भारत ने बदलते समय के साथ खाद्य सुरक्षा में अग्रिम स्थान प्राप्त किया है। भोजन का स्वास्थ्य में योगदान प्रत्यक्ष है। यह जरुरी है कि भोजन में सभी पोषक तत्व विभिन्न स्रोतों से लिए जाएं। आज देश में प्रोटीन की कमी की समस्या है। सोयाबीन इस समस्या का एक सार्थक विकल्प है। यह खरीफ की मुखय तिलहनी फसल है। देश में सोयाबीन उत्पादन 2017-2018 खरीफ में 11.7 मिलियन टन रहा। इस फसल की लोकप्रियता देश के विभिन्न राज्यों में बढ़ती जा रही है। सोयाबीन उत्पादन में मध्य प्रदेश (49.95 प्रतिशत) का प्रथम व महाराष्ट्र (36.28 प्रतिशत) का स्थान द्वितीय है। यह पौष्टिक तत्वों से परिपूर्ण है और स्वास्थ्य संबंधी लाभों के लिए उपयुक्त है। इसमें में 20 प्रतिशत वसा होती है, जिसमें ओमेगा-6 एवं ओमेगा-3 आवश्यक वसीय अम्ल अधिक मात्रा में पाए जाते हैं और ये अम्ल हृदय रोगी के लिए विशेष रूप से उत्तम होते हैं। खेती के लिए भूमि एवं तैयारी सोयाबीन की खेती सभी प्रकार की मृदाओं में (अति अम्लीय क्षारीय व रेतीली मृदाओं को छोड़कर) की जा सकती है। मृदा में अच्छा जल निकास होना चाहिए तथा जैविक कार्बन की मात्रा भी अच्छी होनी चाहिए। पानी के सही निकास वाली चिकनी दोमट मिट्टी सोयाबीन की खेती के लिए अधिक उपयुक्त है। ग्रीष्मकालीन जुताई 3 वर्ष में कम से कम एक बार अवश्य करनी चाहिए। वर्षा प्रारंभ होने पर 2 या 3 बार बखर तथा पाटा चलाकर खेत को तैयार कर लेना चाहिए। इससे हानि पहुंचाने वाले कीटों की सभी अवस्थाएं नष्ट होती हैं। ढेलारहित और भुरभुरी मिट्टी वाले खेत सोयाबीन के लिए उत्तम होते हैं। खेत में पानी भरने से सोयाबीन की फसल पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। अतः अधिक उत्पादन के लिए खेत में जल निकास की व्यवस्था करना आवश्यक है। बखरनी एवं पाटा समय से करें, जिससे अंकुरित खरपतवार नष्ट हो सकें। मेड़ और कूंड़ बनाकर सोयाबीन बोएं। सारणी 1. सोयाबीन का पोषक मान (प्रतिः 100 ग्राम) पानी 8.3 ग्राम जिंक 5.1 मि.ग्रा ऊर्जा 409 किलो कैलोरी कॉपर 1.9 मि.ग्रा ऊर्जा 1691 किलो मैगनीज 2.64 मि.ग्रा प्रोटीन 36.9 ग्राम सेलेनियम 18.0 मि.ग्रा वसा 18.9 ग्राम विटामिन सी 7.0 मि.ग्रा कार्बोहाइड्रेट 31.3 ग्राम थायोमिन(विटामिन बी1) 0.9 मि.ग्रा फाइबर 9.6 ग्राम राईबोफ्लेविन(विटामिन बी2) 0.9 मि.ग्रा आइसोफ्लेवंस 200 मि.ग्रा. नियासिन (विटामिन बी3) 1.7 मि.ग्रा कैल्शियम 284 मि.ग्रा. पैथोटोनिक अम्ल(विटामिन बी5) 0.8 मि.ग्रा आयरन 14.9 मि.ग्रा. विटामिन बी6 0.4 मि.ग्रा मैग्नीशियम 270 मि.ग्रा. फोलिक अम्ल 380 माइक्रो ग्राम पोटेशियम 1800 मि.ग्रा. विटामिन बी12 12 0 माइक्रो ग्राम फॉस्पफोरस 709 मि.ग्रा. विटामिन। 3.0 माइक्रो ग्राम सोडियम 3.0 मि.ग्रा. विटामिन ई 2.0 माइक्रो. ग्राम बुआई के लिए बीज दर छोटे दाने वाली किस्में-70 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर मध्यम दाने वाली किस्में-80 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर बड़े दाने वाली किस्में-100 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर बुआई का समय जून के अंतिम सप्ताह और जुलाई के प्रथम सप्ताह तक का समय सबसे उपयुक्त है। अच्छे अंकुरण के लिए भूमि में 10 सें.मी. गहराई तक उपयुक्त नमी आवश्यक है। अगर बुआई जुलाई के प्रथम सप्ताह के बाद हो तो बीज दर 5-10 प्रतिशत बढ़ा देनी चाहिए। 4-5 लाख पौधे प्रति हैक्टर पौध संखया उपयुक्त होते हैं। असीमित बढ़ने वाली किस्मों के लिए 4 लाख एवं सीमित वृद्धि वाली किस्मों के लिए 6 लाख पौधे प्रति हैक्टर होने चाहिए। बीज अंकुरण परीक्षण चयनित सोयाबीन की किस्मों के बीज का अंकुरण परीक्षण (न्यूनतम 70 प्रतिशत) कर इसकी गुणवत्ता बोने से पहले से सुनिश्चित कर लेनी चाहिए। बीजों का उपचार सोयाबीन के अंकुरण को बीज तथा मृदाजनित रोग प्रभावित करते हैं। इसकी रोकथाम के लिए बीज को थीरम या कैप्टॉन 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम मिश्रण प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करना चाहिए। फफूंदनाशक दवाओं से बीज उपचार के बाद बीज को 5 ग्राम राइजोबियम प्रति कि.ग्रा. दर से उपचारित करें। उपचारित बीजों को छाया में रखना चाहिए एवं जल्दी बुआई करनी चाहिए। सोयाबीन पोषण एवं उपयोगिता सोयाबीन पोषक तत्वों से भरपूर एवं पोषण की खान के रूप में जाना जाता है, इसलिए इसे सुनहरे बीन की उपाधि दी गई है। इसमें अधिक मात्रा में प्रोटीन होने के कारण इसका पोषक मान बहुत अधिक होता है। इसमें विटामिन, खनिज तथा विटामिन 'बी' कॉम्प्लेक्स और विटामिन 'ई' काफी अधिक मात्राा में होता है, जो शरीर निर्माण के लिए आवश्यक अमीनो अम्ल प्रदान करते हैं। सोयाबीन खाद्य उत्पादों में आइसोफ्रलेवंस नामक रसायन होता है, जोकि संरचना में एस्ट्रोजन हार्मोन जैसा होता है। यह महिलाओं को ऑस्टियोपोरोसिस के खतरे से बचा सकता है। इसमें प्रोटीन के अन्य सभी उपलब्ध स्रोतों की तुलना में सबसे अधिक यानी लगभग 40 प्रतिशत अच्छी गुणवत्ता के प्रोटीन एवं 20 प्रतिशत तेल की मात्रा होती है। बुआई सोयाबीन की बुआई कतारों में करनी चाहिए। कतारों की दूरी 30 सें.मी. से 45 सें.मी. तक होनी उपयुक्त है। 20 कतारों के बाद कूंड़ जल निथार तथा नमी संरक्षण के लिए खाली छोड़ देना चाहिए। बीज 2सें.मी. से 3.5 सें.मी. गहराई तक बोयें। खाद को पहले खेत में डालकर हल्की मिट्टी में मिला देना चाहिए। खाद और बीज का सीधा संपर्क नहीं रहना चाहिए। इस प्रकिया से अंकुरण क्षमता प्रभावित नहीं होती है। खरपतवार प्रबंधन फसल के शुरुआत के 30 से 40 दिनों तक खरपतवार नियंत्रण बहुत आवश्यक है। 15 से 20 दिनों की खड़ी फसल में खरपतवारों को नष्ट करने के लिए क्लुजेलेफोप इथाइल एक लीटर प्रति हैक्टर अथवा इमेजेथाफायर 750 मि.ली. प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव करें। मिट्टी में पर्याप्त पानी व भुरभुरापन होना चाहिए। पौध संरक्षण विधि कीट नियंत्रण सोयाबीन की फसल पर बीज एवं छोटे पौधो को नुकसान पहुंचाने वाला ब्लूबीटल (पत्ते खाने वाली इल्लियां), तने को नुकसान पहुंचाने वाली तने की मक्खी एवं गर्डल बीटल आदि का प्रकोप रहता है। कीटों के आक्रमण से 5 से 50 प्रतिशत तक पैदावार में कमी आ सकती है। ऐसे में इन कीटों के नियंत्रण के उपाय इस प्रकार हैं: कृषिगत नियंत्रण खेत की ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें। मानसून की बारिश के बाद बुआई नहीं करनी चाहिए। खेतों को फसल अवशेषों से मुक्त रखें तथा मेड़ों की सपफाई रखें। रासायनिक नियंत्रण अंकुरण के प्रारंभ होते ही ब्लूबीटल के नियंत्रण के लिए क्यूनालफॉस 1.5 प्रतिशत या मिथाइल पेराथियान का 25 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर की दर से छिड़काव करना चाहिए। कई प्रकार की इल्लियां, छोटी फलियों और फलों को खाकर नष्ट कर देती हैं। इन कीटों के नियंत्रण के लिए घुलनशील दवाओं की 700 से 800 लीटर मात्रा पानी में घोलकर प्रति हैक्टर छिड़काव करना चाहिए। प्रथम छिड़काव 25 से 30 दिनों पर एवं दूसरा छिड़काव 40-45 दिनों की फसल पर करना चाहिए। जैविक नियंत्रण कीटों की आरंभिक अवस्था में जैविक कीट नियंत्रण के लिए बी.टी. एवं ब्यूवेरिया बैसियाना आधारित जैविक कीटनाशक 1 कि.ग्रा. या 1 लीटर प्रति हैक्टर की दर से बुआई के 35 से 40 दिनों तथा 50 से 55 दिनों बाद छिड़काव करें। जैविक कीटनाशकों का उपयोग रासायनिक कीटनाशकों से अधिक उपयोगी है। कटाई एवं गहाई फलियों का रंग बदलने पर फसल पकने का अनमुान लगाया जा सकता है। इस अवस्था में सोयाबीन की कटाई करनी चाहिए। कटी हुई फसल की 2-3 दिनों धूप में सुखाकर थ्रेशर से धीमी गति (300-400 आरपीएम) पर गहाई करनी चाहिए। इस बात की सावधानी रखनी चाहिए कि गहाई के समय बीज के छिलके को क्षति न हो। सोयाबीन में प्रोटीन व आहारिक रेशे पाये जाते हैं। आयरन की मात्रा अधिक होने के कारण यह एनीमिया को भी नियंत्रित करता है। सोयाबीन में पाई जाने वाली प्रोटीन से रक्त में हानिकारक कोलेस्ट्रॉल की मात्राा को भी कम किया जा सकता है, जिससे हृदय रोग की आशंका कम होती है। इसमें पाये जाने वाले आइसोफ्रलोविन रसायन के कारण महिलाओं से संबंधित रोग व स्तन कैंसर से बचाव होता है। सोयाबीन के उत्पाद सेहत से भरपूर सायोबीन स्वाद में भी उत्तम है। सोया को आमतौर पर एक ऐसे तत्व के रूप में जाना जाता है, जिसका प्रयोग कई तरह से किया जाता है जैसे ड्राई रोस्टेड सोयाबीन के स्नैक्स के रूप में, जो फाइबर यानी रेशे का एक अच्छा स्त्रोत होता है। इसी तरह सोया से तैयार लिक्विड प्रोडेक्ट जैसे सोया मिल्क के रूप में इसका इस्तेमाल गाय के दूध की जगह पर किया जाता है। इससे तैयार टोफू कैल्शियम का अच्छा स्त्रोत है। सोयाबीन से बनने वाले मुखय उत्पाद निम्न हैं: सोया दूध साफ किए हुये सोयाबीन या सोयाबीन की दाल को भिगोकर 6-8 घंटे के लिए रख दें। उसके बाद 1 भाग सोयाबीन तथा 6 भाग पानी के साथ मिक्सी या ग्राइंडर में पीसें तथा तैयार स्लरी को 10 मिनट के लिए उबालें। उसके बाद मलमल के कपड़े से छान लें और स्वादानुसार चीनी मिलायें। ठंडा होने पर मनपसंद खुशबू मिलायें। इस प्रकार 1 कि.ग्रा. सोयाबीन से लगभग 7 लीटर सोया दूध तैयार हो सकता है। सोयाबीन आटा सोयाबीन का आटा वसारहित व वसा सहित दोनों प्रकार का होता है। वसा सहित घर पर बनाया जा सकता है तथा वसारहित बाजार से खरीदा जा सकता है। सोयाबीन को साफ करके पानी में कम से कम 20 मिनट तक उबालें। उसके बाद उसको धूप में सुखा लें। सूखने के बाद इसे पिसवा लें। सोयाबीन के तैयार आटे को गेहूं के आटे या बेसन के साथ मिलाकर विभिन्न खाद्य उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। सूखे हुये सोयाबीन को गेहूं या चने के साथ भी पिसवाया जा सकता है। गेहूं तथा सोयाबीन का अनुपात 9:1 का होना चाहिए। सोयाबीन का वसारहित आटा, प्रोटीन का बहुत ही अच्छा स्रोत है। इसमें 50-60 प्रतिशत प्रोटीन होता है और इसमें बीन की गन्ध भी बहुत कम आती है। इसको आसानी से उपयोग में लाया जा सकता है। गेहूं के आटे में मिलाकर सभी गेहूं के आटे से बनने वाले व्यंजन बनाये जा सकते हैं जैसे-रोटी, डबलरोटी, पूड़ी, पराठा, समोसे आदि। खाद्य पदार्थों में 30 प्रतिशत मिलाने पर भी स्वाद में अंतर नहीं आता है। वसारहित आटे को बेसन के साथ भी मिलाया जा सकता है। बेसन में मिलाने पर खाद्य पदार्थों की पौष्टिक गुणवत्ता बढ़ने के साथ-साथ कीमत भी कम हो जाती है। सोया पनीर (टोफू) सोया पनीर सोयाबीन का सर्वोत्तम खाद्य उत्पाद है। यह आसानी से पचता है। आइसोफ्लेवान की मात्रा इसमें सर्वाधिक मिलती है। जापान में इसको टोफू कहते हैं। इसको बनाने के लिए साफ सोयाबीन को पानी में 5-6 घंटे भिगो लें। उसके बाद मिक्सी में पानी के साथ 1:9 के अनुपात में पीस लें। उसके बाद प्राप्त घोल को उचित तापमान पर उबाल लें। इससे उबले हुए घोल को मलमल के कपड़े से छान लें। छने हुए दूध को गरम करें तथा 5 मिनट बाद कैल्शियम क्लोराइड के घोल से फाड़ लें। उसके बाद 5 मिनट के लिए बिना हिलाये-डुलाये रख दें। फिर मलमल के कपड़े में दबाकर रखें तथा लगभग 10 मिनट बाद कपड़े से निकालकर टुकड़ों में विभाजित कर दें। इस प्रकार 1 कि.ग्रा. सोयाबीन से लगभग 1.5 से 2 कि.ग्रा. सोया पनीर बनाया जा सकता है। सोया पनीर सेचुरेटेड वसा से रहित होता है तथा दिल के मरीजों के लिए प्रोटीन का कम कीमत पर मिलने वाला स्रोत है। अंकुरित सोयाबीन का नाश्ता सोयाबीन 2 भाग तथा 1 भाग चना और 1 भाग मूंग को पानी में भिगोकर 7-8 घंटे के लिए रख लें। इसके लिए तीनों दालों को अलग-अलग कपड़े में बांधकर 6-8 घंटे भिगोकर रखें। जब अंकुरण हो जाये तो साफ पानी से धोकर अंकुरित सोया दालों को हल्की भाप में पका लें। तीनों को मिलाकर हरा धनिया, प्याज, टमाटर, मिर्च तथा नमक व नीबू स्वादानुसार मिलाकर नाश्ते में उपयोग किया जा सकता है। सोयाबीन पोषण के लिए बहुत ही लाभकारी है। आर्थिक दृष्टि से भी यह एक सफल विकल्प है। इसमें मिलने वाला प्रोटीन एवं कैल्शियम बढ़ते शरीर के लिए महत्वपूर्ण है। इसका नियमित सेवन हमें अच्छे स्वास्थ्य की ओर अग्रसर करता है। गोल्डन बीन के नाम से प्रचलित सोयाबीन पोषण एवं आर्थिक दृष्टि से अपने नाम को सार्थक करता है। सोयाबीन से बने उत्पाद जैसे कि सोयाबीन का दूध और सोया पनीर (टो)फू ग्रामीण महिलाओं के लिए पोषण सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक सशक्तिकरण के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। सोयाबीन पोषण एवं आर्थिक दृष्टि से अपने नाम को सार्थक करता है। सोयाबीन से बने उत्पाद जैसे कि सोयाबीन का दूध और सोया पनीर (टोफू) ग्रामीण महिलाओं के लिए पोषण सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक सशक्तिकरण के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। पूसा संस्थान द्वारा विकसित सोयाबीन की उन्नत किस्में पूसा सायोबीन-14 (डी.एस. 26-14) इसकी औसत उपज 20-30 क्विंटल/ हैक्टर है। यह एक मध्यम दाने वाली किस्म है, जिसके 100 दानों का वजन 9.93 ग्राम है। दानों में तेल की मात्रा 20-26 प्रतिशत होती है, जो सोयाबीन में अधिक तेल की श्रेणी में आती है। इसकी बीज जीवंतता अवधि लंबी है। पूसा 9712 इसकी औसत उपज 20.5 क्विंटल/हैक्टर है। यह जल्दी पकने वाली (116 दिनों) किस्म है। पूसा सायोबीन-12 (डी.एस.12-13) इसकी औसत उपज 22.9 क्विटंल/हैकटर है। यह मोटे दाने वाली किस्म है। इसके 100 दानों का वजन 10.53 ग्राम होता है। इसके बीजों की लंबी जीवन्तता अवधि है। दानों म में तेल की मात्रा 19.60 प्रतिशत है। पूसा 9814 इसकी औसत उपज 22.5 क्विंटल/हैक्टर है। यह किस्म पीत मोजेक वायरस, सोयाबीन मोजेक वायरस एवं फली झुलसा की प्रतिरोधी है। स्त्रोत : खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर),लेखक: सत्यप्रिय, प्रेमलता सिंह, चेतना नागर, रवि शंकर और सत्य प्रकाश कृषि प्रसार संभाग, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली-110012