<h3 style="text-align: justify;">भाकृअनुप-गन्ना प्रजनन संस्थान, कोयंबटूर</h3> <p style="text-align: justify;">गन्ने की किस्में गन्ना कृषि की धुरी के रूप में काम करती हैं। भाकृअनुप-गन्ना प्रजनन संस्थान, कोयंबटूर, भारत की गन्ना किस्मों की जरूरतों को पूरा करने का प्रमुख संस्थान है। 109 वर्ष पुराने इस संस्थान की किस्मों ने देश को स्वतंत्रता के तुरंत बाद ही एक चीनी आयातक देश से चीनी सरप्लस देश में बदल दिया।</p> <p style="text-align: justify;">वर्ष 1912 में कोयंबटूर में प्रजनन सुविधा की स्थापना तथा 1918 में ‘को.-205’ के रूप में पहली गन्ना किस्म का जारी होना, देश की चीनी सुरक्षा के लिए ऐतिहासिक कदम था। गन्ना किस्म ‘को.-205’ ने न केवल गन्ने की खेती में क्रांति ला दी, बल्कि एक प्रजनन रणनीति के लिए भी मार्ग प्रशस्त किया।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC.jpg" width="192" height="168" /></p> <h4 style="text-align: justify;">समस्त गन्ना प्रजनक देशों को लाभ</h4> <p style="text-align: justify;">इसने भारत के साथ-साथ दुनिया के समस्त गन्ना प्रजनक देशों को लाभान्वित किया। संस्थान में अब तक 3200 से अधिक गन्ना किस्में विकसित हुई हैं। इनमें से 150 से अधिक व्यावसायिक रूप से सफल रही हैं। संस्थान की विकसित किस्में इतनी समृद्ध और विविध हैं कि उचित क्षेत्र और किस्म का चयन, उचित समय पर रोपाई व कटाई की अनुशंसित सस्य क्रियाओं से गन्ना किसानों एवं चीनी मिलों को समृद्ध लाभांश सुनिश्चित करती है।</p> <h4 style="text-align: justify;">पहला अंतर्जातीय संकरण</h4> <p style="text-align: justify;">सैकेरम ऑफिसिनेरम क्लोन वेल्लई और सै. स्पोंटेनियम (कोयंबटूर) के बीच पहला अंतर्जातीय संकरण बनाया गया था, जिससे वर्ष 1918 में जारी पहली व्यावसायिक सफल किस्म ‘को.-205’ का विकास हुआ। इसने सैकेरम बारबरी क्लोन कत्था की जगह ले ली, जो उस समय पंजाब प्रान्त में व्यापक रूप से उगाई जाती थी। जल्द ही प्रथम पीढ़ी के संकरों से त्रिजातीय संकर विकसित किये गए जिनमें सैकेरम बारबरी के गुणों से युक्त जावा किस्में के साथ सैकेरम स्पोंटेनियम शामिल था। इनमें उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र को कवर करने के लिए को.-213, को.-244, को.-281, को.-285, को.-290 और को.-312 भारत में अत्यधिक सफल रहीं। गन्ना किस्म को.-312 को लगभग 20 वर्षों तक बड़े पैमाने पर उगाया गया। इसने 1940 के दशक में उत्तर भारत में चीनी उद्योग को स्थिरता प्रदान की। को.-453 तथा को.-1148 इस क्षेत्र में अन्य सफल प्रजातियां थीं। को.-1148 किस्म की 60 से भी अधिक वर्षों तक खेती की गई।</p> <p style="text-align: justify;">बाद में ये सभी किस्में लाल सड़न रोग के प्रति अति संवेदनशील हो गई। उष्ण कटिबंधीय भारत के लिए देशज क्लोन्स की प्रतिस्थापना के लिए किस्मों का प्रजनन 1926 में शुरू किया गया। सात वर्ष की समयावधि के भीतर ही प्रथम अनूठी किस्म को.-419 वर्ष 1933 में जारी की गईं। इसने संपूर्ण उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र को अधिक गन्ना उपज एवं चीनी परता के कारण वर्ष 1952-53 तक 96.2 प्रतिशत क्षेत्रफल के साथ संतृप्त किया।</p> <p style="text-align: justify;">इसकी पांच दशकों से भी अधिक समय तक खेती की जाती रही। विस्तृत जलवायु परिस्थितियों के प्रति अनुकूलता तथा गुड़ उत्पादन के लिए उपयुक्तता इसकी अतिरिक्त खूबियां रही हैं। बाद में महाराष्ट्र में को.-740 द्वारा इस किस्म को प्रतिस्थापित किया गया। को.-6301 दूसरी अदभुत गन्ना किस्म है, जिसकी 30 वर्षों तक खेती की गई। उपोष्णकटिबंधीय भारत के लिए को.-7219, को.-7527, को.-7704, सीओसी-671, को.-8013, को.-8014, को.-7508, को.-6907, सीओए-7601 अन्य प्रमुख किस्में थीं।</p> <h3 style="text-align: justify;">अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना</h3> <p style="text-align: justify;">अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना द्वारा चिन्हित गन्ना किस्में आगे दिये गये विषयों भागों की सारणी-1 में विभिन्न कृषि जलवायु क्षेत्रों में खेती के लिए जारी प्रमुख गन्ना प्रजातियों का विवरण दिया गया है। सारणी-2 में अन्य अनुसंधान सस्ंथानो के द्वारा जारी किस्मों की सूची है, जिसे भाकृअनपु-गन्ना प्रजनन सस्ंथान के फ्लफ सप्लाई प्रोग्राम की सहायता से विकसित किया गया। जारी किस्मों के अलावा अनेक गन्ना क्लोनों की विभिन्न राज्यों द्वारा समय-समय पर खेती की गई। इन राज्यों द्वारा उगाई गई ऐसी गन्ना किस्मों की सूची सारणी-3 में दी गई है।</p> <h4 style="text-align: justify;"> नई गन्ना किस्में</h4> <p style="text-align: justify;">उपोष्णकटिकटबंधीय भारत के लिए महत्वपूर्ण गन्ना किस्में पिछले कुछ वर्षों के दौरान अनेक नई गन्ना किस्में जारी की गई हैं, जिनमें से भाकृअनुप-गन्ना प्रजनन संस्थान क्षेत्रीय केन्द्र, करनाल द्वारा चिन्हित किस्में जैसे को.-0118, को.-0238, को.-05009, को.-05011 शामिल हैं। इनमें से को.-0238 उपोष्ण कटिबंधीय भारत के लिए उपयोगी रही है। </p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : खेती पत्रिका(भाकृअनुप), जी. हेमाप्रभा, रविन्द्र कुमार और बक्शी राम, भाकृअनुप-गन्ना प्रजनन संस्थान, कोयंबटूर।</p>