गन्ने की उत्पादकता एवं चीनी परता में अभिवृद्धि को दृष्टिगत रखते हुए यह अत्यन्त आवश्यक है कि इस प्रकार की आधुनिक तकनीकी पर आधारित गन्ने की खेती की जाये, जिससे गन्ने का उत्पादन बढ़े साथ ही साथ उसके प्रसंस्करण के उपरान्त अधिकाधिक चीनी प्राप्त हो। साथ ही यह भी प्रयास होना चाहिए कि गन्ना उत्पादन लागत में अत्याधिक वृद्धि न होने पाये। फसल चक्र 1. पश्चिमी क्षेत्र चारा-लाही-गन्ना-पेड़ी+लोबिया (चारा)- गेहॅू धान-बरसीम-गन्ना-पेड़ी+लोबिया (चारा) धान-गेहॅू-गन्ना-पेड़ी-गेहॅू-मॅूग 2. मध्य क्षेत्र धान-राई-गन्ना पेड़ी-गेहॅू हरी खाद-आलू-गन्ना-पेड़ी-गेहॅू चारा-लाही-गन्ना-पेड़ी+लोबिया (चारा) 3. पूर्वी क्षेत्र धान-लाही-गन्ना-पेड़ी-गेहॅू धान-गन्ना-पेड़ी-गेहॅू धान-गेहॅू-गन्ना-पेड़ी+लोबिया (चारा) भूमि का चुनाव गन्ने की खेती के लिए सामान्यतः 10-15 प्रतिशत नमी युक्त दोमट भूमि उपयुक्त रहती है। भूमि की तैयारी यदि मृदा में नमी कम हो तो गन्ना बुवाई से पूर्व नमी की कमी को पलेवा कर के पूरा किया जा सकता है। तत्पश्चात् मिट्टी पलटने वाले हल से एक गहरी जुतई तथा 2-3 उथली जुताइयॉ करके पाटा लगाना चाहिए। बुवाई का समय उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में 30-35 डि.से. का तापक्रम वर्ष में दो बार अक्टूबर एवं फरवरी-मार्च में आता है। जो गन्ने की बुवाई के लिए उपयुक्त समय के साथ के साथ ही सर्वोत्तम जमाव हेतु भी उपयुक्त है। क्रम.सं. मौसम बसन्त बुवाई का समय 1 पूर्वी क्षेत्र 15 जनवरी से फरवरी 2 मध्य क्षेत्र 15 फरवरी से 15 मार्च 3 पश्चिम क्षेत्र 15 फरवरी से 15 मार्च पंक्तियों के मध्य की दूरी एवं बीज सामान्यतयः पंक्ति से पंक्ति के मध्य 90 सेमी. दूरी रखने एवं तीन ऑख वाले टुकड़े बोने पर लगभग 37.5 हजार टुकड़े अथवा गन्ने की मोटाई के अनुसार 60-65 कुन्तल बीज गन्ना प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग किया जाता है। बीज गन्ना सामान्यतयः स्वीकृत पौधशालाओं से संस्तुत उन्नतशील गन्ना जातियों का रोग व कीटमुक्त, शत प्रतिशत शुद्ध 12 माह की आयु की फसल से बीज का चुनाव किया जाता है किन्तु वैज्ञानिक प्रयोगों से यह सिद्ध हुआ है कि गन्ने के 1/3 ऊपरी भाग का जमाव अपेक्षाकृत अच्छा होता है तथा 12 माह की फसल की तुलना में 7-8 माह की फसल से लिए गये बीज का जमाव भी अपेक्षाकृत अच्छा होता है। बोने से पूर्व गन्ने के दो अथवा तीन ऑख वाले टुकड़े काट कर कम दो घंटे पानी में डुबो लेना चाहिए तदुपरान्त किसी पारायुक्त रसायन (एरीटान 6 प्रतिशत या ऐगलाल 3 प्रतिशत) का क्रमशः 0.25 या प्रतिशत के घोल में शोधित कर लेना चाहिए। बीजशोधन के लिए बावसटीन 0.1 प्रतिशत घोल का भी प्रयोग किया जा सकता है। अगेती गन्ना प्रजातियाँ को. जे.-64 को.शा.-8436 को.शा.-88230 को.शा.-95255 को.शा.-98231 को.शा.-95436 को.शा-96268 को.से.-00235 को.से.-01235 आदि। मध्य देर से पकने वाली प्रजातियॉ को.शा.-96275 को.शा.-97261 यू.पी.-0097 ह्रदय), यू.पी.-39, को.शा.-96269 (शाहजहॉ), को.शा.- 99259 (अशोक), को.से.-1424 ,को.शा.-767, को.शा.-8432, को.शा.-92423 को.शा.-95422 को.शा.-97264 को.पन्त.-84212 आदि। बुवाई की विधियाँ समतल विधि इस विधि में 90 सेमी. के अन्तराल पर 7-10 सेमी. गहरा कॅूड डेल्टा हल से बनाकर बोया जाता है। वस्तुतः यह विधि साधारण मृदा परिस्थितियों में उन कृषकों के लिए उपयुक्त है जिनके पास सिंचाई, खाद तथा श्रम के साधन सामान्य हो। बुवाई के उपरान्त एक भारी पाटा लगाना चाहिए। नाली विधि उस विधि में बुवाई के एक या डेढ़ माह पूर्व 90 सेमी. के अंतराल पर लगभग 20-25 सेमी. गहरी नालियॉ बना ली जाती हैं, इस प्रकार तैयार की गयी नाली में गोबर की खाद डालकर सिंचाई व गुड़ाई करके मिट्टी को अच्छी प्रकार तैयार कर लिया जाता है। जमाव के उपरान्त फसल के क्रमिक बढ़वार के साथ मेड़ों की मिट्टी नाली में पौधे की जड़ पर गिराते जाते हैं, जिससे अंततः नाली के स्थान पर मेंड़ तथा मेड़ के स्थान पर नाली बन जाती है, जो सिंचाई नाली के साथ-साथ वर्षाकाल में जल निकास का कार्य भी करती है। यह विधि दोमट भूमि तथा भरपूर निवेश उपलब्धता के लिए उपयुक्त है। इस विधि से अपेक्षाकृत अधिक उपज होती है, परन्तु श्रम अधिक लगता है। दोहरी पंक्ति विधि इस विधि में 90-90 सेमी० के अन्तराल पर अच्छी प्रकार तैयार खेत में लगभग 10 सेमी गहरे कूंड बना लिये जाते हैं। यह विधि भरपूर खाद पानी की उपलब्धता में अधिक उपजाऊ भूमि के लिए उपयुक्त है। इस विधि से गन्ने की अधिक उपज प्राप्त होती है। बुवाई सामान्यतः आदर्श परिस्थियितों में तीन ऑख वाले कॅूडों में अथवा नालियों में इस प्रकार डाले जाते है कि प्रतिफुट कम से कम तीन ऑख समायोजित हो जाये। अपेक्षाकृत अच्छे जमाव के लिए दो ऑख वाले टुकड़े प्रतिफुट तीन ऑख की दर से प्रयोग किये जा सकते हैं। बुवाई के उपरान्त नाली में पेड़ी के ऊपर गामा के बी.एच.सी. 20 ई.सी. 6.25 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर हजारे से छिड़कना चाहिए अथवा फोरेट 10 जी.25 किग्रा. या सेविडाल 4.4 जी. 25 किग्रा या लिण्डेन 6 जी. 20 किग्रा./हे. की दर से प्रयोग करना चाहिए। नालियों को फावड़े या देशी हल से तुरन्त पाट कर खेत में पाटा लगा देना चाहिए। इससे दीमक व अंकुरवेधक नियत्रित होते है। कर्षण क्रियाएं अंधी गुड़ाई समतल विधि से बुवाई के एक सप्ताह में अथवा यदि वर्षा हो जाये या शीघ्र जमाव के लिए हल्की सिंचाई की गई हो तो अंधी गुड़ाई आवश्यक है। अंधी गुड़ाई की गहराई अधिकतम 4-5 सेमी से अधिक नहीं होनी चाहिए। गुड़ाई गन्ने के पौधों की जड़ों को नमी व वायु उपलब्ध कराने तथा खरपतवार नियंत्रण के दृष्टिकोण से गुड़ाई अति आवश्यक है। मिट्टी चढ़ाना गन्ने के थानों की जड़ पर मिट्टी चढ़ाने से जड़ों का सघन विकास होता है। इससे देर से निकले कल्लो का विकास रूक जाता है और वर्षा ऋतु से फसल गिरने से बच जाती है। मिट्टी चढ़ाने से स्वतः निर्मित नालियॉ वर्षा में जल निकास का काम भी करती है। अतः अन्तिम जून में एक बार हल्की मिट्टी चढ़ाना तथा जुलाई में अंतिम रूप से पर्याप्त मिट्टी चढ़ाकर गन्ने को गिरने से बचा कर अच्छी फसल जी जा सकती है। बॅधाई अधिक उर्वरक दिये जाने तथा उत्तम फसल प्रबन्धन के कारण फसल की बढ़वार अच्छी हो जाती है किन्तु जब गन्ना 2.5 मीटर से अधिक लम्बा हो जाता हैं जो वर्षाकाल में गिर जाता है। जिससे उसके रसोगुण पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। अतः गन्ने के थानों को गन्ने की सूखी पत्तियों से ही लगभग 100 सेमी.ऊॅचार्ई पर जुलार्ई के अंतिम सप्ताह में तथा दूसरी बॅधाई अगस्त में पहली बॅधाई से 50 मीटर ऊपर तथा अगस्त के अन्त में एक पंक्ति के दो थान व दूसरी पंक्ति के एक थाने से और इस क्रम को उलटते हुए त्रिकोणात्मक बॅधाई करनी चाहिए। सिंचाई प्रदेश के विभिन्न भागों में गन्ना फसल को 1500 से 1750 मिली. पानी की आवश्यकता होती जिसका ऑसतन 50 प्रतिशत वर्षा से प्राप्त होता है शेष पचास प्रतिशत सिंचाई से पूरा किया जाता है। प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र में 4-5 मध्य क्षेत्र में 5-6 तथा पश्चिमी क्षेत्र में 6-7 सिंचाई (2 सिंचाई वर्षा के उपरान्त) करना लाभप्रद पाया गया है। नमी के कमी की दशा में बुवाई के 20-30 दिन के बाद एक हल्की सिंचाई करने से अपेक्षाकृत अच्छा जमाव होता है। ग्रीष्म ऋतु में 15-20 दिनों के अंतर पर सिचाई करते रहना चाहिए। उर्वरक गन्ना फसल के लिए आवश्यक पोषक तत्वों में नत्रजन का प्रभाव सर्वविदित है। पोटाश और फासोरस का प्रयोग मृदा के उपरान्त कमी पाये जाने पर ही किया जाना चाहिए। अच्छी उपज के लिए गन्ने में 150 से 180 किग्रा. नत्रजन/हे. प्रयोग करना लाभप्रद पाया गया है। मृदा की भौतिक सुधारने, मृदा में ह्यूमस स्तर बढ़ाने व उसे संरक्षित रखने, मृदा में सूक्ष्म, जीवाणु गतिविधियों के लिए आदर्श वातावरण बनाये रखने के साथ ही निरंतर फसल लिये जाने, रिसाव व भूमि क्षरण के कारण मृदा में पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने के उद्देश्य से हरी खाद एफ०वाई०एम० कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट सड़ी प्रेसमड आदि का प्रयोग किया जाना चाहिए। यदि भूमि में सूक्ष्म तत्वों जैसे जस्ता, लोहा, मैग्नीशियम, गंधक आदि की कमी हो तो उनका प्रयोग भी संस्तुति के अनुसार किया जा सकता है। खरपतवार नियंत्रण एक बीज पत्री खरपतवार सेवानी, खरमकरा, दूब, मोथा, कॉस व फुलवा आदि। दिव्बीज पत्री खरपतवार मकोय, हिरनखुरी, महकुआ, पत्थरचट्टा, बड़ी, दुद्धी, हजारदाना, कृष्णनील, तिनपतिया, जंगली जूट, बथुआ व लटजीरा आदि। खरपतवार नियंत्रण हेतु निम्नलिखित विधियॉ यांत्रिक नियंत्रण गन्ने के खेत को कस्सी/कुदाल/फावड़ा/कल्टीवेटर आदि से गुड़ाई करके खरपतवार नियंत्रित किया जा सकता है। सूखी पत्ती बिछाना जमाव पूरा हो जाने के उपरान्त गन्ने की दो पंक्तियों के मध्य आठ से बारह सेमी. सूखी पत्तियों की तह बिछाना चाहिए। सावधानी के तैार पर 25 किग्रा० मैलाथियान का 5 प्रतिशत धूल या लिण्डेन 1.3 प्रतिशत धूल का प्रति हेक्टेयर की दर से सूखी पत्तियों पर धूसरण करना चाहिए। रासायनिक नियंत्रण अ) 2-4 पी (50 डब्लू) 2.21 किग्रा. प्रति हेक्टेयर एवं 2-4 डी सोडियम साल्ट 80 प्रतिशत टेक्नीकल 1.25 किग्रा. प्रति हे. की दर से जमाव पूर्व प्रयोग करें। ब) पेंडामिथलीन- 3.3 लीटर/हे मोथा एवं एक बीज पत्रीय खरपतवारों के प्रभावी नियंत्रण हेतु 3 किग्रा.प्रति हे. की दर से जमाव से पूर्व प्रयोग करें। स) एट्राजीन 50 प्रतिशत पी व 2-4 डी : सोडियम साल्ट 80 प्रतिशत टेक्नीकल एट्राजीन 2.00 किग्रा. प्रति हे. जमाव पूर्व तथा 2-4 डी सोडियम साल्ट 80%,2.00 किग्रा. प्रति हे. की दर से जमाव पूर्व प्रयोग करने से अधिकांश एक बीज पत्रीय व दिवबीज पत्रीय खरपतवार नष्ट हो जाते हैं। प्रमुख रोग, उनका आपतन काल लक्षण एवं नियंत्रण रोग का नाम आपतन काल प्रमुख लक्षण काना रोग जुलाई के अंत तक 1. अगोले के ऊपर से तीसरी व चौथी पत्ती के किनारे से गन्ना सूखने लगता है। 2.रोग की अंतिम अवस्था में पूरा अगोला सूख जाता है। 3.तने को लंबवत चीरने पर गूदे का रंग लाल तथा इसमें सफेद धब्बे दिखाई पड़ते हैं। 4.गूदे से सिरके जैसे गंध आने लगती है। पूरा गन्ना सूख जाता है और सूखा गन्ना गॉठों पर से सरलता से टूट जाता है। कण्डुआ रोग का नाम वर्ष भर विशेषकर आपतन काल अप्रैल व जून, अक्टूबर, नवम्बर तथा फरवरी 1.गन्ने अपेक्षाकृत पतले हो जाते हैं तथा तने प्रमुख लक्षण पर पतली व नुकीली पत्तियॉ एक ही गॉठ से विपरीत दिशाओं में निकलने लगती हैं। 2.रोग की अंतिम अवस्था में अग्रभाग की बढ़वार रूक जाती है और लंबा कोढ़ा निकल जाता है। 3.गन्ने की निचली ऑखें समय से पूर्व अंकुरित हो जाती है। उकठा अक्टूबर से अंत तक 1.धीरे-धीरे गन्ने का पूरा अगोला सूख जाता है। 2.पूरा गन्ना खोखला हो जाता है। 3.लंबवत् चीरने पर खोखले भाग में भूरे रंग की फफूदी भरी दिखाई देती है। लाफ स्काल्ड अक्टूबर से अंत तक 1.अगोले की पत्तियॉ सुख कर सीधी हो जाती है तथा बाद में धीरे-धीर अगोला सूख जाता है। 2.नीचे से प्रारम्भ हो कर क्रमशः ऊपर की सभी ऑखें समय से पूर्व अंकुरित हो जाती हैं और फिर निकले किल्ले सूख जाते है। ग्रासीशूट प्रारम्भ से अंत तक 1.पत्तियॉ र्अद्धपारदर्शक कागज की तरह हल्के पीले रंग की हो जाती है। तथा मध्य धारी के सामानान्तर सफेद धारियॉ पड़ जाती हैं। 2.पूरा थान झाड़ीनुमा हो जाता है। नियंत्रण गन्ने में वानस्पतिक प्रवर्धन होने के कारण अधिकांश फसल वर्ष स्वतः संक्रमित होती रहती है। अतः नियंत्रण की अपेक्षा सावधानी हेतु निम्न सरल उपाय अति आवश्यक है रोगरोधी जातियों का चयन। स्वस्थ बीज का चयन। रोगोन्मूलन- रोगी फसल की पेड़ी नहीं रखनी चाहिए। फसल चक्र अपनाना चाहिए ताकि गन्ने के बाद पुनः गन्ना न लिया जा सके। खेत में जल निकास की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। फसल कटाई के उपरान्त गहरी जुताई करनी चाहिए। उष्णोपचार नम गर्म वायु यंत्र से 54 डिग्री. से पर 4 घंटे तक बोने से पूर्व बीज गन्ने की उपचारित करने से भी उपरोक्त रोग नियंत्रित हो जाते हैं। नाशकीट आपतन काल नियन्त्रण के उपाय गन्ने की प्रमुख नाशकीट, उनका आपतन काल एवं नियंत्रण दीमक वर्षभर 1. ब्यूवेरिया, बैसियाना 1.15 प्रतिशत बायोपेस्टीसाइड 2.5-5.0 किग्रा. प्रति हे. 60-75 किग्रा.; गोबर की खाद में मिलाकर हल्के पानी का छीटा देकर 8-10 दिन तक छाया में रखने के उपरान्त प्रयोग करना चाहिए। 2. इमिडा क्लोप्रिड 17.8 एस.एल. 350 मिली सिंचाई के पानी के साथ प्रयोग करना चाहिए। अंकुर बेधक ग्रीष्मकाल 1. क्लोरपाइरीफास 20% घोल-1.5 लीटर प्रति हे. 800-1000 लीटर पानी के घोलकर अथवा फोरेट सी. सी. 30 किग्रा. अथवा कार्बोफ्यूरान 30 किग्रा. प्रति हे. की दर से बरकाव करना चाहिए अथवा ट्राइको गामा 10 कार्ड प्रति हे. की दर से प्रयोग करना चाहिए। चोटी बेधक मार्च से अक्टूबर 1. ग्रीष्मकाल में प्रभावित किल्लों और बेधक के अंडसमूह को निकालना तथा नष्ट करना। ट्राइकोग्रामा 10 कार्ड प्रति हे. की दर से। अथवा फोरेट 10 सी सी 30 किग्रा./हे. 2. कार्बोफ्यूरान 3 जी. का 30 किग्रा. प्रति हे. की दर से नमी की दशा में प्रयोग करना। तना बेधक अगस्त से फरवरी मोनोक्रोटोफास 36% 2.00 ली./हे. दवा को 800-1000 लीटर पानी में मिलाकर अगस्त से अक्टूबर तक तीन सप्ताह के अंतर पर तीन बार छिड़काव करना। कुरमुला सफेद गिड़ार जुलाई से नवम्बर 1. प्रभावित खेतों को अगस्त-सितम्बर माह में 15 सेमी. गहराई में जुताई करना। 2. क्लोपाइरीफास 20 प्रतिशत ई०सी० 1.5 ली.प्रति.हे. 800-1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना। अथवा 3. कार्बेफ्यूरान 3 प्रतिशत सी.सी. 25-30 किग्रा.प्रति हे. अथवा 4. फेनवलरेट 10 प्रतिशत सी.सी.25 किग्रा. बुरकाव करना चाहिए। पायरिला मार्च से नवम्बर मोनोक्रोटाफास 36% 375 मिली. या डाईक्लोरवास 76 ई.सी. 300 मिली. या क्वीनालफास 25% 800 मिली./हे. को (625 लीटर ग्रीष्म काल व 1250 लीटर वर्षाकाल) पानी में मिलाकर छिड़काव करना। काला चिकटा ग्रीष्मकाल डाईमेथोएट 30% 825 मिली. या डाईक्लोरवास 76 ई.सी. 250 मिली.या क्वीनालफास 25% 800 मिली./हे. पानी में मिलाकर छिड़काव करना। शल्क कीट जुलाई से फरवरी गन्ने की कटाई के उपरान्त सूखी पत्तियों को जलाना सफेद मक्खी अगस्त मैलाथियान 50% 1 ली.दवा को 1250 लीटर पानी में मिलाकर घोल का छिड़काव करना। स्त्राेत : पारदर्शी किसाना सेवा याेजना, कृषि विभाग, उत्तरप्रदेश।