौधे के अंदर पुनःप्रस्थान नहीं करता है। इसकी कमी का प्रभाव पेड़ी और नवीन फसलों में अधिक दिखाई देता है। क्लोरोसिस के कारण पौधे बौने रह जाते हैं और कभी-कभी प्रभावित क्लम्प सूख जाते हैं। लोहे की कमी को ऐसे करें दूर लोहे की कमी को दूर करने के लिए, 1.0 से 2.5 प्रतिशत फेरस सल्फेट को 0.1 प्रतिशत साइट्रिक एसिड के साथ मिलाकर तैयार घोल को हर सप्ताह तब तक स्प्रे करें, जब तक लक्षण खत्म न हो जायें। मृदा की आदर्श अवस्थाओं में 25-50 कि.ग्रा. फेरस सल्फेट से मृदा के उपचार की सिफारिश की जाती है। लोहे की कमी के कारण होने वाले क्लोरोसिस को ठीक करने के लिए 2.5 टन कार्बनिक खाद/हैक्टर में 125 कि.ग्रा. फेरस सल्फेट को मिलाकर प्रयोग करना अति उत्तम है। चूनेदार मृदाओं में जिप्सम/गंधक का प्रयोग और पानी की निकासी के साधन होने से लोहे की उपलब्धता बढ़ जाती है। स्त्रोत : खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), नई दिल्ली ।