<p style="text-align: justify;">फ्लेमिंजिया सेमियालता या कुसुमी लाख एक झाड़ीनुमा लाख कीट पोषक पौधा है। इसे झारखण्ड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश एवं पश्चिम बंगाल में लाख की खेती के लिए व्यापक रूप से अपनाया गया है। झाड़ीनुमा होने के कारण, इसे वर्ष दर वर्ष होने वाली काट-छांट एवं दूसरी ओर लाख कल्चर से उत्पन्न होने वाले तनाव को झेलने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है। फ्लेमिंजिया सेमियालता को बारानी स्थिति में उगाया जाता है, जिससे नयी शाखाओं का पुनर्जनन अर्थात पुनः फुटान कम हो पाती है।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/ccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccdownload.jpg" width="210" height="250" /></p> <p style="text-align: justify;">कुसुमी (अगहनी) लाख फसल की कटाई भी गर्मियों के महीनों की शुरुआत से ठीक पहले (फरवरी मध्य) में की जाती है। कुछ बड़े आकार के पौधे, जोकि जमीन के नीचे पर्याप्त संरक्षित भोजन (खाद्य) रखते हैं, पुरानी शाखाओं को पुनर्जीवित कर पाते हैं। ऐसे पौधे बहुत ही कम पूरक सिंचाई से जीवित रह पाते हैं एवं इस प्रकार जुलाई में अच्छी पौध तैयार हो पाती है। अन्य कमजोर पौधे/नयी शाखाएं या तो मानसून आने के बाद उपजते हैं या पिफर मर जाते हैं। इसके लिए किसान को पौधों के बीच के अंतर को भरने के लिये गैप-फिलिंग की व्यवस्था करनी पड़ती है। जीवित पौधे भी आगामी वर्षों में कमजोर होते जाते हैं। उचित पोषण प्रबंधन में पौधों को मरने से दो प्रकार से रोका जा सकता है। एक तो अच्छी पौध वृद्धि लाख कल्चर से होने वाली पौध मृत्युदर को रोक सकती है, दूसरा उचित प्रबंधन से बागान में मजबूत पौधे उत्पादित होते हैं और नयी शाखाओं का पुनर्जनन संतोषजनक होता है। </p> <h3 style="text-align: justify;">पोषक तत्वों का पादप वृद्धि एवं लाख उत्पादन पर प्रभाव </h3> <p style="text-align: justify;">10 मि.मी. एवं इससे अधिक मोटाई की शाखाओं की संख्या/अनुपात लाख उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण पादप गुण माना जाता है। चूना, बोरॉन, नाइट्रोजन (25 ग्राम) एवं एनपीके सम्मिश्रण का प्रयोग, शाखाओं की मोटाई बढ़ाने (40-44 प्रतिशत) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यहां यह बताना जरूरी है कि पोटेशियम प्रयोग का पादप वृद्धि पर विपरीत प्रभाव, पोटेशियम प्रयोग किये पौधों में लाख की अच्छी वृद्धि के कारण होता है। </p> <p style="text-align: justify;">लाख उत्पादन क्षमता को आंकने में 'छिली लाख का वजन प्रति मि. बीहन लाख',एक विश्वसनीय मापदंड माना जा सकता है। इस मापदंड के साथ ज्यादा से ज्यादा लाख उत्पान पोटेशियम (30 ग्राम प्रति पौधा) चूना (375 कि.ग्रा./हैक्टर एवं नाइट्रोजन (25 ग्राम प्रति पौधा), का प्रयोग करके क्रमशः प्राप्त किया जा सकता है। </p> <p style="text-align: justify;">पोटेशियम की साधारण खुराक (30 ग्राम/पौधा) का प्रदर्शन 60 ग्राम/पौधो से बेहतर होता है। परिणाम यह दर्शाता है कि पोटेशियम प्रयोग की उच्च दर के कारण रॉल उपज में उल्लेखनीय रूप से कमी आती है। इसके साथ ही पौधे के बायोमॉस में भी कमी आती है। शायद पोटेशियम की उच्च दर ही लाख कीट के शुरू में प्रचुर वृद्धि होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जिससे पादप स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। बाद में पौधों की वृद्धि में कमी के कारण लाख उपज में भी कमी आती है। इसी प्रकार नाइट्रोजन प्रयोग की उच्च दर (50 ग्राम) के कारण लाख उपज में उल्लेखनीय रूप से कमी देखी गई। नाइट्रोजन की उच्च उदग्रहण की वजह से लाख कीट की प्रतिकूल कायिक गतिविधि लाख उपज में कमी का कारण हो सकती है। </p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccdownload2.jpg" width="250" height="160" /></p> <p style="text-align: justify;">सूक्ष्म पोषक तत्वों के प्रयोग के कारण छिली लाख का उत्पादन उल्लेखनीय रूप से प्रभावित नहीं होता है। जस्ता, तांबा, बोरॉन और मॉलिब्डेनम के प्रयोग से लाख उत्पादन में बहुत पफर्क नहीं पड़ता है। सभी के प्रयोग से लाख उत्पादन लगभग एक-दूसरे के बराबर होता है। यह दर्शाता है कि झारखंड की अम्लीय मृदा में इन सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी उस स्तर तक नहीं है, जो लाख उत्पादन को प्रभावित कर सके।</p> <h3 style="text-align: justify;">अनुशंसा </h3> <p style="text-align: justify;">जहां मृदा पी-एच मान 4.5-5.5 हो वहां 1025 कि.ग्रा. चूना/हैक्टर और जहां मृदा पी-एच मान 5.5-6.0 वहां 375 कि.ग्रा. चूना, सेमियालता के पौधों की वृद्धि एवं लाख उत्पादन के संतोषजनक परिणाम के लिए प्रयोग करने की सिफारिश की गई है। </p> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 100%;"> <h3>चूना है वृद्धिकारक</h3> <p style="text-align: justify;">अच्छे लाख उत्पादन के लिए, पोषक पौधों की औसतन वृद्धि संतोषजनक होनी चाहिए। चूना प्रयोग एक वृद्धिकारक घटक है, और यह मृदा के अधिकाशं भौतिक-रासायनिक गुणों को प्रभावित कर सकता है। इस कारण पौधे का कुल बॉयोमास उत्पादन (जमीन का सतह से ऊपर का उत्पादन), इस तत्व के प्रयोग से ज्यादा पाया जाता है। यही कारण हो सकता है कि चूने के प्रयोग से रेजिन पैदावार भी प्रति इकाई लंबाई में बिल्कुल संतोषजनक है। साधारणतः शाखाओं में शुष्क तत्व एवं मृदा का CaCo3 प्रतिशत बढ़ने से लाख उपज घट सकती है। किन्तु प्रयोग के दौरान मि.ली. CaCo3 का उर्वरता मान इतनी अधिक नहीं रहता, जिससे लाख उपज उल्लेखनीय रूप से प्रभावित हो।</p> </td> </tr> </tbody> </table> <p style="text-align: justify;">झारखंड की अम्लीय लैटरिटिक मृदा में फ्लेमिंजिया सेमियालता में कुसमी लाख उत्पादन के लिए अधिकतम 25, 5 एवं 30 ग्राम क्रमशः N,P<sub>2 </sub>O<sub>5 </sub>एवं K2 से उपजाऊ बनाया जा सकता है। पोटेशियम फास्फोरस परूी खरुाक आरै नाइट्रोजन की आधी खुराक, मानसून आगमन के दौरान प्रयोग की जानी चाहिए। नाइट्रोजन की दूसरी खुराक अगस्त के तीसरे सप्ताह में प्रयोग करनी चाहिए।</p> <h3 style="text-align: justify;">लाभ</h3> <p style="text-align: justify;">फ्लेमिंजिया सेमियालता पर लाख की खेती, सब्जियों की खेती करने के एक विकल्प के रूप में की जा सकती है। समाज में आय अर्जन के संदर्भ में इससे बहुत सकारात्मक परिवर्तन की आशा की जा सकती है। अनुशंसित उर्वरक खुराक के प्रयोग से, किसानों के लाभ में 69 प्रतिशत तक वृद्धि की संभावना हो सकती है।</p> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 100%;"> <h3>फ्लेमिंजिया सेमियालता के पोषक गुण</h3> <p style="text-align: justify;">तने में शुष्क तत्व का प्रतिशत लाख उत्पादकता निर्धारित करने वाला एक महत्वपूर्ण गुण है। शाखाओं में शुष्क तत्व प्रतिशत कम होना पोषक पौधे की अधिक उत्पादन क्षमता का द्योतक है। बोरॉन, पोटेशियम, नाइट्रोजन (50 ग्राम), एनपीके सम्मिश्रण अपेक्षाकृत कम शुष्क तत्व वाली (25.2-26.4 प्रतिशत) मुलायम शाखाएं उत्पादित करता है। चूना प्रयोग से तनों में शुष्क तत्व प्रतिशत बढ़ जाता है। चूना प्रयोग सबसे ज्यादा शुष्क तत्व प्रतिशत (28.8 प्रतिशत) बढ़ाता है, किन्तु सेमियालता में प्राप्त मान इतना कम है कि उपज में किसी प्रकार की कमी नहीं दिखाई देती। यह इस पोषक वृक्ष की उत्कृष्टता का परिचायक है। किसी भी तरीके या प्रयोग का प्रभाव पौधों की बायोमॉस उत्पादन क्षमता द्वारा सबसे ज्यादा प्रतिफलित होता है। सबसे ज्यादा बायोमॉस उत्पादन चूना, नाइट्रोजन प्रयोग एवं एनपीके सम्मिश्रण के प्रयोग से प्राप्त होता है। इस प्रकार चूना लेटेराइटिक मृदाओं की उर्वरता को सुधारने में सबसे अधिक वास्तविक एवं लाभदायक उपाय के रूप में उभरकर सामने आता है। इससे इन मृदाओं को लाख उत्पादन के लिए अनुकूल बनाया जा सकता है। केवल चूना प्रयोग से ताजा वजन में 19.5 प्रतिशत बढ़त देखी गयी है।</p> </td> </tr> </tbody> </table> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : खेती पत्रिक एस. घोषाल और एस. सी. मीणा' 'भाकृअनपु-भारतीय प्राकृतिक रॉल एवं गोंद सस्ंथान, नामकुम, रांची (झारखंड)</p>